मूल त्रिवेणी

ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों मिलकर जिस तरह दत्तात्रेय जी बनते हैं, उसी तरह अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी मिलकर गंगामैया बनती हैं। ये तीनों गंगा की बहनें नहीं हैं, बल्कि गंगा के अंग हैं।ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों मिलकर जिस तरह दत्तात्रेय जी बनते हैं, उसी तरह अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी मिलकर गंगामैया बनती हैं। ये तीनों गंगा की बहनें नहीं हैं, बल्कि गंगा के अंग हैं। भागीरथी भले गंगोत्री से आती हो, तो भी मंदाकिनी का केदारनाथ और अलकनंदा का बद्रीनारायण भी गंगा के ही उद्गम है।
ब्रह्मकपाल से होकर जो अलकनंदा बहती है और वहां एक बार श्राद्ध करने से जो अशेष पूर्वजों को एक साथ हमेशा के लिए मुक्ति देती है उस अलकनंदा का उद्गम स्थान क्या गंगोत्री से कम पवित्र है? ब्रह्मकपाल पर एक बार श्राद्ध करने के बाद फिर कभी श्राद्ध किया ही नहीं जा सकता। यदि मोहवश करें तो पितरों की अधोगति होती है। कितना जाग्रत स्थान है वह!

बद्रीनारायण के गरम कुंडों का पानी लेकर अलकनंदा आती है, जबकि मंदाकिनी गौरीकुंड के उष्ण जल से थोड़ी देर कवोष्ण होती है। केदारनाथ का मंदिर बनावट की दृष्टि से अन्य सब मंदिरों से अलग प्रकार का है। अंदर का शिवलिंग भी स्वयंभू, बिना आकृति का है। वह इतना ऊंचा है कि मनुष्य उस पर झुककर उससे हृदयस्पर्श कर सकता है। मंदिरों की जितनी विशेषता है उतनी ही मंदाकिनी की भी विशेषता है। यहां के पत्थर अलग प्रकार के हैं, यहां का बहाव अलग प्रकार का है, और यहां नहाने का आनंद भी अलग प्रकार का है।

गंगोत्री तो गंगोत्री ही है। इन तीनों प्रवाहों में भागीरथी का प्रवाह अधिक वन्य और मुग्ध मालूम होता है। यह नहीं है कि गंगा में सिर्फ यही तीन प्रवाह हैं। नील गंगा है, ब्रह्मगंगा है, कई गंगायें हैं। हिमालय से निकलने वाले सभी प्रवाह गंगा ही तो हैं! जिनका पानी हरिद्वार के पास हरि के चरणों का स्पर्श करता है। वे सब प्रवाह गंगा ही हैं। वाल्मीकि ने भी जब गंगा को आकाश से हिमालय के शिखररूपी महादेव जी की जटाओं पर गिरते और वहां से अनेक धारा में निकलते देखा तब उनकी आर्ष दृष्टि ने सात अलग-अलग प्रवाह गिनायें थे।

तस्यां विसृज्यमानायां सप्त स्रोतांसि जज्ञिरे।
ह्रादिनी, पावनी चैव, नलिनी च तथैव च।।

सुचक्षुश्चैव, सीता च, सिन्धुश्चैव, महानदी।
सप्तमी चान्वगात् तासां भगीरथ-रथं तदा।।


1934

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