पहाड़ को खोखला करती परियोजनाएं


आखिरकार केंद्र सरकार ने लोहारी नागपाला जलविद्युत परियोजना को रोकने का फैसला कर लिया है लेकिन खतरा अभी टला नहीं है।

उत्तराखंड सरकार राज्य की भागीरथी और अलकनंदा समेत तमाम नदियों पर कुकुरमुत्तों की तरह सैकड़ों बिजली परियोजनाओं को मंजूरी दे चुकी है। सभी जानते हैं की ये पावर प्रोजेक्ट उत्तराखंड के पर्यावरण का नुकसान कर रहे हैं और इनसे कुछ ही लोगों का भला होगा। टिहरी डैम का उदाहरण हमारे सामने है कि लाखों लोगों को बेघर करने वाला यह बांध आज कितनी बिजली उत्पादित कर रहा है।

उत्तराखंड के अधिकांश गाड़-गधेरों पर छोटे-बड़े बांध बनाने की तैयारी हो चुकी है। देशी-विदेशी कम्पनियों को परियोजनाओं का न्योता दिया जा रहा है। निजी कम्पनियों के आने से लोगों का सरकार पर दबाव कम हो जाता है, लेकिन कम्पनी का लोगों पर दबाव बढ़ जाता है। दूसरी तरफ कम्पनी के पक्ष में स्थानीय प्रशासन व सत्ता भी खड़े हो जाते हैं। झूठे आंकड़े व अधूरी, भ्रामक जानकारी वाली रिपोर्ट के साथ जनता को वास्तविक जानकारी नहीं मिल पाती है। इन विद्युत परियोजनाओं में ऐसा ही हो रहा है। राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में, लगभग सात प्रतिशत भूमि ही खेती के लिए बची है। विडम्बना यह कि जंगल की जमीन के साथ खेती की बेशकीमती जमीन आपातलीन धारायें लगा कर इन परियोजनाओं के लिए अधिगृहीत की जा रही हैं। टिहरी बांध के बाद तमाम दूसरे छोटे-बड़े बांधों से विस्थापित होने वालों को जमीन के बदले जमीन देने का प्रश्न नकार दिया गया है। दूसरी तरफ विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के लिए सौ-सौ हेक्टेयर जमीनें विशेष छूट दरों पर उपलब्ध करायी जा रही हैं। पचास-साठ मीटर ऊंचे बांधों को भी छोटे बांधों की श्रेणी में रखकर सभी नदी-नालों को सुरंगों में डाला जा रहा है। जल-विद्युत परियोजनाओं से उत्तराखंड को अब तक बाढ़, भूस्खलन, बंद रास्ते, सूखते जल स्रोत, कांपती धरती, कम होती खेती की जमीन तथा ट्रांसमीशन लाइनों के खतरे जैसे उपहार ही मिलते रहे हैं।

उत्तराखंड सरकार की 2006 की ऊर्जा नीति के तहत राज्य की बारह प्रमुख नदी घाटियों में निजी निवेश के जरिये करीब 500 छोटी-बड़ी बिजली परियोजनाओं को बनाकर 3000 मेगावाट बिजली पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है और इसी दम पर उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने के सपने देखे और दिखाए जा रहे थे लेकिन केंद्र के फैसले से उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने का महत्वाकांक्षी नारा खटाई में जाता दिख रहा है और सरकार की ऊर्जा नीति पर सवालिया निशान लग गया है। राज्य सरकार की 600 मेगावाट की लोहारी नागपाला परियोजना सरकार के लिए गले की हड्डी बनने जा रही है। परियोजना बंद होने से कई सवाल खड़े हो गये हैं। ज्ञात हो कि परियोजना पर 40 प्रतिशत काम पूरा होने के साथ ही एनटीपीसी के 600 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। ऐसे में इस देरी का खामियाजा कौन भुगतेगा। गौरतलब है कि अक्टूबर 2009 में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के साथ ही सरकार ने भागीरथी नदी पर बनने वाली लोहारी नागपाला, पाला मनेरी और भैंरोघाटी जलविद्युत परियोजना पर रोक लगा दी थी। केंद्र ने योजना स्तर पर चल रही 480 मेगावाट क्षमता की पाला मनेरी और 381 मेगावाट की भैरोंघाटी परियोजनाओं को तो निरस्त करने का फैसला कर लिया है। निशंक सरकार की हायतौबा के बीच एक मुद्दा जिस पर विवाद हुआ वो कई कंपनियों को परियोजना आवंटन को लेकर था।

आरोप है कि लघु जल-बिजली परियोजनाओं के आवंटन में स्थानीय हितों और नियमों को दरकिनार कर बाहरी कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया और 56 परियोजनाएं चंद लोगों के स्वामित्व वाली चुनिंदा कंपनियों के बीच बांट दी गईं। सूत्रों के मुताबिक कुछ कंपनियां हाथ खींचने लगी हैं। विपक्ष ने सरकार पर घेरा कस दिया है। निशंक कह चुके हैं कि जो कुछ होगा पारदर्शिता से होगा। विवादास्पद परियोजनाएं आखिर बंटी कैसे, इस पर फिलहाल चुप्पी है। इस सबके बीच बड़ा सवाल है कि सैकड़ों जल विद्युत परियोजनाओं से पहाड़ का अस्तित्व जिस तरह से खतरे में पड़ गया है उसका दोषी कौन है। सवाल है कि निजी फायदे के लिए हम अपनी आने वाली पीढियों के लिए पहाड़ में कुछ बचा पाएंगे या नहीं।
 
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