सौर युद्ध की चपेट में विश्व

दुनियाभर में इस बात की आशा बंधी है कि सौर ऊर्जा के माध्यम से विद्युत उत्पादन कर, जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों को एक हद तक रोका जा सकता है। लेकिन सौर ऊर्जा उद्योग को लेकर चीन के अमेरिका और यूरोप के साथ हो रहे व्यापार युद्ध से अंततः पूरी पृथ्वी ही प्रभावित होगी। स्वच्छ और नवीकरण ऊर्जा के स्रोत को एक ऐसे रक्षक के तौर पर देखा जा रहा है, जो कि दुनिया को बिना ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन के ऊर्जा प्रदान करने में मददगार होगा। सौर ऊर्जा की एक कमी यह है कि यह कोयले एवं तेल के बनिस्बत अधिक महंगी है, लेकिन हाल के वर्षों में सौर ऊर्जा काफी सस्ती हो गई है। विशेषज्ञों का मत है अगले कुछ वर्षों में कुछ क्षेत्रों में इसकी लागत पारंपरिक ईंधन के समतुल्य हो जाएगी। सोलर सेल का मूल्य जो कि सन् 1977 में प्रति वाट 76 अमेरिकी डॉलर था वह सन् 1987 में 10 डॉलर हो गया और सन् 2013 में घटकर मात्र 74 सेंट रह गया है। वहीं चीनी सेल की कीमत प्रति वाट 4.50 अमेरिकी डॉलर से घटकर मात्र 90 सेंट प्रति वाट रह गई है।

मूल्य में गिरावट के मुख्य कारण हैं कच्चे पदार्थ पॉलिसिलिकॉन (अधिक आपूर्ति की वजह से) के मूल्यों में कमी, सोलर सेल की कार्यक्षमता में वृद्धि, निर्माण तकनीक में सुधार, माप की इकाई और गहन प्रतिस्पर्धा। ये सब जलवायु परिवर्तन से लड़ने के संदर्भ में शुभ समाचार हैं। लेकिन अब अशुभ समाचार। बढ़ती वैश्विक मांग के चलते सोलर पैनल निर्माताओं की संख्या में वृद्धि होने से प्रचंड प्रतिस्पर्धा पैदा हो गई है। इसके परिणामस्वरूप अनेक कंपनियां बंद होने की कगार पर हैं।

चीन की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा कंपनी सनटेक गंभीर संकट में है। अमेरिकी सौर पैनल निर्माताओं से शिकायतें मिलने के बाद सं.रा. अमेरिका की सरकार ने चीनी आयात पर एंटी डंपिंग शुल्क थोप दिया। अब यूरोपीय आय¨ग ने चीनी सौर उत्पादों के संबंध में यह दावा करते हुए औसतन 47 प्रतिशत शुल्क लगाने का प्रस्ताव किया है कि वह लागत से भी कम में इन्हें बेच रहा है। चीन इस धमकी को गंभीरता से ले रहा है। चीनी प्रधानमंत्री ली क्विंग ने पिछले दिनों अपनी यूरोप यात्रा के दौरान यूरोपियन नेताओं के साथ यह मुद्दा उठाया था। वरिष्ठ व्यापार अधिकारियों का कहना है कि चीन पलटवार करेगा। अतएव एक पूर्णरूपेण व्यापार युद्ध सन्निकट है।

एक आश्चर्यजनक पलट घटनाक्रम में जर्मनी एवं अन्य 16 यूरोपीय देशों ने यूरोपीय आयोग से कहा है कि वे इस कदम के खिलाफ हैं, लेकिन यूरोपीय व्यापार आयुक्त कारेल डे गच जितनी उनकी हद में आता है उतना अंतरिम शुल्क तो लगाएगें ही। अतएव चीन और यूरोप एवं अमेरिका के मध्य सौर युद्ध के चलते रहने की उम्मीद बरकरार है। लेकिन वास्तविक दुःखद तथ्य यह है कि सौर ऊर्जा के तीव्र विकास एवं जलवायु के खिलाफ लड़ाई में देशों के व्यावसायिक हित आड़े आ रहे हैं। कीमतों के नीचे आने, सौर ऊर्जा को अधिकाधिक प्रतिस्पर्धात्मक बनाने और इसकी जबरदस्त वृद्धि में चीन के सौर पैनल उद्योग के विस्तार ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। ये सच है कि चीन अपने सौर उद्योग को सब्सिडी और प्रोत्साहन देता है, लेकिन अमेरिका और यूरोप भी तो इस उद्योग को भारी मात्रा में सब्सिडी एवं मदद प्रदान करते हैं।

अमेरिका सौर कंपनियों को ऋण गारंटी, शोध अनुदान एवं करों में कटौती जिसमें निवेश कर ऋण एवं अत्यधिक घिसावट भी शामिल है, प्रदान करता है। यूरोपीय देश की ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं एवं साथ ही निर्माताओं को कर भुगतान योजनाओं के माध्यम से प्रोत्साहित कर जो सब्सिडी देते हैं उसमें सौर ऊर्जा उपलब्ध करवाने वालों को वे जो ऊर्जा उपभोक्ताओं से वसूलते हैं, से भी ज्यादा भुगतान किया जाता है और इस अंतर की पूर्ति सरकार करती है। बिना सब्सिडी के सौर उद्योग में वृद्धि ही नहीं होती। व्यापार के सुरक्षात्मक कदम जो कि एक के खिलाफ दूसरे या सभी के एक दूसरे के खिलाफ उठाएंगे अंततः व्यापार, सौर उद्योग एवं पर्यावरण तीनों के लिए विध्वंसकारी सिद्ध होंगे। सौर ऊर्जा के पैरोकार एवं सोलर सेंचुरी के अध्यक्ष जेरेमी लेग्गेट व्यंग्य से कहते हैं, “एक ग्रह पर क्षुद्र ग्रह के टकराने का खतरा है। उसके निवासियों ने खतरे के मुकाबले के लिए राकेट भी बना लिया है। लेकिन जब चट्टान नजदीक आ गई तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बहस में पड़ गया कि इस पर किया गया खर्च कौन वहन करेगा।’’

लेग्गेट का कहना है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की वजह से कोई भी इस व्यापार युद्ध में जीत नहीं सकता। सौर इन्गाट्स और ऊपरी हिस्सा आमतौर पर यूरोप और अमेरिका में बनता है, जबकि बीच में लगने वाले उत्पाद, सेल एवं अन्य पुर्जे चीन में बनते हैं। यदि चीन के द्वारा निर्मित हिस्से के निर्यात पर रोक लगती है तो चीन ऊपरी हिस्से के आयात पर शुल्क बढ़ा सकता है। उदाहरण के लिए चीन के खिलाफ शुल्क बढ़ाने से यूरोप में हजारों रोजगार समाप्त हो जाएंगे, क्योंकि कंपनियां इन पुर्जों का निर्माण नहीं करतीं बल्कि इनको सिर्फ आपस में जोड़ती हैं और उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि ये कहां बनते हैं।

इस समस्या के निराकरण के बारे में उनका कहना है कि कुछ देश जो कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं उनके नेताओं में आपसी सामंजस्य की आवश्यकता है। उन्हें समझना होगा कि इस सौर श्रृंखला के विभिन्न हिस्से बनाने हेतु अगले कुछ वर्षों तक सब्सिडी की आवश्यकता पड़ सकती है, जब तक कि लागत पारंपरिक ऊर्जा के समकक्ष न आ जाए। अपनी बातों के सार में वे कहते हैं कि “विश्व को बड़े स्तर पर साझा सुरक्षा को अपनाना होगा’’ प्रतिस्पर्धा में पड़ने से हमेशा लाभ नहीं होता और इस मामले में ये हमारी साझा समस्या जिनमें ऊर्जा असुरक्षा की समस्या, प्रदूषित वायु और संसाधनों के ह्रास शामिल हैं, का हल नहीं निकाल सकती। इस तरह हम उन उद्योगों को अपंग बनाते रहेंगे जो कि हमें बचा सकते हैं।

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