गंगा-करनाली-घाघरा नदी घाटी में अन्तरराष्ट्रीय जल प्रबंधन हेतु सहभागितापूर्ण दृष्टिकोण


परिचय


विश्व की लगभग 60 प्रतिशत मीठे जल की धाराएँ 263 अन्तरराष्ट्रीय नदी घाटियों से होकर बहती हैं, इनका फैलाव पृथ्वी की लगभग आधी भू-सतह और लगभग 40 प्रतिशत आबादी के बीच है। दक्षिण एशिया में, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदी घाटियों का प्रवाह बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, नेपाल और पाकिस्तान के बीच बँटता है। इन घाटियों में ऐसे करोड़ों लोगों का आवास है, जो स्थायी विकास के आर्थिक और सामाजिक दोनों संकेतकों के स्तर पर कमजोर हैं। इन नदियों के साझा उपयोग की वजह से अक्सर पड़ोसी देशों के बीच संघर्ष की स्थिति बन आती है। उनके बीच की मौजूदा सत्ता असमानता और क्षेत्र की भू-राजनीति अक्सर कमजोर जल सम्बन्ध और एकतरफा निर्णय को बढ़ावा देती है। ऐसी संधियाँ और समझौते अक्सर राष्ट्रवादी बहस से भी प्रभावित होते हैं, इन संधियों में किसी गैर-सरकारी भागीदारों, विशेष रूप से प्रभावित समुदायों के लोगों को शामिल नहीं किया जाता।

हाल के दिनों में यह समझ तेजी से विकसित हुई है कि ऐसे जल संसाधन जो सभी देशों में बाँटे जाएँ या साझा किये गए हों, उन्हें विभिन्न हितधारकों की भागीदारी के साथ एकीकृत तरीके से प्रबन्धित किया जाना चाहिए, गंगा-करनाली-घाघरा बेसिन के बारे में यह चर्चा पत्र जो 'नेपाल और भारत' और 'भारत और बांग्लादेश' के द्वारा साझा किया गया है, समुदाय के स्थानीय जल सुरक्षा के मसलों को शामिल कर घाटी के प्रबन्धन को अधिक न्यायसंगत और सहभागी बनाने का मार्ग प्रदान करता है।

गंगा-करनाली-घाघरा बेसिन


करनाली (नेपाल में)-घाघरा (भारत में) नदी गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है, जो इसके वार्षिक प्रवाह के लगभग 21% का योगदान करती हैं। नदी कोटिया घाट पर भारत में प्रवेश करती है और बिहार के डोरीगंज, छपरा में गंगा नदी में मिलती है। गंगा के साथ संगम करने से पहले करनाली-घाघरा नदी की कुल लम्बाई 1,080 किलोमीटर है।

 

Table 1: Geographic Coverage of the Ganga-Karnali-Ghaghara River Basin across the Countries

बेसिन / उप- बेसिन

क्षेत्रफल (किमी2))

बेसिन में मुख्य देश

बेसिन में देश का क्षेत्र (किमी2)

% बेसिन का क्षेत्रफल

% देश का क्षेत्रफल

औसत वार्षिक अपवाह

गंगा

1,087,300

भारत

860,000

79

26.00

~ 525 बीसीएम

~16,640 m3/sec

चीन

33,500

3

0.35

नेपाल

147,500

14

100.00

 

करनाली घाघरा

 

127,950

बांगलादेश

46,300

4

32.00

~ 113 बीसीएम

~3,581 m3/sec

नेपाल

68,000

53

46.10

 भारत

57,500

45

1.75

चीन (तिब्बत)

24,50

2

0.01

बीसीएम= बिलियन क्यूबिक मीटर; स्रोत: AQUASTAT FAO, 2011; इंस्टीट्यूट ऑफ वाटर मॉडलिंग, 2010

 

• नेपाल, भारत और बांग्लादेश के बेसिन क्षेत्र की जनसंख्या अनुमानतः 34 करोड़ (पूरे गंगा बेसिन में करीब आधा अरब लोगों का घर है) है।
• बेसिन मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र है, यहाँ बहुत अधिक गरीबी और मूलभूत सुविधाओं की कमी है; इनमें से कुछ इलाके सभी मानव विकास सूचकों में काफी नीचे हैं।
• इन नदियों पर जल-विद्युत उत्पादन और सिंचाई के लिये बाँध और बैराज जैसी प्रमुख संरचनाएँ हैं। ऊर्जा के मामले में एक कमजोर देश होने की वजह से नेपाल का जोर प्रमुखतः बिजली उत्पादन पर है (उदाहरण के लिये, नियोजित करनाली हाइड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना), जबकि बांग्लादेश और भारत का फोकस सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण पर है।
• ऊपरी नेपाल बेसिन की प्रमुख समस्या सुखाड़ है और नेपाल, भारत एवं बांग्लादेश के निचले हिस्सों में बाढ़। अपनी जलोढ़ विशेषता के कारण इस बात की आशंका रहती है कि भारत में घाघरा अपनी धारा को बदल सकती है।
• गंगा की सहायक नदियाँ जैसे यमुना आदि इस क्षेत्र की अत्यधिक प्रदूषित नदियों में से एक है। इसके प्रमुख प्रदूषणकारी स्रोत हैं, औद्योगिक कचरा, शहरी सीवेज आदि।
• सूखा, बाढ़, बिगड़ती जल गुणवत्ता (जैसे आर्सेनिक और लवणता में बढ़ोत्तरी) और ऊपरी इलाकों में वनों की कटाई और क्षरण के कारण नदी के निचले इलाके में भारी मात्रा में गाद जमा होता है, जो इस इलाके के निवासियों के बीच जल असुरक्षा को जन्म देता है। इन सभी कारणों ने मत्स्य पालन को प्रभावित किया है, नौकायन को बाधित किया है, और पानी की गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये खतरा पैदा कर दिया है।

प्रमुख अन्तरराष्ट्रीय जल संधियाँ


यद्यपि अन्तरराष्ट्रीय नदियों के सन्दर्भ में हुई अन्तरराष्ट्रीय घोषणाएँ/संधियाँ सम्बन्धित देशों के अधिकार को स्वीकार करते हैं, जिनका जल वे उपयोग कर रहे हैं, इन्हें दो परिस्थितियों में लागू किया जा सकता है:

1. संधि की वजह से दूसरों के जल उपयोग के वैध अधिकारों को खतरे में नहीं डाला जा सकता है।
2. एक पक्ष के जल उपयोग के अधिकार से दूसरे पक्ष की जल सुरक्षा को ‘बहुत ज्यादा नुकसान’ नहीं होना चाहिए।

प्रमुख संधियों और घोषणाओं में शामिल हैं:


अन्तरराष्ट्रीय नदियों के जल उपयोग पर 1966 का हेलसिंकी नियम:

'प्रत्येक बेसिन राज्य अपने क्षेत्र में, एक अंतरराष्ट्रीय जल निकासी के जल के फायदेमंद उपयोगों में उचित हिस्सेदारी का हकदार है.' उचित हिस्सेदारी निर्धारित करने वाले कारकों में शामिल हैं:

• प्रत्येक राज्य/राष्ट्र बेसिन का भूगोल और जल निकासी क्षेत्र

• बेसिन का जल विज्ञान

• बेसिन क्षेत्र को प्रभावित करने वाली जलवायु

• पूर्व उपयोग

• प्रत्येक बेसिन राज्य की आर्थिक और सामाजिक आवश्यकताएं

• इस जल पर निर्भर जनसंख्या

• जल उपयोग में अनावश्यक अपशिष्ट का बचाव

• अन्य संसाधनों की उपलब्धता

• प्रत्येक बेसिन राज्य की आर्थिक और सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करने के वैकल्पिक साधनों की तुलनात्मक लागत

• उपयोगकर्ताओं के बीच संघर्ष के समाधान के साधन के रूप में एक या अधिक सह-बेसिन राज्यों को मुआवजे की व्यवहारिकता

• एक बेसिन राज्य की जरूरतों के लिये एक सह-बेसिन राज्य को पर्याप्त आघात किये बिना राज्य को संतुष्ट किया जाना

स्टॉकहोम घोषणा 1972

राज्यों को अपनी की पर्यावरण नीतियों के अनुसार अपने खुद के संसाधनों का फायदा उठाने का अधिकार है; लेकिन इसके साथ ही यह सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी भी है कि उनके अधिकार क्षेत्र की गतिविधियों से अन्य राज्यों के पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचे.

पर्यावरण और विकास पर रियो सम्मेलन, 1992 का एजेंडा 21 (विशेषकर 18.4 और 18.5 खंड):

साझा जल का उपयोग करने वाले जल साझीदार देशों के बीच सहयोग, जल संसाधन रणनीतियों को विकसित करने और सामंजस्य बनाने की आवश्यकता. यह एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (आईडब्ल्यूआरएम) के ढांचे को विशेष महत्व देता है.

अधिकार और दायित्व (अन्तरराष्ट्रीय जल संसाधनों के गैर-नौवहन उपयोग के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन, 1997):

• बेसिन राज्यों द्वारा समुचित उपयोग और सहभागिता

• अन्य बेसिन राज्यों के लिये अपेक्षाकृत नुकसान की रोकथाम

• अन्य तटीय राज्यों पर पड़ने वाले संभावित प्रतिकूल प्रभावों के साथ अधिसूचित करना

• पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा और संरक्षण

• आंकड़े और सूचनाओं का नियमित आदान-प्रदान

• किसी एक उपयोग को दूसरे पर वरीयता देने की कोई अंतर्निहित प्राथमिकता नहीं

• प्रदूषण की रोकथाम, कमी और नियंत्रण

• आपात स्थितियां से संबंधित अधिसूचना और सहयोग

 

यद्यपि इन अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों और घोषणाओं में नदी प्रबंधन से संबंधित भागीदारी को बढ़ावा देने की पर्याप्त संभावनाएं हैं, लेकिन वे कानूनी नियम नहीं बंधे हैं और इसलिये ये राष्ट्रों पर बाध्यकारी नहीं हैं। यद्यपि इन सभी सिद्धांतों को अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों और घोषणाओं में जोड़ा गया है, जो तटीय समुदायों के लिये काफी प्रासंगिक हैं, मगर यहाँ समुदायों के लिये कोई संस्थागत स्थान नहीं है, जहाँ वे अन्तरराष्ट्रीय नदियों के प्रबंधन में भागीदारी कर सकें, साथ ही अन्तरराष्ट्रीय नदियों के संबंध में समुदाय के दृष्टिकोण को समझने के लिये कोई प्रयास किये जा रहे हों।

करनाली-घाघरा बेसिन पर भारत-नेपाल संधि


विश्व की लगभग 60 प्रतिशत मीठे जल की धाराएँ 263 अन्तरराष्ट्रीय नदी घाटियों से होकर बहती हैं, इनका फैलाव पृथ्वी की लगभग आधी भू-सतह और लगभग 40 प्रतिशत आबादी के बीच हैं। दक्षिण एशिया में, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदी घाटियों का प्रवाह बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, नेपाल और पाकिस्तान के बीच बँटता है। इन घाटियों में ऐसे करोड़ों लोगों का आवास हैं, जो स्थायी विकास के आर्थिक और सामाजिक दोनों संकेतकों के स्तर पर कमजोर हैं। इन नदियों के साझा उपयोग की वजह से अक्सर पड़ोसी देशों के बीच संघर्ष की स्थिति बन आती है। उनके बीच की मौजूदा सत्ता असमानता और क्षेत्र की भू-राजनीति अक्सर कमजोर जल संबंध और एकतरफा निर्णय को बढ़ावा देती हैं। ऐसी संधियाँ और समझौते अक्सर राष्ट्रवादी बहस से भी प्रभावित होते हैं, इन संधियों में किसी गैर-सरकारी भागीदारों, विशेष रूप से प्रभावित समुदायों के लोगों को शामिल नहीं किया जाता।

हाल के दिनों में यह समझ तेजी से विकसित हुई है कि ऐसे जल संसाधन जो सभी देशों में बाँटे जायें या साझा किए गए हों, उन्हें विभिन्न हितधारकों की भागीदारी के साथ एकीकृत तरीके से प्रबंधित किया जाना चाहिए। गंगा-करनाली-घाघरा बेसिन के बारे में यह चर्चा पत्र जो 'नेपाल और भारत' और 'भारत और बांग्लादेश' के द्वारा साझा किया गया है, समुदाय के मसलों को शामिल कर घाटी के प्रबंधन को अधिक न्यायसंगत और सहभागी बनाने का मार्ग प्रदान करता है।

करनाली (नेपाल में)-घाघरा (भारत में) नदी गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है, जो इसके वार्षिक प्रवाह के लगभग 21% का योगदान करती हैं। नदी कोटिया घाट पर भारत में प्रवेश करती है और बिहार के डोरीगंज, छपरा में गंगा नदी में मिलती है। गंगा के साथ संगम करने से पहले करनाली-घाघरा नदी की कुल लंबाई 1,080 किलोमीटर है।

.यद्यपि इन अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों और घोषणाओं में नदी प्रबन्धन से सम्बन्धित भागीदारी को बढ़ावा देने की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं, लेकिन वे कानूनी नियम नहीं बँधे हैं और इसलिये ये राष्ट्रों पर बाध्यकारी नहीं हैं। यद्यपि इन सभी सिद्धान्तों को अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों और घोषणाओं में जोड़ा गया है, जो तटीय समुदायों के लिये काफी प्रासंगिक हैं, मगर यहाँ समुदायों के लिये कोई संस्थागत स्थान नहीं है, जहाँ वे अन्तरराष्ट्रीय नदियों के प्रबन्धन में भागीदारी कर सकें, साथ ही अन्तरराष्ट्रीय नदियों के सम्बन्ध में समुदाय के दृष्टिकोण को समझने के लिये कोई प्रयास किये जा रहे हों।

इसके बावजूद, इन अन्तरराष्ट्रीय सिद्धान्तों और मानदण्डों को ध्यान में रखना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वे सीमावर्ती नदियों के स्थानीय रूप से सन्दर्भित और सहभागिता के शासन के लिये एक व्यापक ढाँचे और वैधता प्रदान करते हैं।

करनाली-घाघरा बेसिन पर भारत-नेपाल संधि


भारत और नेपाल के बीच करनाली बेसिन पर कोई व्यापक द्विपक्षीय समझौता नहीं है। यह केवल निम्न अन्तरराष्ट्रीय संधियों में शामिल हैं:

1 - 1920 में ब्रिटिश सरकार और नेपाल सरकार के बीच भारत के संयुक्त प्रान्त (जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश के रूप में जाना जाता है) के महाकाली-सारदा सिंचाई जल विभाजन के लिये एक समझौता जो ‘शारदा बैराज लेटर ऑफ एक्सचेंज’ के नाम से हुआ था। शारदा, घाघरा की एक सहायक नदी है, जो करनाली का भारतीय भाग है। यह समझौता भारत और नेपाल के बीच के बाद के सभी समझौतों, संधियों और परियोजनाओं के लिये ऐतिहासिक अग्रदूत था और इसे महाकाली संधि, 1996 के एक भाग के रूप में शामिल किया गया है।

2 - महाकाली संधि, 1996 : इस संधि के दायरे में शारदा बैराज, टनकपुर बैराज और प्रस्तावित पंचेश्वर परियोजना शामिल हैं। इस व्यवस्था के मुताबिक, नेपाल सूखे के मौसम (16 अक्टूबर से 14 मई) के दौरान 4.25 एमक्यूब/सेकेंड पानी और आर्द्र मौसम में (15 मई से 15 अक्टूबर) 28.34 एमक्यूब/ सेकेंड पानी इस्तेमाल कर सकता है। टनकपुर में, इस संधि के मुताबिक नेपाल को पूर्वी एफ्लक्स बाँध से आर्द्र मौसम में 28.3 एमक्यूब/सेकेंड पानी और शुष्क मौसम में 8.5 एमक्यूब/सेकेंड लेने का अधिकार होगा। जब पंचेश्वर परियोजना अस्तित्व में आएगी और टनकपुर में शुष्क मौसम में पानी की उपलब्धता बढ़ने लगेगी तो नेपाल को अतिरिक्त पानी प्रदान किया जाएगा। इस बारे में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है कि भारत को क्या वापस किया जाएगा। संधि के बाद, शारदा बैराज के निकट नदी के बाएँ और दाएँ किनारे भारत के नियंत्रण में आ गए। इसे नेपाल के प्रति अनुचित व्यवहार माना गया और बाद के सभी समझौतों में यह असन्तोष उभर कर सामने आया।

3 - जीएमआर-नेपाल संधि 2014: नेपाल सरकार और एक भारतीय निजी कॉरपोरेट एजेंसी, जीएमआर (ग्रांदी मल्लिकार्जुन राव) द्वारा करनाली ट्रांसमिशन कम्पनी प्राइवेट के साथ 2014 में एक और संधि की गई। जीएमआर अपर करनाली हाइड्रोपॉवर लिमिटेड 900 मेगावाट अपर करनाली हाइड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना (यूकेएचईपी) को विकसित कर रहा है, जो नेपाल के दाइलेख, सुरखेट और अछम जिलों में स्थित है। करनाली नदी पर स्थित इस समझौते के अनुसार, नेपाल की बिजली का हिस्सा स्थापित क्षमता का केवल 12 प्रतिशत (मानसून के मौसम में 108 मेगावाट और सर्दियों के मौसम में 36 मेगावाट) रखा गया है और यह भी वाणिज्यिक दर पर है। नेपाल में कई लोग इस समझौते को भारतीय कम्पनी को मिली छूट मानते हैं। इस क्षेत्र में 'करनाली बचाओ' के नाम से एक स्थानीय आन्दोलन भी संचालित हो रहा है।

ऊपरी करनाली परियोजना का एक लम्बा इतिहास रहा है और जैसा कि कई अध्ययनों का सुझाव है, इसे बहुत कम लागत पर (4180 मेगावाट की) एक बड़ी परियोजना माना जाता था और मुख्य रूप से घरेलू बिजली की जरूरतों को पूरा करने वाली। नेपाल में बड़ी संख्या में घरों में बिजली की सुविधा नहीं है और यह देश गम्भीर बिजली संकट को झेल रहा है। यही कारण है कि नेपाल में इस परियोजना के खिलाफ भारी आक्रोश है।

 

ये दोनों समझौते विवाद में फंस गए हैं और काफी हद तक नेपाल के एक बड़े हिस्से की वास्तविक जरूरतों और आवश्यकताओं के प्रति असंवेदनशील हैं.

तटीय समुदायों के कई महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे, जल और ऊर्जा सुरक्षा, खतरे(जैसे बाढ़), प्रदूषण इत्यादि, भारत और नेपाल के बीच अन्तरराष्ट्रीय जल साझेदारी की समझ का हिस्सा नहीं हैं.

चूंकि इसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी नहीं हैं, स्थानीय ज्ञान और अनुभव, मुद्दों, धारणाओं और आकांक्षाओं, अंतरराष्ट्रीय जल साझाकरण व्यवस्था में कभी नहीं दर्ज होते हैं.

 

 

इस प्रकार, नेपाल और भारत के बीच करनाली-घाघरा बेसिन से संबंधित मौजूद समझौतों ने तटीय समुदायों के सामने पेश किसी भी ठोस मुद्दे का समाधान नहीं किया है। इसके बदले, इसने दोनों देशों के बीच तनाव और प्रतिस्पर्धा को ही बढ़ावा दिया है।

भारत-बांग्लादेश गंगा संधि


फरक्का बैराज के निर्माण के बाद से गंगा के पानी की साझेदारी दोनों देशों के बीच तनाव का विषय रहा है। 1956 में कमीशन किये गए इस बैराज के जरिए सूखे के मौसम में प्रति सेकेंड 40,000 क्यूबिक मीटर पानी छोड़ा जाता है, ताकि कोलकाता पोर्ट को नौवहन हेतु सक्षम बनाया जा सके। दोनों मुल्कों के बीच गंगाजल को साझा करने के लिये कई प्रयास किये गए, जैसे कि 1972 की मैत्री संधि और दोनों देशों के बीच चार अन्तरिम समझौते। हालांकि, इन सभी समझौतों के बाद बांग्लादेश में गंगा-आश्रित समुदायों के लिये अनिश्चितता और कठिनाइयाँ ही बढ़ी।

गंगा संधि 1996: आखिरकार एक तीस साल की संधि पर 1996 में हस्ताक्षर किया गया, जो बांग्लादेश को न्यूनतम हिस्सेदारी की गारंटी देती है: यदि उपलब्ध पानी 70,000 क्यूसेक कम है तो आधा पानी और अगर अनुमानित पानी 70,000 क्यूसेक से अधिक है तो कम-से-कम 35,000 क्यूसेक पानी। यदि प्रवाह 75,000 क्यूसेक से अधिक है, तो भारत को 40,000 क्यूसेक सुनिश्चित किया जाता है।

पिछले समझौतों में गंगा में असाधारण रूप से कम प्रवाह के मामलों से निपटने के प्रावधान शामिल थे। 1996 की संधि में ऐसी कोई भी धारा शामिल नहीं की गई है। इसके बजाय, संधि ने उस परिस्थिति को सम्बोधित किया कि अगर फरक्का में किसी भी दस दिनों की अवधि में 50,000 क्यूसेक से नीचे का प्रवाह हो और कहा गया है कि ऐसी स्थिति में, 'दोनों सरकारें तत्काल परामर्श करेगी ताकि आपातकाल के आधार पर इसे समायोजन किया जा सके, ताकि समता के सिद्धान्तों के साथ, निष्पक्ष काम हो और किसी भी पक्ष को कोई नुकसान नहीं हो।' संधि पर हस्ताक्षर करने के दो महीने के अन्दर ऐसी स्थिति पैदा हुई, क्योंकि गंगा नदी में प्रवाह मार्च 1997 में दस दिन की अवधि के लिये निर्धारित स्तर से नीचे चला गया। अगस्त में संयुक्त नदी आयोग (जेआरसी) की एक आपात बैठक की योजना बनाई गई थी; हालांकि स्थिति सुधर गई और बैठक को स्थगित कर दिया गया।

विभिन्न अध्ययनों से यह पता चलता है कि बैराज ने पारिस्थितिकी, कृषि और अन्य आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव डाला है, खासकर बांग्लादेश के उपजाऊ और अत्यधिक आबादी वाले डेल्टा क्षेत्र में। बांग्लादेश में यह धारणा तेजी से बनी है कि भारत सूखे के महीनों में गंगा नदी के प्रवाह के एक हिस्से को गुप्त रूप से अलग कर लेता है, जिससे सूखे के मौसम में प्रवाह कम होने पर बांग्लादेश में गम्भीर जल संकट और पर्यावरणीय क्षति हो रही है। इस आरोप को भारत द्वारा खारिज कर दिया गया है और वह कहता है कि बांग्लादेश को उपयोग से अधिक पानी मिलता है और बहुत पानी 'व्यर्थ' चला जाता है।

खराब मौसम के दौरान पानी को मोड़ना बांग्लादेश के लिये विनाशकारी हो सकता है और गम्भीर सूखे का कारण बन सकता है।

 

इस संधि की प्रमुख कमियाँ ये हैं:


1. दूसरे अधिकांश द्विपक्षीय, बहुपक्षीय समझौतों के विपरीत इसमें मध्यस्थता के लिये कोई अन्य प्रावधान शामिल नहीं है

2. इसमें पानी की गुणवत्ता या प्रदूषण से निपटने का समाधान नहीं है।

3. इसमें किसी भी तरह की सामुदायिक भागीदारी की कमी है और स्थानीय सन्दर्भो को ध्यान में नहीं रखा गया है।

गंगा पर एक बैराज बनाने की बांग्लादेश की कथित योजना एक और विवादित मुद्दा बन रही है। जाहिर है, इस परियोजना को 2027 तक पूरा किया जाना है और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार है। भारत की चिन्ता यह है कि यह उसके इलाके में बाढ़ के खतरे को बढ़ाएगा।

 

The Indo-Bangladesh Water Conflict Sharing the Ganga

अनुशंसाएँ


अन्तरराष्ट्रीय जल साझाकरण समझौते से स्थानीय तटीय समुदायों के जीवन और आजीविका पर कई अलग-अलग तरीकों से प्रभाव पड़ता है। उन समुदायों की पहचान करना आवश्यक है जो जल संधियों के परिणामों का सामना करने की स्थिति में सबसे आगे होते हैं। ये वही व्यक्ति हैं, जो इसकी खामियों को सबसे पहले महसूस करते हैं। इसके अलावा, यह समझना जरूरी है कि जल संसाधन से सम्बन्धित संघर्ष स्थानीय स्तर पर उनके सबसे तीव्र होने पर ही होते हैं। यह बात यूनेस्को-आईएचपी दस्तावेज से उद्धृत है कि, अन्तरराष्ट्रीय जल वार्ता की उच्च राजनीति में, स्थानीय लोगों की चिन्ताओं और बेसिन प्रबन्धन रणनीतियों और समझौतों पर पहुँचने की प्रक्रिया में जनता को शामिल करने की आवश्यकता की अक्सर अनदेखी की जाती है। विश्व के अन्तरराष्ट्रीय बेसिनों में संघर्षों का समाधान और सहयोग की उपलब्धि, स्थिरता और सुरक्षा, लोकतंत्र और मानव अधिकारों को मजबूत बनाने, वातावरण-मानसिक गिरावट में कमी, और पीने के पानी और स्वच्छता तक पहुँच में सुधार सहित प्रमुख लाभ लाएगी। लेकिन नागरिकों की भागीदारी और सभी स्तरों पर नागरिक समाज के लोगों की भागीदारी के बिना, इनमें से कोई भी लाभ जमीन पर सुरक्षित नहीं होगा'

इस प्रकार, यह पानी के बँटवारे को व्यवस्थित करने और उनके संचालन में विभिन्न तटीय समुदायों की चिन्ताओं और दृष्टिकोणों को शामिल करने का एक स्पष्ट मामला है।

1. सीमावर्ती नदियों के मामले में मानसिकता और ढाँचे में परिवर्तन


i. मुख्यधारा की मानसिकता यह है कि पानी की हर बूँद का उपयोग किया जाना चाहिए और समुद्र में जाने वाला सारा पानी बर्बाद हो रहा है, इस धारणा को बदलने की जरूरत है। पानी को 'जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र के एक सेवक' के रूप में देखा और प्रबन्धित किया जाना चाहिए। 'नदियाँ- एक जीवित संस्था' की अवधारणा अन्तरराष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ भारत में भी मान्यता प्राप्त कर रही है।
ii. अन्तरराष्ट्रीय संधियों के ढाँचे में इन बातों को शामिल कर इसे विस्तार देने की आवश्यकता है:

क) इन्हें रक्षित और संरक्षित करने की आवश्यकता है और जल प्रदूषण सहित प्रतिकूल प्रभावों को उलटने की भी।
ख) पानी को पहले एक सामाजिक वस्तु के रूप में देखें, उसके बाद ही किसी आर्थिक वस्तु के रूप में।
ग) बेसिन में सभी को पर्याप्त और सुरक्षित जल और स्वच्छता सुविधाओं (वास) का अधिकार हो।
घ) बुनियादी जरूरतों और न्यायसंगत वितरण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।
ङ) पानी का कुशलता से उपयोग हो, वाटर फुटप्रिंट में कमी लाएँ।
च) सहभागी प्रबन्धन और शासन व्यवस्था हो।

iii. अन्तरराष्ट्रीय जल प्रशासन को नदियों को एक सामाजिक-पारिस्थितिकीय इकाई के रूप में समझने की जरूरत है; बेसिन निवासियों के मानवाधिकारों की रक्षा के उपायों को शामिल करना और देखना कि अन्य सह-तटीय राज्यों को कोई महत्त्वपूर्ण नुकसान तो नहीं हो रहा है।

2. सिद्धान्तों के पदानुक्रम


तटीय राष्ट्रों के बीच भागीदारी के उसूल नीचे दिये गए सिद्धान्तों के आधार पर होना चाहिए:

i. जीवन के लिये पानी : बेसिन में सभी लोगों के लिये पीने, खाना-पकाने और स्वच्छता की जरूरतों को पूरा करने के लिये स्वीकार्य गुणवत्ता वाला पर्याप्त पानी उपलब्ध कराएँ और जानवरों के लिये अलग से।
ii. पारिस्थितिक तंत्र के लिये जल : जलीय जीवन और अन्य पारिस्थितिकीय कार्यों के लिये नदी प्रणाली में पर्याप्त जल प्रवाह और पानी सुनिश्चित कराएँ।
iii. आजीविका स्थायित्व के लिये जल : सार्वजनिक उपयोग के लिये न्यायसंगत उपयोग और सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उत्पादक गतिविधियों को सक्षम कराएँ।
iv. परिवर्तन के अनुकूलन के लिये जल : वर्तमान और भविष्य के जनसांख्यिकीय, आर्थिक और भूमि उपयोग में परिवर्तन और जलवायु परिवर्तन के लिये भण्डार बनाए रखें।

3. जल सुरक्षा योजना और समुदायों की भागीदारी


i. नदी के बेसिन प्रबन्धन में स्थानीय समुदायों की भूमिका आवश्यक है। उनके पास केवल अपनी आवाज सुनाने का ही अधिकार नहीं हो, बल्कि वे कुछ चुनौतियों (जैसे, प्रतिधारण द्वारा) को सुलझाने में सक्रिय भूमिका भी निभा सकें। इसके लिये सिद्धान्तों के उपरोक्त पदानुक्रम के आधार पर, स्थानीय समुदायों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों के लिये ग्राम पंचायतों/गाँवों और शहरी क्षेत्रों के लिये नगर पालिकाओं/वार्ड जैसे उपयुक्त इकाइयों में जल सुरक्षा योजना का विकास महत्त्वपूर्ण होगा।

ii. सभी जल सम्बन्धी नीतियों ने स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ जल सुरक्षा योजना विकसित करने की आवश्यकता की पहचान कर ली है। ये स्थानीय रूप से विकसित जल सुरक्षा योजनाएँ अन्तरराष्ट्रीय जल साझाकरण व्यवस्था में शामिल की जा सकती हैं - और समान रूप से, इनकी जिम्मेदारियों को स्थानीय योजनाओं में वापस शामिल किया जा सकता है। जैसे, स्थानीय समुदायों को भी कार्यान्वयन और जल सुरक्षा योजनाओं की निगरानी में भी शामिल होना चाहिए। स्थानीय समुदायों को स्थानीय स्तरों पर पानी के उपयोग को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए।

iii. बाढ़, वनों की कटाई और गाद का बढ़ता भार, जल प्रदूषण और अन्तर-क्षेत्रीय आवंटन आदि मुद्दों को उप-बेसिन जैसे उच्च स्तर तक उठाया जाना चाहिए। हालांकि, स्थानीय समुदाय भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं, वे निगरानी में शामिल हो सकते हैं और मिट्टी और जल संरक्षण उपायों, जैविक कृषि, जल बचत उपकरणों, माँग पक्ष प्रबन्धन आदि जैसे वैकल्पिक प्रथाओं का सहारा ले सकते हैं।

iv. इसके अलावा, जल सुरक्षा योजनाओं को अन्तरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की सीमाओं के भीतर और समग्र बेसिन परिस्थितियों में भी संचालित करने की आवश्यकता है। दूसरी तरफ, स्थानीय रूप से विकसित जल सुरक्षा योजनाओं के प्रकाश में मौजूद पानी के उपयोग और प्रतिबद्धताओं की समीक्षा करने की इच्छा होनी चाहिए। संक्षेप में, सूक्ष्म और वृहद स्तरों को एक दूसरे को सूचित करना चाहिए।

4. संस्थागत वास्तुकला


i. कुल मिलाकर, इसे राज्य-केन्द्रित से आगे बढ़कर समुदाय-केन्द्रित और सहभागी दृष्टिकोण तक ले जाने की आवश्यकता है। नेस्टेड संस्थानों को माइक्रो वाटरशेड से बेसिन स्तर और उप-बेसिन तक और गंगा बेसिन (नेपाल, भारत और बांग्लादेश) के लिये नदी बेसिन संगठन (आरबीओ) को दीर्घकालिक लक्ष्य के रूप में अपनाया जाना चाहिए। एक अन्तरिम रणनीति के रूप में, नेपाल, भारत और बांग्लादेश के एक सेल की सार्क में स्थापना की जा सकती है। यह सेल नियमित रूप से गंगा बेसिन (नेपाल, भारत और बांग्लादेश) को व्यवस्थित कर सकता है।

ii. विभिन्न स्तरों पर इन संस्थानों को अलग-अलग धारणाओं, ज्ञान, अनुभव, जरूरतों और किसानों, मछुआरों, कारीगरों, महिलाओं, जातीय समुदायों, दलितों आदि जैसे विभिन्न सामाजिक वर्गों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये कानूनी रूप से अनिवार्य बहु-हितधारक प्लेटफार्म (एमएसपी) में विकसित किया जा सकता है। समुदायों से एकत्र की गई जानकारी के आधार पर जल सुरक्षा योजनाओं सहित, अलग-अलग स्तरों पर जल साझाकरण और प्रबन्धन की योजनाएँ तैयार की जा सकती हैं।

iii. भारत में जल चौपाल (या नेपाल में जल कचहरी और बांग्लादेश में पानी सोमोनोई संघ) इसका एक अच्छा उदाहरण है। वे मूल रूप से पानी के मुद्दों पर काम कर रहे समुदाय के सदस्यों, विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और व्यक्तियों का समूह है। यह एक ऐसी अवधारणा है, जिसका उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य में पीने के पानी और पानी की गुणवत्ता के मुद्दों पर वाटरएड द्वारा विस्तारित किया जा रहा है। जल चौपालों को जिला और उप-जिला स्तरों पर सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है (वैकल्पिक रूप से, अनुभवों को साझा करने और महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने के लिये सूक्ष्म वायुमण्डल, उप-घाटियों आदि के क्लस्टर जैसी जल विज्ञान इकाइयों पर)। ये समुदाय आधारित संगठनों (सीबीओ), एमएसपी आदि के लिये तकनीकी सहायता सेवाएँ प्रदान करते हैं।

iv. बांग्लादेश, भारत और नेपाल को जल उपभोक्ता संघों (डब्ल्यूयूए), वाटरशेड डेवलपमेंट समितियों (डब्ल्यूडीसी), जल समितियों आदि के साथ कई वर्षों का अनुभव है, जो स्थानीय स्तर पर पानी के मुद्दों का समाधान करती है। स्थानीय स्तर पर इन सभी प्रकार के सीबीओ के कार्यों को एकीकृत करने की आवश्यकता है (जैसा कि वे अक्सर क्षेत्रीय सीमाओं में काम करते हैं) और एक एकीकृत संगठन बनाते हैं (जिसे विस्तृत जनादेश के साथ एक WUA कहा जा सकता है)। यह एकीकृत संगठन स्थानीय सीएलओ हो सकता है, स्थानीय स्तर पर जल संसाधनों का प्रबन्धन कर सकता है, जिसमें पानी की सुरक्षा योजना तैयार की गई हो।

v. यहाँ प्रतिभागी/हितधारक प्रक्रियाओं के संचालन और मार्गदर्शन के लिये एक विश्वसनीय और सक्षम संसाधन एजेंसी (यह एक नागरिक समाज संगठन या एक शैक्षिक/अनुसन्धान संस्थान हो सकता है) की आवश्यकता होती है।

5. क्षमता निर्माण, आँकड़े और संसाधन साक्षरता तक पहुँच


i. हितधारकों, विशेषकर स्थानीय समुदायों के क्षमता निर्माण, जल संसाधन साक्षरता पर नदी प्रणाली को समझने के विशिष्ट उद्देश्य के साथ, जल राजनीति, जल संसाधनों के लोकतांत्रिक शासन और संस्थागत मुद्दों को शुरू करने की आवश्यकता है। अक्सर, अन्तरराष्ट्रीय पहलू, अपने कार्यों (या स्थानीय हस्तक्षेप) और बेसिन के बीच सम्बन्धों को गलत तरीके से समझा जाता है।

ii. आँकड़ों पर सहमति और सभी हितधारकों तक इसकी पहुँच भागीदारी प्रक्रिया की सफलता की एक महत्त्वपूर्ण शर्त है वस्तुतः, स्थानीय समुदायों, सीबीओ और सीएसओ को आँकड़ा संग्रह में शामिल किया जा सकता है और इसके लिये एक सहमति - आधारित प्रोटोकॉल के आधार पर काम किया जा सकता है। साथ ही, सभी हितधारकों की भागीदारी के लिये धरातल बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि अलग-अलग शेयर धारकों के बीच सामाजिक प्रभाव के मामले में असमानता होती है।

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Participatory Approaches to Transboundary Water Governance in Ganga-Karnali-Ghaghara River Basin

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