आखिर इस दावानल का जिम्मेदार कौन


इस साल ही नहीं हर साल ही यह देखने को मिलता है कि फायर सीजन शुरू होते ही वन विभाग इंद्र भगवान की स्तुति करना शुरू कर देता है। इंद्र भगवान जितने देर तक रूष्ठ रहेंगे वन विभाग उतना ही परेशान और सभी की नजरों में घिरा रहता है। लेकिन जैसे ही इंद्र भगवान मेहरबान हुए वैसे ही वन विभाग भी चैन की साँस लेता है और फिर लाखों का खर्चा दिखाता है फायर लाइन के संरक्षण व सफाई में।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगी कि ब्रिटिशकाल में उत्तराखण्ड के जंगलों को वनाग्नि से बचाने के लिये 17306.64 किलोमीटर लम्बी फायर लाईन बनायी गई थी। जिनमें 100 फुट, 50 फुट व 30 फुट चौड़ी फायर लाइन बनायी गई थी। यह आँकड़ा हमारा नहीं वन विभाग का ही है। लेकिन वक्त के साथ यह फायर लाइन सिमट कर रह गई है। वन विभाग न फायर लाइन तो शायद ही बना पाया हो लेकिन इन जंगलों की इन लाइफ लाइन को भी नहीं बचा पा रहा है। वक्त के साथ ये फायर लाइन निशान बन कर ही रह गई हैं। वन विभाग के अधिकारियों का खुद मानना है कि इन फायर लाइन के जगह अब पेड़ उग गये हैं। जिनको काटने के लिये केंद्र की अनुमति चाहिए।

इस बार तो फायर सीजन की शुरूआत में ही वन विभाग की यह पोल भी खुल गई। जब पूरे प्रदेश के जंगल धू-धू कर जलने लगे। पूरा प्रदेश धुएँ में घिरा नजर आने लगा। कई लोग इस वनाग्नि की चपेट में आ गये हैं और उन्हें अपने जीवन से हाथ तक धोना पड़ा। ऐसे में लाजमी है वन विभाग पर उंगली उठना। पूर्व एम एल सी पृथ्वीपाल सिंह चौहान ने तो जाँच तक की मांग की है कि ब्रिटिशकाल में कितनी लम्बी फायर लाइन थी, कहाँ थी और अब यह फायर लाइन कितनी बची हुई हैं। जिनके संरक्षण व सफाई के लिये वन विभाग हर साल लाखों रुपये खर्च करता है।

लेकिन हमेशा ही यह देखने को मिलता है कि वन विभाग अंत में जंगलों में लगने वाली इस वनाग्नि के लिये ग्रामीणों को ही जिम्मेदार ठहराता है। हर साल की तरह इस बार भी विभाग के अधिकारी ग्रामीणों पर आरोप लगाते नजर आये की ग्रामीण जंगलों में आग बुझाने में उनका सहयोग नहीं करते हैं और घास के लिये जंगलों में आग लगाते हैं। वहीं कई बार ग्रामीणों को यह भी कहना होता है कि वे वन विभाग को सूचना देते हैं लेकिन विभाग सूचना देने के बावजूद मौके पर नहीं आता। वन विभाग की मजबूरी है कि आखिर जाये तो जाये कहाँ जब सब जगह आग ही आग हो। सीमित साधनों के चलते चंद मुट्ठी भर वनकर्मियों के भरोसे वन विभाग भी कितनी आग बुझा पायेगा।

वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं के बाद ये सवाल उठने भी लाजिमी है कि आखिर क्यों वनाग्नि की घटनायें बढ़ रही हैं। वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं पर पत्रकार त्रिभुवन उनियाल का कहना है कि बढ़ती जनसंख्या के अनुसार ग्रामीणों को पर परिवार उनका हक हकूक नहीं मिल रहा है साथ ही वन विभाग के कड़े नियमों के चलते बीते सालों से ग्रामीणों का जंगलों के प्रति रुझान कम होता जा रहा है। बात सही भी है कि वन विभाग वनाग्नि से जंगलों को बचाने के लिये ग्रामीणों को प्रशिक्षण व जागरूकता अभियान चलाता है लेकिन नतीजा कुछ नहीं। तभी तो इस बार एनडीआरएफ को मैदान में उतारना पड़ा और एम-17 हेलीकॉप्टरों का सहारा लेना पड़ा।

नेवी से रिटायर होने के बाद वाइल्ड लाइफ पर फोटोग्राफी करने वाले अरविंद मुद्गल का कहना है कि वनों के संरक्षण के लिये 9 ग्रामीणों को सम्मिलित कर व एक सरपंच बनाकर वन पंचायतों का गठन तो किया जाता है लेकिन अभी तक अंग्रेजों के जमाने की ही वननीति चली आ रही है। अब न वननीति बनाने की आवश्यकता है नहीं तो धीरे-धीरे वनाग्नि की घटनाएँ तो बढ़ेंगी ही साथ ही गाँव भी खाली होते जायेंगे। ऐसी स्थिति पर पलायन एक चिंतन के संयोजक रतन सिंह असवाल का कहना है कि वनाग्नि को नियंत्रित करने को राज्य गठन से आज तक इस प्रकार के तंत्र को विकसित करने पर विचार तक न होना चिन्तनीय है। वन सम्पदा से भरपूर छोटे-छोटे देशों में भी वनाग्नि पर नियंत्रण के लिये एयर फायर नियंत्रण सिस्टम का प्रयोग किया जाता है। यहाँ ऐसा सिस्टम बनाना तो दूर वननीति ही नहीं बन पा रही है।

जंगलों में आग से बेबस होते जानवरजंगलों में आग से बेबस होते जानवरऐसे में दावानल को रोकने के लिये ग्रामीणों से समर्पण करने की अपेक्षा करना बेमानी ही होगा। ऐसा ही कुछ युवा पत्रकार अजय रावत का कहना है कि 25 अक्टूबर 1980 को भारत सरकार द्वारा वन संरक्षण कानून लागू करते ही वनों व आबादी के बीच का आपसी रिश्ता तार-तार होने लगा। यहाँ के बसासतों को एक झटके में वन्य सम्पदा से बेदखल कर दिया गया, यहाँ तक कि मवेशियों चारे व जलावन की लकड़ी के लिये वाशिंदे महोताज होने लगे।

वर्ष 1988 में इसमें संसोधन कर इसे और जटिल कर दिया गया। हैरानी की बात है कि जम्मू कश्मीर को इस कानून से अलग रखा गया। जबकि तत्कालीन सरकार चाहती तो हिमाचल व तत्कालीन अविभाजित उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र से इस कानून में छूट दे सकती थी। आज यह कानून उत्तराखण्ड के आधारभूत ढांचे के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। नतीजतन आज आम ग्रामीण वनों व वन्यजीव को वन विभाग की बपौती मानने लगे हैं।

वनों में दावानल के लिये सबसे बड़ा खलनायक यहाँ के वनों में चीड़ के पेड़ों से गिरा सूखा पिरूल भी है। प्रदेश में 20 प्रतिशत वन क्षेत्र चीड़ के जंगलों का है। यह सूखा पिरूल वन विभाग के सर का दर्द बना हुआ है। भले ही वर्ष 2000 से चीड़ के पेड़ों को लगाना बंद कर दिया गया है फिर भी इस पेड़ की विषम परिस्थितियों में जीवित रहने की काबिलियत और इसकी रिप्रोडक्शन की क्षमता से यह फैलता ही जा रहा है। चीड़ एक ऐसा पेड़ भी है जिसका हर भाग उपयोग में आता। यह इमारती लकड़ी, जलावन की लकड़ी के प्रयोग में आता ही है। इसका लीसा भी की प्रयोग में आता है। वन विभाग ने पिरूल से बिजली और कोयला बनाने की योजना का भी खूब प्रचार-प्रसार किया।

लेकिन धरातल पर उतरने से पहले ही इन योजनाओं ने दम तोड़ दिया है। पौड़ी के पास अदवाणी में वन विभाग ने ग्रामीणों में सहकारिता बढ़ावा देने के लिये कोल ब्रिकेट प्लांट लगाया। इस प्लांट से 30 क्विंटल कोयला भी बनाया गया। लेकिन अब यह प्लांट धूल फाँक रहा है। ग्रामीण को एक किलो पिरूल इकट्ठा करने के बदले मात्र एक रूपये ही दिया जाता था साथ ही वन विभाग इस कोयले के लिये बाजार भी नहीं दे पायी, जिससे 15 क्विंटल कोयला बर्बाद हो गया। अंत में यह प्लांट ही बंद हो गया।

बहरहाल जब तक आग भड़कती रहेगी ये मुद्दे भी भड़कते रहेंगे। दावानल की घटनाओं के बाद सरकार कुछ सचेत नजर आती है लेकिन दावानल के शांत होते ही सरकार भी इस ओर सोचती तक नहीं है। अब समय आ चुका है वनों को लेकर ठोस नीति बनाने का, पुराने कानून में बदलाव करने का। वक्त रहते ये कदम नहीं उठाये गये तो कहीं ऐसा न हो कि जंगल रहे पर गाँव न रहे।

Path Alias

/articles/akhaira-isa-daavaanala-kaa-jaimamaedaara-kaauna

Post By: Hindi
×