पानी-पर्यावरण मास्टर - मास्टर मोहन कांडपाल 

एक खाव बनती हुई
एक खाव बनती हुई

प्यार से पर्यावरण वाले मास्साब के नाम से जाने जाने वाले मोहन चंद्र कांडपाल का जन्म वर्ष 1966 में कुमाऊं की पहाड़ियों में स्थित अल्मोड़ा, उत्तराखंड के विकासखंड द्वाराहाट के ग्राम कांडे में श्री गोपाल दत्त कांडपाल जी के परिवार में हुआ था। उनके पिता कानपुर में एक बैंक में कर्मचारी थे। 5 वर्ष की उम्र में वह पिता के साथ रहने कानपुर चले गए। बचपन वह रामकृष्ण मिशन आश्रम में जाते व वहां के साहित्य को पढ़ते थे। इसी कारण स्वामी विवेकानंद का उन पर बहुत प्रभाव है। 

बचपन से ही वे सामाजिक कार्यों में रुचि लेते थे। वर्ष 1984 में इंटरमीडिएट की परीक्षा के बाद, वे अपने गांव कांडे घूमने आए। उस वक्त पहाड़ में 'नशा नहीं, रोजगार दो' आंदोलन चल रहा था, जिसमें उनके द्वारा बढ़-चढ़कर प्रतिभाग किया गया। तब से उनका मन अपने गांव वापस आकर रहने का करने लगा। आखिरकार 1989-90 में अपनी स्नातकोत्तर की शिक्षा पूर्ण कर वे अपने गांव रहने को आ गए।

उस समय गांवें में बच्चों की शिक्षा के बारे में जागरूकता की कमी थी। लड़कियों की दशा तो और खराब थी। ज्यादातर लड़कियों को कक्षा 8 से आगे पढ़ने नहीं दिया जाता था। हां, लड़कों को पढ़ाते थे, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि बच्चों को क्या और कैसे पढ़ना चाहिए। अपने गांव के किशोरों का मार्गदर्शन देने के लिए उन्होंने अपने गांव के पंचायत घर में स्कूली शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक व पर्यावरण शिक्षा देना शुरू किया। यह वह समय था जब युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। 

कांडपाल जी को भी गांव में रहने हेतु कुछ वित्तीय सहायता की आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने पास के एक इंटर कॉलेज में अध्यापन का कार्य प्रारंभ कर दिया। अपने शिक्षण के साथ-साथ उन्होंने कालेज में विज्ञान क्लब व पर्यावरण चेतना मंच की स्थापना की। उस समय उनके क्षेत्र में या तो पहाड़ बंजर थे या फिर चीड़ के वृक्ष थे जो जल संरक्षण व चारे के लिए फायदेमंद नहीं थे। पर्यावरण चेतना मंच के विद्यार्थियों के साथ उन्होंने स्कूल परिसर और आसपास के गांव में जल संरक्षण वाले पेड़ लगाना प्रारंभ किया। उन्होंने विद्यार्थियों को उनके घरों में पौधे लगाने हेतु दिए जो आज लगभग 30 वर्षों में सुंदर जंगल बन गए हैं। 

पर्यावरण शिक्षा एवं सतत विकास के उद्देश्य से वर्ष 1992 में पर्यावरण चेतना मंच के माध्यम से उन्होंने तीन दिवसीय उत्तराखंड स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन कॉलेज में किया। इस संगोष्ठी में सर्वसम्मति से निष्कर्ष निकला कि उत्तराखंड के ग्रामीण विकास के लिए हमें गांव की महिलाओं में सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता की जरूरत है। लेकिन इस बैठक में कुल 4 महिलाएं मौजूद थीं। कांडपाल जी ने संगोष्ठी में कहा कि वह अध्यापन के साथ-साथ समाज की रूढ़ीवादी मानसिकता को तोड़ने और समुदाय की महिलाओं में सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता लाने के लिए अपने आस-पास के गांव में कार्य करेंगे।

उन्होंने कॉलेज के बाद अपने खाली समय में छुट्टियों के दिन गांव में जाकर लोगों से विचार-विमर्श कर अपना मिशन प्रारंभ कर दिया क्योंकि उस क्षेत्र में अधिकांश पुरुष रोजगार की तलाश में शहरों की ओर चले गए थे। इसलिए ग्रामीण जीवन पूर्ण रूप से महिलाओं के कंधों पर निर्भर था। यह महिलाएं बच्चों की देखरेख शिक्षा कृषि मवेशी रसोई घरेलू कार्य में व्यस्त थीं। इसके अतिरिक्त चारा ईंधन और पानी के भीषण संकट से भी लड़ रही थीं। उन्होंने देखा कि महिलाएं गांव की बेहतरी की किसी भी बैठक में आने को तैयार नहीं थीं। पुरुष प्रधान वादी समाज होने के कारण वह बैठक में आने को तैयार नहीं थीं। कुछ गांव में रह रहे सेवानिवृत्त व अन्य पुरुषों के द्वारा ही गांव के महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे। वे अपने अनुभव को बताते हैं कि गांव में जंगल से पशुओं हेतु घास काटने की तिथि तय करने हेतु पुरुषों की बैठक चल रही थी। मैंने सुझाव दिया कि यदि महिलाओं ने घास काटने का काम करना है, तो उन्हें अपनी सुविधा अनुसार तिथि तय करने हेतु बुलाया जाना चाहिए। घास महिलाओं को काटनी है तो पुरुष तय कर रहे हैं, कैसे? तब उन्हें जवाब मिला आप ही महिलाओं को बुला लीजिए । अन्यथा आप शिक्षण का कार्य कीजिए, हमारे तरीकों में हस्तक्षेप मत कीजिए।

वह अपने मिशन से पीछे नहीं हटे और सुरईखेत के आसपास के 5 गांव में उन्होंने ग्रामीणों से खुलकर विकास व पर्यावरण पर विचार विमर्श करना प्रारंभ कर दिया। जिसके अंतर्गत स्वच्छता पानी चारा व बच्चों की शिक्षा पर जोर दिया इन कार्यों हेतु महिला मंगल दलों का गठन किया।

'पर्यावरण शिक्षण एवं ग्रामोत्थान समिति - सीड' का गठन

क्षेत्रीय स्तर पर ग्रामीण विकास व पर्यावरण संरक्षण हेतु जनता के सहयोग से कार्य करने हेतु उन्होंने 5 जून 1993 को एक सामाजिक संगठन 'पर्यावरण शिक्षण एवं ग्रामोत्थान समिति - सीड' का गठन किया। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने गांव-गांव घूम-घूम कर महिला मंगल दलों का गठन प्रारंभ किया। धीरे-धीरे महिलाएं मासिक बैठकों में अपने विचार के साथ-साथ अपनी समस्याओं को भी रखने लगीं। कांडपाल जी ने उनकी समस्याओं के समाधान पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया।

महिलाओं की मूल समस्या थी, उनके छोटे-छोटे बच्चों की देखरेख खेतों में व अन्य कार्यों से बाहर जाने पर वह अपने बच्चों को या तो बांधकर जाती थीं या फिर कमरे में बंद करके। जिससे वह मानसिक रूप से परेशान रहती थीं, उनकी इस समस्या के समाधान हेतु उन्होंने बालवाड़ी चलाई। जिसकी देखरेख व सही तरीके से संचालन की पूर्ण जिम्मेदारी गांव के महिला मंगल दलों को सौंपी गई। इन केंद्रों पर 1 से 5 वर्ष तक के बच्चों को महिलाएं 4 घंटे छोड़ जाती थीं, जहां उन्हें खेल खेल में स्वच्छता व पर्यावरण शिक्षा दी जाती थी। अब वह निश्चिंत होकर 4 घंटे अपना काम करती थीं।

गांव में बालवाड़ी से निकलने के बाद 6 वर्ष में बच्चे प्राथमिक पाठशाला में कक्षा 1 में प्रवेश लेते थे। महिलाओं की कार्य की व्यस्तता के कारण शाम को बच्चे मुक्त रूप से घूमते रहते थे। महिलाओं ने इस समस्या को बैठकों में रखा, तब उन्होंने छह से 11 वर्ष की आयु के बच्चों को स्वच्छता व पर्यावरण शिक्षा संबंधी गतिविधियों में संलग्न करने हेतु पर्यावरण शिक्षा संध्या केंद्रों का संचालन किया। यह केंद्र शाम 4:00 से 7:00 तक बच्चों को व्यवहारिक व सामाजिक ज्ञान देते हैं । आज भी कुछ केंद्र संचालित हैं, पर्यावरणीय व सामाजिक ज्ञान बच्चों में बना रहे इस हेतु उनके द्वारा कक्षा 5 की शिक्षा पूरी करने के बाद इंटर कॉलेज में आगे आने पर विद्यालय में विज्ञान मंच का गठन कर बच्चों को 14 वर्ष तक व्यावहारिक ज्ञान जारी रखा। इन बच्चों को जंगलों, नदियों, आसपास की समस्याओं पर सर्वे के साथ ग्रामीणों के साथ विचार विमर्श कर समस्याओं का समाधान करने हेतु प्रयास किया जाता है।

5000 से अधिक विद्यार्थियों का हुआ पर्यावरणीय शिक्षण

कांडपाल जी ने अपने क्षेत्र में 42 गांव में बालवाड़ी, अट्ठारह गांव में पर्यावरण शिक्षा सुविधा केंद्र तथा अपने विद्यालय में व्यावहारिक ज्ञान मंच चलाया। पिछले 30 वर्षों में 5000 से अधिक विद्यार्थियों ने इन माध्यमों से पर्यावरणीय शिक्षा ली। कम उम्र में पर्यावरण शिक्षा में शामिल होने पर उनके जीवन में स्थाई प्रभाव पड़ता है। बच्चों ने छोटी-छोटी नर्सरियां व पौधशालाएं बनाईं। घर के पॉलीथिन इकट्ठा कर उनमें पौधे उगाए। उन्होंने अपने खेतों में लगाए। आज कई बच्चे बड़े होकर स्वत: पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रहे हैं।

श्रमदान से बनीं पौधशालाएं

महिला मंगल दलों के गठन के बाद चर्चा में निकल कर आया कि गांव में चारे व जल संरक्षण करने वाले पौधों की कमी है। सरकारी पौधशालाओं में भी इस प्रकार के पौधों की कमी थी। इसलिए महिलाओं ने अपने स्तर से पौधशालाएं श्रमदान में तैयार करके उनको लगाने का निर्णय लिया। कई गांव के संगठनों ने सामूहिक पौधशालाएं बनाईं। सामूहिक रूप से श्रमदान कर इन पौधों का रोपण किया। कांडपाल जी ने मार्गदर्शन के साथ-साथ पॉलिथीन बैग और कहीं-कहीं पौधे खरीदने हेतु सहायता प्रदान की। इन पौधों की देखरेख महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से की गई। इसी का नतीजा है कि आज लाखों पेंड़ जीवित हैं, जिनसे जल संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों को चारा भी मिल रहा है।

स्वच्छता हेतु शौचालय

1993 में गांव में स्वच्छता हेतु शौचालय नहीं थे। जब वह गांव में लौटे थे तब क्षेत्र में आर्थिक रूप से संपन्न केवल 2 परिवारों में ही शौचालय बने थे। खुले में शौच न करने हेतु उनके द्वारा ग्रामीणों को जागरूक किया गया। ग्रामीणों को शौचालय बनाने हेतु प्रेरित करने हेतु उनके द्वारा उत्तराखंड सेवा निधि अल्मोड़ा के सयोग से  7-15 सौ रुपया प्रति शौचालय आर्थिक सहयोग दिया गया। प्रारंभ में पुरुषों के हाथ में पैसा दिया। सहयोग के बावजूद कुछ शौचालय नहीं बने। बाद में पैसा महिला मंगल दलों के माध्यम से महिलाओं को दिया गया। जिससे सभी शौचालय बने पैसा कम होने पर महिलाओं ने सामूहिक श्रमदान करके भी व्यक्तिगत शौचालय बनाए। 15 सौ से अधिक शौचालय वर्ष 1993 से 2005 तक इस क्षेत्र में उनके द्वारा बनवाए गए अब ग्रामीण स्वत: अपने स्तर से शौचालय बना रहे हैं।

ग्रामीण साहुकारिता जी का जंजाल

उस समय गांव में साहुकारिता प्रणाली का मजबूत पकड़ थी। गरीब लोग अमीर लोगों के खिलाफ बोलने से भी डरते थे। क्योंकि अमीर लोग गरीबों को आवश्यकता पड़ने पर ब्याज में पैसा देते थे, इस कारण वे किसी भी सामाजिक बुराई व उनके गलत निर्णय के खिलाफ बोलने को तैयार नहीं थे। देश के अन्य हिस्सों की तरह साहुकारिता गरीबों का शोषण कर रही थी। इस व्यवस्था को तोड़ने के लिए उन्होंने महिला मंगल दल के सदस्यों का एक सामूहिक सहायता कोष बनवाया जहां सदस्यों द्वारा 10 या ₹20 प्रति माह जमा किए गए। जमा पैसा बैंक या पोस्ट ऑफिस में रहता था। कुछ पैसा गांव के दल के कोषाध्यक्ष के पास रहता था। किसी को आपातकालीन अवस्था में तुरंत कर्ज दिया जाता था। जैसे किसी के बीमार पड़ जाने पर या बच्चे की कॉपी किताब की आवश्यकता पड़ने पर। बड़े खर्चें जैसे शादी, गाय या भैंस आदि के लिए तो बैंक से पैसा निकाल कर दिया जाता था। इस सामूहिक पैसे ने महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ाया तथा उन्हें स्वावलंबी बनाया। इस सामूहिक व्यवस्था के कारण साहूकार का व्यवस्था चरमरा गई। जिसके कारण साहूकारों ने रार ले ली। कई महिला मंगल दलों को साहूकारों द्वारा तोड़ दिया गया। लेकिन कांडपाल जी ने हार नहीं मानी उन्होंने दोगुने जोश से कार्य किया। यह व्यवस्था 1996 में प्रारंभ की गई थी आज तक कई गांव में सक्रियता से चल रही है। इस कारण महिलाएं भी जुड़ी है।

जो महिलाएं केवल अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए कभी-कभी गांव से बाहर जाती थीं, वह अल्मोड़ा, नैनीताल, दिल्ली आदि विभिन्न हिस्सों में आयोजित बैठकों में प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जाने लगीं।

गांव की महिलाएं अब संगठन के अध्यक्ष बालवाड़ी व संध्या केंद्र शिक्षिकाओं का चयन स्वत: करने के साथ-साथ गांव में जल संरक्षण हेतु नौलों का सुधार, खावों  का निर्माण, पौधशाला बनाना स्वतः करने लगीं। कांडपाल जी ने सभी गांव के कार्यक्रम में महिला मंगल दलों की जिम्मेदारी दे दी। जिससे महिलाओं में गजब का आत्मविश्वास देखने को मिला। उन्होंने विभिन्न गांव में महिला मंगल दलों का विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। द्वाराहाट व भिक्यासैंण  विकासखंड के 82 गांव में दल बनाए गए, जिसमें से 62 गांव में सामूहिक सहायता कोष भी चलाए गए।

पंचायत चुनाव और महिला एकता परिषद का गठन

1992 से महिलाओं के सामाजिक एवं राजनीतिक जागरूकता लाने का प्रयास उनके द्वारा किया जा रहा था। 1996 में पंचायत प्रणाली में महिला आरक्षण लागू न होने के बावजूद कई सक्रिय महिलाओं ने पंचायत चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। टल्ली बिठौली की महिला मंगल दल की अध्यक्ष पुरुषों को हराकर ग्राम प्रधान बनी। यह महिला सामाजिक बदलाव में मील का पत्थर साबित हुई। कई पितृसत्तात्मक पुरुषों को यह ठीक नहीं लगा। उन्होंने महिला मंगल दलों को तोड़ने का प्रयास किया। कांडपाल जी ने संगठनों को मजबूती देने हेतु सभी संगठनों का एक सामूहिक संगठन का सुझाव रखा। तब महिलाओं का सामूहिक संगठन महिला एकता परिषद का गठन 28 दिसंबर 1996 को किया गया जिसके माध्यम से महिलाएं गांव में से निकलकर क्षेत्रीय समस्याओं पर चर्चा करने लगीं। उसके बाद लगातार सामान्य सीटों पर महिलाएं चुनाव लड़ीं। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य बनकर अपनी पहचान के साथ-साथ अच्छे कार्य कर रही हैं।

किशोरी एकता परिषद का गठन

आज निश्चित रूप से हमारे समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता टूट रही है। लेकिन 30 वर्ष पहले स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी। गांव में बमुश्किल ही लड़कियां आठवीं या कुछ ही मामलों में दसवीं तक पढ़ती थी। लोग सोचते थे कि लड़कियों को शिक्षित करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि अंत में उनको घर का काम ही करना होता है कई लोग लड़कियों को पढ़ाने की शहर की मानसिकता को चुनौती देते थे। कांडपाल जी ने अपने क्षेत्र में लड़कियों को शिक्षित व सशक्त बनाने के लिए उन्हें प्रेरित किया। जिसके लिए 42 गांव में किशोरी संगठनों का गठन किया गया। इन संगठनों का सामूहिक संगठन किशोरी एकता परिषद का गठन कर उन्होंने क्षेत्रीय स्तर पर अपनी बात रखने का मौका दिया। बाल वाड़ी संध्या केंद्रों में शिक्षण के कई कार्य हेतु लड़कियों का चयन पर जोर दिया। पिछले 30 वर्ष में 282 किशोरियों ने केंद्रों में शिक्षिका का कार्य किया इन छोटे-छोटे गांव में लड़कियों ने खामोशी से बदलाव के लिए कार्य किया। जिन लड़कियों ने किसी कारण आठवीं या दसवीं से पढ़ाई छोड़ दी थी उन्होंने शिक्षिका का कार्य प्रारंभ करने के बाद पुनः अपनी पढ़ाई प्रारंभ की। कई ने तो 5 से 6 वर्ष बाद भी अपनी पढ़ाई पुनः प्रारंभ की। एक शिक्षिका ने तो 16 वर्ष बाद हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की।

शादी में आठवां संकल्प

कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए बेटी बचाओ के उद्देश्य से वर्ष 2015 में उनके द्वारा एक नई पहल महिला एकता परिषद के सहयोग से प्रारंभ की गई। इस अभियान के तहत महिलाएं अपने गांव व आसपास के क्षेत्र में विवाह समारोह में जाती हैं। विवाह जोड़े से सात फेरों के वादे के बाद एक वादा और लेती हैं कि वे लड़के की चाहत में कन्या भ्रूण हत्या नहीं करेंगे। साथ ही लड़के और लड़की में कोई भेदभाव नहीं करेंगे। लड़का और लड़की दोनों को समान रूप से आगे बढ़ने का मौका देंगे। इस हेतु एक वादा पत्र गवाहों के साथ वर-वधू से गवाहों के साथ भरा जाता है सैकड़ों वादा पत्र अभी तक भर चुके हैं।

कोरोना काल 2019

कोरोना काल 2019 में उनके द्वारा चलो गांव की ओर अभियान शुरू किया गया जिसके माध्यम से युवाओं को अपने गांव लौटने हेतु प्रोत्साहित कर रहे हैं। यदि उन्हें शहर में वांछितत जीवन नहीं मिल पा रहा है। जैसे कम वेतन वाली नौकरी में दुर्गति से परेशान लोगों से ‘चलो गांव की ओर’ अभियान के तहत वह उन लोगों से अनुरोध कर रहे हैं कि वे शहरों में कठिन जीवन बिताने के बजाय अपने गांव में वापस आएं।  वह गांव में खुद का काम कर सकते हैं जैसे पशुपालन सामूहिक खेती या अपने गांव स्तर पर कोई व्यवसाय कुछ सेवानिवृत्त लोगों की मदद से उन्होंने एक फंड बनाया, जिसके माध्यम से गांव लौट आए युवाओं को वह जीरो प्रतिशत ब्याज पर उधार दे रहे हैं। जिससे युवा मवेशी खरीद रहे हैं अब तक 25 लोगों ने इस पहल से लाभान्वित हुए हैं। और अब वह एक गाय के माध्यम से 6 से ₹7000 प्रतिमाह कमा लेते हैं इस प्रकार वह सम्मानजनक जीवन भी जी रहे हैं। गांव अनावश्यक खर्च के एक साधारण जीवन प्रदान करता है। अब लोग खेती कर सब्जी भी उगा रहे हैं। उनकी अपील है शहर में रहने वाले अपने बच्चों को गांव में लाकर अपनी जड़ों को समझने वह जानने का मौका बच्चों को दें। तभी गांव रहेंगे ,शहर से गांव लौट कर स्वरोजगार कर जीवन यापन करने वालों को वह समय-समय पर सम्मानित भी करते रहते हैं।

खाव खोदो, पानी बोओ 

कांडपाल जी ने पिछले 30 वर्षों से वर्षाजल को पहाड़ी के ऊपर खाव खोदकर रोकने के साथ-साथ पुराने खावों तालाबों को पुनर्जीवित करने का कार्य कर रहे हैं। उनका प्रभाव यह है कि कुछ नौलों मैं पुनः पानी निकल गया है। लेकिन फिर भी पानी की कमी है, क्योंकि गांव से पलायन बढ़ जाने के कारण सीढ़ीदार पहाड़ों के ऊपरी क्षेत्र में खेत जोतना समाप्त हो गया है। जिसके कारण खेत बंजर हो गए हैं अब वर्षा का पानी खेतों में नहीं रुकता है। जिसके कारण जमीन में पानी नहीं जा पाता। इस कारण नौले धारे व नदियां सूखने लगी है। इस कारण क्षेत्रीय रिस्कन नदी भी सूखने लगी है ।

पानी बोओ, पानी उगाओ अभियान

उनके द्वारा गांव-गांव घूमकर खाव बनाने व पुन: खेती करने हेतु एक नारा 'पानी बोओ व पानी उगाओ का दिया गया है। पिछले 9 से 10 वर्ष से उनके द्वारा रिस्कन नदी जो लगभग 40 किमी की दूरी तय कर गगास, रामगंगा से होते हुए गंगा नदी में समा जाती है। उसे बचाने हेतु प्रयास किया जा रहा है। रिस्कन नदी पर 46 गांव का अस्तित्व निर्भर करता है। मई-जून में यह नदी कुछ वर्ष पूर्व पूर्ण रूप से सूख जाती थी। उनके द्वारा ‘पानी बोओ, पानी उगाओ’ अभियान के माध्यम से जागरूकता लाने के साथ-साथ प्रयोगात्मक कार्य ग्रामीणों के साथ मिलकर रिस्कन नदी बचाने का के प्रयास किए जा रहे हैं। जिसके अंतर्गत गांव में पूजाकार्य, नौकरी लगने, सेवानिवृत्त होने, शादी व संतान होने पर लोगों से अपील की जाती है कि वह जल संरक्षण हेतु खाव खुदवाएं व पेड़ लगाएं। 

रिस्कन नदी

रिस्कन नदी 40 किमी लंबी है। अब तक बने 5000 से अधिक खावों का प्रभाव कहीं-कहीं दिखाई देने लगा है। लेकिन एक नदी को जिंदा होने के लिए पर्याप्त नहीं है। रिस्कन नदी को बचाने हेतु उनके द्वारा माननीय प्रधानमंत्री महोदय, माननीय जल शक्ति मंत्री भारत सरकार व माननीय मुख्यमंत्री उत्तराखंड से भी निवेदन किया गया है।
 

Path Alias

/articles/paanai-parayaavarana-maasatara-maasatara-maohana-kaandapaala

Post By: Kesar Singh
×