जल प्रबंधन एवं सिंचाई क्षमता वर्धन रबड़ बाँध एक विकल्प

जल प्रबंधन एवं सिंचाई क्षमता वर्धन रबड़ बाँध एक विकल्प
जल प्रबंधन एवं सिंचाई क्षमता वर्धन रबड़ बाँध एक विकल्प

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                धरती पर जीवन के लिए महत्पूर्ण तत्व जल आज संकट काल से गुजर रहा है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जल संकट से उभरने के लिए आधुनिक परिवेश में इसका उचित प्रबंधन अति आवश्यक है। जल प्रबंधन के कई पहलू है यथा जल प्रदूषण की रोकथाम, जल का संरक्षण, भण्डारण एवं उचित उपयोग भारत एक कृषि प्रधान देश है इसकी 70 प्रतिशत आबादी गाँवों में निवास करती है तथा जिनका जीवन यापन खेती पर निर्भर है। भारत के अधिकतर भू-भाग में खेती वर्षा जल पर आधारित होने के कारण किसानों को वर्षा के जल पर निर्भर रहना पड़ता है। मानसून से पूर्व सिचाई हेतु जल संसाधनों की कमी के चलते इसका दुष्परिणाम खेती की पैदावार के साथ-साथ किसानों की आर्थिक स्थिति एवं देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। वर्षा जल पर कृषि की निर्भरता को कम करने के लिए जान की भण्डारण क्षमता को बढ़ना अति आवश्यक है।

जल भंडारण का कार्य प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। प्राचीन समय में जब तकनीक इतनी विकसित भी नहीं हुई थी, तब भी लोग तालाब एवं बावड़ी इत्यादि का प्रयोग वर्षा जल के भण्डारण के लिए करते थे। उस समय आबादी कम होने के कारण सीमित जल संसाधनों के होने पर भी मानव के कई दैनिक एवं व्यावसायिक कार्य सुचारू रूप से संपन्न हो जाते थे। जैसे-जैसे जनसंख्या में वृद्धि हुई अन्न की माँग भी बढ़ी इस बढ़ी हुई माँग की पूर्ति हेतु खेती के भू-भाग में बढ़ोत्तरी हुई। इस बढ़ी हुई खेती के भू-भाग की सिंचाई के लिए जल की मांग बढ़ने लगी जल की इस मांग ने बाँध जैसी जल भण्डारण वाली अवसंरचनाओं को जन्म दिया।

नदियों पर बनाने की शुरुआत नील नदी से हुई। माना जाता है कि विश्व का पहला बाँध 2000 ई० पूर्व नील नदी पर बनाया गया था जो राजा मेस की राजधानी मैफिक को जल की आपूर्ति करता था। भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे पहला बाँध बलूचिस्तान में पत्थरों द्वारा जुरूस्त्रो ने बनवाया था 9वी शताब्दी में राजा अवन्ती वमन के राज्य में झेलम नदी में आई बाढ़ के जल को रोककर जो जलाशय बनवाया गया था यह आज भी जम्मू कश्मीर राज्य की मीठे पानी की बुलर झील के रूप में विद्यमान है। आधुनिक काल में भारत का सबसे पुराना बांध तमिलनाडु में कावेरी नदी पर बना कालानाई बाँधे है यह विश्व की सबसे पुरानी जन वितरक एवं नियमन अवसंरचनाओं में से एक है।

आधुनिक युग में भारत की सभी प्रमुख नदियों यथा गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र सतलुज कृष्णा कावेरी महानदी और गोदावरी इत्यादि पर बहुउदेशीय बड़े बांधो का निर्माण हो रखा है। हालांकि बड़े बांध आधुनिक जलापूर्ति एवं जल विद्युत की मांग है परन्तु उनके निर्माण की लागत, विस्थापन की समस्या एवं संस्थापन में अत्यधिक समय लगने के कारण तथा पर्यावरण की समस्या के चलते छोटे बांध की आवश्यकता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। आधुनिक परिवेश में सिंचाई की क्षमता को बढ़ाने के लिए छोटी एवं माध्यम आकार की नदियों पर रबड़ बाँध एक लचीली व्यवस्था प्रदान कर रहे हैं।

रबड़ बांध 

रबड़ बाँध का विकास 1950 के दशक से आरम्भ हुआ था सबसे पहला स्चचभूजल पुनर्भरण एवं बाढ़ के समन हेतु कैलिफोर्निया की लॉस एंजिल्स नदी पर बनाया गया था। पहले इस प्रकार के बाँध जल एवं हवा दोनों को साथ-साथ प्रयोग कर बनते थे।  परन्तु बाद में नई-नई तकनीक आने के कारण इनके स्वरूप एवं संख्या में भी विस्तार हुआ। आधुनिक युग में हजारों की संख्या में रबड़ बाँध विभिन्न रूपों यथा सिचाई, जलापूर्ति विद्युत उत्पादन, जल उपचारण, समुद्रीय ज्वारभाटा अवरोधक बाढ़ नियंत्रण एवं पर्यावरण संरक्षण के रूप में सम्पूर्ण विश्व में उपयोग हो रहे है।

रबड़ बाँध ट्यूब के आकार के होते है जिन्हें छोटी या मध्यम आकार की नदियों पर बनाया जाता है। इन ट्यूबों को फुलार नदी के जल को रोका जाता है नदी के जल में वृद्धि
सिचाई क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। रेगिस्तानी क्षेत्रों में सर्दियों के मौसम में जब नदी जल स्तर घट जाता है अथवा नहीं वर्षा कम होती है या पहाड़ी क्षेत्रों में पेयजल की आपूर्ति हेतु इस प्रकार बांधो का उपयोग किया जाता है। यह बाँध उच्च शक्ति वाले कपड़े (ई०पी०डी०एम० एथलीन प्रोपलीन डाई मोनोमर) द्वारा बना होता है। यह एक सस्ती जल संरक्षण संरचना है तथा छोटी एवं मध्यम आकार की नदियों पर बिना गेट के बनाए जाते हैं। कम समय एवं कम लागत में निर्मित होने वाली ये पूर्णत स्वचालित अवसंरचनाएं हैं जो नदी में जल स्तर को बढ़ाने हेतु प्रयोग की जाती है जिससे नदी जल को संरक्षित किया जा सके। इसमें प्रयोग होने वाली ट्यूब को जल अथवा वायु का प्रयोग कर फुलाया जाता है जिससे यह एक दीवार की भांति जल के प्रवाह को रोकने में सक्षम हो जाते हैं बाँध की ऊंचाई को आसानी से कम ज्यादा किया जा सकता है ऊंचाई के सरल समायोजन के कारण बाद के समय इसे आसानी से समतल स्तर तक नीचे कर जल प्रवाह को निर्वाध कर बाढ़ की स्थिति में जल फैलाव क्षेत्र को कम किया जा सकता है

रबड़ बाँध का मुख्य भाग रबड़ बैग, पम्प हाउस एवं कंक्रीट का फर्श होता है (जिसके साथ रबड़ बैग स्टील पैड और प्लेट के साथ जुड़ा हुआ होता है) ऊपरी वाहिका से आने वाले जल का प्रयोग कर पम्प हाउस में लगे पम्प मोटर एवं वाल्व की मदद से रबड़ के बैग को फुलाया जाता है इन्ही वाल्वों के द्वारा बैग को आवश्यतानुसार खाली भी किया जाता है जल के आलावा बैग को फुलाने के लिए हवा का प्रयोग भी करते हैं। जल पूरित रबड़ बैग (चित्र - 2) अथवा हवा पूरित रबड़ बैंग (चित्र-1 ) दोनों ही के कुछ लाभ एवं कुछ हानियां होती है यथा जल से पूरित बाँध दोलन के प्रभाव से सुरक्षित रहता है तथा बाँध की पूरी ऊंचाई का उत्थान एवं पतन एक सामान रूप से होता है परन्तु इसने कंक्रीट की चौड़ी पट्टी की आवश्यकता, जल के पम्प एवं पाइप लाइन का व्यास बड़ा होने के कारण इनकी लागत में वृद्धि हो जाती है। इन बांधों में ट्यूब में जल भरने एवं निकासी में समय लगता है तथा ठन्डे प्रदेशों में जल के जमने पर बाँध भी जम जाता है। दूसरी और हवा पूरित बाँध को भरने एवं खाली करने में समय कम लगता है. निर्माण लागत कम होती है तथा शक्ति का खर्च कम होता है परंतु ये हल्के होने के कारण इनमें दोलन होता है एवं ऊंचाई का उत्थान एवं पतन एक सामान रूप से नहीं होता है हवा पूरित बाँध के दोलन को कम करने के लिए श्रेष्ठ अवसंरचनाओं के साथ-साथ इनका आकार अर्धवृत्ताकार द्विरेखीय समन्वयन एवं पाइप अंतरको का भी प्रयोग किया जाता है।

चित्र1 हवा पूरित रबड़ बाँध
चित्र 1 हवा पूरित रबड़ बाँध
चित्र 2 जल पूरित रबड़ बांध
चित्र 2- जल पूरित रबड़ बांध 

स्थल का चुनाव

रबड बाँध की स्थापना हेतु स्थल के चुनाव में निम्न बातों का ध्यान रखना परम आवश्यक है। 

  1. बाँध को बनाने हेतु स्थल ऐसी जगह होना चाहिए जिससे उस बाँध द्वारा रोके गए जल का सिंचाई अथवा पेय जल हेतु भरपूर उपयोग हो सके।
  2. बाँध को निर्मित करने से पूर्व उसके लाभार्थियों से परामर्श किया जाना चाहिए।
  3. बाँध स्थल सड़क मार्ग से सुगम्य होना चाहिए।
  4.  नदी का वह भाग जिस पर बाँध का निर्माण होना है वह सीधा एवं उसमें जल प्रवाह सुचारू होना चाहिए।
  5.  जमीन का ढाल एक सामान होना चाहिए।
  6.  उससे निकाली गई नहरों का जाल इस प्रकार होना चाहिए की जल गुरुत्वाकर्षण द्वारा प्रवाहित हो सके।
  7. जहां गुरुत्वाकर्षण संभव नहीं वहाँ सौर पम्पिंग / विद्युत पम्प द्वारा जल की निकासी संभव होनी चाहिए।
  8. बाँध का निर्माण सूखे के मौसम अथवा वर्षा काल से पूर्व होना चाहिए।"
  9. नदी के किनारे स्थिर होने चाहिए।

रबड़ बाँध के उद्देश्य

रबड़ बाँध निम्न उद्देश्यों की पूर्ति हेतु निर्मित किए जाते है:- 

  1.  बाढ़ नियंत्रक के रूप में।
  2.  मनोरंजन हेतु झील अथवा वाटर पार्क इत्यादि बनाने में उपयोग होते हैं। 
  3. छोटे उद्योगों में विद्युत आपूर्ति हेतु जल विद्युत उत्पादन के उद्देश्य से ।
  4. रबड़ बाँध शीघ्र स्थापित हो जाते है इसलिए इनका प्रयोग बड़े बाँध की मरम्मत करने के समय जल विपथक के उद्देश्य से किया जाता है।
  5.  ग्रामीण अंचलों में जालाशय के निर्माण में इनका प्रयोग होता है।

विश्व में रबड़ बाँध के विभिन्न उपयोग

रबड़ बाँध लागत एवं समय प्रभावी होने के साथ-साथ आसानी से संस्थापित होने के कारण विश्व के अनेक देशों में हजारों की संख्या में इनका विभिन्न रूपों में प्रयोग हो रहा
है।

  1. जल विद्युत उत्पादन हेतु अमेरिका का रेनबो बाँध का (3.86 मी ऊँचाई तथा 67.7 मी लम्बाई)
  2. जलापूर्ति हेतु इंडोनेशिया का गबंग रबड़ बांध (2.85 मी ऊंचाई तथा 12.0 मी लम्बाई) 
  3. भूजल पुनर्भरण हेतु अमेरिका का अल्मेज बाँध (3.96 मी ऊँचाई तथा 88.8 मी लम्बाई)
  4. ज्वारीय अवरोध हेतु जापान में नारूज नदी पर बना बाँध (2.3 मी ऊँचाई तथा 42.1 मी लम्बाई) 
  5. सिंचाई हेतु थाईलैंड का लाम्बी मुआंग लिंग बाँध (4 मी ऊँचाई तथा 73 मी लम्बाई)
  6.  जलाशय की क्षमता वर्धन हेतु ऑस्ट्रेलिया का मिरानी बाँध (1.8 मी ऊँचाई तथा 107.3 मी लम्बाई)।
  7.  जहाजरानी हेतु जापान का ट्युडेबाँध (1.5 मी ऊँचाई तथा 20 मी लम्बाई )
  8.  मनोरंजन हेतु कोरिया का सिन चान बाँध (1.5 मी ऊँचाई तथा 50.65 मी लम्बाई)
  9. पुनर्वास हेतु फिलिपीन्स का वाका बाँध (2.0 मी ऊँचाई तथा 13.3 मी लम्बाई) 
  10.  पेयजल हेतु अमेरिका का अल्तुना बाँध (1.53 मी ऊँचाई तथा 35.7 मी लम्बाई)
  11.  मल-प्रवाह के नियंत्रण हेतु जापान में इचियका मॉल-प्रवाह पद्धति संयंत्र (1.1 मी ऊँचाई तथा 6.5 मी लम्बाई ) 
  12.  बाढ़ नियंत्रण हेतु ताइवान का शिंग चू नदी पर बना बाँध (1.6 मी ऊँचाई तथा 8 मी. लम्बाई)

रबड़ बाँध के लाभ

रबड़ बाँध के निम्न लाभ है-

  1.  रबड़ बाँध बाढ़ व सूखे पर अच्छे नियंत्रक होते हैं
  2. जल उपयोग क्षमता एवं प्रति व्यक्ति जल संग्रहण क्षमता में वृद्धि करते हैं
  3. रबड़ बाँध का संस्थापन आसान, कम खर्चीला एवं कम समय में हो जाता है 
  4.  इनकी लागत पारंपरिक गेटेडविनियम संरचना की अपेक्षा 40% तक कम आती है।
  5.  भूजल पुनर्भरण हेतु आसानी से लगाए जा सकते हैं। 
  6.  मृदा के क्षरण को रोकने में समर्थ होते हैं।
  7. रबड़ बाँध प्रत्येक ढलान कोण के अनुकूल होते हैं जिससे इसकी स्थापना के लिए नदी तटों को बहुत कम संशोधन की आवश्यकता होती है।
  8. रबड़ बाँध चौड़ी नदियों में भी बिना घाट निर्मित किए भी स्थापित किए जा सकते हैं।
  9. इस बाँध को सरलता से दूसरे स्थान पर पुनः प्रयोग किया जा सकता है।
  10.  इनका निर्माण काल लघु होता है।

भारत में रबड़ बाँध

भारत में यद्यपि रबड़ बाँध का प्रयोग काफी कम हुआ है फिर भी इसके प्रयोग में भविष्य में बढ़ोत्तरी की संभावनाएं हैं। भारत में रबड़ बाँध के कुछ उदाहरण निम्न है-

  1. भारत का प्रथम रबड़ बाँध आन्ध्र प्रदेश राज्य के उत्तर तटीय जिले विजयानगरम के राज्यलक्ष्मी गाँव में झंझावाटी नदी जोकि नागवेली नदी की एक मुख्य सहायिका है, पर वर्ष 2006 में निर्मित हुआ था जिसके कारण 24000 एकड़ भूमि में सिंचाई संभव हो सकी।
  2.  वर्ष 2009 में उड़ीसा राज्य के बाघामारी क्षेत्र में रखड बाँध का निर्माण किया गया था। इस रबड़ बाँध के प्रभाव का आंकलन करने पर ज्ञात हुआ कि रबड़ बाँध से पहले इस क्षेत्र में गर्मियों के मौसम में सब्जियों की उत्पादकता पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ा। रबड़ बाँध के निर्माण से पहले वर्ष 2009 में जो क्षमता 2.873 थी वह रबड़ बाँध के निर्माण एवं इससे संरक्षित जल के उपयोग के कारण वर्ष 2010 में 4.67 हो गई थी ।
  3.  गुजरात राज्य प्रथम रबड़ बाँध वर्ष 2010 में रूध में तापी नदी पर बनाया गया ।
चित्र 3 - आन्ध्र प्रदेश के विजयानगरम में झंझावाटी नदी पर बना रबड़ बाँध
चित्र 3 - आन्ध्र प्रदेश के विजयानगरम में झंझावाटी नदी पर बना रबड़ बाँध

भविष्य की राहें

भारत एक कृषि प्रधान देश है बढ़ते उद्योगों, बढ़ती जनसंख्या, जलवायु परिवर्तन एवं बढ़ते प्रदूषण कम होते भूजल स्तर जैसी समस्याओं ने जल संसाधनों पर दबाव बढ़ाना आरम्भ कर दिया है। भविष्य में इन समस्याओं से निपटने के लिए जल संसाधनों के उचित प्रबन्धन एवं भडारण की महती आवश्यकता है। जल संरक्षण एवं सिंचाई के प्रबंधन में रबड़ बाँध अपनी एक भूमिका निभा सकते हैं रेगिस्तानी एवं पर्वतीय क्षेत्रों में इनके माध्यम से जल का भण्डारण कर उसका उचित उपयोग किया जा सकता है जिससे पेय जल की समस्या एवं सिंचाई हेतु जल की समस्या का कुछ हद तक निवारण हो सकता है। इसको ध्यान में रखते हुए कई राज्यों यथा उत्तराखंड राज्य में हिंडन नदी पर केरल में पम्पा नदी पर उड़ीसा के भुवनेश्वर  में तथा झारखंड एवं पश्चिम बंगाल ने भी इसके निर्माण के प्रति झुकाव दिखाया है आधुनिक परिवेश में आवश्यकता है कि जल का अधिक से अधिक भण्डारण हो सके जिसमें रबड़ बाँध एक समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं।

स्रोत :- राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान,रुड़की प्रवाहिनी अंक 26 (2010)
 

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Post By: Shivendra
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