विलुप्त होते वन्य जीव एवं उनका संरक्षण


गाँधीजी ने कहा था- ‘‘प्रकृति में प्रत्येक की जरूरत पूरी करने की क्षमता है, लेकिन किसी एक के लालच के लिए नही’’।

इतिहास साक्षी है कि अशोक महान ने अपने सभी शिलालेखों पर जीवों पर दया करने की बात लिखवाई थी। धार्मिक सुरक्षा के कवच ने ही वन्य जीवों को लम्बे अन्तराल तक बचाये रखा। बन्दूक का आविष्कार होते ही वन्य जीवों को अपना अस्तित्व बनाये रखना भी कठिन हो गया। ब्रिटिश सरकार ने वन्य जीवों की सुरक्षा के लिये प्रथम कानून वर्ष 1879 में ‘वाइल्ड एलीफेन्ट प्रोटेक्शन एक्ट’ नाम से पारित किया गया।

जैव विविधता विलोपन के भविष्य के सारे अनुमान इस गणित पर आधारित हैं कि यदि किसी वन्य जीव के प्राकृतिक वास को 70 प्रतिशत कम कर दिया जाये तो वहाँ निवास करने वाली 50 प्रतिशत प्रजातियाँ विलोपन की स्थिति में पहुँच जायेंगी। विलोपन के इसी भूगोल से ज्ञात होता है कि यदि विनाश की गति यथावत रही तो आने वाले 25 वर्षों में 10 प्रतिशत प्रजातियाँ पृथ्वी पर विलुप्त हो जायेंगी। विश्व संसाधन संस्थान, वाशिंगटन के एक प्रतिवेदन के आधार पर-

अगली आधी सदी के दौरान प्रजाति विलोपन का सबसे बड़ा अकेला कारण कटिबन्धी वनों का विनाश होगा। स्मरणीय है कि पृथ्वी पर कटिबन्धी वनों का प्रतिशत क्षेत्रफल केवल 7 ही है, और उसमें सम्पूर्ण की 50 प्रतिशत से भी अधिक वनस्पति प्रजातियाँ पायी जाती हैं। ये वन वनस्पति ही नहीं अपितु वन्य प्रजातियों के सन्दर्भ में और अधिक समृद्ध हैं। एक आकलन के आधार पर विश्व की कुल वन्य प्रजाति के विलोपन से प्रकृति के सन्तुलन में व्यापक प्रभाव पड़ता है। प्रकृति की व्यवस्था में मानव नगण्य है। कहने का आशय यह है कि यदि पृथ्वी पर मानव विलुप्त हो जायें तो प्राकृतिक व्यवस्था में कहीं भी किसी भी प्रकार का असन्तुलन नहीं होगा। मानव के लिये यह कितनी बड़ी विडम्बना है। प्रकृति में वनस्पति प्रजाति व वन्य प्राणी प्रजातियों के इस अति-संवेदनशील सन्तुलन को बहुत सोच-विचारकर छेड़छाड़ करनी चाहिए अन्यथा इसके घातक प्रभाव से मानव का बच पाना सम्भव न होगा।

वन्य जीव


प्राकृतिक आवासों में अर्थात वनों में पाये जाने वाले जंगली (अपालित) जन्तुओं को वन्य जीव कहा जाता है। वन्य प्राणियों के दैनिक क्रिया कलापों से वनों को उगने व पनपने में सहायता मिलती है।

भारतीय उपमहाद्वीप में वन्य जीवों की कुछ ऐसी दुर्लभ प्रजातियाँ हैं, जो विश्व में अन्यत्र नहीं पायी जाती हैं। उदाहरणार्थ- अनूप भृग (स्वैम्पडीपर), चौसिंगा (फोरहोर्नड एन्टीकोप), कश्मीरी महामृग, नीलगाय, चीतल, कृष्णमृग, एक सींग वाला गैंडा, मणिपुरा हिरन, सांभर, गोर, जंगली सूअर इत्यादि। पर्यावरण सन्तुलन में वन्य जीवों की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण है।

भारत वर्ष जैव सम्पदा की दृष्टि से समृद्धतम देशों में से एक है। विश्व में पायी जाने वाली विभिन्न प्रजातियों के लगभग 40 प्रतिशत जीव-जन्तु भारत में हैं। उक्त प्रजातियों में बड़ी तेजी से गिरावट आने लगी और कालान्तर में कुछ प्रजातियों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। यद्यपि विलोपन एक जैविक प्रक्रिया है परन्तु असमय समाप्ति सोचने पर विवश करती है। कोई भी जीव को इस धरा पर जन्म लेना निश्चित रूप से मृत्यु को प्राप्त होगा। यह एक जैविक सत्य है परन्तु किसी भी जीव का असमय मृत्युग्रस्त होना सर्वथा विचारणीय एवं चिन्ताजनक है। पृथ्वी से ‘विलोपन’ एक जैविक सत्यता है। असमय विलोपन का कारण पर्यावरणीय परिस्थितियों में अवांछनीय परिवर्तन, वन्य जीवों के प्राकृतिक वासों का विनाश, वनों का निर्दयतापूर्वक विदोहन, अवैज्ञानिक पशुचारण तथा तीव्र गति से बढ़ता औद्योगिकीकरण है।

प्रकृति ने भारत को उन्मुक्त हस्त से दान दिया है। सम्पूर्ण विश्व की लगभग 2 प्रतिशत भूमि हमारे पास है और इस भूमि पर विश्व के 5 प्रतिशत अर्थात 75,000 प्रजातियों के जीव-जन्तु निवास करते हैं तथा वनस्पतियों की 45,000 प्रजातियाँ भारत में पायी जाती हैं। प्राकृतिक कारणों से वन्य प्रजातियों का समाप्त होना एक धीमी प्रक्रिया थी परन्तु आधुनिक युग में जब से बंदूक का आविष्कार हुआ वन्य जीवन को असहनीय क्षति पहुँचाई जा रही है। कहीं पर कृृषि विकास के नाम पर, तो कहीं औद्योगिक विकास के नाम पर। हद तो तब से हो गई जब इन्हें शिकार व मनोरंजन के लिये मारा जाने लगा।

‘राष्ट्रीय प्राकृतिक संग्रहालय’, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तिका ‘वर्ल्ड आॅफ मैमल्स’ के आँकड़े चौकाने वाले हैं। इस पुस्तिका के अनुसार भारत में स्तनपायी वन्य जीवों की 81 प्रजातियाँ संकटग्रस्त हैं। कश्मीरी हिरणों की संख्या घटकर 350 रह गई है। भारतीय गैंडों का डीलडौल और विशालकाय शरीर देखते ही बनता है, इनकी संख्या 8,000 से भी कम रह गई है। सम्पूर्ण विश्व में शेरों की कुल सात नस्लें पायी जाती हैं। हमारे देश में इस शताब्दी के पूर्वार्द्ध में 10,000 शेर थे जो घटकर आज 2,000 रह गये हैं। बन्दर प्रजाति के वन्य प्राणी लुप्तप्राय जीवों की सूची में अंकित किये जा चुके हैं। काले एवं सफेद तेंदुओं के अस्तित्व पर संकट ज्यादा गहराया है।

वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि पृथ्वी पर लगभग 300 लाख प्रजातियों के जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधे हैं। अभी तक इनमें से केवल 15 लाख का ही पता लगाकर उनका विवरण तैयार किया जा सका है। इनमें से 724 प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं और 22,530 प्रजातियाँ विलुप्त होने की स्थिति में हैं।

आज का मानव यह भूल गया है कि पृथ्वी पर अन्य जीव जन्तुओं को भी रहने का उतना ही अधिकार है, जितना मनुष्य को। वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मानव एक दूसरे के अस्तित्व के पूरक हैं। वन्य जीवों को मारने का मानव का जन्मजात स्वभाव है क्योंकि उसने सर्वप्रथम इन्हीं को भोजन के रूप में देखा था। आदिकाल में शिकार, जोखिम व बहादुरी का प्रतीक था, तो मध्य काल में शान-शौकत व मनोरंजन का काम समझा जाने लगा और आधुनिक युग में तो यह अत्यधिक लाभप्रद व्यवसाय के रूप में परिवर्तित हो गया है।

वन एवं वन्य-जीव का जीवन साहचर्य


मारीशस में एक पक्षी डोडो पाया जाता था जिसे स्वादिष्ट होने के कारण मांसाहारी खा गये। इस पक्षी की कमजोरी थी कि यह अपने 15-20 किलो वजन के कारण उड़ नहीं पाता था। अब यह सदा के लिये विलुप्त हो गया है। डोडो के समाप्त होने का परिणाम यह हुआ कि ‘काल्वेरिया मेजर’ नामक वृक्ष भी समाप्त होने की स्थिति में आ गये क्योंकि उल्लिखित पेड़ के बीजों का मोटा छिलका अपने पेट में पचाकर डोडो पक्षी बीज बाहर निकाल देता था तभी यह बीज उग पाते थे। डोडो खत्म तो काल्वेरिया पौधा समाप्त होने के कगार पर। इस समय 300 साल पुराने मात्र 13 पेड़ बचे हैं। आँकड़े दर्शाते हैं कि प्रति बीस वर्ष में प्रत्येक दस में से एक पार्थिव प्रजाति विलुप्त होने जा रही है। पेड़-पौधों की लगभग 25,000 प्रजातियाँ और रीढ़दार जानवरों, रेंगने वाले प्राणियों, पक्षी तथा स्तनपायी जीवों की लगभग 9,000 प्रजातियाँ निकट भविष्य में विलुप्त होने की स्थिति में हैं।

1973 में वाशिंगटन में अस्सी देशों के प्रतिनिधि एकत्र हुए और जीवों के संरक्षण के लिये एक आचार संहिता बनाई गई जिसे ‘कनवेंशन ज्ञान इण्टरनेशनल ट्रेड एण्ड एडेंजर्ड स्पीशीज ऑफ वाइल्ड फाॅना एण्ड फ्लोरा’ नाम दिया गया। इसमें कहा गया है कि संकटग्रस्त जीवजन्तुओं और वनस्पतियों को बचाने का उत्तरदायित्व समूची दुनिया का है। यदि पर्यावरण ह्रास के कारण किसी भी प्रकार की वनस्पति या प्राणि प्रजाति संकटापन्न होती है तो इसका प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव मानव के अस्तित्व पर पड़ता है। खाद्य शृंखला के रूप में सभी का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।

सारणी-1

भारत में संकटग्रस्त वन्य जीव

1

2

3

1. शेर

2. चीता

3. बाघ

4. सफेद तेंदुआ

5. गैंडा

6. स्लोलोरिस

7. जंगली भैंसा

8. गंगीय डालफिन

9. लाल पाण्डा

10. मालावार सिवेट

11. कस्तूरी हिरन

12. संगाई हिरन

13. बारहसिंघा

14. कश्मीरी हिरन

15. सिंह पूंछ बन्दर

16. नीलगिरि लंगूर

17. लघुपूंछ बन्दर

18. बबून

19. गुनोन

20. चिम्पैंजी

21. औरंग

22. ऊटान

23. वनमानुष

24. कछुआ

25. पैगोलिन

26. सुनहरी सूअर

27. जंगली गधा

28. पिगमी सूअर

29. चित्तीदार लिनसैग

30. सुनहरी बिल्ली

31. भूरी बिल्ली

32. डुगोंग

33. सोन चिड़िया

34. जर्डेन घोड़ा

35. पहाड़ी बटेर

36. गुलाबी सिर बत्तख

37. श्वेतपूंछ बत्तख

38. टेंगोपान

39. मगरमच्छ

40. घड़ियाल

41. जलीय छिपकली

42. अजगर

43. भूरा बारहसिंघा

44. छोटा बारहसिंघा

45. चैसिंघा हिरन

46. दलदली हिरन

47. मास्क हिरन

48. नीलगिरी हिरन

 


सारणी-2

विलुप्त हो रहे जीव-जन्तुओं की संख्या

प्रजाति

विलुप्त हो चुकी

विलुप्त होने का खतरा

1. पेड़-पौधे

384

19079

2. मछलियां

32

343

3. उभयचर

2

50

4. सरीसृप

21

170

5. बिना रीढ़ वाले जन्तु

98

1355

6. पक्षी

113

1037

7. स्तनधारी

83

497

कुल योग

724

22,530

 


इतिहास साक्षी है कि अशोक महान ने अपने सभी शिलालेखों पर जीवों पर दया करने की बात लिखवाई थी। धार्मिक सुरक्षा के कवच ने ही वन्य जीवों को लम्बे अन्तराल तक बचाये रखा। बन्दूक का आविष्कार होते ही वन्य जीवों को अपना अस्तित्व बनाये रखना भी कठिन हो गया। ब्रिटिश सरकार ने वन्य जीवों की सुरक्षा के लिये प्रथम कानून वर्ष 1879 में ‘वाइल्ड एलीफेन्ट प्रोटेक्शन एक्ट’ नाम से पारित किया गया। उल्लेखित अधिनियमों का व्यापक प्रभाव पड़ा परन्तु वनों की सुरक्षा के लिये कोई प्रभावी प्रयास न होने के कारण अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इस हेतु 1927 में वनों की सुरक्षा, वैज्ञानिक प्रबन्ध एवं विदोहन तथा वन्य जीवों के हितार्थ ‘भारतीय वन अधिनियम’ के रूप में एक विस्तृत अधिनियम पारित किया गया। इसके अन्तर्गत वन एवं वन्य जीवों सम्बन्धी अपराधों को रोकने के लिये आर्थिक व शारीरिक दण्ड की व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी।

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय व्यापक रूप से बेतहाशा वनों की कटाई हुई। शिकारियों ने भी अवसर का लाभ उठाते हुए बड़े पैमाने पर पशु संहार प्रारम्भ कर दिया। वन्य जीव प्रेमी संगठनों के आह्वान पर भारत सरकार ने ‘इण्डियन बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ’ की स्थापना की। ‘भारतीय वन अधिनियम, 1956’ में वन एवं वन्य जीव दोनों की ही सुरक्षा का प्रावधान था परन्तु वन विभाग के शस्त्र-विहीन कर्मचारियों के लिये राइफलों से लैस शिकारियों को रोक पाना सम्भव न हो सका। वन्य जीवों की सुरक्षा को लेकर वन विभाग के अन्तर्गत ही पृथक रूप से ‘वन्य जीव परिरक्षण संगठन’ की स्थापना की गई। रक्षकों को शस्त्रों से लैस किया गया तथा वाहन भी प्रदान किये गये।

इस व्यवस्था से पर्याप्त नियंत्रण किया जा सका। इन प्रयासों के बावजूद वन्य जीवों की अधिकांश प्रजातियाँ विलुप्त होती गईं। अतः ऐसा अनुभव किया गया कि वन एवं वन्य जीवों की सुरक्षा हेतु कड़ा दण्ड प्रावधान तथा वन्य जीवों के वास स्थलों की व्यापक सुरक्षा का प्रबन्ध किया जाये। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु भारत सरकार ने ‘वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972’ पारित किया और अपराधी को 7 वर्ष तक का कारावास तथा पर्याप्त अर्थदण्ड की व्यवस्था की गई। वन्य जीवों के वास स्थलों को सम्पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने के लिये राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीव विहार तथा अभ्यारण्य बनाने की प्रक्रिया प्रारम्भ की गई। 2 अक्तूबर, 1991 से अधिनियम को संशोधित करके इसकी धाराओं को और अधिक कड़ा कर दिया गया है। इस अधिनियम से आशातीत सफलता मिली और दूसरी तरफ वन्य जीवों के संरक्षण के लिये उनके वास स्थलों के रूप में राष्ट्रीय उद्यानों, वन्य जीव विहार एवं अभ्यारण्यों की स्थापना को बल मिला। इन्हीं प्रयासों के फलस्वरूप ‘भारतीय वन्य जीव परिषद’ ने वन्य प्रजातियों को तुरन्त संरक्षण प्रदान करने का सुझाव दिया है।

वन्य जीव संरक्षितियाँ विस्तृत रूप से दो भागों में विभक्त की गई है-

1. राष्ट्रीय उद्यान
2. वन्य जीव विहार

वन्य जीव संरक्षिति का विशेष उद्देश्य जानवरों व पक्षियों को सुरक्षा प्रदान करना है जबकि राष्ट्रीय उद्यान सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षा प्रदान करते हैं। कुछ विशेष प्रकार की वन्य जीव संरक्षितियाँ भी हैं जैसे बाघ परियोजना। इसमें से प्रमुख है, सुन्दर वन बाघ परियोजना। इस परियोजना में रॉयल बंगाल टाइगर को सुरक्षा प्रदान की गई है। यहाँ बाघों की बढ़ती जनसंख्या ने एक नई समस्या को जन्म दिया है। यह तथ्य इस परियोजना की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

इस समय भारत में 54 राष्ट्रीय वन्य उद्यान हैं जिनके अन्तर्गत सागरतटीय वन्योद्यान, उच्च अक्षाशीय वन्योद्यान तथा अंडमान निकोबार द्वीप समूह में स्थित वन्य अभ्यारण्य हैं। इनमें से 26 बड़े वन्य अभ्यारण्य नगरीय क्षेत्रों में तथा 160 वन्य जीव संरक्षितियाँ देश के शेष भागों में केन्द्रित हैं। सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि दक्षिण की तुलना में उत्तर भारत वन्य जीवों की दृष्टि से धनी है। दक्षिण भारत में केवल केरल राज्य ही वन्य जीव संरक्षण पर सर्वाधिक ध्यान देता है, पारिस्थितिकी तंत्र व जीवों की सुरक्षा के लिये ‘मैन एण्ड बायोस्फेयर प्रोग्राम’ की रूपरेखा भारत सरकार ने तैयार की है।

राजीव गाँधी नगर, फर्रूखाबाद (उ.प्र.)
डा. गुलाबसिंह बघेल
प्रवक्ता, भूगोल, दुर्गानारायण महाविद्यालय, फतेहगढ़

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