महिला किसानों के सशक्तिकरण हेतु पहल

महिला किसानों के सशक्तिकरण हेतु पहल
महिला किसानों के सशक्तिकरण हेतु पहल

महिलाएं देश के लगभग हर राज्य में सक्रिय किसानी से जुड़ीं हैं और कई क्षेत्रों में तो वे ही खेती की मुख्य कर्ताधर्ता हैं। कृषि की स्थिति में बेहतरी लाने के लिए किया जाने वाला कोई भी प्रयास दरअसल महिलाओं के सशक्तिकरण को प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करता है। सौभाग्य से इसे प्रमाणित करने के लिए देश में दर्जनों मॉडल हैं जहाँ कृषि क्षेत्र से महिलाओं के जुड़ाव ने महिला सशक्तिकरण के नए आयाम खोल दिए हैं। इन मॉडलों में स्वयं सहायता समूह मूलभूत ढाँचे की भूमिका निभा रहे हैं।

बांग्लादेश, भारत, म्यांमार, फिलिपींस और वियतनाम के 1165 गाँवों के 12,000 खेतिहर परिवारों पर किए गए इस अध्ययन में महिला सशक्तिकरण को 0 से 100 के स्केल पर उत्पादन, आमदनी, संसाधन, समय और नेतृत्व के पाँच मानकों पर आंका गया। इस अध्ययन के अनेक निष्कर्षों में एक सार्वभौमिक नतीजा यह था कि महिलाओं के सशक्तिकरण से एक तो परिवारों में खेती को लेकर प्रगतिशील रुझान बढ़ता है और दूसरा, उन्हें आर्थिक और सामाजिक तौर पर प्रगति के ज्यादा अवसर प्राप्त होते हैं।  

कृषि सुधारों का महिला सशक्तिकरण से क्या सम्बन्ध हो सकता है या ऐसे भी पूछा जा सकता है कि क्या इनका आपस में कोई सम्बन्ध हो भी सकता है ? क्लासिकल हिन्दी सिनेमा ‘मदर इण्डिया’ से लेकर आज तक खेती या किसानी से जुड़े जो भी संचार हमारे सामने आते हैं, उनमें किसान एक पुरुष ही होता है और उसमें महिलाओं की भूमिका खेतों में उन्हें दोपहर का भोजन पहुँचाने, भोजन कराने और हाथ धुलाने तक सीमित होती है। मतलब सामान्य धारणा के मुताबिक किसान-और-किसान की पत्नी दो अलग-अलग पहचान की इकाइयाँ हैं और कृषि में बेहतरी के साथ महिला सशक्तिकरण का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं हो सकता। इसलिए मूल विषय में प्रवेश से पहले उस सामान्य धारणा को सही करने की आवश्यकता है जो कई दशकों से आम जनमानस पर छपी है। एक अध्ययन के मुताबिक ग्रामीण भारत में 84 प्रतिशत महिलाओं की आजीविका कृषि पर आधारित है। अपने खेतों में जुताई करने वाले किसानों में 33 प्रतिशत महिलाएँ हैं, जबकि खेतिहर मजदूरों में इनका प्रतिशत 47 फीसदी है। दरअसल महिलाएं देश के लगभग हर राज्य में सक्रिय किसानी से जुड़ी हैं और कई क्षेत्रों में तो वे ही खेती की मुख्य कर्ताधर्ता हैं। इसका एक सीधा मतलब यह भी है कि कृषि की स्थिति में बेहतरी लाने के लिए किया जाने वाला कोई भी प्रयास दरअसल महिलाओं के सशक्तिकरण को प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करता है। सौभाग्य से इसे प्रमाणित करने के लिए देश में दर्जनों मॉडल हैं जहाँ कृषि क्षेत्र से महिलाओं के जुड़ाव ने महिला सशक्तिकरण के नए आयाम खोल दिए हैं। इन मॉडलों में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) मूलभूत ढाँचे की भूमिक निभा रहें हैं, जिसकी सदस्य महिलाएँ ही हो सकती हैं। यद्यपि एसएचजी ग्रामीण क्षेत्रों में ही प्रचलित हैं, लेकिन इनके कार्यक्षेत्र में केवल कृषि नहीं आता। एसएचजी महिलाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के केन्द्र में लाने के उद्देश्य से काम करते हैं, जिसका अन्तिम परिणाम इस रूप में होता है कि परिवार की निर्णय प्रक्रिया में उनकी राय सुनी जाने लगती है और आर्थिक तौर पर उनके फैसले मान्य होने लगते हैं। सिर्फ इन्ही दो बदलावों से महिलाओं के सामाजिक आर्थिक हालात में चमत्कारिक बदलाव हो सकते हैं और इसका सीधा प्रभाव कृषि के विभिन्न विभागों पर भी दिखने लगता है। इस तरह एक बात तो बिल्कुल साफ है कि जब हम कृषि और महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो दरअसल यह एक द्विआयामी श्रृंख्लाबद्ध प्रक्रिया होती है, जिसमें एक ओर तो महिलाओं में बढ़ती जागरुकता, आत्मनिर्भरता और सक्रियता के कारण कृषि क्षेत्र पर सीधा असर पड़ता है और दूसरी ओर कृषिगत सुधारों से महिला सशक्तिकरण की प्रक्रिया और तेज होती है।
 
इसे समझने के लिए सिंगापुर ली कुआन इयू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के शोध विभाग में सहायक डीन रहीं सोनाया अकतर के अध्ययन की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, जिन्होंने फरवरी 2018 में ऑस्ट्रेलेशिया एग्रीकल्चर एंड रिसोर्स इकोनॉमिक सोसायटी काॅन्फ्रेंस में अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया था। बांग्लादेश, भारत, म्यांमार, फिलिपींस और वियतनाम के 1165 गाँवों के 12,000 खेतिहर परिवारों पर किए गए इस अध्ययन में महिला सशक्तिकरण को 0 से 100 के स्केल पर उत्पादन, आमदनी, संसाधन, समय और नेतृत्व के पाँच मानकों पर आंका गया। इस अध्ययन के अनेक निष्कर्षों में एक सार्वभौमिक नतीजा यह था कि महिलाओं के सशक्तिकरण से एक तो परिवारों में खेती को लेकर प्रगतिशील रुझान बढ़ता है और दूसरा, उन्हें आर्थिक और सामाजिक तौर पर प्रगति के ज्यादा अवसर प्राप्त होते हैं। अकतर का यह अध्ययन भारत के कई गाँवों में सजीव रूप से देखा और महसूस किया जा सकता है।
 
बिहार के पूर्विया जिले में चल रही जीविका मूलतः स्वयं सहायता समूहों यानी एसएचजी के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की सरकारी योजना है, जिसमें तमाम एसएचजी ही आपस में मिलकर किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) भी बनाते हैं। यहाँ क्योंकि एसएचजी की पूरी अवधारणा सीधे तौर पर महिला सशक्तिकरण से जुड़ी है, इसलिए जीविका की सफलता के साथ ही बिहार में महिला सशक्तिकरण के नए आयाम भी जुड़ रहे हैं। शुरुआत में आन्ध्रप्रदेश की महिलाओं ने यहाँ आकर एसएचजी का प्रशिक्षण दिया, लेकिन अब स्थानीय महिलाएँ राजस्थान और दूसरे राज्यों में रिसोर्स के तौर पर जा रही हैं। यह परिवर्तन केवल महिलाओं के निजी व्यक्तित्व विकास तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ने और परिवार में ‘नो वन’ से ‘समवन’ होने तक के सफर की बानगी है। शकीला बानो धमदाहा ब्लॉक के एक एसएचजी से जुड़ी ऐसी ही एक महिला हैं, जिन्होंने प्रशिक्षण पाकर अपनी पूरी खेती का ढाँचा बदला है। शकीला के कारण ही अब उनके परिवार ने एसआरआई विधि से धान की खेती करना प्रारम्भ किया। इतना ही नहीं, शकीला और उनके साथ दूसरी महिला किसानों को जब मक्के का अच्छा भाव पाने में मुश्किल हो रही थी, तब जीविका की मदद से उनके एसएचजी ने एग्री कमोडिटी एक्सचेंज एनसीडीईएक्स (नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज) के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना शुरू किया। महिला किसानों का पूरा समूह आरण्यक एफपीओ के तौर पर काम करता है, जिसके 1500 से ज्यादा सदस्य हैं और इन महिलाओं के एफपीओ का कुल कारोबार पायलट प्रोजेक्ट के पहले साल में ही एक करोड़ रुपए को पार कर गया था। ये पूरी परियोजना बिहार सरकार और विश्व बैंक का साझा प्रयास है और इस सफलता ने बिहार सरकार को इस कदर उत्साहित किया कि दूसरे ही साल में आरण्यक एफपीओ की मक्का खरीद का लक्ष्य लगभग 10 गुना बढ़ाकर 10,000 टन कर दिया गया। ये महिलाएँ आज न केवल अपने एफपीओ के लिए खरीद-बिक्री के भाव और टाइमिंग का फैसला करती हैं और हेजिंग जैसे तकनीकी तरीकों की आसानी से व्याख्या करती हैं, बल्कि अपने बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के दूसरे आर्थिक फैसले भी खुद कर रही हैं।
 
छत्तीसगढ़ में भी महिला सशक्तिकरण के लिए कृषि उत्पादों से सम्बन्धित एक शानदार योजना चल रही है, जिसके परिणामों की चर्चा यहाँ प्रांसगिक होगी। वनवासी-बहुल इस राज्य में महिलाएँ वैसे भी समाज में मुख्य भूमिका निभाती हैं। ऐसे में उनके आर्थिक सशक्तिकरण के लिए वनोपज विभाग ने उन्हें इमली, काजू, शहद और जड़ी-बूटियों के संग्रहण और प्रोसेसिंग से जोड़ा है। यहां तक कि इन उत्पादों की मार्केटिंग के लिए जो संजीवनी रीटेल स्टोर चेन शुरू किए गए हैं, वहाँ भी महिलाएँ ही नियुक्त की जाती हैं। इन जड़ी-बूटियों को लाने से लेकर, उनकी प्रोसेसिंग और उन्हें बेचने का काम स्वयं सहायता समूहों के जरिए होता है, जिनमें अधिकतर महिलाएँ शामिल हैं। महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए इस तरह एक-दूसरे से जुड़कर वनोपज के प्रसंस्करण से अपनी आजीविका चलाना केवल उनकी सदस्य महिलाओं को आर्थिक आजादी ही नहीं दे रहा है, बल्कि उनकी सामाजिक और पारिवारिक प्रतिष्ठा को भी बढ़ा रहा है। हर्रा, बहेड़ा, आंवला, त्रिफला, सर्पगंधा, अर्जुन छाल और ऐसी कई नायाब जड़ी-बूटियों को जंगल से चुन कर लाने और उसे प्रोसेस कर हर्बल औषधियाँ तैयार करने वाले ऐसे ही एक एसएचजी में गजपति पुरुष सदस्य हैं। गजपति के मुताबिक इलाके में अब लोग उस गाँव को हर्बल स्वयं सहायता समूह के कारण जानने लगे हैं, जिससे महिलाओं का सम्मान बढ़ गया है और घरों में भी उनको ज्यादा प्रतिष्ठा मिलने लगी है। इस और इस जैसे दूसरे समूहों ने पहली बार इन वनवासी महिलाओं को घर का कमाऊ सदस्य बना दिया है। इसी समूह की अंजलि इसे कुछ यूं बयां करती हैं, ‘हाथ में पैसे हों, तो बहुत कुछ बदल जाता है। हम लोग कालमेघ लाते हैं, गिलोय लाते हैं, नीम लाते हैं जो महिलाएँ ज्यादा मेहनत करती हैं, उनको महीनें में 3000-4000 रुपए की कमाई हो जाती है।’ कांकेर जिले के बकावंड में काजू प्रोसेसिंग प्लांट में आस-पास के इलाकों की ग्राम समितियाँ वन विभाग की जमीन से काजू संग्रहण कर लाती हैं और 21 सदस्यों वाले माँ धारिणी करिन स्वयं सहायता समूह की महिलाएँ उबालने से लेकर पैकिंग तक का चरण पूरा करती हैं। पिछले साल इस केन्द्र में करीब 1300 क्विंटल काजू आया, जिसमें 100 क्विंटल की प्रोसेसिंग की गई और बाकी को कच्चे रूप में ही बेचा गया। यह समूह कच्चे माल को वैल्यू ऐड कर बेहतर कीमत पर बेचने की रणनीति पर काम कर रहा है।
 
धौलपुर राजस्थान के 33 जिलों में मानव विकास सूचकांक के लिहाज से 30वें स्थान पर है और देश के 100 सबसे पिछड़े जिलों में शामिल है। लेकिन इस रेगिस्तान में कई मरुद्यान बसते हैं। जिले के 4000 एसएचजी से करीब 54,000 महिलाएँ जुड़ी हैं जो खेतीबाड़ी में अति सक्रिय हैं। करेरुआ ब्लॉक में रचना, मेनका, मनोज कुमारी, ब्रह्मा जैसी महिलाएँ यहाँ ऐसे ही एक समूह से जुडी हैं जिन्हें ‘कृषि सखी’ नियुक्त किया गया है। इन महिलाओं के मुताबिक कुछ वर्षों पहले तक यहाँ ये सब घरों की चारदीवारी में कैद थीं। खेतों में क्या हो रहा है, कौन-सी फसल की बोआई हो रही है और खेती में क्या इस्तेमाल हो रहा है, न इसकी उन्हें कोई समझ थी और न इसमें कोई भागीदारी, लेकिन अब कृषि सखी बनने के बाद वे घर से बाहर निकलने लगी हैं, मीटिंग में जाती हैं, बाजार जाती हैं और खेती की फसलों पर निर्णय भी लेती हैं।
 
धौलपुर के इस परिवर्तन ने एक सवाल कृषि सुधारों के स्वरूप के बारे में भी उठाया है। जब भी सुधारों की बात की जाती है, तो आमतौर पर उसे सरकारी नीतियों में बड़े बदलाव या सैकड़ों करोड़ रुपए की निवेश योजना से जोड़ दिया जाता है। लेकिन भारत में कृषि से जुड़ी बारीकियाँ इतनी महीन हैं कि उन्हें दरअसल छोटी-छोटी बातों के जरिए समझने और समझाने की आवश्यकता है। महिलाओं को कृषि से जोड़ने के लिए सबसे पहले तो समाज और परिवार की सोच को बदलने की जरूरत होती है और जब एक बार कुछ महिलाएँ इसके लिए तैयार होती हैं, तो फिर उन्हें वहाँ से सहायता देनी होती है, जहाँ वे खड़ी हैं। यह काम केवल सरकारी घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीन पर काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन और उनके कार्यकर्ताओं से ही सम्भव है। धौलपुर की महिला किसानों की ट्रेनिंग का नतीजा था कि पहले जहाँ बोआई हवा में बीज बिखेर कर होती थी, वहीं अब मिट्टी की मेड बनाकर बीज की रोपाई होने लगी है। पहले जहां बीज को सीधे दुकान से खरीदकर मिट्टी में डाल दिया जाता था, वहीं अब बीजोपचार के बाद बोआई होने लगी है। इस तरह के बदलाव से एक ओर लागत में कमी आई, वहीं दूसरी ओर उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी होने लगी है और बेहतर प्रक्रियाओं के जरिए लागत में कमी और उत्पादन में बढ़ोत्तरी के मंत्र के साथ ही इन महिलाओं ने खेती के जरिए वो कमाल कर दिखाया है, जिसके लिए तमाम सरकारें और नीति निर्माता प्रयास कर रहे हैं। केवल बहुफसलीकरण और बोआई के तरीकों में बदलाव कर कम पढ़ी-लिखी और साधनों के अभाव से जूझती इन महिला किसानों ने महज कुछ सालों के भीतर खेती से अपने परिवार की आय को दोगुना करने में सफलता पा ली है। राधाकृष्ण एसएचजी की किसान बबली देवी ने इसे कुछ यूँ बनाया, ‘पहले पूरे साल में खेत में गेहूँ, बाजरा और सरसों की दो-तीन फसल ही करते थे। अब आधे में बाजरा करते हैं, तो आधे में मूँगफली कर लेते हैं या आधे में ग्वार कर लेते हैं, थोडी-सी मूँग, उड़द भी कर लेते हैं। इससे घर की बचत हो जाती है और आमदनी में भी दोगुने तक की बढ़ोत्तरी हुई है।’
 
धौलपुर जिले के ही आदमपुर गाँव में महिलाओं का एक और स्वयं सहायता समूह पूरे इलाके में खेती का पैर्टन बदलने पर काम कर रहा है। इस समूह की महिलाओं ने अपने परिवारों को चुनौती देते हुए इलाके में पहली बार सब्जियों की खेती शुरू की और पारम्परिक खेती के मुकाबले बीघे के लिहाज से दोगुनी आमदनी हासिल कर दिखाया। अब आलम ये है कि इनकी देखा-देखी गाँव के दूसरे लोग भी सब्जियों की खेती शुरू कर रहे हैं। जय हनुमान एसएचजी की उमा देवी ने बताया, ‘इस साल पहले यहाँ किसी सब्जी की खेती नहीं होती थी, लेकिन अब आलू, बैंगन, टमाटर, मिर्च, घीया, तोरई, भिंडी जैसी फसलें पिछले साल से अपने खेतों में उगा रहे हैं। शुरू में घरवालों ने विरोध किया, लेकिन हमने छोटे से हिस्से से शुरूआत की थी। एक बीघे में मिर्ची लगाई थी। हम खेती करते हैं और हमारे पति उसे लेकर पास की मंडी में बेचने जाते हैं। एक बीघे से एक लाख रुपए तक की आमदनी हुई, जिससे धीरे-धीरे 25-30 किसानों ने अब इसकी शुरुआत कर दी है।’ ये उदाहरण दरअसल भविष्य की राह के लिए वो दिशाएँ हैं, जिन पर चल कर एक साथ दो लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं- महिलाओं का सशक्तीकरण और देश में खेती की प्रगति। ये दो ऐसे लक्ष्य हैं, जिन्हें साधकर देश की आधी से ज्यादा सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। इस लिहाज से महिला सशक्तिकरण और कृषि का सम्बन्ध इतना गहरा और दूरगामी हो सकता है, जिसकी शायद कल्पना भी मुश्किल हो।

 

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Post By: Shivendra
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