हिमालय का भूगोल बदल देगा नया वन कानून

हिमालय का भूगोल बदल देगा नया वन कानून
हिमालय का भूगोल बदल देगा नया वन कानून

संसद के मानसून सत्र में नया वन (संरक्षण) कानून संसद यानी वन (संरक्षण एवं संवर्द्धन) विधेयक पारित हो गया। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के बदले आने वाले इस कानून की विशेषता है कि इसमें अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से 100 किमी. दूर स्थित 'राष्ट्रीय महत्त्व की रणनीतिक परियोजनाओं' या सुरक्षा और रक्षा परियोजनाओं के लिए उपयोग की जाने वाली 5-10 हेक्टेयर तक की वन भूमि में पेड़ काटना या वन भूमि का भूमि उपयोग परिवर्तन बहुत आसान हो जाएगा। जाहिर है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा से 100 किमी. की हवाई दूरी के इस दायरे में चीन की सीमा से सटे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश का बहुत बड़ा इलाका ही नहीं, बल्कि तीन चौथाई हिस्सा आ जाएगा। उत्तराखंड की बात करें तो चीन सीमा के करीब बदरीनाथ से देहरादून के बीच की हवाई दूरी महज 150
किमी. के आसपास है।

इस तरह देखें तो नये कानून से उत्तराखंड के उस बहुत बड़े पहाड़ी इलाके को वन कानून से छूट मिल जाएगी जहां प्रदेश के अधिकांश वन हैं। फिर रक्षा या रणनीतिक प्रोजेक्टों के नाम पर क्या होगा ? सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। यह सब तब हो रहा है जब देश भर में पुराना ज्यादा सख्त वन कानून लागू होने के बावजूद वन भूमि के दूसरे कामों के लिए हस्तांतरण में कमी नहीं आई है। सभी जानते हैं कि 1951-75 के बीच लगभग 40 लाख हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न गैर- वानिकी उद्देश्यों के लिए हस्तांतरित की गई थी। चिपको और दूसरे पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों के बाद जब 1980 में सख्त वन कानून लाया गया तो 1980-2023 के बीच वन कानून की सख्ती से वन भूमि हस्तांतरण में काफी कमी आई और दस लाख हेक्टेयर वन भूमि का ही उपयोग हो सका।

'नये वन कानून के प्रावधानों पर पर्यावरणविद् को आशंका है कि यह 'वन' की परिभाषा और सुप्रीम कोर्ट के 1996 के गौडावर्मन फैसले को पलट देगा। इस फैसले ने बहुत हद तक वन संरक्षण को बढ़ावा दिया था क्योंकि इसके तहत पेड़ों वाले उन इलाकों को भी वन कानून के दायरे में ला दिया गया था जो औपचारिक रूप से 'वन' के रूप में अधिसूचित नहीं थे, लेकिन जंगल माने जा सकते थे'

भारतीय वन सर्वेक्षण की 2021 की इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट में देश में पहली बार क्लाइमेट हॉट स्पॉट चिह्नित किए गए थे। क्लाइमेट हॉट स्पॉट उन क्षेत्रों को कहा जाता है, जहां तापमान और बारिश में बहुत ज्यादा अंतर देखा जाता है। रिपोर्ट में अधिकांश हॉट स्पॉट हिमालयी राज्यों जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में चिह्नित किए गए। ये वही राज्य हैं जो चीन, पाकिस्तान और नेपाल से सटे हैं। इतना ही नहीं, आशंका यह भी है कि अब नया वन संरक्षण कानून, सालों के उस संघर्ष और उससे मिले वनाधिकार कानून को कमजोर कर वन समुदायों के वनाधिकारों को एक झटके में खत्म कर देगा। इससे देश में पहले से चल रहे वनों में रह रहे वन समुदायों और आदिवासियों की जंगलों से बेदखली, विस्थापन और बचे-खुचे प्राकृतिक जंगलों के खत्म होने की गति तीव्र हो जाएगी। 

बाढ़, भूस्खलन जैसी आपदाएं बढ़ेंगी

इसी साल 'नेचर' पत्रिका में प्रकाशित लॉरेंस बर्कले नेशनल लेबोरेटरी, बर्कले और मिशिगन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लोबल वार्मिंग जारी रही तो पर्वतीय इलाकों में बर्फबारी की बजाय बारिश हो सकती है, जिससे वर्षा की चरम सीमा कुछ घंटों से लेकर एक दिन तक बढ़ सकती है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर हिमालय और उत्तरी गोलार्ध के अन्य पहाड़ों में 15 फीसद अधिक बारिश होने के आसार हैं। बर्फबारी की बजाय बारिश होने के इस बदलाव के कारण बाढ़, भूस्खलन और मिट्टी के कटाव जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड में समय से पहले बुरांस का खिलना, ग्लेशियरों का सिकुड़ना, वृक्ष रेखा का ऊपर खिसकना, बेमौसम बारिश, सूखा और बाढ़ वगैरह जलवायु परिवर्तन के संकेत हैं। दिलचस्प बात यह है कि उत्तराखंड के सबसे ज्यादा वनावरण वाले जिलों में अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे पहाड़ी जिले उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ शामिल हैं, और उत्तराखंड सरकार की मानव विकास रिपोर्ट-2019 के मुताबिक सबसे ज्यादा चमोली जिले के 64.7 फीसद लोगों ने जलवायु परिवर्तन महसूस किया है।

 उत्तरकाशी के 62.7 फीसद लोगों ने जलवायु परिवर्तन का अनुभव किया है। हैरत की बात है कि पौड़ी और टिहरी ऐसे पहाड़ी जिले हैं, जहां सबसे कम क्रमशः 12.9 और 19.2 फीसद लोगों ने जलवायु परिवर्तन का अनुभव किया। अल्मोड़ा में 28.4 फीसद ने माना कि उन्होंने जलवायु परिवर्तन महसूस किया है। मैदानी जिलों हरिद्वार के 43.1 फीसद तो ऊधमसिंह नगर के 37.9 फीसद लोगों ने यह बदलाव महसूस किया है। हैरत की बात है कि मैदानी और पहाड़ी, दोनों भूगोल वाले जिलों देहरादून और नैनीताल में जलवायु परिवर्तन महसूस करने वालों की तादाद में भारी अंतर है। देहरादून में 29.7 तो नैनीताल के 59.7 फीसद लोगों ने जलवायु परिवर्तन महसूस किया है।

जलवायु परिवर्तन की वजह वन कटान 

उत्तराखंड सरकार की मानव विकास रिपोर्ट-2019 में पेश - सर्वेक्षण के मुताबिक उत्तराखंड में 38.9 फीसद लोगों ने जलवायु परिवर्तन महसूस किया है। उत्तराखंड के 57.9 फीसद मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह जंगलों का कटना है। चमोली ऐसा जिला है जहां के लोगों ने बीते पांच साल में सबसे ज्यादा जलवायु परिवर्तन का असर महसूस किया। उत्तराखंड के आठ पहाड़ी जिलों के लोगों के लिए वनों का खात्मा जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजह हैं।

चमोली के 86.9 फीसद, पिथौरागढ़ के 78.7, रुद्रप्रयाग के 78.4, बागेश्वर के 72.2, चंपावत के 76.1, अल्मोड़ा के 69.3 फीसद, नैनीताल के 65.8, उत्तरकाशी के सबसे ज्यादा यानी 57.8 फीसद लोगों ने माना कि जलवायु परिवर्तन की वजह वनों का खत्म होना है।

रुद्रप्रयाग में सर्वाधिक खतरा

इसी साल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के राष्ट्रीय सुदूर संवेदी केंद्र (एनआरएससी) की भूस्खलन जोखिम विश्लेषण पर आधारित एक रिपोर्ट आई थी। इसके मुताबिक उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले को देश में भूस्खलन से सबसे अधिक खतरा है। रुद्रप्रयाग में ही केदारनाथ स्थित है। इस मामले में टिहरी दूसरे स्थान पर है जबकि इनमें चमोली भूस्खलन जोखिम के मामले में देश में 19वें स्थान पर है। देश के सर्वाधिक भूस्खलन पीड़ित 147 जिलों में उत्तराखंड के सभी जिले शामिल हैं। इसका मतलब है कि भूस्खलन से इन जिलों को सबसे अधिक सामाजिक- आर्थिक नुकसान होने का खतरा है। भूस्खलन जोखिम वाले जिलों में हिमाचल के 11 जिले शामिल हैं। हिमाचल में भूस्खलन से सबसे अधिक खतरा मंडी जिले में है। जम्मू और कश्मीर के 14 जिले भूस्खलन जोखिम वाले जिलों की सूची में शामिल हैं। इनमें राजौरी देश का चौथा और पुंछ छठा सबसे अधिक भूस्खलन पीड़ित जिला है।

स्रोत :- राष्ट्रीय सहारा लखनऊ। शनिवार 26 अगस्त,2023, hastkshep.rsahara@gmail.com 

 

Path Alias

/articles/himalaya-ka-bhugol-badal-dega-naya-one-kanoon

Post By: Shivendra
×