Skip to main content
Share your content
Ask a question
Toggle navigation
?
Ask a Question?
Main navigation
Home
Data
People & Content
Data Finder
MET Data
State of Sanitation
Articles
Books and Book Reviews
Interviews
People and Organisations
Research Papers
Success Stories and Case Studies
Travel and Tourism
Video, Audio and other Multimedia
Weekly News and Policy Updates
View all Articles
Opportunities & Events
Topics
Solid Waste
Rainwater Harvesting
Rural Sanitation
Agriculture
Groundwater
Privatization
Livestock
Mining
Springs
Schools
View All Topics
पुस्तकें और पुस्तक समीक्षा
Term Path Alias
/sub-categories/books-and-book-reviews
छः ग्रह एकै रासि बिलोकौ
घाघ और भड्डरी
Posted on 25 Mar, 2010 03:17 PM
छः ग्रह एकै रासि बिलोकौ।
महाकाल को दीन्हों कोकौं।।
भावार्थ-
जब छः ग्रह एक ही राशि में हो तो समझो महाकाल को निमन्त्रण दिया गया है।
चैत पूर्णिमा होइ जो
घाघ और भड्डरी
Posted on 25 Mar, 2010 03:14 PM
चैत पूर्णिमा होइ जो, सोम गुरौ बुधवार।
घर घर होइ बधावड़ा, घर घर मंगलचार।।
भावार्थ-
यदि चैत की पूर्णिम सोमवार, वृहस्पतिवार या बुधवार को पड़े तो घर-घर आनन्द की बधाई बजेगी और मंगलचार होगा।
चैत सुदी रेवतड़ी जोय
घाघ और भड्डरी
Posted on 25 Mar, 2010 03:08 PM
चैत सुदी रेवतड़ी जोय। बैसाखहिं भरणी जो होय।।
जेठ मास मृगसिर दरसंत। पुनरबसू आषाढ़ चरंत।।
जितो नछत्र की बरत्यो जाई। तेतो सेर अनाज बिकाई।।
भावार्थ-
चैत सुदी (कृष्ण) में रेवती, वैशाख में भरणी, ज्येष्ठ में मृगशिरा और आषाढ़ में पुनर्वसु जितने भी घड़ी रहेगी, अनाज उतने सेर बिकेगा।
चैत अमावस जै घड़ी
घाघ और भड्डरी
Posted on 25 Mar, 2010 03:06 PM
चैत अमावस जै घड़ी, परती पत्रा माँहिं।
तेता सेरा भड्डरी, कातिक धान बिकाहिं।।
भावार्थ-
पचांग में चैत की अमावस जितनी घड़ी की होगी कातिक में धान उतने ही सेर बिकेगा, ऐसा भड्डरी का मानना है।
गहता आथा गहतो ऊगै
घाघ और भड्डरी
Posted on 25 Mar, 2010 03:04 PM
गहता आथा गहतो ऊगै।
तोऊ चोखी साख न पूगै।।
शब्दार्थ-
गहता-ग्रहण। आथा-अस्त। ऊगै-उदय।
भावार्थ-
यदि ग्रहण ग्रस्तोदय (लगा हुआ ही उदय) और ग्रसातास्त (लगा हुआ अस्त) हो तो फसल अच्छी नहीं होगी।
कै जु सनीचर मीन को
घाघ और भड्डरी
Posted on 25 Mar, 2010 03:02 PM
कै जु सनीचर मीन को, कै जु तुला को होय।
राजा बिग्रह प्रजा छय, बिरला जीवै कोय।।
भावार्थ-
शनिश्चर मीन का हो या तुला का, दोनों ही परिस्थिति में राजाओं में युद्ध होगा, प्रजा का नाश होगा और शायद ही कोई जीवित बचे।
एक मास में ग्रहण जो दोई
घाघ और भड्डरी
Posted on 25 Mar, 2010 03:01 PM
एक मास में ग्रहण जो दोई।
तो भी अन्न महंगो होई।।
भावार्थ-
यदि एक महीने में दो ग्रहण लगे तो अन्न महँगा होगा।
एक पाख दो गहना
घाघ और भड्डरी
Posted on 25 Mar, 2010 02:59 PM
एक पाख दो गहना।
राजा मरै कि सहना।।
शब्दार्थ-
सहना- अधीनस्थ राजकर्मचारी। नगर प्रधान।
भावार्थ-
यदि एक पक्ष में दो ग्रहण लगे तो राजा या शाहंशाह में से कोई एक मरेगा।
असाढ़ मास पुनगौना
घाघ और भड्डरी
Posted on 25 Mar, 2010 02:55 PM
असाढ़ मास पुनगौना। धुजा बाँधि के देखौ पौना।
जो पै पवन पुरब से आवै। उपजै अन्न मेघ झर लावै।।
अगिन कोन जो बहै समीरा। पड़ै काल दुख सहै सरीरा।।
दखिन बहै जल थल अलगीरा। ताहि समें जूझैं बड़ बीरा।।
तीरथ कोन बूँद ना परैं। राजा परजा भूखन मरैं।।
पच्छिम बहै नीक कर जानो। पड़ै तुसार तेज डर मानो।।
अद्रा भद्रा कृत्तिका
घाघ और भड्डरी
Posted on 25 Mar, 2010 02:52 PM
अद्रा भद्रा कृत्तिका, असरेखा जो मघाहिँ।
चन्दा ऊगै दूज को, सुख से नरा अघाहिँ।।
भावार्थ-
द्वितीया का चन्द्रमा यदि आर्द्रा, भद्रा (भाद्रपद), कृत्तिका, अश्लेषा या मघा में उदित हो, तो मनुष्य को सुख ही सुख प्राप्त होगा।
Pagination
First page
« First
Previous page
‹ Previous
…
Page
172
Page
173
Page
174
Page
175
Current page
176
Page
177
Page
178
Page
179
Page
180
…
Next page
Next ›
Last page
Last »
Subscribe to पुस्तकें और पुस्तक समीक्षा
×
Email Address