फूड लेबलिंग के नियम-कायदे


भारत में खाने-पीने की चीजों के विज्ञापन और लेबलिंग से जुड़े नियम-कायदों में कई खामियाँ हैं। नामी फूड ब्रांड भी इन कमियों का फायदा उठाकर लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने में पीछे नहीं रहते। इसलिये खाद्य नियामक लेबलिंग नियमों की समीक्षा करने पर विचार कर रहा है

1. न्यूट्रिशन लेबलिंग क्या है?


यह किसी खाद्य वस्तु के पोषक गुणों के बारे में उपभोक्ताओं को जानकारी देने का एक तरीका है। इसके दो पहलू हैं, पहला- अनिवार्य रूप से दी जाने वाली पोषक तत्वों की जानकारी यानि अनिवार्य लेबलिंग और दूसरा, अनिवार्य लेबलिंग को समझने के लिये दी गई अतिरिक्त जानकारी। पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में पोषक तत्वों का विवरण दिया जाता है। जबकि अतिरिक्त जानकारी, जिसे फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग भी कहते हैं, पैकेट के सामने की तरफ होती है। आमतौर पर न्यूट्रिशन लेबलिंग के तहत नमक, वसा, शर्करा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट आदि पोषक तत्वों की जानकारी दी जानी चाहिये। इनके अलावा अगर पैकेट पर सेहत या पोषण सम्बन्धी कोई दावा किया गया है तो वह भी न्यूट्रिशन लेबलिंग के दायरे में आयेगा।

2. न्यूट्रिशन लेबलिंग क्यों जरूरी है?


न्यूट्रिशन लेबलिंग के जरिये उपभोक्ताओं को पता चलता है कि वे जो चीज खाने जा रहे हैं, उसमें कौन-कौन से पोषक तत्व किस मात्रा में हैं। इन पोषक तत्वों की रोजाना कितनी मात्रा उनके लिये उचित है और प्रत्येक उपभोग से कितना पोषण मिलेगा? इस तरह की जानकारियाँ न्यूट्रिशन लेबलिंग के जरिये मिलती हैं।

3. फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल का क्या मतलब है?


फ्रंट-ऑफ-पैक यानी एफओपी ऐसी लेबलिंग है जो न्यूट्रिशन लेबलिंग को आसानी से समझने में मदद करती है। इसका उल्लेख पैकेट के सामने की तरफ किया जाता है। इसमें शब्द या संकेत दोनों का इस्तेमाल हो सकता है। इस तरह एफओपी लेबल बेहतर खान-पान को बढ़ावा दे सकते हैं।

4. वार्निंग या चेतावनी लेबल क्या होते हैं?


इस प्रकार की लेबलिंग उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थ में मौजूद हानिकारक तत्वों के बारे में चेतावनी देती है। खाने-पीने की कुछ चीजों जैसे अल्कोहल, नमक या मीठे आदि की अधिक मात्रा की चेतावनी दी होती है। वार्निंग लेबल लोगों को हानिकारक चीजों के अत्यधिक उपभोग से बचा सकता है।

5. भारत में न्यूट्रिशन लेबलिंग की क्या स्थिति है?


भारत में न्यूट्रिशन लेबलिंग के तहत नमक/सोडियम और एडेड शुगर की जानकारी देना अनिवार्य नहीं है। किसी वस्तु के प्रत्येक उपभोग के आधार पर पोषक तत्वों की जानकारी देना भी वैकल्पिक है, जबकि यह अनिवार्य होना चाहिये। यहाँ तक कि विभिन्न खाद्य वस्तुओं के प्रत्येक उपभोग की उचित मात्रा भी तय नहीं है। किसी व्यक्ति को रोजाना पोषक तत्वों की कितनी जरूरत है और किसी वस्तु के सेवन से कितना पोषण मिलेगा, इसका विवरण देना भी आवश्यक नहीं है। अमेरिका की तरह भारत में न्यूट्रिशन लेबलिंग का कोई प्रारूप ही तय नहीं है। एफओपी और वार्निंग लेबल की व्यवस्था को भी औपचारिक तौर पर लागू नहीं किया गया है।

6. विश्व स्तर पर किस प्रकार की न्यूट्रिशन लेबलिंग की जाती है?


अमेरिका, कनाडा, ताइवान, थाईलैंड, मैक्सिको और ब्राजील जैसे देशों में किसी वस्तु के प्रत्येक उपभोग की मात्रा और पोषक तत्वों की रोजाना उचित मात्रा की जानकारी देना अनिवार्य है। मैक्सिको, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूके, डेनमार्क, स्वीडन और सिंगापुर में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग के प्रावधान हैं। अमेरिका, फिनलैंड और चिली जैसे कुछ देशों में वार्निंग लेबल का चलन बढ़ रहा है।

7. फूड ब्रांड किस तरह की जानकारी छुपाते हैं?


नियामक व्यवस्था की कमियों के चलते भारत में कई नामी फूड ब्रांड खाद्य वस्तुओं के पैकेट पर प्रत्येक उपभोग की उचित मात्रा (सर्विंग साइज) और नमक की जानकारी नहीं देते हैं। जिन मीठी चीजों में न के बराबर नमक होता है, उनमें जरूर कुछ ब्रांड नमक की मात्रा का उल्लेख कर देते हैं। जबकि ऐसी वस्तुएँ जिनमें नमक अधिक होता है, यह जानकारी छिपा ली जाती है।

8. खाद्य-वस्तुओं में ज्यादातर किस तरह के दावे किये जाते हैं?


अक्सर खाने-पीने की चीजों में पोषक तत्वों और स्वास्थ्य परिणामों को लेकर बढ़ा-चढ़ाकर दावे किये जाते हैं। “लो फैट, हाई इन फाइबर, कम चीनी, कम नमक” जैसे दावे आप अक्सर सुनते होंगे। ऐसा उत्पादों की बिक्री बढ़ाने और उपभोक्ताओं का विश्वास जीतने के लिये किया जाता है।

9. ऐसे दावों को लेकर भारत में किस प्रकार के नियम-कायदे हैं?


भारत में ट्रांस फैट, सेचुरेटेड फैट और डाइटेरी फाइबर को छोड़कर पोषण से जुड़े अन्य दावों की तरफ ध्यान ही नहीं गया है। फूड ब्रांड किस तरह के दावे कर सकते हैं और कौन-से नहीं, यह भी तय नहीं है। यूरोपीय संघ ने पोषण सम्बन्धी कुछ दावों की अनुमति दी हुई है। वहाँ स्वास्थ्य सम्बन्धी मान्य और अमान्य दावों का रिकॉर्ड रखा जाता है। इसी प्रकार अमेरिका में भी अधिकांश पोषक तत्वों के मानक तय हैं। इनके बारे में किस तरह के दावे किये जा सकते हैं, यह भी स्पष्ट किया गया है।

10. नियामक व्यवस्था में खामियों का क्या नुकसान है?


नियामक व्यवस्था में कमियों का फायदा उठाकर भारत में खाद्य पदार्थों से जुड़े ऐसे दावे किये जा रहे हैं जो कई देशों में मान्य नहीं हैं। मिसाल के तौर पर, किसी वस्तु के 98 फीसदी फैट फ्री होने का दावा किया गया है जबकि यूरोपीय संघ में इस तरह के दावे प्रतिबंधित हैं। इसी तरह कुछ खाद्य पदार्थों में मस्तिष्क के विकास सम्बन्धी दावे किये गये हैं। कनाडा में इस तरह के दावों की अनुमति नहीं है।

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