उत्तर प्रदेश के जल में “आर्सेनिक” का जहर


एक तरफ हम विश्व जल दिवस (22 मार्च) मनाने की तैयारी कर रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दी लक्ष्य घोषित किए जा रहे हैं, लोगों को साफ सुरक्षित पेयजल मुहैया कराने के जितने प्रयास किए जा रहे हैं वहीं ऐसा लगता है कि मंजिल कोसों दूर होती जा रही है। हाल में मिलने वाली खबरें कुछ ऐसे ही खतरे का संकेत दे रहीं हैं।

हाल ही में यूनिसेफ की मदद से उत्तर प्रदेश सरकार ने एक सर्वे करवाया, जिसमें उत्तर प्रदेश के बीस से अधिक जिलों का भूजल “आर्सेनिक” प्रदूषित पाया गया है। सर्वे की प्राथमिक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 31 जिले और ऐसे हैं जहाँ यह खतरा हो सकता है, हालांकि उनकी विस्तृत जानकारी अभी सामने आना बाकी है। चौंकाने वाली यह खबर उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास मंत्री दद्दू प्रसाद ने विधानसभा में दी। हिन्दू महासभा के सदस्य राधामोहन अग्रवाल के प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रसाद ने बताया कि यूनिसेफ द्वारा यह अध्ययन प्रदेश के 20 जिलों के 322 विकासखण्डों में किया गया, जहां आर्सेनिक अपनी मान्य मात्रा 0.05 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से कहीं अधिक पाया गया है।

डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार पानी में आर्सेनिक की मात्रा प्रति अरब 10 पार्ट से ज्यादा नहीं होनी चाहिए या प्रति लीटर में 0.05 माइक्रोग्राम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन शोध बताते हैं कि यह इन क्षेत्रों में 100-150 पार्ट प्रति बिलियन तक पानी में आर्सेनिक पहुंच चुका है। बलिया और लखीमपुर जिले सबसे अधिक प्रभावित पाये गये। एहतिहात के तौर पर सैकड़ों की संख्या में हैण्डपम्प सील कर दिये गये हैं। बहराईच, चन्दौली, गाज़ीपुर, गोरखपुर, बस्ती, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, सन्त कबीर नगर, उन्नाव, बरेली और मुरादाबाद, जिलों में भी आर्सेनिक की अधिक मात्रा पाई गई है, जबकि रायबरेली, मिर्ज़ापुर, बिजनौर, मेरठ, सन्त रविदास नगर, सहारनपुर और गोण्डा आंशिक रूप से प्रभावित जिले हैं ।

मथुरा में बैराज के कारण यमुना का रुका जल स्थानीय भू गर्भ के लिए खतरा बन रहा है तो मथुरा के आसपास के कुछ स्थानों पर बोरिंग के दौरान लाल रंग का पानी निकलने लगा है।

दिल्ली के मेडिकल संस्थान एम्स की जांच आख्या के अनुसार दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम में दो सौ किलोमीटर के दायरे में आर्सेनिक का एंडमिक क्षेत्र विकसित हो रहा है। इस क्षेत्र को आर्सेनिक के मामले में विश्व के दो सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक कहा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इसका एक कारण बांग्लादेश से आने वाली गहरी अंत: नलिका तो है ही, गोकुल बैराज से भी जो जल जमीन के नीचे जा रहा है, वह भयंकर रूप से आर्सेनिक को अपने साथ भू गर्भ में ले जा रहा है। यमुना जल में भारी मात्रा में केमिकल कचरा तथा ब‌र्स्ट बोरिंग इसका दूसरा बड़ा कारण माना जा रहा है।

बिहार में तो पटना सहित 12 जिलों के लोग आर्सेनिक युक्त जहरीला पानी पाने के लिए मजबूर हैं। आर्सेनिक युक्त पेयजल के कारण गैंग्रीन, आंत, लीवर, किडनी और मूत्राशय के कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां हो रही हैं। राज्य के जन स्वास्थ्य और अभियंत्रण विभाग के मंत्री प्रेम कुमार के अनुसार, “गंगा के किनारे रहने वाले 1,20,000 लोगों के जीवन को आर्सेनिक युक्त भू-जल से खतरा है”। केंद्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री जयप्रकाश यादव बताते हैं कि कानपुर से आगे बढ़ने पर गंगा में आर्सेनिक का जहर घुलना शुरू हो जाता है। कानपुर से लेकर बनारस, आरा, भोजपुर, पटना, मुंगेर, फर्रुखा तथा पश्चिम बंगाल तक के कई शहरों में गंगा के दोनों तटों पर बसी आबादी में आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं।

पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक का कहर सबसे भयानक है, करीब 70 लाख लोग बीमारियों की चपेट में आ गए हैं। लगभग 20 जिले आर्सेनिक प्रभावित हैं। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने राज्यों को सलाह दी है कि जल को शुद्ध किए बगैर पीने के लिए उपयोग में नहीं लाया जाए।

सरकार इस खतरे से निपटने के लिये काम कर रही है और इससे समु्चित ढंग से निपटा जायेगा, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास मंत्री कहते हैं। वे बताते हैं कि उत्तरप्रदेश जल निगम के अधिकारियों, केन्द्रीय भूजल बोर्ड, यूनिसेफ़, इंडस्ट्रियल टॉक्सिकोलोजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट लखनऊ, CSM मेडीकल यूनिवर्सिटी और आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों की एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया था जिसने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। मंत्री जी ने खुलासा किया कि टास्क फ़ोर्स द्वारा सुझाये गये सभी उपायों पर तत्परता से अमल किया जा रहा है और जनता को आर्सेनिक संदूषित पानी के खतरों के बारे में आगाह किया जा रहा है और साथ ही लोगों से अपील की जा रही है कि वे इस पानी का उपयोग पीने के लिये न करें। विभिन्न इलाकों में खतरे की सम्भावना वाले हैण्डपम्पों पर लाल ‘X’ का निशान लगाया जा रहा है ताकि उसका पानी लोग उपयोग न करें, इसी प्रकार कुछ अन्य जिलों में गहरे हैण्डपम्प खुदवाये जा रहे हैं। बलिया जिले में तो जगह- जगह बोर्ड लगाकर हिदायत दी जा रही है है कि यहां का पानी पीना मना है! और साथ ही गंगा किनारे के गांवों के 117 हैंड पंपों पर लाल निशान लगाए गये हैं।

 

आर्सेनिक के खतरे


आर्सेनिक के जहर वाला पानी नमकीन हो जाता है। अगर आर्सेनिक मिले पानी को लंबे समय तक पिया जाए तो इससे कई भयंकर बीमारियां होनी शुरू हो जाती हैं। पानी में घुलित आर्सेनिक कैंसर के कई रूप, त्वचा कैंसर और किडनी फेल होने जैसी बीमारियों का कारक है। मथुरा के शंकर कैंसर चिकित्सालय के डॉ. दीपक शर्मा के अनुसार आर्सेनिक के प्रभाव से गाल ब्लैडर में कैंसर हो सकता है। वृंदावन पैलिएटिक केयर सेंटर के डॉ. संजय पिशारोड़ी के अनुसार आर्सेनिक और नाइट्रेट के कारण मनुष्य का इम्यून सिस्टम प्रभावित होता है। इससे समय से पहले वृद्धावस्था के लक्षण नजर आते हैं। इम्यून सिस्टम प्रभावित होने पर मस्तिष्क में कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। आर्सेनिक से टाइप दो की डायबिटीज का भी खतरा बढ़ जाता है।

आर्सेनिक से प्रदूषित जल के सेवन से धमनियों से संबंधित बीमारियाँ होने और परिणामस्वरूप दिल का दौरा पड़ने और पक्षाघात के ख़तरे बढ़ जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार उन्होंने शरीर में आर्सेनिक के निरंतर प्रवेश का मस्तिष्क से जुड़ी धमनियों में सिकुड़न और अलीचलेपन से प्रत्यक्ष संबंध पाया है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में छपी अनुसंधान रिपोर्ट में आर्सेनिक और कई जल अशुद्धियों को रक्तवाहनियों से जुड़े रोगों का कारण बताया गया है। बांग्लादेश और चीन सहित दुनिया के विभिन्न देशों में चट्टानों में आर्सेनिक की मात्रा पाई जाती है। लंबे समय तक आर्सेनिक प्रदूषित जल के सेवन से त्वचा संबंधी बीमारियाँ भी होती हैं, लेकिन कपड़े धोने या स्नान के लिए इस जल का उपयोग ख़तरनाक नहीं माना जाता है।
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आर्सेनिक से मुक्ति का उपायः


आर्सेनिक युक्त जल को अगर खुली धूप में 12-14 घंटे तक रख दिया जाए तो उसमें से 50 फीसदी आर्सेनिक उड़ जाता है। उसके बाद उस जल का इस्तेमाल पेयजल के रूप में किया जा सकता है।इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे प्रयासों के तहत बंगाल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग ने कम्युनिटी एक्टिव एलुमिना फिल्टर का निर्माण भी किया है जो पानी से आर्सेनिक निकालने में मददगार साबित हो सकता है।

वहीं राष्ट्रीय वनस्पति शोध संस्थान के वैज्ञानिक भी इस समस्या से निजात दिलाने के रास्ते खोज रहे हैं संस्थान के वैज्ञानिकों ने उस जीन का पता लगा लिया है जो सिंचाई के बाद आर्सेनिक के स्तर को कम करने के साथ साथ उसे अनाज व सब्जियों में पहुंचने से रोकेगा। इस शोधकार्य में महती भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिक डॉ. देवाषीश चक्रवर्ती ने कहा, “यह शोध प्लांट डिदेंस मैकेनिज्म को आधार बनाकर किया गया है”।

ब्रिटेन के बेलफास्ट स्थित क्वींस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भी ऐसी किफायती तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जिससे आर्सेनिक संदूषित जल की समस्या से निजात मिल सकती है। इस परियोजना के समन्वयक भास्कर सेनगुप्ता ने कहा,'क्वींस के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार की गई यह तकनीक पर्यावरण के अनुकूल, इस्तेमाल में सरल, किफायती और ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध कराई जा सकने वाली दुनिया की एकमात्र तकनीक है।' यह तकनीक आर्सेनिक संदूषित भूमिगत जल के एक हिस्से को पारगम्य पत्थरों में रिचार्जिग पर आधारित है। इन पत्थरों में जल धारण करने की क्षमता होती है। यह तकनीक भूमिगत जल में ऑक्सीजन स्तर को बढ़ा देती है और मिट्टी से आर्सेनिक निकलने की प्रक्रिया धीमी कर देती है। इस तकनीक से पानी में आर्सेनिक की मात्रा धीरे-धीरे कम होने लगती है।

इस तरह के वैज्ञानिक दावों से उम्मीद की डोर तो बांधी जा सकती है, पर पानी के प्रति सरकारों और पानी के संगठनों को जिम्मेदारी थोड़ा ईमानदारी से निभानी होगी, तभी शायद कोई रास्ता निकले . . .

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