जल दर्शन एवं विज्ञान

जल दर्शन एवं विज्ञान
जल दर्शन एवं विज्ञान

पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी मात्र में चार हिस्सा जल और शेष पांचवा हिस्सा अन्य सभी तत्त्वों का होता है। आधुनिक जीव विज्ञान (Zoology) के अनुसार भी प्राणी मात्र में 78 प्रतिशत पानी होता है। उसमें एक प्रतिशत भी घटे तो जीवन के लिए संकट खड़ा हो जाता है। पानी चैतन्य का भी प्रतीक है। मनुष्य शरीर के जिन अवयवों में जल नहीं होता, जैसे-लोम, केश, नाखून आदि निर्जीव सामग्री हैं, इन्हें काटने से किसी पीड़ा का अनुभव नहीं होता। इस तथ्य के आधार पर सामाजिक संदर्भ में कमजोर, कायर, अनैतिक इंसान के लिए 'बेआबरू', यानी जिसका पानी उतर गया हो, का मुहावरा विकसित हुआ।

हमारे समस्त शास्त्र और आख्यान प्रमाण हैं कि अभी एक डेढ़ सदी पहले तक हमारी पानी की समझ अत्यंत विस्तृत थी। मध्य काल में लोक भाषाओं का प्रचलन बढ़ने लगा तो हमारे मनीषियों ने जल के शास्त्रीय विवेचन को सरल लोकोक्तियों में प्रस्तुत कर दिया। रहीम का दोहा है:

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून ।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानस चून ।।

निज परंपरा का यह तथ्य लंबे अर्से से दृष्टि ओझल है, विस्मृत है कि जल की एक बूंद तक का दुरुपयोग हिंसात्मक है और जीव दया के सिद्धान्त का घोर उल्लंघन है। दैनंदिनी जीवन में नित्यकर्म से लेकर रात्रि विश्राम तक हम जो कुछ भी करते हैं, उसमें निरन्तर हिंसा का विस्तार करते हैं। शौच मलमूत्र विसर्जन के लिए पन्द्रह से पच्चीस-पचास लीटर तक पानी उसमें खपा देते हैं। भारतीय परंपरा में जल ईश्वर तत्त्व है। मल विसर्जन का माध्यम नहीं। वैज्ञानिक तथ्य है कि मल का विघटन या ऊर्जा में परिवर्तन स्वतः प्रक्रिया है जो सूर्य, वायु और मिट्टी के संसर्ग से तीव्र गति से हो जाती है।

जल का मिश्रण कर देने पर यह स्व-विघटन एवं स्व-विकीर्णीकरण की प्रक्रिया सुस्त हो जाती है, जिसके दो नुकसान होते हैं। प्रथमतः तो सहज उपलब्ध होने वाली ऊर्जा नष्ट हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि ऊर्जा का मूल सिद्धांत यही है कि मैं क्षय होती हूं, इसीलिए हूं। यानी सूर्य क्षय होकर ही ऊर्जा प्रदान करता है। लकड़ी, कोयला आदि जल कर ही ऊर्जा उपलब्ध करवाते हैं। पदार्थ का क्षय होना उसका ऊर्जा रूप में परिवर्तित होना है। द्वितीय, इस क्षय-गति में अवरोध से अनावश्यक एवं अवांछनीय जीव उत्पत्ति की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। ये दोनों प्रक्रियाएं अनन्त व्यापक हिंसा के क्रम की उत्पत्ति का स्रोत हैं। आधुनिकता के अंधे इस तथ्य को जानने-समझने में असमर्थ ही हैं कि यह कृत्रिम हाईजीन / सफाई स्वच्छता अत्यंत घातक तथा प्रदूषण और जीव हत्या का स्रोत है। आधुनिकता में जिस व्यवस्था को हाईजीन कहा जाता है, वह वास्तव में व्यापकतम गंदगी / अवर्णनीय प्रदूषण और घिनौने जलवायु का स्रोत है। सभी प्रकार की बीमारियों की छूत एवं विस्तार का स्रोत आधुनिक हाईजीन में केन्द्रित है।

जीवन के लिए अत्यंत अल्प मात्रा में जल का मात्र सदुपयोग एवं जल प्रवाह से न्यूनतम छेड़छाड़ ही वैकल्पिक जल प्रबंधन की वैज्ञानिक विधि है। आधुनिक साइंस के सिद्धान्त भी जल विज्ञान के इस तात्विक दर्शन को नकार नहीं सकते। भारत देश के समस्त धर्म संप्रदायों का यही सार तत्त्व है। धर्म का विज्ञान वैसा निरर्थक है नहीं, जैसा हम मानने लगे हैं। हम केवल यह तथ्य भूल गए है कि आर्य देश की मूल धर्म परंपरा केवल करुणा के सिद्धांत का विस्तार है। आधुनिक जीवनशैली में सर्वाधिक जीव हिंसा का स्रोत भी जल के दुरुपयोग एवं कुप्रबंधन में निहित है।

आधुनिकता के चलते जल एवं वायु पर घोर हिंसात्मक प्रहार हो रहा है। नदियों को बांधने के कारण जल के विरुद्ध जो हिंसा होती है, उससे व्यापक स्तर पर जीव हत्या तो होती ही है, जल जीवों का जीवनक्रम पूर्णतया अवरुद्ध हो जाता है। समस्त जल जीव भी वायु-आकाश-जीवों की तरह घुमन्तू प्राणी हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक जल जीवन नियमित स्थानांतरण की प्रक्रिया पर आधारित है। सिंधु, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र के स्रोतों से लेकर समुद्र तक जो जल जीव होते हैं, उनमें से अनेक को प्रजनन के लिए हिमालय के अत्यंत ठंडे / बर्फीले क्षेत्रों तक लौटना होता है। आधुनिकता के प्रभाववश यह संपूर्ण प्रक्रिया आज नष्टप्राय है। बड़ी संख्या में नदियों और पुलों आदि के निर्माण से सृजन और प्रजनन की प्रक्रिया बाधित हुई है।

संक्षेप में, जल के विरुद्ध जो हिंसा होती है, उससे जल स्वयंमेव हिंसात्मक प्रवृत्ति अपना लेता है। ऐसे हिंसात्मक जल का हम भोजन / प्यास बुझाने के लिए उपयोग करते हैं तो हिंसात्मक प्रवृत्तियां प्रबल होने लगती हैं। वर्तमान जल व्यवस्था एवं प्रबंधन के चलते समस्त प्राणी जगत हिंसक बन रहा है। आधुनिक विज्ञान में जो सूक्ष्म तत्त्व मीमांसा विकसित हो रही है, वह भी इस तथ्य को स्वीकार करती है कि जल मात्र पदार्थ या संसाधन नहीं है। जीव उत्पत्ति का मूल कारक भी है।

इस तथ्य के दो प्रत्यक्ष प्रमाण हैं - पहला तो यह कि हिंसा से आहत जल की प्रवृत्ति भी हिंसात्मक बन जाती है और हिंसक जल का उपयोग करने से मनुष्य की प्रवृत्ति भी हिंसक बनती है। यह सिद्धांत सभी जीवात्माओं एवं उपभोग हेतु निर्मित / उत्पादित अथवा प्रकृति चक्र द्वारा उपलब्ध सामग्री पर भी लागू होता है। अहिंसा के शासन या समस्त सृष्टि में शांति स्थापना की परिकल्पना ही इसलिए की गई है कि यदि ब्रह्माण्ड और अन्तरिक्ष में शांति की स्थापना नहीं होगी तो मेरा मानना है कि अशांत आकाश गंगा से उपलब्ध होने वाला अंतरिक्ष जलम् (ओस) तक अशांत हो जाएगा। वैदिक आर्य परंपरा का शांति पाठ / ऋचा मनुष्य के भीतर अहिंसा की भावना / प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति और उद्घोष है। इसी तरह मेरा मानना है कि मोक्ष मार्ग तभी प्रशस्त होता है जब सर्वत्र अहिंसा की प्रेरणाम जागृत होती है।

दूसरा तथ्य अपेक्षाकृत सरल सिद्धांत है। मल और जल का अनावश्यक मिश्रण होता है तो अवांछित जीव उत्पत्ति शुरू हो जाती है। पृथ्वी पर जीवों की जनसंख्या का असीमित विस्तार, वास्तव में जल के साथ दुर्व्यवहार-दुरुपयोग का परिणाम है। सृष्टि विज्ञान के इन तथ्यों को केवल जानना-समझना ही आवश्यक नहीं है, इनका कड़ाई से पालन करना होगा, तभी मानव कल्याण का मोक्ष मार्ग प्रशस्त होगा। जल के दुरुपयोग, प्रदूषण, हिंसा पर ध्यान न देना भी हिंसा का प्रोत्साहन ही है। पुण्य आत्माओं का अनिवार्य कर्तव्य है कि वह इस संदर्भ में आवश्यक हस्तक्षेप कर जल के विरुद्ध हो रही हिंसा को बंद करवाने का प्रयास करें।

जल को अविरल बहने दो  

युगों पूर्व यह सत्य कहा गया था बहता पानी निर्मला, यानी पानी का परिशोधन - (आक्सीजनीकरण) जल और वायु के गतिशील घर्षण से होता है। इसी सरल अनुभव के आधार पर तीर्थ विद्या का यह विधान विकसित हुआ कि नदियों का वेगवती रूप अक्षुण्ण बनाए रखना अनिवार्य है। महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को उपदेश दिया है- हे राजन ! भूमि का जन्म नदियों की कोख से होता है, इनके समकक्ष कल्याणदायी दूसरा नहीं है। नदियों की समुचित रक्षा राजा का धर्म है। इनसे अधिक कल्याणकारी कोई नहीं है।

भारतीय मानसून में सूक्ष्मा-ति-सूक्ष्म स्थानीय पारिस्थितिकी (micro-eco-specificity) समग्र मानसून चक्र की सूत्रबद्ध कड़ी है। इसमें उपलब्ध आद्रता / शुष्कता (moisture regime) के यथोचित सदुपयोग का विधान है। उससे अन्यथा छेड़-छाड़ की अनुमति नहीं। पश्चिमी राजस्थान की कहावत है कि मारवाड़ में बारिश गउओं के भाग की होती है यानी कम वर्षा के क्षेत्र में कृषि का विस्तार करेंगे तो पर्यावरण की अपूरणीय हानि हो सकती है। किसी भी पर्यावरणीय क्षेत्र में अनियमित और अनावश्यक छेड़-छाड़ समस्त मानसून प्रणाली के चक्र को बाधित करती है।

प्रकृति ने कम-ज्यादा, ठंडा-गर्म, गीला सूखा आदि की जो व्यवस्थाएं कायम की हैं, इन्सान को उन सीमाओं में रह कर ही जीवन प्रणाली आयोजित करनी होगी। प्रकृति से यह मांग नहीं की जा सकती कि वह कन्याकुमारी में भी माऊंट एवरेस्ट की हवा चलाए या गोआ में कश्मीर का मौसम उपलब्ध करवाए। इसी तरह यह मांग भी अवैज्ञानिक है कि दिल्ली की प्यास बुझाने के लिए हिमालय का पानी उपलब्ध करवाया जाए। इसी श्रेणी में मरुधर में इंदिरा गांधी नहर का निर्माण भी पर्यावरण से छेड़-छाड़ करता दिखता है।

अंतरिक्ष में उत्पन्न जीवन तत्त्व सर्वत्र उपलब्ध है, ग्रहण करने के लिए उपयुक्त पात्र की समझ होनी आवश्यक है। उत्तम श्रेणी का गेहूँ तो ओस की सिंचाई पर ही निर्भर है। इसी कृषि शास्त्र का नाम हिंदू धर्म है। नदियां हिंदू धर्म की अंतरधाराएं हैं। अरण्य-आधारित ऋषिकृषि प्राचीन धार्मिक कर्मकांड है।

पानी की समस्या केवल जल संरक्षण की नहीं है, यह हिंदुस्तान के ड्रेनेज (जल निस्तारण) के समुचित उद्धार का भी विषय है। ड्रेनेज का सम्बंध सिर्फ नदियों के प्रवाह से नहीं है बल्कि भूजल के सही / उचित स्तर से भी है। भारत में भूजल प्रबंधन के लिए देश भर में लगभग 25 लाख तालाब, बावडियां, झील कुण्ड आदि की व्यवस्था थी। आज यह समस्त व्यवस्था नष्ट-भ्रष्ट है। अधिकांश तालाबों की जमीन पर आम जनता का कब्जा है। उनके घर हैं या कोई सड़क जैसा लोक उपक्रम निर्मित हो गया है। इनमें से कुछ कब्जे विशिष्ट जन के भी हैं। किसी को भी सहज भाव से बेघर करना आसान नहीं है।

आधुनिक साइन्स की आंतरिक नैतिकता पर चिंतन की शुरुआत अभी हुई नहीं है। क्या सचमुच हमें यह नहीं मालूम कि समूचे हिंदुस्तान में समान आर्द्रता (uniform moisture regime) की इच्छा का स्रोत कौन सी ज्ञान मीमांसा से उपजता है? ऐसी वैचारिक सादगी आधुनिक साईंस में ही संभव है। प्रकृति में विविधता और वैविध्य का विधान या नियम क्यों बना? इस सूत्र पर आधुनिक विमर्श अत्यंत अल्प और अपर्याप्त है।

इस नियमावली से परिचय सिर्फ हिंदू कर्म कांड के माध्यम से ही पाया जा सकता है। Diversity विविधता और Bio-diversity जैव विविधता पर चर्चा तो दस-बीस बरस से जरूर होने लगी है लेकिन आधुनिक साईंस परंपरागत वैविध्य विज्ञान की पर्याप्त समझ से सदियों दूर है। दरअसल सरल बात ही कठिन पहेली होती है।

स्रोत-अरुण कुमार 'पानीबाबा'

दक्षिण एशियाई हरित स्वराज संवाद
(साउथ एशियन डॉयलॉग्स ऑन इकोलोजिकल डेमोक्रेसी) सीमेनपू फाउंडेशन,

फिनलैंड का वित्तीय सहयोग एवं वसुधैव कुटुम्बकम् 

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