नदियों को मारकर,गंदे नालों के साथ जीने की लत

भारत नदियों का देश रहा है। इस देश में गंगा, यमुना, सरस्वती आदि प्रसिद्ध नदियां बहती हैं। इन नदियों को मां कहा जाता है। सुबह-शाम इनकी पूजा-अर्चना की जाती है। नदियों के किनारे ही हमारे संस्कृति का विकास हुआ है। लेकिन अब नदियां कचरा ढोने वाली मालगाड़ी बन गई हैं। अब नदियों में साफ पानी से ज्यादा सीवेज का कचरा मिलेगा। क्योंकि हम नदियों से पानी लेते तो हैं लेकिन उसके बदले नदियों को अपने शहर की गंदगी देते हैं जिसके कारण नदियां विलुप्त होती जा रही हैं। नदियों के गंदा होने के बारे में बता रही हैं सुनीता नारायण।

अभी ही हम एक ऐसी पीढ़ी बन चुके हैं, जिसने अपनी नदियां खो दी हैं और भी परेशान करने वाली बात यह कि हम अपने तरीके नहीं बदल रहे। सोचे-समझे ढंग से हम और ज्यादा नदियों, झीलों और ताल-तलैयों को मारेंगे। फिर तो हम एक ऐसी पीढ़ी बन जाएंगे, जिसने सिर्फ अपनी नदियां नहीं खोईं, बल्कि बाकायदा जल-संहार किया है। क्या पता, एक समय ऐसा भी आएगा जब हमारे बच्चे भूल जाएंगे कि यमुना, कावेरी और दामोदर नदियां थीं।

जल ही जीवन है और जीवन अपने पीछे जो सीवेज छोड़ता है, वह जल की जीवन-कथा है। भारत का बेतहाशा शहरीकरण आने वाले दिनों में और तेज ही होता जाएगा। यह तेजी रफ्तार और दायरा, दोनों ही मामलों में दिखाई पड़ रही है। पानी की अपनी जरूरतों को हम किस तरह व्यवस्थित करें कि अपने ही मल-मूत्र में डूब न जाएं, यह आज के दौर का बहुत बड़ा सवाल है और इसका जवाब हमें हर हाल में खोजना पड़ेगा। इस मामले में अपनी खोजबीन के दौरान सबसे बड़ी दिक्कत हमारे सामने यह आती है कि हमारे देश में न तो इससे संबंधित कोई आंकड़े मिलते हैं, न इसे लेकर कोई खोज हुई जान पड़ती है, और न ही इस मुद्दे पर कहीं कोई समझ देखने में आती है। यह हाल तब है, जब सीवेज का ताल्लुक हम सब की जिंदगी से है।

फ्लश के बाद


हमें पानी की जरूरत पड़ती है। यह हमें अपने घर में हासिल हो जाता है। अपना मल-मूत्र हम फ्लश करके घर से बाहर बहा देते हैं। अपनी नदियों को हम मरते हुए देख सकते हैं। लेकिन इन अलग-अलग बातों के बीच कोई सूत्र हम नहीं जोड़ते। अपने फ्लश को अपनी नदी से जोड़ कर देखना हमारी आदत में नहीं है। ऐसा लगता है कि इस बारे में हम कुछ जानना ही नहीं चाहते। हमें पूछना चाहिए कि ऐसा क्यों है। क्या यह भारतीय समाज में मौजूद जाति व्यवस्था की मानसिक परछाई है, जिसमें मल-मूत्र हटाने का काम किसी और का हुआ करता था? या इसमें मौजूदा प्रशासन तंत्र प्रतिबिंबित हो रहा है, जिसमें पेयजल और कचरे का निपटारा एक सरकारी काम है, वह भी पेयजल और स्वच्छता विभाग की निचले दर्जे की नौकरशाही का? या फिर इसमें सिर्फ ठेठ भारतीय अक्खड़पना जाहिर होता है, जिसके तहत हम यह मानकर चलते हैं कि बस, पैसे हाथ में हों तो सब कुछ दुरुस्त किया जा सकता है?

विसर्जन का अर्थशास्त्र


सोच के इस ढांचे में पानी की कमी और कचरा महज तात्कालिक समस्याएं हैं, जो भारत के अमीर देश बनते ही रहस्यमय ढंग से गायब हो जाएंगी। उसके बाद तो देश का सारा इन्फ्रास्ट्रक्चर नए सिरे से खड़ा किया जाएगा, पानी बिल्कुल साफ बहने लगेगा और मल-मूत्र जैसे शर्मिंदा करने वाले तथ्य हमारे शहरों से पलक झपकते छूमंतर हो जाएंगे। वजह चाहे जो भी हो लेकिन एक बात तो साफ है कि अपने देश के पानी और कचरे के बारे में हम बहुत कम जानते हैं। पर्यावरणविद अनिल अग्रवाल, जिन्होंने भारतीय पर्यावरण की स्थिति के बारे में नियमित रिपोर्टों की कल्पना की और बाकायदा इसका ढांचा तैयार किया, 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में कहा था कि हमें उस राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझने की जरूरत है, जो भारत के अमीर तबके को सुविधाजनक ढंग से मल विसर्जन करने के लिए सरकारी सहायता प्रदान करता है।

पिछले कुछ सालों की खोजबीन के दौरान हमारा सामना ऐसे न जाने कितने मामलों से हुआ है, जिनमें हाल तक नदी के रूप में जानी जाने वाली प्राकृतिक संरचना को शहर का कचरा ढोने वाले नाले में बदल दिया गया है। दिल्ली फिलहाल जिसे नजफगढ़ नाले के रूप में जाती है, जिससे होकर शहर की काफी सारी गंदगी यमुना में पहुंचती है, उसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है कि उसका स्रोत एक झील है। इसी झील से साहिबी नदी निकलती थी, जो अब गायब हो चुकी है। लोगों की जीवित स्मृति में यह एक नाला है, जिसमें पानी नहीं, सिर्फ प्रदूषण बहता है। इससे भी बुरी बात यह कि दिल्ली की पहाड़ियों को घेरे हुए खाली जगह में गुड़गांव नाम का जो नया शहर खड़ा हो गया है, वह अपना सारा कचरा उसी नजफगढ़ झील में डाल रहा है। लुधियाना में जिसे बूढ़ा नाला कहते हैं- क्योंकि यह नाला ही है, बदबू और गंदगी से भरा हुआ- वह कुछ समय पहले नाला नहीं कहलाता था। तब इसे बूढ़ा दरिया कहते थे और इसमें ताजा, साफ पानी बहता था। सिर्फ एक पीढ़ी गुजरी है और इतने में ही न सिर्फ इसका रूप, बल्कि नाम भी बदल गया।

मीठी को मैक्सिमम सिटी मुंबई की शर्म कहा जाता है। 2005 की बाढ़ में डूबते हुए इस शहर ने जाना कि उसने मीठी नाम के नाले का रास्ता रोक दिया है। यह नाला आज भी प्रदूषण और अतिक्रमण से ग्रस्त है। लेकिन मुंबई को आज भी जिस चीज का अहसास नहीं है, वह यह कि मीठी ने शहर को नहीं, शहर ने ही मीठी को शर्मिंदा किया है। शहर के पास से शुरू होने वाला यह नाला असल में एक नदी था। इसका नाम नदी था और यह नदी की ही तरह बहता था। लेकिन आज की आधिकारिक पर्यावरण स्टेटस रिपोर्ट में भी इस जिंदा नदी को बरसाती नाले का ही दर्जा हासिल है। इस तरह एक और शहर ने एक ही पीढ़ी में अपनी नदी खो दी।

दु:स्वप्न के सामन


लेकिन इससे हमें चकित क्यों होना चाहिए? हम अपनी नदियों से पानी उठाते हैं- पीने के लिए, सिंचाई के लिए, जलविद्युत परियोजनाएं चलाने के लिए। पानी लेकर हम उन्हें कचरा वापस करते हैं। नदी में पानी जैसा कुछ बचता ही नहीं। मल-मूत्र और औद्योगिक कचरे के बोझ से यह अदृश्य हो जाती है। हमें इस पर क्रोध आना चाहिए। अभी ही हम एक ऐसी पीढ़ी बन चुके हैं, जिसने अपनी नदियां खो दी हैं और भी परेशान करने वाली बात यह कि हम अपने तरीके नहीं बदल रहे। सोचे-समझे ढंग से हम और ज्यादा नदियों, झीलों और ताल-तलैयों को मारेंगे। फिर तो हम एक ऐसी पीढ़ी बन जाएंगे, जिसने सिर्फ अपनी नदियां नहीं खोईं, बल्कि बाकायदा जल-संहार किया है। क्या पता, एक समय ऐसा भी आएगा जब हमारे बच्चे भूल जाएंगे कि यमुना, कावेरी और दामोदर नदियां थीं। वे उन्हें नालों के रूप में जानेंगे, सिर्फ नालों के रूप में। यह दु:स्वप्न हमारे सामने खड़ा है, हमारे भविष्य को घूर रहा है।

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