हिमालय : भारतीय उप महाद्वीप के जल चक्र का नियामक

हिमालय का संबंध केवल भारत से ही नहीं है। इससे निकलने और बहने वाली नदियां केवल भारतीय भूभाग में ही नहीं बहतीं बल्कि एशिया महाद्वीप के कई देशों में बहती हैं।भारतीय उपमहाद्वीप की अति विशिष्ट पारिस्थितिकी की कुंजी हिमालय का भूगोल है लेकिन पिछले दो सौ बरसों में हिमालय के बारे में हमारे अज्ञान का निरंतर विस्तार हुआ है। हिमालय जितना पराया फिरंगियों के लिए था, आज हमारे लिए उससे भी अधिक पराया हो गया है। जितना और जैसा सर्वनाश फिरंगियों ने दो सौ बरसों में नहीं किया, उससे कई गुना भयावह बिगाड़ हमने 60-70 बरसों में किया है। यहां अविरल, सलिल नदी-नाले, प्राकृतिक ऊर्जा, विविध आर्द्रता और अतुल जैव संपदा के स्रोत थे
और हैं।

चालीस-पचास बरस पहले मध्य हिमालय में लगातार दस-पन्द्रह दिन बर्फबारी होती थी, बीस-पच्चीस या उससे भी अधिक दिन शिमला, धर्मशाला, डलहौजी, मसूरी, नैनीताल, अल्मोड़ा,कौसानी, के पर्वत बर्फ से ढके रहते थे। अब इस मध्य हिमालयी श्रृंखला में भी कभी-कभार ही बर्फ गिरती है, शायद वह भी कुल दो-चार दिन। हमारे नेतृत्व से लेकर विद्वत जनों तक किसी को अनुमान ही नहीं है कि मध्य हिमालय में बर्फबारी क्यों बंद या इतनी कम क्यों हो गई और भौतिक संसाधनों की उपलब्धि में  क्या हानि-लाभ हुआ ?

हिमालय संबंधी कुछ मूल सूत्रों को ध्यान में रखें तो विषय को समझने में सुविधा होगी, जैसे-

  1.  भारत उपमहाद्वीप हिमालय का उपहार है। अगर हिमालय टुंड्रा- साइबेरिया से चलने वाली हवाओं को अवरुद्ध न करे तो यह भूखंड भी साइबेरिया का दक्षिणी विस्तार ही हो।
  2.  इस उप महाद्वीप की जल प्रणाली और मानसून स्वयं में एक सुसंगठित सशक्त प्राकृतिक प्रबंध है। तिब्बत के हिमनद और हिमालय के शिखर, बर्फ का अस्तित्व बनाए रखने के लिए निज ताप निर्मुक्त करते हैं और जो सूर्य की प्रतिबिंबित चमक और ताप होता है, उससे हिमालय शिखर क्षेत्र में एक व्यापक व्योम का निर्माण होता है। उस व्योम से प्रेरित वायुवेग हिंद महासागर से तिब्बत के हिमनदों की तरफ आकर्षित होता है, वही कालिदास का मेघदूत या जनभाषा का मानसून है।
  3. यह मानसून उत्तर में हिमालय शिखरों तक,पूर्व में म्यांमार तक फैली उपत्यकाओं तक, दक्षिण में हिंद महासागर स्थित श्रीलंका तक और पश्चिम में अरब सागर और बलूच पठार तक इस उपमहाद्वीप का सीमांकन करता है। साल भर में बरसने वाले पानी को संचालित करता है, जिससे पूरा उपमहाद्वीप भारत-वर्ष कहलाता है। 'वर्ष वर्षा' उस आकाश मार्ग से उपलब्ध जल को कहते हैं, जो एक साल (बरस) के लिए होता है।
  4.  इस जल प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण घटक-विशाल भूखंड, दक्षिण एशिया का संयुक्त, समुचित जल निर्गम भी है। इस अंचल के समस्त मैदान और पहाड़ों के ढलान की मिट्टी और आर्द्रता मानसून और जल निर्गम के अति विशिष्ट उपादान हैं।
  5. अगर इस उपमहाद्वीप को 78 डिग्री देशांतर रेखा से दो भागों में बांट दें तो कन्याकुमारी से श्रीनगर तक जो रेखा है, उसके पूर्वी अर्धांग में बरसात बंगाल की खाड़ी से आती है और लगभग 75 प्रतिशत होती है। पश्चिमी अर्धांग की बारिश अरब सागर से आती है और 25 प्रतिशत होती है। जिस दिशा से जितना पानी आता है, उस दिशा को उतना ही वापस लौटता है।
  6. हिंद महासागर में सुदूर दक्षिण से जो मानसून ठेठ उत्तर की दिशा में चलता है, वह भूखंड पहुंचते-पहुंचते पृथ्वी की दैनंदिनी प्रक्रिया की गति के कारण बड़ी मात्रा में पूर्वी पृथ्वी की तरफ मुड़ जाता है। बंगाल की खाड़ी से जल उठाता है, म्यांमार की अराकान पर्वत श्रृंखला से टकरा कर बरसता है और बंगाल-असम के हिमालय और गंगा के मैदान, ओडीशा से मध्य प्रदेश की तरफ मुड़ जाता है। मानसून का यह बंगाल की खाड़ी वाला अंग हमारे देश में प्रमुख वर्षा करता है।
  7. पूर्वमुखी मानसून का एक बड़ा भाग चीन, दक्षिण पूर्वी एशिया, हिंद एशिया, मलेशिया के रास्ते जापान और आस्ट्रेलिया की तरफ चला जाता है। यह पूरे इलाके में जलवायु का प्रमुख कारक है।
  8. इसी तरह पूर्व से उत्तर पश्चिम की तरफ बहने वाले मानसून का एक भाग हिमालय और एक भाग हिंदूकुश उल्लांघ कर मध्य एशिया-अराल समुद्र की तरफ बढ़ता है और एक ठेठ पश्चिमी वेग मिस्र मेसोपोटामिया की तरफ चला जाता है। जो शाखा वाया अरब सागर ठेठ दक्षिण से उत्तर-पश्चिम की तरफ बहती है, वह इसी मुख्य धारा में जुड़ जाती है।
  9. वर्षा की मात्रा में विविधता और अन्य अनेक विविधताएं इस उपमहाद्वीप में 50 विविध पारिस्थितिकीय अंचलों का निर्माण करती हैं, जो शेष विश्व में पाई जाने वाली भौगोलिक विविधता से कुछ ज्यादा हैं।
  10. म्यांमार से ढाका होकर कन्याकुमारी तक और वहां से कराची तक लगभग सात हजार मील लंबे तट पर हजारों डेल्टा (मुहाने) और छोटे-बड़े पश्चजल क्षेत्र (बैक वाटर) स्थित हैं। दक्षिण एशिया तटीय भूभाग का जैव वैविध्य विश्व के अन्य किसी भी तट से कई गुना अधिक है। इस तटीय संपदा का मूल कारक वह शुद्ध-मीठे जल की अंतरधारा है, जो विशाल नदियों द्वारा लाए गए जल, गाद आदि से निर्मित होती है और समूचे उपमहाद्वीप के तट को एक सूत्र में बांधती है।

ऐसी तमाम विशेषताओं, भौतिक यथार्थ और इनकी जटिल प्रणालियों को सांस्कृतिक मूल्यों में संश्लिष्ट किया गया था। 'लौकिकवादी पुनरुत्थान' के सिलसिले में सांस्कृतिक मानस छिन्न-भिन्न हो गया। भौतिकवादी दृष्टि ने प्रकृति को छिन्न-भिन्न कर दिया है। समग्रता में सोचना ही छोड़ दिया गया है लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप की मानसून और जल निर्गम प्रणाली में चीन सहित समस्त यूरेशिया (जंबू द्वीप) का हित निहित है। सब कुछ नष्ट होने से पहले एशियाई देशों को मूल मानसून या एशियाई मानसून की सुरक्षा के लिए विकास की नई तरतीब तजवीजनी होगी।

सिंधु-गंगा का मैदान हिमालय के जल-निर्गम (ड्रेनेज) से बना है। प्राकृतिक आर्द्रता की विविधता एक अत्यंत संश्लिष्ट प्रणाली है। भारतीय उपमहाद्वीप का समग्र भू-परिदृश्य एक बहुरंगी बनावट है, जो अपने आप में एक सुनियोजित व्यवस्था है। इस बनावट में आमूलचूल परिवर्तन के गंभीर नतीजे हो सकते हैं लेकिन आज तो 'नेतृत्व' और 'विद्वत वर्ग' आर्द्र पूर्वार्ध से शुष्क पश्चिमी अर्धांग को जल प्लावित कर परमात्मा की तरह सर्वशक्तिमान बनने को आतुर है। पिछले पौने दो सौ बरसों में जितनी सफलता मिली है, उसके इतिहास और नतीजों का गंभीर परीक्षण होना चाहिए वरना साम्राज्यवादी शोषण और षड्यंत्र की समझ अधूरी ही रह जाएगी।

अंग्रेजों के भारत आगमन तक हमारी अतिविशिष्ट जल-चेतना अक्षुण्ण थी। न तो हिमालय की पवित्रता पर कोई हमला हुआ था और न ही जल निर्गम प्रणाली में कोई व्यवधान डालने का प्रयास किया गया था। फिरोज तुगलक के समय में पंजाब में जो नहर निर्माण कर सिंचाई का प्रयोग किया गया वह सौ बरसों में ही दफन किया गया। मुगल बादशाह ने दिल्ली क्षेत्र में शाहजहानाबाद बसाया तो सैकड़ों वर्ग मील भूभाग में फलों के बागों की रक्षा के लिए और लाल किले की खाई में पानी भरने के लिए यमुना से निकले एक रजवाहे का नहर की तरह उपयोग किया।

इस नहर से कृषि सिंचाई की इजाजत नहीं थी और दिल्ली तक जितना पानी उपयोग में लिया जाता था उससे अधिक जल दिल्ली की अरावली पहाड़ियों के आगोर से यमुना नदी में व्यवस्थित रूप से लौटने दिया जाता था। उस युग के अति साधारण भारतीय तक को यह समझ थी कि समस्त नदियों के जल पर पहला अधिकार समुद्र और बाढ़ क्षेत्र का है और जो अंतिम जीवात्मा उस जल पर निर्भर है उसके मूल अधिकार की रक्षा के लिए समस्त जल की निर्बाध अविरलता अनिवार्य है। निरंतर बहना जल की प्रकृति है, इसलिए अविरल जल ही निर्मल है। 'बहता पानी निर्मला' शाश्वत सिद्धांत है।

पूरे देश में तालाबों की व्यवस्था मूलतः जल निर्गम की निरंतरता, और सर्दी के मौसम से लेकर गर्मियों तक सूखी हवाओं को आर्द्रता देने के लिए थी। बरसात का कुल पानी तुरंत न बह जाए इसलिए प्रकृति द्वारा निर्मित गड्ढों में उसे रोक लेते थे ताकि सतही आर्द्रता से लेकर पाताल तक जल निर्गम सदैव सक्रिय बना रहे। व्यापक ताल-तालाब व्यवस्था का एक लाभ यह भी था कि मानसून के आगमन से पहले और प्रस्थान के बाद भी स्थानीय स्तर पर नियमित बरसात हो जाया करती थी। सिंधु-गंगा के मैदान का हर गांव लंका की तरह बसा था। सर्दियों की नियमितता और मध्य हिमालय की बर्फबारी इसी मानव निर्मित तरावट पर आधारित थी।

उन्नीसवीं सदी के तीसरे चौथे दशक से फिरंगी शासकों ने नदियों से छेड़छाड़ शुरू की ताकि किसानों से नहर सिंचाई के नाम पर वसूली की जाए।1830 में पहली नहर यमुना-गंगा दोआब के क्षेत्र में निकाली गई। वहां के किसानों ने 1857 के विप्लव में सक्रिय हिस्सेदारी की।वह कहानी इस लेख में नहीं सुनाई जा सकती।नहर की जरूरत किसानों को नहीं थी बल्कि उसकी जरूरत पानी का टैक्स वसूलने के लिए कंपनी सरकार को थी। भारत के हिस्टोरियन्स जब कभी इतिहास की विधा सीख कर 1857 के गदर की कहानी सुनाएंगे तब ही यह वास्तविकता स्पष्ट हो सकेगी।पठानकोट से चटगांव तक की तराई कट चुकी है। गंगा नदी की हत्या हो चुकी है। यमुना तो कालपी पहुंचने के पहले ही नष्ट हो जाती है। दिल्ली में यमुना के नाम का जो गंदा नाला बहता है उसे देखने में भी घिन लगती है। जहां दृष्टि डालो हिमालय का सर्वनाश ही दिखाई पड़ता है।

ब्रह्मपुत्र-मेघना-गंगा के जल की अंतर-घाटी हस्तांतरण योजना भारत ने 1970 में ही बनानी शुरू कर दी थी। किन्हीं कारणों से योजना शुरू नहीं की जा सकी। लेकिन चीन ने ब्रह्मपुत्र को मोड़ने की योजना क्रियान्वित कर ली तो एतराज की क्या बात है? आप भागीरथी को बांध चुके हैं तो चीन ब्रह्मपुत्र को क्यों नहीं मोड़ सकता? जब तिब्बत मुक्ति आंदोलन के लिए न संकल्प है न सामर्थ्य, फिर ब्रह्मपुत्र पर चीन के अधिकार को चुनौती कैसे दी जा सकती है ?

इस तथ्य में कहीं धोखा नहीं होना चाहिए कि हिमालय के लिए लड़ाई दो अधकचरी आधुनिकताओं के बीच होनी है तो चीन के मुकाबले में हमारी हार सुनिश्चित है। चीन को अमेरिका का कोई खौफ नहीं है। यू भी अमेरिका खनिज तेल की जो लड़ाई अरब क्षेत्र में लड़ रहा है, उसके चलते वह चीन से बिल्कुल नहीं उलझेगा। आज परिस्थितियां 1962 से बिल्कुल विपरीत हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था को चीनियों का सहारा है। इसलिए इस बात की अधिक संभावना है कि अमेरिका अनेक मजबूरियों के कारण संकट के दौरान चीन के समर्थन में खड़ा दिखाई पड़े। रूस से किसी भी तरह के सहयोग की उम्मीद ही गलत होगी; बाकी है कौन, जो हमारा सहयोग करेगा?

बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि आज देश में एक भी नेता दिखाई नहीं पड़ता, जिसे अनुमान हो कि उत्तरी सीमा पर चीन ने भारतीय उपमहाद्वीप की कितनी जमीन पर कब्जा कर रखा है। पाकिस्तान ने अपने सीमांचल में उसे कितना अधिकार दे रखा है? या म्यांमार में चीनियों ने किस किस्म की घुसपैठ बना ली है। किसी नेता को यह अनुमान भी शायद ही हो कि हिमालय में कुल सीमा कितनी है और वहां कुल मिलाकर कितने मोर्चे खोलने पड़ेंगे।

सामरिक रणनीति पर विचार से ज्यादा महत्त्व हिमालय क्षेत्र में नए विकास का है, उपमहाद्वीप की परिस्थितिकी के आधार पर विश्व स्तर पर एक भारत केन्द्रित पर्यावरण आंदोलन शुरू करने का है। लिहाजा पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, अफगानिस्तान की सक्रिय भागीदारी और सहकार जुटा कर उपमहाद्वीप की भौगोलिक एकता पर शोध और संवाद आयोजित किए जाएं। ऐसे उपमहाद्वीपीय आधार पर चीन के साथ हिमालय-हिमनदों के हालात पर चर्चा संवाद की शुरुआत होनी चाहिए।

एशिया ही नहीं, पूरे विश्व को इस बात से सरोकार होना चाहिए कि हिमालय में जो बर्फबारी होती है, उसकी प्रक्रिया क्या है? मध्य हिमालय में बर्फबारी लगातार घट रही है, हिमनद पिघल रहे हैं। इन विषयों में क्या परस्परता है? हाल-फिलहाल कोई अनुमान उपलब्ध नहीं है कि हिमालय में कुल कितनी बर्फबारी होती है। उसके लिए आवश्यक आर्द्रता या तरावट का स्रोत कहां है? हिंद महासागर में या चीन सागर में। आधुनिक विज्ञान के जरिए यह जानने का प्रयास तो होना ही चाहिए कि सिंधु-गंगा के मैदान की आर्द्रता और तराई की तरावट से हिमालय के पर्यावरण का रिश्ता क्या है ?

आज जो मौसम-विज्ञान, वायुमंडल और आकाश की समझ उपलब्ध है, उसके आधार पर यह विमर्श अवश्य बनाया जा सकता है कि 'भारतीय मानसून' का वैश्विक पर्यावरण पर क्या प्रभाव होता है। यह तो सहज स्पष्ट है कि हिमालय के दक्षिणी पनढाल का जो महत्त्व भारतीय उपमहाद्वीप के लिए है लगभग वैसा ही महत्त्व उत्तरी पनढाल का चीन के लिए है। समग्र दृष्टि से देखें तो हिमालय चीन और भारत की साझा विरासत है। इसकी साझा संभाल में दोनों की बराबर की भागीदारी और सहयोग अनिवार्य है।

भारत के प्रबुद्ध समाज को अपने राजनीतिक नेतृत्व और स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ) से यह उम्मीद बिल्कुल छोड़ देनी चाहिए कि वे हिमालय की रक्षा के लिए कोई नई पहल करेंगे। पहेली बूझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त है। भारतीय जनता पार्टी अपने को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पार्टी मानती है। कैलाश मानसरोवर के लिए सरोकार की बात तो छोड़ दीजिए, गंगा घाटी में सोलह सौ बांध बनाने की योजना भाजपा सरकार द्वारा चलाई जा रही है। स्वामी निगमानंद और बाबा नागनाथ के आत्मबलिदान के बाद भी इस विषय पर कहीं कोई आलोचना नहीं है कि गंगा पूरी तरह विलुप्त हो गई तो क्या होगा? 2013 और 2015 के मानसून में उत्तराखंड और हिमाचल की जो तबाही हुई, क्या उससे कोई सबक लेंगें?

हमें देश को आगाह करना होगा कि जल-मल शोधन संयंत्र की योजना से गंगा की अविरलता नहीं लौट सकती। इन सभी योजनाओं का स्रोत विश्व बैंक द्वारा प्रस्तावित है, जो सिर्फ 25-50 हजार करोड़ रुपए के संयंत्र बिकवाने में रुचि रखता है, गंगा को शुद्ध करने में नहीं। हिमालय चेतना आंदोलन का प्रयास तो समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया की तरह प्रबुद्ध जनों को निजी जोखिम पर शुरू करना होगा। लोहिया ने पचास बरस पहले जो कुछ कहा, लिखा, उसका संदर्भ और परिप्रेक्ष्य किसी हद तक बदल चुका है किन्तु 'हिमालय बचाओ' का नारा आज भी विश्व पर्यावरण का एक प्राथमिक मुद्दा है।

पानी पर पहला अधिकार समुद्र का

भारत भूमि और उसकी परिस्थितिकी निर्माण के दो मूल कारक हैं। पहला हिमालय और दूसरा हिन्द महासागर। आधुनिक जियोपालिटिकल भू-राजनैतिक मुहावरे में दक्षिण एशिया कहा जाने वाला यह भू भाग पूरी दुनिया का सर्वाधिक अन्न उत्पादक क्षेत्र या धान का कटोरा है। इस क्षेत्र में प्राकृतिक क्षमता के अनुरूप योगदान होने लगे तो यह अकेला दक्षिण एशिया दुनिया की भूख का निराकरण कर सकता है। विभिन्न शाखाओं के वैज्ञानिक एकमत हैं कि भारत देश की अन्न उत्पादन क्षमता 300 करोड़ टन से ज्यादा है। यह कोई गोपनीय तथ्य नहीं है। इस तथ्य का सीधा रिश्ता हिमालय के दक्षिणी पनढाल और हिन्द महासागर से है यानी एशियाई मानसून पारिस्थितिकी या जलवायु से है।

अप्रैल से सितम्बर तक जो समुद्री हवाएं महासागर से उठकर हिमालय की तरफ चलती हैं उन्हीं का नाम मानसून है। यही मानसून हिन्दुस्तान की भूमि पर हर साल विशालतम महानदियों के अतिरिक्त डेढ़ दर्जन सदा सुहागन महानदियों तथा चप्पे-चप्पे को सर्वदा जल प्लावित बनाएं रखता है। यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अरावली से
निकल कर मरुस्थल में बहने वाली लूनी भी ऐसी ही नदी है, जिसने कच्छ के डेल्टा का निर्माण किया है। यह बात अलग है कि हम पिछले दो सौ बरस से लगातार भारत की उत्पादकता का विनाश कर रहे हैं। और इस प्रक्रिया में हम लूनी और साबरमती जैसी कई नदियों की पारिस्थितिकी को नष्ट कर उनकी हत्या कर चुके हैं। यह सारा विनाश हमने साईंस से प्रेरित होकर मानवता आदि के नाम पर किया है। उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में हिन्दुस्तानी सांस्कृतिक चेतना का जो ह्रास हुआ, उसका हमें ठीक-ठीक अन्दाज नहीं है। इसमें पानी की चेतना का ह्रास तो विशेष चिन्ता का विषय है।

हिन्दुस्तान सदा-सर्वदा से नदी-नालों का देश है। उत्तर में सिन्धु तथा ब्रह्मपुत्र से लेकर कन्याकुमारी तक उन्नीस महानदी क्षेत्रों में हजारों नदियां साल भर जल प्लावित रहती हैं। हिमालय के दक्षिण क्षेत्र में समस्त मानव जाति के लिए 'सिन्धु' अथवा 'हिन्दु' संज्ञा का प्रयोग प्राचीन काल से प्रचलित है। सिन्धु जल का पर्याय है, इसलिए सिन्धु से परिवर्तित हिन्दू भी जल-प्लावित व्यक्ति और देश का पर्याय है।

आधुनिक साइन्स के विपरीत शाश्वत जल विज्ञान की मान्यता है कि जल का संरक्षण ठीक उसी स्थान पर होना चाहिए जहां जल की बूंद बरसती है। जब पृथ्वी पर गिरी बूंद अपने स्थान से आगे बढ़ जाती है, तब उसके संरक्षण का प्रयास अनर्थकारी नहीं तो भी अवैज्ञानिक तो है ही। बूंद गिर कर बह जाएगी तो सतह पर अपेक्षित सजलता नहीं बनेगी क्योंकि पानी तो अपने दबाव से ही धरती के भीतर प्रवेश करता है। इसलिए अनिवार्य है कि पानी जहां गिरे, वहीं थमे और उस बिन्दु पर पर्याप्त सजलता निर्मित हो जाये यानी पानी को धरती के भीतर जाने का यथोचित मार्ग और दबाव मिल जाय, ताकि अतिरिक्त पानी आगे जा सके। यदि जल आकाश से गिरते ही आगे बढ़ गया तो न धरती सजल बनेगी और न ही मिट्टी अपने स्थान पर रुकेगी। सतही सजलता का शीघ्र वाष्पीकरण होता है। धरती काफी गहराई तक सजल होगी तो शीघ्र वाष्पीकरण की बजाय हरियाली (बायोमास) उत्पादन की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। जमीन की सतह पर जैव सामग्री होगी तो मिट्टी का संरक्षण होगा। पर्याप्त मिट्टी और हरियाली होगी तो जल का स्वतः संरक्षण होगा। पानी नदी, नालों, झरनों, झील, तालाबों में स्वतः रिस-रिस कर आवश्यकता के अनुरूप पहुंचेगा और ऊपरी सतह के नीचे अनेक स्तरों पर ड्रेनेज (पानी का निकास-बहाव) बना रहेगा। धरती को क्षारीकरण से बचाने के लिए धरती की सतह और उसके बहुत नीचे तक नियमित ड्रेनेज अनिवार्य है।

हिन्दुस्तान में पानी सिर्फ 60 से 100 दिन बरसता है, किन्तु ड्रेनेज तो साल भर बना रहना चाहिए। यह तभी संभव है जब धरती के भीतर पर्याप्त पानी होगा। इसी तथ्य का दूसरा पक्ष है कि धरती भीतर से सजल होगी तो खाद्यान्न उत्पादकता के लिए ऊपर की मामूली सिंचाई पर्याप्त होगी। इसका अर्थ यह हुआ कि जल विज्ञान के अनुसार जल का लगातार बहते रहना अनिवार्य तत्त्व है, न कि बांध बना कर उसमें गतिरोध पैदा करना। 'बाढ़ नियंत्रण' एवं बांध बनाकर 'जल संरक्षण' की आधुनिक अवधारणा प्राकृतिक विज्ञान पर आधारित नहीं है क्योंकि सहज पारंपरिक जल विज्ञान का दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त समस्त डेल्टा क्षेत्र की नियमित एवं निरन्तर धुलाई (फ्लशिंग) है। डेल्टा की उत्पादकता ऐसी धुलाई पर निर्भर है। यदि नदी मुख (डेल्टा) समुचित रूप से धुलेंगे नहीं तो समुद्रीय क्षार तट के कण-कण को क्षारीय / लवणीय बनाता है।   समूची भारत भूमि को लील सकता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय धरती का बड़ा भाग नदियों द्वारा बिछायी गयी मिट्टी से बना है, न कि यूरोप की तरह चट्टानों से। भारत की बड़ी विशेषता है कि यहां की उत्पादकता केवल मध्य देश आधारित नहीं बल्कि डेल्टा आधारित है। पूर्व में गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा से लेकर दक्षिण में पेन्नार के डेल्टा तक अत्यन्त उपजाऊ असंख्य तटीय डेल्टा क्षेत्र स्थित हैं। हमारे पूर्वी तट को तो पूरी तरह नदियों ने समुद्र से निकाल कर बनाया है। पश्चिमी तट में भी छोटे-बड़े डेल्टा क्षेत्र हैं। भारत की सर्वोत्तम उपजाऊ भूमि डेल्टा क्षेत्रों की है। यहां वनस्पतियों की बहुतायत है। बरसाती मौसम से ले कर ठेठ गर्मी के मौसम तक इन डेल्टा क्षेत्रों की धुलाई होते रहना जरूरी है, जो नदी की अविरल धारा से ही संभव है। यदि ऐसा न किया गया तो साबरमती और लूनी जैसी नदियों के विनाश के समान परिणाम हमारे सामने होंगे।

अब साईंस लगातार नारा लगा रही है कि देश का बहुमूल्य पानी समुद्र में व्यर्थ बह कर जा रहा है। देश के 'महानतम' साइंटिस्ट पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की भी राय है कि बड़े-बड़े बांधों जलाशयों में पानी रोक कर भारत की समस्त नदियों को नहरों से जोड़ दिया जाये और पानी की एक बूंद भी समुद्र में व्यर्थ न बहने दी जाए। समुद्र को तो तरह-तरह से अत्याचार सहने की आदत है। वह शायद इस अत्याचार को भी सह लेगा लेकिन भारत का आम आदमी एक-एक बूंद के लिए तरस जाएगा।

समुद्र में जाने वाली नदियों के पानी को व्यर्थ बताने का यह तर्क बार-बार दिया जाता है। बांध बनाकर नदी के पानी को समुद्र में जाने से रोकने की यह तर्क प्रणाली विध्वंसकारी है। इसलिए अपने-अपने राज्यों में बह रही नदियों के पानी पर एकछत्र अधिकार का दावा करने वाले मुख्यमंत्रियों और देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को सबसे पहले यह जानना होगा कि नदियों के पानी के असली स्वामी वे नहीं 'समुद्र' है। कोई भी साइन्स या विज्ञान नदी जल को समुद्र में जाने से नहीं रोक सकता। इसलिए सबसे पहले हमें अपने संविधान में लिखना होगा कि पानी पर पहला हक समुद्र का है। इस बुनियादी सिद्धान्त को मानकर ही नदी जल बंटवारे के नियम-कानून बनाने होंगे।

लोक विज्ञान का मुहावरा है- 'बहता पानी निर्मला'। इस मुहावरे का दार्शनिक तत्त्व यही है कि पानी की निर्मलता उसकी गत्यात्मकता में निहित है। पानी की उपलब्धि चक्रीय प्रणाली के तहत है जिसमें अनेक वैज्ञानिक कारणों से जो पानी भाप बन कर समुद्र से चला है और बारिश बन कर धरती पर बरसा है, उसका समुद्र में वापस लौटना अनिवार्य है। मनुष्य जब इस प्रक्रिया में अवरोध स्थापित करेगा तो पानी की प्रवृत्ति में आमूलचूल परिवर्तन हो जायेगा। कावेरी के अवरुद्ध प्रवाह के कारण व्यापक हिंसा का वातावरण बन जाये तो इसमें आश्चर्य नहीं। पानी के नियमित प्रवाह को अवरुद्ध करना प्रकृति के विरुद्ध गंभीर हिंसा है। प्राकृतिक विधान के अनुसार नदियों में उपलब्ध समस्त जल पर प्रथम और अन्तिम अधिकार समुद्र का है। इस सिद्धान्त का उल्लंघन मानव के आत्मघाती चरित्र का लक्षण है। अपनी लड़ाई को विस्तार देने से पहले तमिल और कन्नड़ नेताओं को इस तथ्य पर एक-एक गिलास शीतल बोतलबंद पानी पीकर ठंडे दिमाग से अवश्य गौर कर लेना चाहिए।

आज लाखों करोड़ रुपये की बांध एवं जल विद्युत योजनाएं प्रगति पर हैं या प्रस्तावित हैं। इनमें से एक भी समुचित वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है। पानी को हरियाली द्वारा रोके जाने के अतिरिक्त सिर्फ प्रकृति द्वारा निर्मित भराव क्षेत्रों में ही रोका जाना चाहिए और उसे अपने द्वारा निर्धारित प्राकृतिक मार्गों पर ही बहने देना चाहिए। दामोदर नदी घाटी जल विद्युत योजना का इतिहास प्रमाण है कि पानी किसी की धींगामस्ती बर्दाश्त नहीं करता। साइन्स को साइन्स का इतिहास जरूर पढ़ना चाहिए। साइन्स और समाज का जो संबंध विकसित हुआ है, उसे भी जानना-समझना आवश्यक है। पानी को अप्राकृतिक ढंग से बांधने पर ही पानी का सम्पत्तिकरण शुरू होता है।

धरती का आवरण जल नहीं, हरियाली है। पानी का स्थायी स्रोत भी हरियाली है। जहां पर्याप्त हरियाली है वहां प्रकृति आवश्यकता का पानी जुटा देगी। हरियाली नष्ट करके पानी एकत्रित करना केवल खतरनाक खिलवाड़ ही नहीं अवैज्ञानिक भी है। जल से ऊर्जा / विद्युत का उत्पादन भी बहते पानी से होना चाहिए; वनस्पति, वन्य जीव, प्राणियों को उजाड़ कर नहीं। बरसात का चरित्र पूर्णरूपेण हरियाली के चरित्र पर निर्भर करता है। जहां हरियाली है वहां किसी असंतुलन के कारण यदि बादल फट भी जाये  तो वहां की धरती अतिवर्षा सहन कर लेती है, किन्तु जहां हरियाली नहीं है वहां तो साधारण से थोड़ी ज्यादा बारिश भी व्यापक विनाश का कारण बन जाती है और नन्हीं बूंदें भाप बन कर तुरत-फुरत उड़ जाती हैं, यानी बरसात निरर्थक है।

हिन्दुस्तान में जिस विचार और आचरण को धर्म कहा जाता है, उसमें जल शास्त्र, शुचिता और कर्मकांड आदि का प्राथमिक महत्त्व है। इस देश की धरती पर पानी सिर्फ तीन-चार महीने बरसता है लेकिन धरती की धुलाई तो निरन्तर चाहिए। इसी प्रकार हमारे समाज ने इस विज्ञान को अनादि काल से आत्मसात किया था कि धरती भीतर से सजल हो तो सतह पर मामूली छिड़काव भी पर्याप्त सिंचाई है।

हिन्दू जाति ने इसी ज्ञान को तीर्थ परम्परा में अभिव्यक्त किया है। तीर्थ सिद्धान्त में महत्त्व जल की अनवरत अविरलता का है न कि बांध बना कर उसमें गतिरोध पैदा करने का। जल संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण का आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी वैज्ञानिक विमर्श पर आधारित नहीं है। उत्तरी बिहार, आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र और दिल्ली से आगरा व इटावा तक की गन्दे नाले से भी गन्दी यमुना की समस्याएं इस बात के प्रमाण हैं। पिछले 50  सालों में बाढ़ पीड़ित क्षेत्र ढाई करोड़ हेक्टेयर से पांच करोड़ हेक्टेयर हो गया है। इस दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल तक कितना सर्वनाश हुआ है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

जीवन के लिए जल का अविरल बहना भी उतना ही जरूरी है जितना कि जल का संरक्षण। जल के समुचित संरक्षण और पर्याप्त व अविरल बहाव में सन्तुलन स्थापित करने के विज्ञान को ही तीर्थ विज्ञान कहते हैं। यह भारतीय जीवन दर्शन का तत्त्वबोध है। जल संरक्षण का कार्यक्रम न्यूनतम स्तर का हो या नर्मदा और टिहरी जैसी नदियों पर बड़े बांधों के स्तर का हो, उसमें जल दर्शन के दोनों सिद्धान्तों का पालन अनिवार्य है। इस सन्दर्भ में आज जिस प्रकार तदर्थवादी और अवैज्ञानिक तरीके के जल भरण क्षेत्र के विकास के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं वे बहुत खतरनाक हैं। इस आत्मघाती मानस के नतीजे निकट भविष्य में कितने घातक हो सकते हैं, इसका अनुमान पानी-जन्य महामारियों के व्यापक विस्तार से लगाया जा सकता है।

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Post By: Shivendra
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