खेत की आग को बुझाने में क्यों नाकाम रहा पंजाब 

खेत की आग को बुझाने में क्यों नाकाम रहा पंजाब 
खेत की आग को बुझाने में क्यों नाकाम रहा पंजाब 

पिछले साल 11 दिसंबर को पंजाब के किसानों नेे फिरोजपुर जिले के काबर बाचा गांव में राज्य के कृषि विभाग के तीन अधिकारियों को बंधक बना लिया था। किसानों का आरोप था कि उन्होंने अधिकारियों की सलाह के बाद धान के पुआल को नहीं जलाया था, जिस कारण उनकी गेहूं की फसल को पिंक स्टेम बोरर कीट (गेहूं के तने पर लगने वाला कीड़ा) ने संक्रमित कर दिया था। पिछले साल धान को जलाए बिना गेहूं की खेती करने वाले फरीदकोट जिले के रामियाना गांव के किसान गुरविंदर सिंह धालीवाल ने कहा कि प्रति एकड़ में उपयोग किए गए 500 से 1000 रुपये के कीटनाशकों के अलावा उन्हें 4 क्विंटल प्रति एकड़ की फसल का भी नुकसान उठाना पड़ा था।

अक्टूबर में शुरू होने वाली धान की कटाई हर साल पंजाब के साथ ही हरियाणा और उत्तर प्रदेश की ओर ध्यान आकर्षित कराती है। अभी अभी किसानों ने धान की कटाई की है और वक्त गेहूँ की बुआई का है, लेकिन बुआई से पहले उन्हें खेतों से पुआल को भी साफ करना है।  इसलिए वें खेतों को जल्दी साफ करने के लिए पुआल को आग लगा देते हैं। हालाकि धान की कटाई और गेहूँ की बुआई के बीच किसान के पास थोड़ा ही समय होता है। वर्ष 2019 में तो बारिश और बाढ़ के कारण ये समय और भी कम था, जिस कारण धान की कटाई में देरी हुई। 

अक्सर दिल्ली में गंभीर वायु प्रदूषण के लिए पुआल जलाने को दोषी ठहराया जाता है। राजधानी दिल्ली में खेतों की आग से होने वाला प्रदूषण मौसम की स्थिति और आग के दैनिक उदाहरणों पर निर्भर करता है। सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में वायु प्रदूषण में पुआल की आग 2 से 46 प्रतिशत तक का योगदान देती है। पठानकोट के मुख्य कृषि अधिकारी इंद्रजीत सिंह का मानना है कि अगले कुछ वर्षों में पिंक स्टेम बोरर जैसे कीड़े, जो किसानों की गेहूं की फसल को संक्रमित करते हैं, अगले कुछ वर्षों में बड़ी समस्या बनने वाले हैं। ऐसे कीड़ों से छुटकारा पाने के लिए भी किसान खेतों में आग लगाते हैं। उन्होंने कहा कि अब अनुकूल वातावरण के कारण कीड़ों की संख्या में वृद्धि हो रही है। साथ ही जब तक वैज्ञानिक इस समस्या को कम करने का कोई समाधान नहीं ढूंढ लेते, तब तक आग को कम करने के सभी प्रयास निरर्थक रहेंगे।

वर्ष 2019 में पंजाब ने 50 हजार से अधिक आग के मामले पंजीकृत किए थे, जिनसे वायु प्रदूषण के कारण कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हुई हैं और सड़क पर धुंंध रहने से दृष्यता भी कम हुई थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहल की और प्रदूषण आपातकाल के खिलाफ मुकदमा चलाने का नोटिस दिया। जिसके बाद प्रशासन सक्रिय हुआ और पुआल जलाने वाले किसानों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई, चालान काटे गए तथा किसानों को गिरफ्तार भी किया गया, लेकिन अब सरकार किसानों पर एफआईआर वापस लेने, राजस्व रिकाॅर्ड से रेड एंट्रियों (राजस्व रिकाॅर्ड में रेड एंट्री का मतलब है कि इन किसानों को भविष्य में किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलेगा) को हटाने और जुर्माने को माफ करने की मांग कर रहे नाराज फार्म यूनियनों को शांत करने की कोशिश में लगी हुई है। हालाकि सरकार ने बीते वर्षों में कई योजनाएं पेश करने के साथ ही समाधान भी सुझाए हैं, लेकिन इसका जमीनी स्तर पर अभी तक कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 25 सितंबर 2019 को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के एक सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से दावा किया गया था कि आगामी महीनों में धान के पुआल प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए राज्य के कृषि विभाग ने 278 करोड़ रुपये की लागत से किसानों को 26 हजार से अधिक मशीनें प्रदान करने के लिए एक अभियान शुरू किया था। इस पोस्ट को समर्थकों ने तो काफी पसंद किया, लेकिन अन्यों की नाराजगी भरी टिप्पणियां भी काफी मिलीं। इसके अलावा पोस्ट पर ही कई लोगों ने मशीनों पर मिलने वाली सब्सिडी में भ्रष्टाचार का आरोप भी लगाया। साथ ही मशीन के संचालन में अक्षमता और उच्च लागत की बात भी कही। 

मुख्यमंत्री ने केंद्र से धान उत्पादकों को 100 रुपये प्रति क्विंटल प्रोत्साहन देने की मांग की, जिसे बाद में सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सुनवाई में भी दोहराया। खैर मांग को खारिज कर दिया गया था, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को उठाया और राज्य सरकार ने 13 नवंबर 2019 को राज्य के छोटे और सीमांत किसानों को 2500 रुपये प्रति एकड़ देने की घोषणा की, लेकिन घोषणा करने में बहुत देर हो चुकी थी और सीजन लगभग खत्म हो चुका था।

मशीनों की भूमि

पंजाब की खेती अत्यधिक यंत्रीकृत है, जिसने श्रमिकों की कमी से निपटने में मदद की है, लेकिन उच्च ऋण और पारिस्थितिकी आपदाओं को बढ़ा भी दिया है। पंजाब राज्य किसान नीति के मसौदे में कहा गया है कि पंजाब के प्रत्येक 8.7 हेक्टेयर खेती योग्य जमीन के लिए ट्रेक्टर उपलब्ध हैं और ट्रेक्टर का औसत उपयोग आर्थिक व्यवहार्यता के लिए आवश्यक 1000 घंटों में से 40 प्रतिशत से भी कम है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन में बताया गया कि फार्म इनपुट और मशीनरी के लिए लिया गया ऋण, किसानों द्वारा लिए गए कुल ऋण का 52 प्रतिशत है, जबकि छोटे किसानों के लिए ये हिस्सेदारी 68 प्रतिशत हो गई है, जिसने स्वास्थ्य और सामाजिक समारोहों जैसे अन्य उद्देश्यों के लिए उनकी खरीदने की क्षमता को घटा दिया है। पुआल प्रबंधन के लिए होने वाले मशीनों के प्रचार ने संकट को और बढ़ा दिया है। हालाकि इन मशीनों को किराए पर उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन ये अपर्याप्त है।

वर्ष 2019 में राज्य सरकार ने सुपर हार्वेस्टर सिस्टम (सुपर एसएमएस) को कंबाइन हार्वेस्टर (कंबाइन हार्वेस्टर किसानों द्वारा प्रयोग की जाने वाली मशीन है, जो धान की कटाई करती है और अनाज को भूसे से अलग करती है। सुपर.एसएमएस कंबाइन हार्वेस्टर से जुड़ा हुआ है, जो भूसे को और काट देता है और इसे खेत में पतवार के रूप में फैला देता है।) के लिए अनिवार्य कर दिया था। सरकार ने घोषणा की कि सुपर एसएमएस के बिना संचालित कंबाइन हार्वेस्टर को जब्त कर लिया जाएगा। इसका पहला मामला 15 अक्टूबर को मोगा जिले के बुघीपुरा गांव से सामने आया था। जब्त मशीन के सामने पुलिस और अधिकारियों की तस्वीर के साथ एक प्रेस नोट भेजा गया था। प्रेस नोट में कहा गया कि किसान प्रेम सिंह को सुपर एसएमएस का उपयोग किए बिना धान की कटाई करनी पड़ी, जो कि कॉम्बिनेशन हार्वेस्टर पर लगाया गया था। हालाकि, जांच में यह पाया गया कि प्रेम सिंह न तो किसान है और न किसी खेती की जमीन का मालिक है। उनके घर से छानबीन में पता चला कि वह एक मैकेनिक है, जो एक कंबाइन हार्वेस्टर का मालिका है और कटाई के मौसम के दौरान इसे किराए पर देता है। जिस कारण प्रशासन ने मशीन को जब्त नहीं किया क्योंकि जब्ती का आदेश केवल उन उन कंबाइन हार्वेस्टर के लिए था, जिनके पास सुपर एसएमएस नहीं था। प्रेम सिंह ने बताया कि उनके पास सुपर एसएमएस है, लेकिन उपयोग करने के दौरान अधिक ईंधन का उपयोग होता है और रखरखाव की लागत अधिक है। उन्होंने बताया कि सुपर एसएमएस से कटाई की गति काफी धीमी होने के कारण कटाई की लागत 50 से 60 प्रतिशत बढ़ जाती है, लेकिन किसान अतिरिक्त भुगतान करने को तैयार नहीं हैं। मैंने अधिकारियों से कहा कि हमें किसानों से पैसा मिलता है, आपसे नहीं। हम उनकी आज्ञा का पालन करेंगे। किसान सुपर एसएमएस से भी सावधान रहते हैं, क्योंकि मशीन में अनाज जाने की संभावना रहती है, जिससे उपज का नुकसान होता है।

ऑपरेशन की लागत के अलावा कई कंबाइन हार्वेस्टर मालिक सुपर एसएमएस इंस्टाॅल नहीं कर सकते हैं। उद्योगों का अनुमान है कि पंजाब के करीब 35 प्रतिशत हार्वेस्टर 65 हार्सपावर से कम क्षमता वाले ट्रेक्टरों को चला रहे हैं, जो सुपर एसएमएस के अतिरिक्त भार को वहन नहीं कर सकते हैं और किसानों को सुपर एसएमएस का जीर्णोद्धार/मरम्मत खुद करनी होगी। मानकों का उल्लंघन कर प्रदूषण फैलाने वाली प्रत्येक मशीन पर पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) ने दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया, साथ ही चालान भी जारी किया। जिसके बाद पुलिस के राज्य के कंबाइन हार्वेस्टरों को जब्त कर लिया। अब किसान अपनी फसल काटने की मशीन (हार्वेस्टर) को मुक्त करने के लिए विरोध कर रहे हैं। मोगा जिले के जोगेवाला गांव के किसान हरजीत सिंह ने कहा कि समाधान के तौर पर क्या काम करना चाहिए, ये जानने के बजाए सरकार हम पर महंगी मशीनों को थोप रही है। उन्होंने कहा कि किसानों पर चालान जारी करने और एफआईआर दर्ज करने के बजाए वित्तीय सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है। ये भी समझना होगा कि अखिर किसान क्यों आत्महत्या करने का तैयार होंगे, कर्ज या डर के कारण ? जो किसान क़र्ज़ के कारण आत्महत्या करने को तैयार हैं, वो चालान से क्यों डरेगा ?

हालाकि पंजाब राज्य सरकार किसानों को अलग अलग सब्सिडी देती है, जिसमें व्यक्तिगत तौर पर किसानों को 50 प्रतिशत और किसानों के समूह तथा सहकारी समितियों के समूहों को 80 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है। भारती किसान यूनियन के अध्यक्ष अजमेर सिंह राजेवाल, जो पंजाब के प्रमुख किसानों में से एक हैं, ने बताया कि 10 दिसंबर 2015 को एनजीटी ने किसानों को दो एकड़ से कम जमीन वाली मशीनें देने का आदेश दिया था, लेकिन आदेश के अनुपालन में किसानोंं का ऐसा कोई सहयोग नहीं किया गया। वहीं सब्सिडी की घोषणा के बाद मशीनों की दरें बढ़ने से सब्सिडी से भी किसानों को कोई राहत नहीं मिली। अब किसाने इसे सरकार और काॅरपोरेट के बीच सांठगांठ ही कह सकते हैं। हालाकि अधिकारी इन सभी प्रकार के आरोपों से इन्कार करते हैं। पंजाब सरकार के सचिव (कृषि) केएस पननू का कहना है कि मशीन निर्माताओं को केंद्र सरकार के स्तर पर सूचीबद्ध किया गया है और मशीनों की विशिष्टताएं और दरें राष्ट्रीय स्तर पर यही थीं। उनका यह भी कहना है कि समान मशीनें कम गुणवत्ता और विशिष्टताओं के साथ बाजार में कम दामों पर उपलब्ध हो सकती हैं। उद्योग जगत के नेताओं का भी यही मानना है। दशमेश मैकेनिकल वक्र्स के प्रबंध निदेशक सरबजीत सिंह का कहना है कि कई स्थानीय निर्माता कम दरों पर यही मशीन उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन उनकी विशिष्टताएं काफी कम और प्रदर्शन काफी खराब है। कृषि उद्यमी विक्रम आहूजा ने कहा कि तकनीक और मशीनों की लागत में समय के साथ गिरावट आती है, लेकिन सब्सिडी के तहत कृषि मशीनों के मामले में दरों में वृद्धि हुई है। सरकार को किसानों को सही कारण बताना चाहिए।

राज्य सरकार सहकारी समितियों के मशीन बैंकों के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को किराये पर कृषि मशीनें उपलब्ध कराने का दावा करती है। हांलाकि, बैंक अधिक मांग को पूरा करने के लिए पूर्ण रूप से सुसज्जित नहीं है और केवल फाइलों में ही अस्तित्व में हैं। इसका खुलासा भी हो चुका है और मध्य प्रदेश के सेंट्रल फार्म मशीनरी ट्रेनिंग एंड टेस्टिंग इंस्टीट्यूट बुदनी की टीम सरकारी रिकाॅर्ड में सूचीबद्ध 107 में से केवल 34 बैंकों को ही खोज पाई है। साथ ही इन केंद्रों पर पाई गई मशीनें या तो पूरी तरह से उपयोग में नहीं हैं, या गुम/अनुपलब्ध हैं और कर्मचारी भी अप्रशिक्षित पाए गए हैं। राज्य सरकार का दावा है कि मशीनों की अनुपलब्धता तथ्यात्मक है और केंद्र की टीम की सूची में कुछ विसंगतियां थीं। एनजीटी को दिए गए आंकड़ों में बताया गया कि कस्टम हायरिंग केंद्रों को फार्म मशीनों की डिलीवरी करने का पंजाब केवल 39 प्रतिशत लक्ष्य ही पूरा कर सका है। व्यक्तिगत किसानों के बारे में आंकड़ा और भी अधिक निराशाजनक था, क्योंकि किसानों को मशीनों के लक्ष्य वितरण का केवल 21 प्रतिशत ही मिला था।

हैप्पी सीडर का सीमित लाभ

सरकार के साथ साथ गैर सरकारी संगठन गेहूं की बुआई के लिए हैप्पी सीडर मशीन को बढ़ावा देते रहे हैं, जो गेहूं बुआई की जीरो टीलेज तकनीक है और बिना जुताई बीजों की तैयारी के फसल लगाने की एक विशेष मशीन है। इसे देर से बुआई से बचने और चावल के खेतों में भूमि तैयार करने की लागत से बचने के लिए अवशिष्ट नमी में शून्य जुताई ड्रिल के माध्यम से गेहूं बोया जाता है। इससे धान के पुआल को जलाने से बचाया जा सकता है। हांलाकि किसानों को अक्सर यह शिकायत होती है कि हैप्पी सीडर के उपयोग से गेहूं की फसल में कीड़ों और बीमारियों के संक्रमण के साथ साथ मिट्टी में उच्च या ज़रूरत से ज़्यादा नमी होती है, जो फसल के लिए फायदेमंद नहीं होती। पंजाब में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता गुरप्रीत सिंह डबरीखाना का मानना है कि हैप्पी सीडर केवल हल्की मिट्टी पर परिणाम दिखाता है। भारी मिट्टी में कीड़े की समस्या प्रचलित है, जो उपज को प्रभावित करती है और जुताई की लागत को बढ़ाती है। कृषि उद्यमी विक्रम आहूजा का कहना है कि अलग अलग प्रकार की मिट्टी और भिन्न भिन्न किसानों के लिए हैप्पी सीडर के परिणाम भी अलग हैं। इसे पूरी तरह से विफल कहना उतना ही ग़लत होगा जितना इसे एकमात्र समाधान मान लेना। उन्होंने कहा कि पीढ़ियों से किसानों को साफ सुथरे खेत में बोने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।अब हम उन्हें इस विधि को भूलने और शून्य जुताई का पालन करने के लिए कह रहे हैं। अन्यों का मानना है कि हैप्पी सीडर के प्रदर्शन के मुद्दे को सिंचाई के समय, उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को बदलकर प्रबंधित किया जा सकता है।

फोटो - Mongabay-India

दिल्ली स्थित द नेचर कंजरवेंसी के फसल अवशेष प्रबंधन कार्यक्रम के प्रमुख मनोज सिंह ने कहा कि अब तक सरकार ने मशीन वितरण पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है और अधिकतम लाभ हेतु इन मशीनों का उपयोग करने के लिए किसानों की क्षमता निर्माण पर कम ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने कहा कि हैप्पी सीडर के लाभ तीसरे या चौथे वर्ष में स्पष्ट हो जाते हैं, लेकिन किसान पहले उपयोग के बाद धैर्य खो देते हैं। यही वजह है कि उनकी हैंडहोल्डिंग की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि इस तकनीक का उपयोग करने के दीर्घकालिक लाभों में खेती की लागत में गिरावट के अलावा मिट्टी के स्वास्थ्य और जल संरक्षण में सुधार शामिल हैं।

बायोमास बिजली संयंत्रों की व्यवहार्यता

पटियाला जिले के मग्यार गांव के सुखचैन सिंह ने बेलर और रेक मशीन का कॉम्बो खरीदा था, जिसका कर्ज चुकाने के लिए हाल ही में उन्होंने अपनी एक एकड़ जमीन बेच दी। उन्हें जुड़वा मशीनों का उपयोग धान के पुआल को उखाड़ने और आसान परिवहन के लिए बंडलों में संपीड़ित करने के लिए करना था। दरअसल, सिंह उन 100 किसानों में से एक हैं, जिन्होंने पटियाला के पास पंजाब बायोमास पावर लिमिटेड द्वारा स्थापित 12 मेगावाट बायोमास आधारित बिजली संयंत्र में पुआल के बंडल की आपूर्ति के लिए इन मशीनों को 20 लाख रुपये में खरीदा था, लेकिन 2017 में पावर प्लांट का परिचालन बंद हो गया, जिससे वे फंसे हुए हैं। सुखचैन सिंह ने कहा कि हमने इन सभी मशीनों को खरीदा है, जो पुआल की आपूर्ति से लेकर प्लांट तक के मुनाफे को चुकाने में मदद करेंगी। अब हम बेलर को 50 किमी तक के क्षेत्रों में ले जाते हैं ताकि लाभ में बने रहें।

वर्तमान में पंजाब में 72.5 मेगावाट क्षमता के नौ बायोमास बिजली संयंत्र हैं और 61 मेगावाट क्षमता के चार और जोड़ने की योजना है। इसमें राज्य भर में सैकड़ों बायोमास बिजली संयंत्रों की स्थापना के लिए विभिन्न कंपनियों के साथ नियमित रूप से समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन केवल कुछ ही भौतिक हैं। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि इसका कारण टैरिफ समर्थन की कमी और सौर ऊर्जा से प्रतिस्पर्धा है। पंजाब रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक लेफ्टिनेंट कर्नल मोनिष आहूजा (सेवानिवृत्त) ने कहा कि सरकार को बायोमास को उसी तरह बढ़ावा देना चाहिए, जिस तरह से पवन और सौर क्षेत्रों का समर्थन किया जाता है। बड़ी कंपनियों और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए परियोजनाओं को बढ़ाने की आवश्यकता है। वर्तमान में हमारे पास बहुत छोटी बायोमास आधारित बिजली परियोजनाएं हैं, जिनमें से अधिकांश कम टैरिफ समर्थन के कारण घाटे में चल रही हैं। उन्होंने कहा कि हमें केवल बिजली परियोजनाओं के बजाए मिश्रित उपयोग पर ध्यान देने की आवश्यकता है, खासकर जब धान की पुआल भारी मात्रा में उपलब्ध है। बायोमास का उपयोग अन्य उत्पादों के अलावा ब्रिकेट, सीएनजी, इथेनॉल के उत्पादन के लिए किया जा सकता है। पंजाब एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी के संयुक्त निदेशक एमपी सिंह  वाणिज्यिक गैर व्यवहार्यता के दावों से इनकार करते हैं। उनका मानना है कि टैरिफ दरें नियामक द्वारा तय की जाती हैं और सभी कंपनियों को सालाना 5 प्रतिशत की वृद्धि मिलती है। एक बिजली परियोजना को छोड़कर अन्य सभी बायोमास संयंत्र पंजाब में काम कर रहे हैं।

स्थानीय विकेंद्रीकृत समाधान

वायु प्रदूषण ने किसानों को भूसा प्रबंधन में नवाचारों के साथ आने के लिए प्रेरित किया है। कपूरथला जिले के जयरामपुर गांव के ज्यान सिंह ने कम लागत वाली तकनीक का प्रयोग तब किया, जब धान का पुआल खेत में खड़ा था, जिसमें यूरिया उर्वरक के साथ गेहूं के बीज का छिड़काव शामिल है। इसके बाद पुआल एक रीपर के साथ कट जाता है और जमीन को कवर करता है। जब नीचे से गेहूं का अंकुर निकलता है तो यूरिया और पानी समय के साथ भूसे का विघटन करते हैं। ज्यान सिंह ने बताया कि पहले वें पुआल जलाते थे और प्रति एकड़ 20 क्विंटल गेहूं की उपज प्राप्त करते थे। इस तकनीक से उपज 23 क्विंटल है और पानी का उपयोग भी कम हो गया है। एक एकड़ से दो साल पहले मैंने इस पद्धति को पूरे 30 एकड़ भूमि पर बढ़ाया है। 

इस तकनीक के साथ लागत 400 रुपये प्रति एकड़ है, जबकि श्रमिकों या बीजक मशीनों को काम पर रखने पर 2500 से 4000 रुपये खर्च होते हैं। फसल रीपर, एक सामान्य कम लागत वाली मशीन इस पद्धति के माध्यम से उपयोग किया जाने वाला एकमात्र कार्यान्वयन है। इस विधि को किसानों के बीच बढ़ावा देने वाले गुरप्रीत डबरीखाना का कहना है कि इसकी तुलना हैप्पी सीडर जैसी महंगी मशीनों से करें, जो गेहूं की बुआई के बाद भी बेकार हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि इस साल इस विधि का उपयोग करके पंजाब में लगभग 25000 एकड़ भूमि में गेहूं लगाया गया है।

अधिशेष फसल अवशेषों को नष्ट करने के लिए पशु चरवाहा और किसान सदियों से सहयोग कर रहे हैं। धान का पुआल सिलिका में उच्च और पोषण मूल्य पर कम होता है। यही कारण है कि कई डेयरी किसान इसे दुधारू पशुओं को खिलाने से रोकते हैं। हांलाकि गुर्जरों की तरह घुमंतू चरवाहा समुदाय अभी भी पुआल को पशुओं के चारे और बिस्तर के रूप में उपयोग करते हैं। महंगे भोजन को वहन करने में अक्षम होने के कारण घुमंतू चरवाहा समुदाय खेतों से पुआल उठाते हैं या मुफ्त में अथावा किसानों को कम भुगतान कर अपने जानवरों को खेतो में चराते हैं, लेकिन इस व्यवसाय में किसानों और चरवाहों के बीच सहयोग में गिरावट आई है, जो अब पहाड़ियों से सटे बहुत कम इलाकों तक ही सीमित है। इस मौसम के दौरान चरवाहों की आवाजाही को आसान बनाने के लिए विशेष व्यवस्था करने से पुआल को कम लागत में दूध और खाद में बदला जा सकता है।

लेखक - मनु मुदगिल

Mongabay-India

 

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