पंचेश्वर बाँध बनेगा मील का पत्थर


प्रतिमत


उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य यह है कि यहाँ कुछ बेहतर होने से पहले कुछ ऐसे बिना मेहनत लोग बाधा बनने लग जाते हैं जिनका काम सिर्फ राजनीति करना है। आज पंचेश्वर बाँध के नाम पर कुछ बिना मेहनत लोग अपनी व्यक्तिगत राजनीति चमकाने के लिये बाँध का विरोध कर रहे हैं। जब उत्तराखण्ड की सत्रह वर्षों की सरकारें पहाड़ को रहने लायक नहीं बना सकीं वहाँ आम व्यक्ति को सामान्य सुविधाएँ नहीं दिला सकी तब किसी ने सवाल खड़े नहीं किए, करते भी कैसे, जो लोग बिना मेहनत की खाकर आरामदायक जीवन जीने के आदी हो गए हों और जिन्हें इसी प्रकार के फर्जी धरने प्रदर्शन कर पेट भरने की आदत पड़ गई हो, ऐसे लोगों को आखिरकार उन लोगों को पहाड़ से बाहर निकालने में कष्ट तो होगा ही, जिनके पीछे उनकी तुच्छ राजनीति चलती आ रही है। आज दुनिया के पर्यावरण बचाने, पेड़ों की रक्षा करने, बादल फटने, आपदा आने के नाम पर निर्माणाधीन बाँधों को लेकर तमाम तरह के भाषण दिये जा रहे हैं। अगर उत्तराखण्ड के विकास के लिये बाँध बनाने के लिये पेड़ काटने हैं तो जरूर काटने चाहिए। अगर पर्यावरण को नुकसान हो रह है तो पर्यावरण को बचाने का ठेका उत्तराखण्ड के लोगों ने नहीं ले रखा बल्कि उन लोगों को अपने घरों में अपनी बेशकीमती जमीनों पर पेड़ लगाने चाहिए जो पर्यावरण के नाम पर भाषण देते हैं। उत्तराखण्ड के विकास के लिये बाँध निर्माण रीढ़ बन सकते हैं। अगर पूरे पहाड़ खाली कर हर जगह बाँध बनाने पड़ें तो सरकारों को बनाने चाहिए, बस इतना ध्यान रहे कि बाँध प्रभावितों का सर्वश्रेष्ठ पुनर्वास हो।

पंचेश्वर बाँधदेहरादून। भारतवर्ष के गृहमंत्री राजनाथ सिंह दशहरे के अवसर पर कुछ दिन के प्रवास के लिये उत्तराखण्ड आए और उन्होंने सीमान्त जनपद चमोली की सीमा पर तैनात सेना के जवानों और ग्रामीणों से मुलाकात की। ग्रामीणों से मुलाकात के बाद राजनाथ सिंह ने ग्रामीणों से अनुरोध किया कि वे इसी प्रकार सीमा पर डटे रहें और सेना के जवानों की भाँति सीमा की रक्षा करना उनका भी धर्म है। जिस वक्त राजनाथ सिंह यह बयान जारी कर रहे थे उस समय उनके बगल में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री भी मौजूद थे, जिन्होंने कुछ दिन पहले ही उत्तराखण्ड में पलायन रोकने के लिये एक पलायन आयोग का गठन किया।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा सीमा की रक्षा के लिये इस प्रकार का बयान जारी करना दर्शाता है कि वास्तव में सरकारों ने देश की सीमाओं के साथ खिलवाड़ किया है और पिछले तीन वर्षों से देश के गृहमंत्री की जिम्मेदारी सम्भाल रहे राजनाथ सिंह ने इस दिशा में कोई भी काम नहीं किया। खाली होते पहाड़ देश के लिये चिन्ता का सबब है किन्तु देश का ठेका उत्तराखण्ड के लोगों ने नहीं ले रखा है यह भी शत-प्रतिशत सत्य है।

ये वही राजनाथ सिंह हैं जो विधानसभा चुनाव 2017 से पहले देहरादून आए थे, तब उनसे पत्रकार गजेन्द्र रावत ने सवाल पूछा था कि उत्तर प्रदेश के कैराना से 300 लोगों के पलायन को भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी मुद्दा बना दिया है, आज उत्तराखण्ड के 3 लाख से अधिक लोग पलायन कर चुके हैं, क्या भारतीय जनता पार्टी इस पर गम्भीरता से काम करेगी और क्या इसे चुनावी मुद्दा बनाएगी? तब राजनाथ सिंह ने यह कहकर पिंड छुड़ा दिया कि वे उत्तराखण्ड सरकार से इस बारे में रिपोर्ट तलब करेंगे कि आखिरकार ऐसे हालात क्यों पैदा हुए। चुनाव नजदीक आया तो राजनाथ सिंह कई जनसभाओं को सम्बोधित करने उत्तराखण्ड आए लेकिन उस गम्भीर सवाल पर उन्होंने मौन साधे रखा। अब पड़ोसी देशों द्वारा लगातार समस्या खड़ी करने के बाद गृहमंत्री पहाड़ के लोगों को वहीं डटे रहने का भाषण देते हैं किन्तु वे आज भी इस बारे में गम्भीर नहीं हैं कि आखिरकार ऐसे क्या हालात हैं जो उत्तराखण्ड के लोग पहाड़ से पलायन करने को लगातार मजबूर हो रहे हैं। तीन दिन के पिकनिक के बाद राजनाथ सिंह वापस चले गए किन्तु वो सारे गम्भीर सवाल अब भी वहीं खड़े हैं जहाँ से शुरू किए गए थे कि आखिरकार उत्तराखण्ड के लोग पलायन को क्यों मजबूर हो रहे हैं। उत्तराखण्ड सरकार द्वारा गठित पलायन आयोग का दफ्तर उस पौड़ी में खोलने की बातें हो रही हैं जहाँ पलायन की सबसे बड़ी मार पड़ी है। आज लोग सामान्य मौलिक सुविधाओं को पाने अर्थात बेहतर शिक्षा बेहतर स्वास्थ्य की सुविधा न होने के कारण पलायन करने को मजबूर हैं और सरकारें इसी का इन्तजाम नहीं कर पाई हैं।

जिस पौड़ी ने उत्तर प्रदेश में हेमवती नंदन बहुगुणा, उत्तराखण्ड में भुवन चंद्र खंडूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा और अब त्रिवेंद्र सिंह रावत को पैदा किया, आज उस जनपद में पलायन आयोग का दफ्तर खुलना दर्शाता है कि उत्तराखण्ड की सरकारों ने आखिरकार धरातल पर कुछ भी नहीं किया। ये वही पौड़ी जनपद है जहाँ से पाँच मुख्यमंत्री, भारत सरकार के मंत्री, उत्तराखण्ड सरकार के मंत्री, राष्ट्रीय दलों के प्रदेश अध्यक्ष, दायित्वधारी और भारत सरकार में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग दुनिया भर में गाते फिरते हैं कि वे पौड़ी के रहने वाले हैं किन्तु पर्दे के पीछे की स्याह हकीकत यह है कि भीतर से ये लोग पौड़ी को कितना समझ पाए हैं।

पौड़ी जनपद के ये वीवीआईपी, वीआईपी लोग सिर्फ व्यक्तिगत राजनीति के लिये पहाड़ आते-जाते रहे हैं और पूरा जिला भीतर से खोखला होता रहा है। आज पहाड़ में बिजली, पानी, सड़क स्वास्थ्य की बदहाली पर प्रतिदिन भाषण दिए जा रहे हैं। पलायन आयोग का निर्माण इस बात की पुष्टि करता है कि वास्तव में उत्तराखण्ड बनने के बाद पहाड़ की दशा खराब हुई है और पहाड़ों में रहने वाले लोगों का जीना और मुश्किल हुआ है।

सीमा पर तैनात पहाड़ के ये लोग यदि फसल उगाते हैं तो सुअर और बन्दर इनकी फसलों को नष्ट कर देते हैं। लगातार सूखते स्रोत पहाड़ के लोगों के लिये और बड़ी परेशानी का सबब बन गए हैं। पहाड़ में रहने वाले लोग इतनी भारी मुसीबत में हैं कि वे लगातार बाघों के हमलों से अपने नौनिहालों को गँवा रहे हैं तो देहरादून में बैठी सरकारें बाघों को बचाने के लिये महेन्द्र सिंह धोनी को बाघ बचाओ अभियान का ब्रांड अम्बेस्डर बनाती है।

खेती किसानी की बदहाली को रोकने के लिये उत्तराखण्ड सरकार के कृषि और उद्यान मंत्री विदेशों के दौरों पर जाते हैं किन्तु उन्हें इन पर्वतीय क्षेत्रों में समाधान तब नहीं मिल पाता जबकि ये खुद दावा करते हैं कि इनका जन्म इन्हीं पहाड़ों पर विषम परिस्थितियों में जीने वाले लोगों के बीच हुआ है। विगत 17 वर्षों में जिस प्रकार अरबों-खरबों के बजट उत्तराखण्ड के पर्वतीय अंचलों में खपाए गए उतने बजट से तो कई नए शहर बस जाते।

उत्तराखण्ड के ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख, क्षेत्रपंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्य, जिला पंचायत अध्यक्ष, विधायक, सांसदों अर्थात 90% जनप्रतिनिधियों ने मैदानी क्षेत्रों में अपने घर बसा लिये हैं। ये लोग सिर्फ चुनाव लड़ने के लिये पहाड़ में जाते हैं और फिर चुनाव जीतकर वापस मैदानों में रहने लग जाते हैं। जब हजारों की संख्या के ये पूर्व और वर्तमान जनप्रतिनिधि पहाड़ों में रहने को तैयार नहीं और उन्हें भय है कि यदि वे पहाड़ों में रहेंगे तो उनके बच्चों को बाघ खा जाएगा, उनकी शिक्षिका पत्नी को पर्वतीय अंचल के स्कूलों में जाने के लिये चढ़ाई चढ़नी पड़ेगी, उनकी पत्नियों को डिलीवरी के लिये पहाड़ में योग्य डॉक्टर नहीं मिलेंगे तो उन सभी ने मैदानों में बसने का निर्णय ले लिया है। ऐसे में इन तमाम जनप्रतिनिधियों को पालने-पोसने, उन्हें चुनाव जिताने का ठेका आखिरकार पहाड़ के लोगों ने तो नहीं ले रखा, तो ये पहाड़ के लोग क्यों अपना जीवन खतरे में डालकर पहाड़ में डटे रहें।

जब इन लोगों को यही जनप्रतिनिधि दिन भर भाषण दे रहे हैं कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आती तो इनके काम भी क्यों आवे। उत्तराखण्ड में तमाम स्थानों पर बने बाँधों के कारण कहीं-न-कहीं देश के साथ-साथ प्रदेश का भी हित हुआ है। सरकारों की भ्रष्ट नीतियों के कारण विस्थापन की कमजोर पहल और पर्यावरण के नाम पर राजनीति करने वाले पर्यावरण गिद्धों ने जरूर पहाड़ को बहुत नुकसान पहुँचाया है किन्तु यह बात शत-प्रतिशत सत्य है कि इस प्रदेश को आज और कुछ नहीं तो ऊर्जा प्रदेश तो बनाया ही जा सकता है। उत्तरकाशी, टिहरी, श्रीनगर, चमोली जैसे पर्वतीय क्षेत्रों की जलविद्युत परियोजनाएँ आज पहाड़ के पानी और जवानी के सदुपयोग का जीता जागता उदाहरण है।

करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद उत्तरकाशी में बन्द की गई बाँध परियोजना का उदाहरण हो या आज पंचेश्वर बाँध को लेकर राजनीति कर रहे लोग ये सब वे लोग हैं जो इसी प्रकार के धरने प्रदर्शन कर लग्जरी कारों में घूमते हैं, अपने बच्चों को मैदानी क्षेत्रों में पढ़ाते हैं और शाही जीवन जीकर लोगों को बरगलाने का काम करते हैं। जब इन तमाम जनप्रतिनिधियों, नौकरशाहों, छोटे-बड़े अधिकारियों को पहाड़ में नहीं रहना तो आखिरकार पहाड़ के लोग भी क्यों वहाँ रहें। आखिरकार वे लोग क्यों अपने बच्चों को बाघ के मुख में डालें, क्यों वे इलाज के अभाव में मरें और क्यों वे अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में न पढ़ाएँ। उत्तराखण्ड के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तावित पंचेश्वर बाँध के कारण यदि 123 की बजाए 1023 गाँव भी विस्थापित हो जाएँ तो भी कोई नुकसान नहीं। आखिरकार भारत के इन नागरिकों को भी तो बेहतर जीवन जीने का अधिकार है और वे सिर्फ एक वोट बैंक नहीं हैं।

उत्तराखण्ड में इन दिनों पंचेश्वर बाँध को लेकर बयानबाजी और धरने प्रदर्शनों का दौर सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक चरम पर है। अपने-अपने अनुसार पंचेश्वर बाँध की व्याख्या कर रहे सामाजिक और राजनैतिक लोग इसका नफा-नुकसान गिनाने में लगे हुए हैं। भारत नेपाल की उत्तराखण्ड सीमा की काली नदी पर प्रस्तावित पंचेश्वर बाँध के निर्माण हेतु भारत सरकार से टर्म ऑफ रेफ्रेंस की मंजूरी मिलने के बाद उत्तराखण्ड में बयानबाजियों का दौर शुरू हुआ है। इस परियोजना के धरातल पर आने पर 123 गाँवों का पुनर्वास होना प्रस्तावित है। 4800 मेगावाट की इस बहुआयामी योजना से उत्तराखण्ड को न सिर्फ ऊर्जा प्रदेश बनने में मदद मिलेगी बल्कि प्रदेश को ऊर्जा से राजस्व की भी प्राप्ति होगी। 4800 किमी की इस बाँध परियोजना का निर्माण 40 हजार करोड़ रुपए की लागत से प्रस्तावित है, जिसके अन्तर्गत 12276 वर्ग किमी पंचेश्वर बाँध का और 13490 वर्ग किमी रूपालीगढ़ का कैचमेंट एरिया होगा जबकि बीच का कैचमेंट एरिया 1214 वर्ग किमी का होगा। इस बाँध परियोजना के लिये 9100 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है, इसमें 1 लाख 70 हजार हेक्टेयर भूमि नेपाल और 2 लाख 59 हजार हेक्टेयर भूमि भारतवर्ष की सिंचित होगी। इस बाँध परियोजना से एक और फायदा यह होगा कि भारत और नेपाल द्वारा हर वर्ष इस नदी के कारण आने वाली बाढ़ पर खर्च होने वाले तकरीबन 100 करोड़ रुपए भी बचेंगे।

कुल मिलाकर यह बाँध परियोजना उत्तराखण्ड के लिये फलदायी होगी। इस परियोजना पर पर्यावरण प्रभाव के आकलन और पर्यावरणीय प्रबन्ध योजना का प्रस्तुतीकरण हो चुका है। भारत सरकार के पर्यावरण जलवायु परिवर्तन एवं वन मंत्रालय द्वारा इस सन्दर्भ में टर्म ऑफ रेफ्रेंस की मंजूरी होने के बाद रिसेटलमेंट और रिहैबिलिटेशन प्लान भी तैयार कर लिया गया है।

काली नदी पर प्रस्तावित इस पंचेश्वर बाँध की ऊँचाई 311 फुट प्रस्तावित है, जो ऊँचाई के लिहाज से एशिया का सबसे ऊँचा बाँध होगा। टिहरी बाँध जैसे विशालकाय परियोजना के धरातल पर आने के बाद जिस प्रकार उत्तराखण्ड ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ा है उसी प्रकार अब पंचेश्वर बाँध के निर्माण को लेकर उम्मीदें आसमान पर हैं।

वर्षों से फाइलों में घूम रही इस परियोजना को भारत सरकार की मंजूरी मिलने के बाद अब निकट भविष्य में नेपाल और उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और चम्पावत के कुछ गाँव विस्थापित होंगे। इस बाँध परियोजना की एक और खास बात यह रहेगी कि नेपाल के गाँवों का पुनर्वास भी भारतवर्ष को करना पड़ेगा।

कुल मिलाकर पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी के सन्दर्भ में कही गई किताबी बातों को यदि धरातल पर उतारना है तो निश्चित रूप से उत्तराखण्ड की हर नदी हर गाढ़ हर खाले पर छोटे-बड़े बाँध बनने चाहिए। जो लोग इन बाँधों का विरोध कर रहे हैं ऐसे लोगों को अपना परिवार अपने बच्चों की मैदानी स्कूलों से एडमिशन कैंसिल करावकर पर्वतीय क्षेत्रों के स्कूलों में करा देने चाहिए, नियमित रूप से पहाड़ में रहना चाहिए और जब ये लोग उन परिस्थितियों से रूबरू होंगे तब इन्हें मालूम होगा कि आखिरकार पहाड़ में रहना पहाड़ से टकराने से कहीं कम नहीं है। उत्तराखण्ड के लिहाज से बेहतर पुनर्वास नीति बनाकर सभी का पुनर्वास कर निश्चित रूप से पंचेश्वर जैसे बहुआयामी बाँध बनते रहने चाहिए।

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