पर्यावरण प्रवाह: विकास एवं नदी जीवन के मध्य समझौता

पर्यावरण प्रवाह: विकास एवं नदी जीवन के मध्य समझौता,Pc-HT
पर्यावरण प्रवाह: विकास एवं नदी जीवन के मध्य समझौता,Pc-HT

17 अप्रैल, 2017 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन.जी.टी) ने केंद्र से यह स्पष्ट करने को कहा कि गंगा नदी में निर्वाध जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए उसमें न्यूनतम पर्यावरण प्रवाह क्या होना चाहिए। शीर्ष पर्यावरण नियामक ने यह भी कहा कि जब तक पानी को अत्यधिक निकाले जाने और प्रदूषकों को उसमें बहा दिये जाने पर नियंत्रण नहीं लगाया जाता, तब तक गंगा को पूर्णरूपेण उसके असली रूप में वापस नहीं लाया जा सकेगा। राष्ट्रीय हरित अधिकरण की उक्त टिप्पणी से पर्यावरण प्रवाह के महत्व का पता चलता है। आसान शब्दों में पर्यावरण प्रवाह एक सरल अवधारणा है जिसका मतलब है कि हमारी नदियों में निचले क्षेत्रों के पर्यावरण, सामाजिक और आर्थिक लाभों को बहाल करने हेतु पर्याप्त पानी बहता रहे। पर्यावरणीय प्रवाह का संबंध मानवीय जीविका का पोषण करने के साथ-साथ ताजे पानी तथा संबंधित पारिस्थितिकी को बनाए रखने से है। पर्यावरण प्रवाह एक पारिस्थितिकी के लिए स्वीकार्य प्रवाह है जिसकी नदी को पूर्वनिश्चित अवस्था में बरकरार रखने हेतु परिकल्पना की गयी है। इसलिए पर्यावरण प्रवाह एक समझौता है। जिसमें एक तरफ जलीय विकास एवं दूसरी तरफ नदी के स्वास्थ्य का समुचित रख-रखाव या कम से कम उचित हालत में रख-रखाव है। जलीय प्रजातियों ने प्राकृतिक प्रवाह पद्धती के अनुसार अपने आप को विकसित किया है। इसलिए प्रवाह पद्धती में परिवर्तन देशी प्रजातियों की जैव विविधता को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

पर्यावरण प्रवाह
जलीय प्रजातियों ने प्राकृतिक प्रवाह

अगर नदी में प्रवाह कुछ नियत सीमा से नीचे गिर जाता है तो नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य में कमी आ जाती है, इसी को आधार मानते हुए 1970 के दशक में नदियों में न्यूनतम प्रवाह की अवधारणा प्रयोग में आयी। बाद के अध्ययनों से यह पता लगा कि एक प्रवाह पद्धती के लिए सभी तत्वों, जैसे कि उच्च, मध्यम और कम प्रवाह की पारिस्थितिकी सभी महत्वपूर्ण हैं। उच्च प्रवाह चैनल की सफाई, बाढकृत के मैदानों के रख-रखाव और नदी तट की वनस्पतियों को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है मध्यम प्रवाह मछलियों के विकास और प्रवास के लिए आवश्यक हैं; और कम प्रवाह नदी को विखंडन से बचाने लिए पानी की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए तथा नदी के मौजूदा स्वरूप के साक्ष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। पर्यावरण प्रवाह एकीकृत जल प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण पहलू हैं।

भारत में औसत वार्षिक वर्षों की 90 प्रतिशत से अधिक वर्षा वर्षा के चार महीनों (जून से सितम्बर) की अवधि के दौरान होती है तथा वर्षा का वितरण बेहद असमान है और स्थानिक रूप में इसमें बहुत अधिक भिन्नता है। जिसके कारण वर्ष भर विभिन्न क्षेत्रों की पानी की मांग को पूरा करना अत्यधिक कठिन है। पानी की मांग को पूरा करने के लिये सतही जल के संग्रहण के लिए नदियों पर छोटे-बड़े अनेकों बांध बनाए गए हैं। वर्षा के समय के अतिरिक्त विशेष रूप से गर्मियों के समय जब पानी की मांग अधिकतम होती है तथा नदी में कम पानी होता है, ऐसे समय में नदी का अधिकतर पानी, जल माग आपूर्ति हेतु प्रयोग कर लिया जाता है तथा नीचे के क्षेत्रों में पानी कम छोड़ा जाता है जिसके कारण नीचे के क्षेत्रों में नदी में इतना कम पानी रह जाता है कि पर्यावरण प्रवाह की पूर्ति भी नही हो पाती। एक नदी को सजीव बनाए रखने के लिए नदी में कम से कम इतना पानी बहना चाहिए जितने से वह अपनी समान्य गतिविधियां पूरी कर सके जिसमें निम्न गतिविधियां शामिल है:

  • प्रवाह तथा क्षेत्र को बनाये रखना
  • जलीय जीवन को आवास प्रदान करना
  • बाढ़ वाले क्षेत्रों में पोषक तत्वों की पुनः पूर्ति करना
  • भूजल का पुनः पूरण करना
  • नदी मुहाने को बचाए रखना तथा समुद्र से खारेपन के प्रवेश को रोकना आजीविका का भरण-पोषण करना तथा समुदाय की पीने, खेती तथा व्यवसाय के लिए
  • पानी की जरूरतों को पूरा करना
  • अपशिष्ट को पचाना तथा अपने आप को शुद्ध करना
  • नौ परिवहन, मनोरंजन, पर्यटन एवं तीर्थयात्रा को सुगम करना तथा समाज के आर्थिक, सांस्कृतिक तथा आध्यत्मिक जीवन में योगदान देना

यदि नदी से इतना अधिक पानी निकाल लिया जाए कि यह बिल्कुल या लगभग सूख जाये या नदी में इतनी गंदगी तथा जहरीले पदार्थ डाल दिये जाएं कि नदी के सारे जलीय जीवन मर जाए तो नदी की एक प्रकार से मृत्यु हो जाती है। नदियां हमारे लिए पवित्र है, हम उनकी पूजा करते हैं. इसके बावजूद हमारी नदियों की स्थिति बहुत ही खराब है। विकास की दौड़ में हम इतने अंधे हो गए हैं कि हमने बहुत-सी नदियों को मृत प्राय बना दिया है इसीलिए, पर्यावरण प्रवाह का आंकलन आज के समय की मांग है। पर्यावरण प्रवाह के मूल्यांकन की विधियों का विवरण निम्न प्रकार है।

पर्यावरण प्रवाह मूल्यांकन की विधियाँ

पर्यावरणीय प्रवाह मूल्यांकन की विधियों चार प्रकार की होती हैं

  1. जलविज्ञानीय विधियों
  2.  हाइड्रोलिक रेटिंग,
  3.  हेबिटेट सिमुलेशन और
  4.  होलिस्टिक (सर्वांगीण) ।

जलविज्ञानीय विधियाँ

ये विधियाँ सबसे सरल मानी जाती हैं, इन विधियों में डेस्कटॉप के स्तर पर ऐतिहासिक जल विज्ञानीय दैनिक, 10 दिवसीय या मासिक प्रवाह आंकड़ों का उपयोग मानक प्रवाह सूचकांक प्राप्त करने के लिए किया जाता है, जिनकी सिफारिश पर्यावरण प्रवाह के रूप में की जाती है। पर्यावरण प्रवाह आमतौर पर औसत वार्षिक प्रवाह के प्रतिशत के रूप में या प्रवाह अवधि वक्र के प्रतिशतक के रूप में वार्षिक मौसमी या मासिक आधार पर दिया जाता है। सबसे आम जलविज्ञानीय विधियाँ हैं ट्रेनेंट तथा मोडिफाइड टेनेंट विधि प्रवाह अवधि वक्र (एफ.डी.सी) ।

टेनेंट विधि

टेनेंट विधि जिसे मोंटाना विधि के रूप में भी जाना जाता है, सबसे पुराने तरीकों में से एक है जिसे विशेष रूप से मछली की जरूरतों के लिए विकसित किया गया था। टेनेंट विधि में जैसा कि सारिणी-1 में दर्शाया गया है, प्रवाह को वार्षिक प्रवाह ( एम.ए.एफ) के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है।

सारणी 1 टेनेंट (1976) में वर्णित
सारणी 1 टेनेंट (1976) में वर्णित, मछली, वन्य जीवन, मनोरंजन और संबंधित पर्यावरण संसाधनों के लिए धारा प्रवाह

मोडिफाइड टेनेंट विधि

जल्दी ही यह स्वीकार किया गया कि मूल टेनेंट विधि को उन क्षेत्रों को छोड़कर जिनके लिए मूल रूप से इसे तैयार किया गया था, अन्य भौगोलिक स्थानों के लिए इसे लागू नहीं किया जा सकता विभिन्न संशोधित तकनीकों के साथ इस विधि को अन्य क्षेत्रों के लिए प्रयोग योग्य बनाया गया। टेस्समन ने टेनेंट विधि को संशोधित किया और इस दृष्टिकोण को संशोधित टेनेंट विधि या टेस्समन विधि के रूप में जाना जाता है। टेस्समन ने इस विधि को मासिक आधार पर प्रवाह में प्राकृतिक विविधताओं पर विचार कर प्रवाह थ्रेसहोल्ड निर्धारित कर आगे बढ़ाया। टेस्समन ने स्थानीय जलीय और जैविक शर्तों, जिनमें न्यूनतम मासिक प्रवाह (MMF) की मासिक परिवर्तनशीलता शामिल है, को ध्यान में रखकर औसत वार्षिक प्रवाह ( एम.ए.एफ) के प्रतिशत की जांच कर, टेनेंट मौसमी प्रवाह के रूप में सिफारिश की।

इन परिवर्तनों के तहत निम्नलिखित नियम तैयार किए गए।

  • यदि एम.एम.एफ.>एम.ए.एफ. के 40% तो मासिक न्यूनतम एम.एम.एफ. के  बराबर।
  • यदि एम.एम.एफ.> 40% एम.ए.एफ. के तो मासिक न्यूनतम एम.ए.एफ. के 40% के बराबर । 
  • यदि एम.एम.एफ. का 40% > एम.ए.एफ. के 40% तो मासिक न्यूनतम एम.ए.एफ. के 40% के बराबर।

जहां एम.ए.एफ. का मतलब औसत वार्षिक प्रवाह है और एम.एम.एफ का मतलब औसत मासिक प्रवाह है। इसके अलावा, चैनल रखरखाव के लिए उच्चतम प्रवाह के महीने के दौरान 14 दिन की अवधि के लिए एम.ए.एफ. के 200% का प्रवाह आवश्यक है।

प्रवाह अवधि वक्र (एफ.डी.सी.) और पर्यावरण प्रबंधन वर्ग (ई.एम.सी.) विधि

प्रवाह अवधि वक्र (एफ.डी.सी) एक संचयी आवृत्ति वक्र है, जो उस समय का प्रतिशत के रूप प्रतिनिधित्व करता है जिसके दौरान किसी दिए गए स्थान का औसत डिस्चार्ज (प्रवाह की दर ) एक विशेष मान से अधिक या बराबर हो (चित्र 1)। एफ.डी.सी दैनिक, साप्ताहिक या मासिक अपवाह मूल्यों के आधार पर हो सकता है। यह धारा के प्रवाह के फैलाव और प्रवाह की परिवर्तनशीलता की सबसे अच्छी माप है जिसे उस समय सबसे अच्छी प्रकार से पेश किया जा सकता है जब इसकी तैयारी के लिए दैनिक प्रवाह आंकड़े उपयोग किए गए हो।

 

जलीय प्रजातियों ने प्राकृतिक प्रवाह
चित्र 1 - प्रवाह अवधि वक्र


नियतमान से अधिक प्रतिशतक या वर्षों तक मापे गए विशेष प्रवाह के स्तर की अवधि विशेष के लिए प्रवाह अवधि वक्र के आधार पर एक बड़ी संख्या में जलविज्ञानीय सूचकांकों के सुझाव दिये गये हैं। इन सूचकांकों में से कई विभिन्न उपयोगों, विशेष रूप से पनबिजली के लिए कम से कम प्रवाह थ्रेसहोल्ड की कल्पना कर और धाराओं में प्रवाह निर्वहन सीमा के आकलन को ध्यान में रखते हुए विकसित किए गए हैं। मछली या अन्य बायोटा की रक्षा करने के लिए भी पर्यावरण प्रवाह सूचकांकों की व्याख्या की गई।

एफ.डी.सी. स्थानांतरण विधि में विशिष्ट नदी वर्गों के रख रखाव, प्रबंधन और विशेष पर्यावरण प्रबंधन वर्ग (ई.एम.सी) को बनाए रखने के लिए नदी में छोड़े जाने वाले ई-प्रवाह की मात्रा का फैसला करने हेतु किया जाता है एक नदी को छह पर्यावरण प्रबंधन कक्षाओं अर्थात कक्षा ए (प्राकृतिक); कक्षा बी (थोड़ा संशोधित); कक्षा सी (मध्यम संशोधित) कक्षा डी (मोटे तौर पर संशोधित) कक्षा ई (गंभीरता से संशोधित) और कक्षा एफ (गंभीर रूप से संशोधित) में परिभाषित किया जा सकता है।

विशिष्ट महीने के लिए प्रवाह अवधि वक्र, घटना की संभावनाओं के पूरे फैलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा निश्चित 17 प्रतिशत अंक यथा 0.01, 0.1, 1, 5, 10, 20, 30, 40, 50, 60, 70, 80, 90, 95, 99, 99.9 और 99.99% की तालिका में प्रवाह मूल्यों को पेश करते है ऐतिहासिक आंकड़ों का उपयोग कर विकसित किए गए प्रवाह अवधि वक्र को संदर्भ वर्ग के रूप में जाना जाता है। ई.एम.सी की विभिन्न श्रेणियों के लिए पर्यावरण प्रवाह (ई--फ्लो) का आकलन करने के लिए ई.एम.सी-ए  ई.एम.सी-बी, ई.एम.सी-सी और ई.एम.सी-डी के लिए प्रवाह अवधि वक्र को क्रमश: एक कदम, दो कदम, तीन कदम और चार कदमों के लिए स्थानांतरित किया जाता है।

हाइड्रोलिक रेटिंग विधि

हाइड्रोलिक रेटिंग विधि में आंकलन साधारण जलीय चरों जैसे कि नम भूमि परिधि, अधिकतम गहराई, नदी प्रवाह वर्ग और स्थानापन्न वास कारकों या नियोजित बायोटा में आए परिवर्तनों के प्रयोग द्वारा किया जाता है। पर्यावरण प्रवाह का आंकलन, जलीय चरों तथा प्रवाह वक्र द्वारा आमतौर पर वक्र ब्रेकप्वाइंट द्वारा किया जाता है, जिनकी पहचान वास गुणवत्ता में आई महत्वपूर्ण कटौती के द्वारा की जाती है।

हैबिटेट सिमुलेशन विधि

ये विधिया हाइड्रोलिक विधियों के विस्तार के रूप हैं क्योंकि इनमें भी जलीय स्थितियों, जो बायोटा के निवास स्थान की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करती है. का उपयोग किया जाता है। भौतिक वास के कुछ विशेषताएं (गहराई और वेग) सीधे प्रवाह से संबंधित हैं, जबकि अन्य विशेषताएँ जैसे सब्सट्रेट (नदी सतह सामग्री) और आवरण परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। इन विधियों में विभिन्न प्रकार के मॉडलों का उपयोग, प्रवाह पद्धतियों और विभिन्न प्रजातियों के प्राकृतिक निवास स्थान की गुणवत्ता तथा इसके साथ ही अन्य पर्यावरणीय पहलुओं जैसे कि तलछट परिवहन, पानी की गुणवत्ता और मछली पारगमन के बीच संबंध स्थापित करने हेतु करते हैं। ये विधियां हाइड्रोलिक तरीकों से भिन्न हैं क्योंकि इसमें जलीय पहलुओं को परिभाषित करने हेतु प्राकृतिक वास को धारा के माइक्रो हैबीटेट के एकत्र आंकड़ों के साथ जोड़ दिया गया है।

होलिस्टिक (सर्वागीण ) बिल्डिंग ब्लॉक विधि -

नदी पारिस्थितिकी तंत्र को पूर्व निर्धारित वांछित स्थिति में बनाए रखने हेतु समग्र प्रवाह पद्धती का निर्धारण करने के लिए बी.बी.एम का बुनियादी दृष्टिकोण, पूरे जलालेख और उपलब्ध आंकड़ों की पूर्ण रूप से जांच करना है। यह "वांछित स्थिति" विभिन्न धाराओं के लिए अलग अलग हो सकती है, कुछ धाराओं को प्राकृतिक या निकट प्राकृतिक अवस्था में बनाए रखा जा सकता है जबकि बाकी के लिए जहां पर पानी का अधिक उपयोग हो वहाँ पर कुछ बदलाव स्वीकार्य हो सकते हैं। संरचित, कार्यशाला की स्थापना में जीव, नदी जिओमोर्फोलोजिस्ट, हाइड्रोलिक मोडलर्स और जलवैज्ञानिक जलालेख की जांच करके और परिमाण, समय और अवधि की जांच करने के बाद प्रवाह की सिफारिश करते हैं। सबसे पहले, नदी की प्राकृतिक प्रवाह पद्धती का जैसे कि बारहमासी प्रवाह शुष्क और आर्द्र मौसम में सतही प्रवाह, वर्षो के मौसम में बड़ी बाढ़ की अवधि एवं परिमाण तथा अन्य समय में पाए जाने वाले प्रवाह का ध्यान रखा जाता है। इसके बाद उन चीजों का ध्यान रखा जाता है जो प्रवाह को वांछित स्थिति में बनाए रखने के लिए जरूरी हों तथा उनका जल संसाधनों के विकास के दौरान नाश नहीं किया जाना चाहिए। प्रत्येक प्रवाह घटक अंतिम पर्यावरणीय प्रवाह की आवश्यकता (ई.एफ.आर) के लिए एक निर्माण खंड है, और यह एक पारिस्थितिकी या जिओमोफोलोजिकल कार्य करता है। कम प्रवाह घटक इमारत का प्रथम इमारत ब्लॉक है, इसके साथ-साथ निर्धारित समय पर आवश्यक उच्च प्रवाह को जोड़ने वाले निर्माण खंड है।

निष्कर्ष

नदी के प्रवाह तंत्रों की रक्षा और नदी की प्रवाह व्यवस्थाओं को बनाए रखना और इस प्रकार पर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह प्रदान करके पारिस्थितिक तंत्र को समर्थन देना, जल आधारित विकास के महत्वपूर्ण पहलू बन गए हैं। पर्यावरण प्रवाह प्रदान नहीं करने की कीमत को कम करके नहीं आँका जाना चाहिए। यह स्पष्ट है कि पर्यावरण प्रवाह की आवश्यकता को पूरा करने में विफलता, कई नदियों के उपयोगकर्ताओं के लिए विनाशकारी परिणाम ला सकती है। यह समझने की जरूरत है कि यहाँ पर सभी की आवश्यकता पूर्ति हेतु पर्याप्त जल है, परंतु अति लोभ के लिए नहीं जल पर सभी प्राणियों का समान अधिकार है तथा सभी के हितो की रक्षा होनी चाहिए। पर्यावरणीय प्रवाह की आवश्यकता के लिए पानी दूसरे उपभोक्ताओं से छीना नहीं जा सकता, इसे दूसरे उपभोक्ताओं के साथ बराबरी के आधार पर सुलझाना होगा। हमारे समुदायों और देशवासियों के बीच से बहकर नदियों को अपने गंतव्य अर्थात खाड़ी तक पहुँचना होता है यदि वे खाड़ी तक नहीं पहुंचती हैं, तो नदियों की वे "नर्सरी" बंद हो जाती हैं जो हमारे तटीय वन्यजीवों के अधिकतर घर है। यह अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है यह हमारे जीवन के तरीके को प्रभावित करता है, हमें यह सुनिश्चित करना है कि ये सुंदर नदियां हमेशा अपने गंतव्य तक पहुंचे पर्यावरण प्रवाह आवश्यकताओं के निर्धारण के लिए कोई सरल नियम नहीं है। पर्यावरण प्रवाह आवश्यकताओं का आकलन करने के लिए विभिन्न विधियाँ उपलब्ध हैं। विधियों का चयन अध्ययन के उद्देश्य पर निर्भर करता है।

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Post By: Shivendra
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