सरदार सरोवर विवाद

सरदार सरोवर विवाद
सरदार सरोवर विवाद

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सरदार सरोवर बांध के निर्माण को हरी झण्डी दे दी, जो पिछले छह वर्षों से रुका पड़ा था। इस संदर्भ में कुछ तथ्य गौरतलब हैं। पिछले वर्ष भारत के कम्प्ट्रोलर व ऑडिटर जनरल (सी.ए.जी.) ने अपनी रिपोर्ट में उसी बात की पुष्टि की थी जिसे कई समितियां कहती आई हैं इन्दिरा सागर व सरदार सरोवर परियोजना के प्रभावित लोगों के पुनर्वास की स्थिति अत्यन्त घटिया है। मेग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित बाबा आमटे ने आरोप लगाया है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला 'बगैर जांच पड़ताल के दिया है और राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें। सुश्री मेधा पाटकर ने भी राष्ट्रपति से हस्तक्षेप का आग्रह किया है। किन्तु सर्वोच्च न्यायालय का आदेश होने की वजह से इस पर पुनर्विचार हेतु सर्वोच्च न्यायालय में ही पुनर्विचार याचिका दाखिल करने के सिवा कोई रास्ता नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के बहुमत फैसले के अनुसार सरदार सरोवर की ऊंचाई को वर्तमान 88 मीटर से बढ़ाकर 90 मीटर किया जा सकता है। यह कार्य नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा स्वीकृत योजनानुसार किया जाएगा। इसके आगे निर्माण कार्य हेतु नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण से अनुमति लेनी होगी। यह अनुमति पुनर्वास व पुनर्स्थापना कार्य की प्रगति पर निर्भर होगी। योजना आयोग ने 1960 में 49 मीटर ऊंचे बांध की अनुमति दी थी। किन्तु गुजरात सरकार ने समुद्र सतह से 140 मीटर ऊंचा पूर्ण जलाशय स्तर प्रस्तावित किया। नर्मदा जल विवाद ट्रायब्यूनल ने पूर्ण जलाशय स्तर 138 मीटर निर्धारित किया।
सरदार सरोवर परियोजना दरअसल नर्मदा घाटी विकास परियोजना का अंग है, जो दुनिया की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना बताई जाती है। इसके अन्तर्गत 30 बड़े, 135 मझोले व 3000 छोटे बांध बनाने की योजना है।

सहमति का अभाव

परियोजना अधिकारियों का दावा है कि सरदार सरोवर परियोजना एक ऐसी परियोजना है जिसके सम्बंध में सर्वाधिक अध्ययन हुए हैं। किन्तु इस बात पर कोई आम सहमति नहीं है कि इस परियोजना से कितने लोग विस्थापित होंगे। सन 1985 में यह संख्या 6603 बताई जाती थी। 1996 में सरकारी अनुमान ही 41,000 परिवारों का था। इसी प्रकार से नर्मदा में पानी की मात्रा को लेकर भी आम सहमति नजर नहीं आती। नर्मदा में पानी की मात्रा का निर्धारण ट्रायब्यूनल को करने देने की बजाय सम्बंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने मान लिया कि नर्मदा में प्रतिवर्ष लगभग 280 लाख एकड़ फीट पानी बहता है। ट्रायब्यूनल ने इस आंकड़े के आधार पर पानी का बंटवारा कर दिया और सरदार सरोवर का पूर्ण जलाशय स्तर 138 मीटर तय कर दिया। दरअसल सिंचाई सम्बंधी गणनाओं से पूर्ण जलाशय स्तर 133 मीटर आता है किन्तु मध्यप्रदेश को बिजली देने हेतु 5 मीटर का प्रावधान और जोड़ा गया था।

पानी की मात्रा की उक्त गणना के लिए 1891 से 1947 के बीच के 57 वर्षों के कुछ आंशिक व शंकास्पद आंकड़ों का उपयोग किया गया था। इनकी वजह से हुआ यह कि वास्तविक बहाव (220 लाख एकड़ फीट) को बढ़ा-चढ़ाकर 280 लाख एकड़ फीट दर्शा दिया गया। सच्चाई तो यह है कि दुनिया के किसी भी बांध के सम्बंध में विश्वसनीय आंकड़े नहीं दिए जा सकते। यह तो मौसम वैज्ञानिक भी निश्चित तौर नहीं बता सकते कि अगले 50 वर्षों में किसी नदी में कितना पानी बहेगा।
अखिल भारतीय जन विज्ञान आंदोलन नेटवर्क तथा जवाहरलाल नेहरू स्मारक संग्रहालय द्वारा आयोजित एक गोष्ठी में प्रो. अमूल्य रेड्डी का कहना था कि नर्मदा बारहमासी नदी तो है किन्तु अधिकांश पानी मॉनसून के दौरान बह निकलता है। अतः यहां मॉनसून पश्चात् बिजली उत्पादन का कोई औचित्य नहीं है। यही कारण है कि अतिरिक्त 5 मीटर को कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता। उनका सुझाव था कि बिजली उत्पादन के अन्य विकल्पों पर गहराई से विचार होना चाहिए, जो सरदार सरोवर की अपेक्षा कहीं अधिक सस्ते हैं।
वास्तव में देखा जाए तो सरदार सरोवर के बिजली उत्पादन का ढिंढोरा थोड़ा ज़्यादा ही पीटा गया है। होगा यह कि जब ज्यादा पानी सिंचाई की नहरों में बहने लगेगा तब धीरे-धीरे इससे उत्पन्न बिजली मात्र 50 मेगावॉट रह जाएगी जबकि उम्मीद 439 मेगावॉट की लगाई जा रही है। लिहाजा आगे चलकर इस परियोजना से जितनी बिजली बनेगी, उससे ज़्यादा इसी के संचालन में खप जाएगी।
इकॉनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली में जशभाई पटेल ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया है कि गुजरात सरकार ने प्रान्त की सीमाओं पर बांध बनाने की तकनीक में महारत हासिल कर ली है ताकि लाभ तो उसे मिले और डूब पड़ोसी राज्यों में हो।

हालांकि पेयजल को सरदार सरोवर का एक प्रमुख लाभ गिनाया गया है। किन्तु पेयजल प्रदाय की लागत को परियोजना की लागत में शामिल नहीं किया गया है। कई विश्लेषकों ने बताया है कि गुजरात के 70 प्रतिशत सूखाग्रस्त इलाकों और 90 प्रतिशत आदिवासी आबादी को इस परियोजना से एक बूंद भी पानी नहीं मिलेगा। विवादों के चलते 1991 में विश्व बैंक द्वारा बैडफोर्ड मोर्स की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति का गठन किया था। मोर्स समिति का स्पष्ट मत था कि परियोजना के लाभ बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हैं जबकि सामाजिक व पर्यावरणीय लागतों को प्रायः कम करके दिखाया गया है। विश्व बैंक ने मार्च, 1993 में परियोजना को वित्तीय सहायता देना बन्द कर दिया था।

भारत सरकार द्वारा अगस्त, 1993 में गठित एक विशेषज्ञ समूह ने बताया था कि परियोजना से सम्बंधित बुनियादी आंकड़े त्रुटिपूर्ण हैं। जनवरी 1995 में केन्द्र सरकार ने गुजरात पर दबाव डाला कि वह बांध की ऊंचाई को 63 मीटर पर रोक दे। 94 में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की। बांध के काम पर न्यायालय ने रोक लगा दी। याचिका में कहा गया था कि विस्थापितों का पुनर्वास असम्भव है तथा परियोजना से होने वाली पर्यावरणीय क्षति अस्वीकार्य है।
यह देखा गया है कि नदी पर जैसा असर बांध का होता है, अन्य किसी चीज का नहीं होता। बांध की वजह से नदी में आने वाली कुदरती बाढ़ का चक्र बदल जाता है। इसका इकॉलॉजिकल प्रभाव भीषण होता है। इसकी वजह से बांध के नीचे के क्षेत्र में रहने वाले लोग उस बाढ़ से वंचित हो जाते हैं जो उनके खेतों में उपजाऊ मिट्टी व सिंचाई लाती है।

'कई विश्लेषकों ने बताया है कि गुजरात के 70 प्रतिशत सूखाग्रस्त इलाकों और 90 प्रतिशत आदिवासी आबादी को इस परियोजना से एक बूंद भी पानी नहीं मिलेगा। विवादों के चलते 1991 में विश्व बैंक द्वारा बैडफोर्ड मोर्स की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति का गठन किया था। मोर्स समिति का स्पष्ट मत था कि परियोजना के लाभ बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हैं जबकि सामाजिक व पर्यावरणीय लागतों को प्रायः कम करके दिखाया गया है।'

भारत के सारे बड़े बांधों (एक घन किलोमीटर से अधिक क्षमता वाले) में तेजी गाद भरती जा रही है। इससे उनकी जलसंग्रह क्षमता कम होती जा रही है। मसलन, आन्ध्रप्रदेश के निजाम सागर को लें। इसमें गाद भरने की रफ्तार पूर्व अनुमान से 1650 प्रतिशत अधिक है। इसके अलावा नदी का पानी वर्षा जल की बनिस्बत अधिक लवण युक्त होता है। शुष्क जलवायु में सिंचाई का पानी लगातार तेजी से वाष्पित होता है तथा इसकी वजह से मिट्टी की उत्पादकता घट जाती है। अपनी पुस्तक पिलर्स ऑफ सैण्ड (रेत के स्तम्भ) में वर्ल्डवॉच संस्थान की सैण्ड्रा पोस्टेल ने अनुमान व्यक्त किया है कि भारत में 30 लाख हैक्टेयर जमीन से बर्बाद हुई है। पूरी दुनिया में अब नए बांध बनाने की बजाय पुराने बांधों को सुरक्षित ढंग से संचालित करने पर ध्यान दिया जा रहा है। संयुक्त राज्य अमरीका में तो बांध हटाने का उद्योग स्थापित हो चुका है। यह बांधों को हटाने व नदी का कुदरती प्रवाह बहाल करने का काम करता है। 1980 के दशक से ही दुनिया भर में चल रहे बांध विरोधी आंदोलनों की वजह से कई बड़े बांधों का निर्माण रुका है। मसलन, थाईलैण्ड।

का नाम चोन बांध और भारत का साइलेण्ट वैली। सरदार सरोवर बांध के पीछे भरता पानी सिर्फ यही दर्शाता है कि यह परियोजना वंचितों से संसाधन छीनकर सम्पन्न लोगों के हाथ में सौंप देने के अलावा कुछ नहीं करेगी। इस बांध के हितग्राही ठेकेदार और कमान क्षेत्र में रईस किसान होंगे। दूसरी ओर बड़ी संख्या में जिन लोगों का सम्बंध जीवनदायी धरती से टूट जाएगा उनके लिए तो यह परियोजना रातों रात गरीबी और सांस्कृतिक टूटन का ही पैगाम है। एक आंकड़े के मुताबिक पूरे गुजरात की सिंचाई वह पेयजल परियोजना का पैसा सरदार सरोवर को सौंप दिया गया है। इस बांध से गुजरात का सर्वाधिक लाभान्वित अभी का सम्पन्न इलाका होगा। शेष इलाकों में पानी पहुंचने का अनुमान 27 वर्षों बाद है जबकि उनके लिए तत्काल वैकल्पिक संसाधनों के लिए कोई योजना नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

प्रवीण कुमार मुंबई में रहकर स्वतंत्र विज्ञान लेखन करते हैं। अनुवाद डॉ. सुशील जोशी।


स्रोत -  स्रोत फीचर, फरवरी 2001

Path Alias

/articles/sardar-sarovar-dispute

Post By: Shivendra
×