प्रकृति से मुंह मोड़ने का नतीजा

पर्यावरण को बचाना
पर्यावरण को बचाना

पिछले दस-पन्द्रह सालों में ही पर्यावरण का हल्ला अखबारों में हुआ है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण पर सेमिनार होने लगे हैं। बड़े-बड़े प्रस्ताव पास किए जा रहे हैं। स्कूलों, कालेजों विश्वविद्यालयों में पर्यावरण विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होती हैं। अकाशवाणी व दूरदर्शन पर संवाद होते हैं। इन सबसे ऐसा लगता है जैसे पर्यावरण को लेकर सभी चिन्तित हैं। लेकिन हमारे देश में तीन सौ के आस-पास विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय शोध संस्थान हैं, जहां से हर साल लाखों विद्वान् बड़ी-बड़ी उपाधियां लेकर निकलते हैं। क्या ये लोग पर्यावरण के बारे में गम्भीर हैं। नहीं हैं तो देश के सर्व-साधारण के लिए क्या कहा जाए ?

आम लोग तो पर्यावरण और प्रदूषण को एक ही समझते हैं । इसका परिणाम यह है कि पर्यावरण की बात कुछ देश व समाज प्रेमी नागरिकों, पत्र-पत्रिकाओं और रेडियो, टी.वी. तक ही रह गई है। हां, हमारे मंत्रियों के भाषण लिखने वाले अफसर भी पर्यावरण मंत्रालय की सहायता से मंत्रियों के मुख से ऐसा कुछ कहलाने का यत्न करते हैं जैसे उन्हें पर्यावरण की चिन्ता खाए जा रही है। परन्तु सच्चाई यह है कि हम अपने आपसे छल करके पर्यावरण को बर्बाद ही कर रहे हैं।

प्रकृति ने हमें अनुपम भेंट दी है। हमें दिया था खुला आकाश और शुद्ध वायु। हमें दिया नदियों, झीलों का निर्मल जल, भांति-भांति के पेड़-पौधे, फल, घास, पहाड़ और सूरज-चांद के उदय-अस्त। जब हम अपने घर बनाकर पहले-पहले बसे थे, हमने अपने गांव व फिर नगर किसी नदी-नाले या झील के किनारे ही बसाए, जहां दूर-दूर तक हरे पेड़ थे। खुली और साफ हवा में विभिन्न पक्षियों व वन प्राणियों के योग से सारा वातावरण ऐसा था कि जिससे मानव हृदय खिला-खिला रहता था। पर हमें 'विकास' करना था। हमने अन्न पैदा करने के लिए वनों को साफ किया। भोजन पकाने के लिए भी वृक्षों को ईंधन बनाया। खेत जोतने व दूध के लिए पशु पाले। उनका मल-मूत्र हमारे निकट का वातावरण दूषित करने लगा। हमारा प्रकृति से निकट का सम्बन्ध रहता था, इसलिए वह हमारा सहयोग करती थी। हमारे देशवासियों को पेड़ों की छाया में बैठकर बतियाने और वहीं आराम करने की आदत थी। वृक्ष सदैव हमारे रखवाले रहे हैं। आखिर वे ही हमें हर समय प्राण-वायु देते हैं।

लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाती। हमारी जनसंख्या जो 1947 में 37 करोड़ थी, 95 करोड़ हो गई। हमारी आदत बाहर खुले में निवृत होने की थी। नए जमाने ने घरों में, बल्कि कमरे में ही शौचालय बनवा दिए। सारा मल-मूत्र बहकर उन्हीं नदी-नालों में जाने लगा, जिनसे हम पीने के लिए पानी लेते रहे हैं। हम घण्टे दो घण्टे के लिए अपने घरों में तेल से दीया जला लिया करते थे। बिजली ने आकर जगमगाहट कर दी। फिर बिजली से ही कारखाने चलने लगे। आज इस बिजली को बनाने के लिए रोजाना लाखों टन कोयला फूंककर उसके धुएं को उस हवा में उड़ाया जाता है, जिसमें हम सांस लेते हैं। हम घर का कटा वा बुना खद्दर पहना करते थे। परन्तु अब रसायनों से बने शर्ट, टी शर्ट, जैकेट,सलेक्स, जींस आदि पहनते हैं। अब तो जूते भी रसायनों से बने ही पहनते हैं। नतीजतन चर्म रोग हो रहे है  इतनी बड़ी आबादी का पेट भरने के लिए अधिक अन्न की जरूरत पड़ी तो उसके लिए रासायनिक खाद व कीटनाशकों की आवश्यकता भी पड़ी। इनके लिए भी कारखाने लगे। यानी दोहरी मार।

इस बिगाड़ का परिणाम हुआ भांति-भांति की बीमारियों का आना। इनकी रोकथाम के लिए चाहिए दवाइयां। इन दवाइयों के लिए भी कारखाने बने और इन कारखानों ने भी प्रदूषण फैलाया। वही दोहरी मार। कैसा कुचक्र है ? सड़कों पर एक-दो घोड़े-तांगे चलते थे। अब धुआं उगलती गाड़ियों का तांता नहीं टूटता। यही धुआं सांस लेने वाली नाली में आकर हमारा जीना दूभर कर देता है। ईंधन की बर्बादी और दुर्घटनाओं की सौगात अलग से। हमें मिट्टी के कच्चे मकानों में रहने की आदत थी। मगर अब ईटों व सीमेंट के ऊंचे भवन बन गए। दरवाजों, खिड़कियों व फर्नीचर के लिए अपने मित्र वृक्ष पर कुल्हाड़ी चलाई और ईंटों व सीमेंट बनाने के लिए कोयला फूंक कर हवा में फिर ज़हरीले धुएं के बादल छोड़े। हमारे पुरखों ने चौपाल, कुआं, जोहड़, धर्मशाला व मन्दिर बनवाए तो उनके साथ बड़ या पीपल के पेड़ भी लगाए। भाग्यवान लोगों ने बाग लगवाए। परन्तु आधुनिकता की इस अंधी दौड़ ने इन पेड़ों व बागों को निगल लिया बल्कि समाज की मान्यता ही बदल गई। पहले बड़ा आदमी बाग लगवाता था और अब बड़ा आदमी बाग कटवा कर कालोनी बसाता है। पहले पेड़ लगवाने वाला भला आदमी कहलाता था और अब 'भला' वह है जो पेड़ों को कटवाए। जो हमें शुद्ध हवा देकर हमारे जीवन के दीये में तेल डालते रहते थे, वे पेड़ ही हमारी कुल्हाड़ी का शिकार हो गए तो फिर जीवन की ज्योति को खतरा मंडराने लगा। क्या यह ज़हरीली हवा व दूषित जल हमारे मित्र हो सकते हैं ? इसी स्थिति को तो पर्यावरण का बिगड़ना कहा जाता है। यह परिणाम नकली जीवन जीने की पद्धति का है। प्रकृति से मुंह मोड़कर हमने पर्यावरण को डुबो दिया। इस बिगड़े पर्यावरण को हमें फिर से ठीक करना होगा।

वरना हमारा और दूसरे प्राणियों का भी जीवन अंधकारमय होता जाएगा। बड़े-बड़े शहरों में तो रात को तारे देखना भी जाता रहा है। लोग दूषित हवा में सांस लेने व दूषित पानी पीने से उत्पन्न भांति-भांति की बीमारियों के आदी हो चले हैं। विकास के नाम पर विनाश हो रहा है और हम अपनी ही बलि दिए जा रहे हैं। प्रदूषण फैलता जा रहा है और हम हैं कि इसे सरकार के भरोसे छोड़कर उसे कोसने का काम ही करते हैं।

बहरहाल, अब हम क्या कर सकते हैं? सबसे महत्वपूर्ण काम है कटे वृक्षों की भरपाई करना। यानी नए पेड़ लगाना और उन्हें जिन्दा रखकर बड़े करना। वैसे तो हमारे देश में हर वन महोत्सव पर कई लाख पेड़ लगाए जाते हैं। इस तरह अब तक कई अरब पेड़ लगा चुके हैं। परन्तु वे पेड़ केवल कागजों पर लगे और हमारी भूमि विधवा की मांग की भांति सूनी पड़ी है। जबकि दूसरी तरफ पहले लगे पेड़ों पर अब भी बेदर्दी से कुल्हाड़ी चलाई जा रही है। यह पेड़ लगाने का कार्यक्रम दस वर्ष भी चला दिया जाए तो अपना देश फिर से ठीक पर्यावरण के रास्ते पर आ जाएगा।

स्रोत- (जनसत्ता, 5 जून, 1997)

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