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झारखंड
झारखंड में नरेगा
Posted on 03 Jul, 2009 10:51 PMझारखंड में नरेगा की बदहाली खुद सरकारी आंकड़ों से बयान होती है। यह इस राज्य का एक और बड़ा दुर्भाग्य है। नरेगा कानून का लाभ उठाकर देश के अन्य राज्य अपनी ग्रामीण आबादी की किस्मत संवार रहे है। लेकिन झारखंड में इसकी पूरी राशि लूट का शिकार हो रही है।
लूट ली हरमू नदी
Posted on 03 Jul, 2009 09:23 AMरांची की लाइफ लाइन हरमू नदी का चीरहरण पहले तो किनारे बसे लोगों ने किया फिर जमीन दलालों ने ऐसी लूट मचायी कि नदी की पहचान भी मिटी और लोग धोखा भी खाते गए। प्रशासन द्वारा गंगानगर और विद्यानगर क्षेत्र में दूसर दिन बुधवार को हरमू नदी की युद्धस्तर पर हुई मापी के दौरान एसे मामलों का खुलासा हुआ। मापी में महज आधा किलोमीटर क्षेत्र में हरमू नदी के पेट में 45 से भी अधिक मकान बनने के भी निशान मिले।झारखंड के शहरों में पानी संकट
Posted on 24 Mar, 2009 05:51 AMडॉ हेम श्रीवास्तव / 21 मार्च09/ हिन्दुस्तानबुंडू में नदी-नाले सूखे पेयजल की किल्लत
Posted on 14 Mar, 2009 09:25 AMहिन्दुस्तान ब्यूरोरांची, 10 मार्च। कांची नदी में पानी कम होने के कारण बुंडू पेयजल आपूर्ति योजना बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। पेयजल एवं स्वच्छता प्रमंडल रांची पूर्व के कार्यपालक अभियंता उमेश प्रसाद गुप्ता ने पत्र में कहा है कि गर्मी शुरू होते ही कांची नदी का जल बहाव काफी कम हो गया है।
साभार – दैनिक हिन्दुस्तान
दामोदर नदी ने रास्ता दिखाया
Posted on 19 Dec, 2008 11:02 AMविल्काक्स (1930) ने पिछले समय में बंगाल के वर्ध्दमान जिले में दामोदर नदी द्वारा घाटी में सिंचाई पद्धति के बारे में बड़ा ही दिलचस्प विवरण दिया।
हिंडाल्को इंडस्ट्रीज़, मूरी , झारखंड: संरक्षण, उत्सर्जन शोधन और पुनर्चक्रण
Posted on 08 Oct, 2008 07:40 PMएल्युमीनिया के उत्पादन में पानी का बहुत अधिक इस्तेमाल होता है। विषैले उत्सर्जन और ग्रीन हाउस गैसों माध्यम से इसका पर्यावरण पर गहरा असर होता है। ऐसे में पानी के इस्तेमाल और अन्य उत्सर्जन में कमी के किसी भी प्रयास को प्रोत्साहित करना चाहिए। हिंडाल्को इंडस्ट्रीज़ ने उत्पादन प्रक्रिया और अपनी टाउनशिप मूरी में इस्तेमाल होने वाले पाने के पुनर्चक्रण के लिए कई कदम उठाए हैं। इसके साथ ही कंपनी ने आस-पास केमौत का पानी : दीपांकर चक्रवर्ती
Posted on 17 Sep, 2008 12:15 PMअंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पानी में आर्सेनिक नामक विषैले तत्व की मौजूदगी की ओर उस वक्त लोगों का ध्यान गया, जब 1994-95 में 'द एनालिस्ट' में आपका शोधपत्र छपा, जिस पर 1996 में 'द गार्डियन' में छपे एक लेख में 'द वाटर ऑफ डैथ' (मौत का पानी) शीर्षक से टिप्पणी की गई थी। भूजल में आर्सेनिक विशाक्तता अब पानी को मौत का पानी बना रही है, इंडिया वाटर पोर्टल के लिए दिए गये साक्षात्कार की हिन्दी प्रस्तुतितालाबों ने किया सिंगारी गांव का कायाकल्प
Posted on 11 Sep, 2008 05:21 PMसुधीर पाल, भारतीय पक्ष/उन्हें नहीं पता कि देशभर की नदियों को जोड़ने की योजना बनाई जा चुकी है। इस योजना से होने वाले नफा-नुकसान से भी उनका कोई सरोकार नहीं है। उनके पास तो नदियां हैं ही नहीं, बस तालाब हैं और वे इसे ही जोड़ने की योजना पर काम कर रहे हैं। तालाबों को जोड़ने के लिए उनके पास श्रम की पूंजी है और नतीजे के रूप से चारों ओर लहलहाती फसल। यही वजह है कि झारखंड के इस गांव में अब कोई प्या
जलवायु परिवर्तन में ‘जस्ट ट्रांजिशन' विकास का नया मानदंड
Posted on 10 May, 2022 08:56 AMआज पूरी दुनिया के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है–जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव‚ जिसके पीछे वर्तमान विकास मॉडल और मानव जनित कारणों से पैदा हुई ग्लोबल वार्मिंग और अनियंत्रित कार्बन उत्सर्जन की समस्याएं हैं‚ के ठोस समाधान और वैकल्पिक विकास ढांचे पर सभी देशों के बीच सहमति के लिए ‘यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' के तत्वावधान में साल–दर–साल व्यापक नीतिगत विमर्श और विजनरी एजें