निर्जला होती नदियाँ

नदियों के प्रति काका कालेलकर का भाव दृष्टव्य है ``नदी को देखते ही मन में विचार आता है कि यह कहां से आती है और कहां जाती है ... आदि और अंत को ढूंढने की सनातन खोज हमें शायद नदी से ही मिली होगी ....। संसार का हर व्यक्ति पेयजल, खाद्य पादर्थ, मत्स्य पालन, पशु पालन, कृषि एवं सिंचाई साधन आदि के लिए नदी जल परम्परा से जुड़ा है। जल चक्र की नियामक धारा स्वरूपा इन नदियों को सहेजना हमारा धर्म है। अब वक्त आ गया है कि हम उन कारणों को खोजे जो हमारी नदियों एवं जल वितरणिकाओं को निर्जला कर रहे हैं। हमारी रसवसना नदियों को सुखाकर अथवा प्रदूषित कर हमारी आँखों में आँसू भर रहे है। जब किसी नदी का जल पीने योग्य नहीं रहता और कोई प्यासा तट पर आकर प्यासा ही रह जाता है तो नदी भी यकीनन मर जाती है।

अब तो सागर भी जलवायविक व्यतिक्रम तथा ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण तेजाबी होता जा रहा है। सागर में अम्लीयता बढ़ रही है। कार्बनिक एसिड पानी के पीएच स्तर को कम करता है, जिससे अम्लीयता बढ़ती है। जीवाश्म ईंधन के दहन से उत्सर्जित कार्बन डाई आक्साइड का अवशोषण भी समुद्र के द्वारा होता है। तेजाबी होता हुआ समुद्र अपनी जैविकी खो रहा है। मानों आँसू पी-पी कर सागर खारा हो रहा है।

समुद्री धारा प्रवाह और ताप परिवर्तन के कारण बादल बनने की क्रिया भी प्रभावित हो रही है। कहीं पर वर्षा कम तथा कहीं पर सामान्य से अधिक हो रही है। कही नदियाँ सुखाड़ से प्रभावित है, तो कही बाढ़ से। जलाभाव हो अथवा जल भराव, दोनों ही स्थितियों में कष्ट तो नदी ही उठाती है। दर्द से नदियाँ कराह उठती हैं। देखें तो जरा क्या है हमारी रस वसना नदियों का हाल।

अमेरिका स्थित नेशनल सेंटर फॉर एटमोस्फिरिक रिसर्च (एन सी ए आर) के अध्ययन के अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग का जबरदस्त प्रभाव नदियों की प्राणता पर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों ने 56 वर्ष (सन् 1940 से 2004 तक) की दीर्घकालिक कार्ययोजना एवं अध्ययन के आधार पर विश्व की 925 नदियों के जलग्रहण एवं जलप्रवाह को आकलित किया। अध्ययन से यह ज्ञात हुआ कि 300 नदियाँ जलवायु परिवर्तन से अधिक प्रभावित हैं। हिन्द तथा प्रशान्त महासागर में गिरने वाली २०६ नदियों के जल प्रवाह में कमी आई है और हिमनदीय आर्कटिक क्षेत्रों में होकर बहने वाली १०२ नदियों के जलप्रवाह में वृद्धि हुई है। इस प्रवाह वृद्धि का कारण तापन से पिघलते हिमनद तथा ग्लेशियर हैं और जिन नदियों में प्रवाह कम हुआ है उसका मुख्य कारक मनुष्य है। मनुष्य के अक्षम्य क्रियाकलाप से न केवल जल का दुरूपयोग बढ़ा है वरन वह जल को विषाक्त भी कर रहे हैं। हम भूल रहे हैं कि अन्तत: यह विष हमें ही पीना पड़ेगा।

किसी भी नदी के जल ग्रहण क्षेत्र तथा प्रवाह का सामान्य से कम या अधिक होना पर्यावरणविदों तथा भूवेत्ताओं को चिंतित करता है अब जन-जन को जल के सरोकार से जुड़ जाना चाहिए। यूँ तो किसी भी नदी का संकटापन्न होना गम्भीर बात है। तथापि वैश्विक रिपोर्ट में भारत की गंगा, चीन की पीली नदी, पश्चिमी अफ्रिका की नाइजर नदी तथा दक्षिणी अमेरिका की कोलोरेडो नदी को संकटापन्नता पर विशेष चिंता व्यक्त की गई है। हमें आंकड़ों की मुँहदेखी के बजाये सत्य से स्वयं साक्षात्कार करना चाहिए। आप अपने निकट की किसी भी जलधारा, सरिता अथवा नदी के तट पर जाकर स्वयं वस्तु स्थिति ज्ञात कर सकते हैं।

उत्तराखण्ड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण बोर्ड का हालिया बयान आने पर कि गंगा का पानी प्रदूषण के चलते सिंचाई योग्य भी नहीं रह गया है, जल प्रहरी चिंता में डूब गए हैं। जिस गंगा जल की पवित्रता, श्रृद्धा और भक्ति, विज्ञान को चुनौति देती रही, उसकी यह दुर्गति क्यों और कैसे हुई? जिस गंगा जल में आक्सीजन को पानी में बरकरार रखने की विलक्षण क्षमता रही है वह भी स्वयं निष्प्राण हो रही है। हालांकि जीवनदायिनी गंगा को नवजीवन प्रदान करने की कोशिश में करोड़ों की धन राशि व्यय हो रही है फिर क्यों शिखर पर ही मैली हो रही है। गंगा कि आचमन योग्य भी नहीं रही? क्या गंगा को यूँ ही मरने दिया जाये?

ज्ञातव्य है कि कई राष्ट्रों की जल पोषिता राइन नदी कुछ दशक पूर्व तक मृतप्राय थी किन्तु गंभीर प्रयासों द्वारा उसे नवजीवन मिला। विश्व की नदियाँ अचानक संकटापन्न नहीं हुई है। अविवेकपूर्ण अत्यधिक दोहन, जलवायविक परिवर्तन तथा जनसहयोग का अभाव नदियों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। राष्ट्रों के बीच तथा एक ही राष्ट्र में राज्यों के बीच प्रवाहमान नदियाँ तो हमेशा विवाद के घेरे में रहती है। संकटापन्न नदियों की घाटियाँ भी प्रभावित हुई हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) तथा एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एआईटी) की हालिया रिपोर्ट, दक्षिण एशिया ताजा पानी संकट इसी ओर इंगित करती है। अत: आज ऐसे टिकाऊ विकास की आवश्यकता है जो हमारी धरती की नौसर्गिकता को भी अक्षुण्ण रख सके।

प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से कुछ समय के लिए भले ही हम आर्थिक वृद्धि दर की चकाचौंध में खो जाएं किन्तु दीर्घकालिक दृष्टि से यह घाटे का ही सौदा सिद्ध होता है। हम यह तथ्य भूल रहे है कि हमें प्रकृति से त्याग के साथ उतना ही ग्रहण करना चाहिए जो कि निहायत जरूरी है क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों पर हमारी संततियों का भी हक है। अन्य जीव जन्तुओं का भी हक है। यदि एक नदी मरती है तो मर जाती है, स्थान विशेष की सभ्यता।

नदियों के संरक्षण हेतु नदियों का संज्ञान जरूरी है। उनके उद्गम स्थल, प्रवाह मार्ग, जलग्रहण क्षमता तथा जल वितरण को भी समझना जरूरी है। गंगा यमुना तथा उनकी सहायक नदियाँ प्राय: दक्षिण पूर्व की ओर बहती हैं। इसके विपरीत रावी, व्यास और सतलज नदियाँ दक्षिण पश्चिम की ओर बहती हैं। बंगाल की खाड़ी के उत्तर में गंगा तथा ब्रह्मपुत्र की जलवितरिकाएं मिलकर बड़ा और उपजाऊ डेल्टा बनाती हैं। उत्तरी भारत की इन नदियों का उद्गाता हिमालय पर्वत है जिसकी हिमाच्छादित श्रेणियों से नि:सृज जल की सूक्ष्म धाराएं नदियों का पोषण करती है। वन प्रांतर इन धाराओं के रक्षक हैं। जब यह नदियाँ धरती की गोद में उठखेलियाँ करती हैं तब शिव का डमरू सा बजता है। शिवालिक की श्रेणियों के दक्षिण में भावर और तराई परिक्षेत्र नदियों के अवतरण के कारण ही उर्वर है। क्येंकि नदियां अपने साथ उपजाऊ मिट्टी लाकर धरती पर बिखरा जाती हैं। आजकल पहाड़ों पर होने वाले खनिज-खनन के कारण भी नदियाँ आहत हो रही हैं और जल प्लावनता खो रही हैं। खनन से नदी का रूप विकृत होता है वह सुकृत नहीं रह पाती और सूख जाती है। दक्षिण के त्रिभुजाकार पठार के उत्तर में अरावली सतलज और यमुना को पृथक करता है। पूर्वीघाट और पश्चिमी घाट श्रेणियों को काटकर महानदी, गोदावरी कृष्णा पेनार तथा कावेरी नदियों ने अपनी विस्तृत घाटियाँ बना ली है। नर्मदा तथा ताप्ती नदियाँ पठारी भाग से निकलकर पश्चिम की ओर चौड़े मुहाने के रूप में अरब सागर में गिरती है। यमुना की सहायक नदियाँ चम्बल बेतवा और केन उत्तर पूर्व की ओर बहती हुई यमुना में गिरती हैं। पठार से निर्गत नदियाँ भी उपेक्षा का शिकार होकर निर्जला होती जा रही हैं।

आदिकाल से ही नदियों के तटों पर मानवीय सरोकर जुड़े रहे हैं। नदियों को उनकी मातृवत्सला पोषण शक्ति के कारण विश्व मातर कहा गया है। नदियों के प्रति हम कृतज्ञता का भाव व्यक्त करते हैं। नदियों के प्रति काका कालेलकर का भाव दृष्टव्य है ``नदी को देखते ही मन में विचार आता है कि यह कहां से आती है और कहां जाती है ... आदि और अंत को ढूंढने की सनातन खोज हमें शायद नदी से ही मिली होगी ....। पानी के प्रवाह या विस्तार में जो जीवन लीला प्रकट होती है उसके प्रभाव जैसा कोई प्राकृतिक अनुभव नहीं। पहाड़ चाहे कितना उत्तुंग या गगनभेदी क्यों न हो, जब तक उसके विशाल वृक्ष की चीर कर कोई जलधारा नहीं निकलती, तब तक उसकी भव्यता कोरी, सूनी और अलोनी ही मालूम होती है।''

प्रवाह ही जल को सप्राण रखता है। प्रवाह द्वारा ही जल आत्म शोधन करता है। हमने नदियों के तरों को पाट दिया है। नदियों के पथरेख पर सड़कों का जाल बुन दिया हैं। नदियां के पाटों को पुलों से बांध दिया है। जिससे घुटने लगी है नदियों की साँस और जल जीवों की घूटने लगी है आस जो जलजीव नदियों के उद्गम से लेकर सिंधु मिलन तक साथ निभाते है। वह संकरी सुरंगो में दम तोड़ जाते हैं और नदी एक अनाम अपराध बोध से जीतेजी मर जाती है। आखिर निर्जला होती नदियों को कैसे बचायें ? नितांत जरूरी है कि हम जन मानस में पानी के प्रति उस चेतन धारा को बहाएं कि सब ही जल प्रोतों के परिरक्षण में जुट जाएं। वहाँ कतार बद्ध वृक्षारोपण करने से मिट्टी को बांधा जा सकता है। तटों पर अनधिकृत निर्माण को तुरन्त रोकना जरूरी है, इस बात की निगरानी करनी होगी कि ऐसा काम तो नहीं हो रहा जिससे नदी की नैसर्गिकता भंग हो रही हो और नदी के सर्पिलला पथरेख को बदला जा रहा है। जागरूकता के द्वारा ही हम नदियों को निर्जला होने से रोक सकते हैं।

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