विकास और विनाश की बिसात में फसा मानव
नागरिकों का टूटा भरोसा, हताशा के साथ झुंझलाहट
मानव द्वारा निर्मित विकास और विनाश अगर एक साथ देखना है तो फिर आप कहीं और मत जायें, देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े क्षेत्रफल वाले जनपद सोनभद्र आयें जिसे देश की उर्जा की राजधानी कहते हैं। 40 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले 18000 मेगावाट क्षमता के आधा दर्जन विद्युत ताप गृह मौजूद हैं। अगले पाँच वर्षों में रिलायंस एस्सार जैसे कई निजी 20 हज़ार मेगावाट के अतिरिक्त विद्युत ताप गृह लगाये जायेंगे। बिरला का अल्युमिनियम, कार्बन और रसायन कारखाना यहाँ मौजूद है साथ ही यह क्षेत्र स्टोन माइनिंग के लिये भी मशहूर है। जिन्होंने उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा जैसे राज्यों को गुलज़ार किया है।
वहीं यहाँ के नागरिकों को फ्लोरोसिस जैसी लाइलाज बीमारियाँ भी दी हैं जिससे लोग सिर्फ़ जमीन पर रेंग कर चल सकते हैं। हम यह दावा नहीं करते कि यह देन सिर्फ इन कारखानों की है यह देन उस विकास की भी है जिसमें हमें जो नहीं उपलब्ध होता है उसको किसी भी हद तक पाने की जिद होती है।
क्या है फ्लोरोसिस
मानक से अधिक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से फ्लोरोसिस बीमारी पैदा होती है। फ्लोरोसिस से ग्रसित व्यक्ति के दाँत ख़राब तथा हाथ पैर की हड्डियाँ टेढ़ी हो जाती हैं जिसके कारण वह चलने फिरने से लाचार हो जाता है यह बीमारी बच्चों से लेकर अधिक उम्र वाले व्यक्ति को अपनी चपेट में ले लेती है। एक लीटर पीने के पानी में फ्लोराइड एक मिलीग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। यदि फ्लोराइड की मात्रा मानक से अधिक होती है तो इसका प्रभाव लोगों पर पड़ने लगता है। सोनभद्र में फ्लोरोसिस का प्रभाव बहुत अधिक है। औद्योगिक क्षेत्र से फ्लोराइड का उत्सर्जन अधिक होने के कारण पीने का पानी फ्लोराइड युक्त हो गया है। औद्योगिक क्षेत्र से उपजे प्रदूषण के साथ ही मौसम की मार ने भी यहाँ के नागरिकों को यह बीमारी देने में योगदान किया है। अवर्षा के चलते भूजल स्तर बेहद नीचे चला गया जिसके कारण राज्य सरकार ने पीने का पानी जुटाने के लिये गहराई वाले चापाकल (हैंडपंप) लगाने शुरू कर दिए राज्य सरकार ने यह देखा ही नहीं कि जो पानी गहराई से चापाकल द्वारा मुहैया कराया जा रहा है उसमें मानक के कई गुना अधिक मात्रा में फ्लोराइड है।
फ्लोरोसिस बीमारी से समाज पर पड़ने वाले प्रभाव
मानक से अधिक फ्लोराइड युक्त पानी पीने के प्रभाव से होने वाली बीमारी फ्लोरोसिस से परिवार एक ऐसे दोराहे पर खड़ा हो जाता है जो न मर पाता है और न जीवित रह पाता है। फ्लोरोसिस का प्रभाव बच्चों से लेकर बूढों तक होता है। परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो जाता है क्यों कि फ्लोरोसिस का असर हाथ, पैर और रीढ़ की हड्डियों पर पड़ता है आदमी औरत झुक कर चलने लगते हैं, उनके हाथ पैर टेढ़े और कमजोर हो जाते हैं। ऐसे परिवारों में कोई भी अपनी लड़की नहीं ब्याहता है जिसके कारण तमाम विकृतियाँ देखने को मिलती हैं। ऐसे परिवार अपनी सांस्कृतिक विरासत खो चुके होते हैं। कई परिवार तो हताशा के कारण मानसिक रोगी हो जाते हैं।
कब और कैसे हुई जानकारी
पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है इसकी जानकारी सर्वप्रथम रेनुकूट एवं सिंगरौली क्षेत्र में वर्ष 1954 से वनवासियों के बीच कार्य कर रही संस्था वनवासी सेवा आश्रम गोविंदपुर को वर्ष 1980 में हुई। वनवासी सेवा आश्रम प्रवास के दौरान सदानंद जी (प्रो. जीडी अग्रवाल आईआईटी कानपूर) ने बताया कि उस समय वनवासी सेवा आश्रम का कार्य प्रेम जी देखा करते थे उनको कार्यकर्ताओं द्वारा जब ये जानकारी हुई कि क्षेत्र के लोगों को कुछ इस तरह की बीमारी हो रही है जिससे उनकी हड्डियाँ कमज़ोर हो रही हैं तो उन्होंने जानकारियाँ जुटानी प्रारम्भ की तो पाया कि औद्योगिक प्रदूषण से पीने का पानी प्रदूषित हो रहा है। वनवासी सेवा आश्रम में पानी के परिक्षण को एक लैब तैयार करवाई गयी। पानी का परीक्षण किया गया तो यह पूर्णतया तय हो गया कि जिन लोगों ने फ्लोराइड के अधिक मात्रा वाला पानी पिया था वही फ्लोराइड की अधिकता वाले पानी पीने से होने वाली बीमारी फ्लोरोसिस से ग्रसित थे। प्रेम जी ने इस बारे में मुझे सूचना दी मैंने उस समय बनारस विश्वविद्यालय बनारस (बीएचयू) में वनस्पति शास्त्र के प्रोफ. डीएन राय से इस बारे में मदद करने को कहा। प्रो. डीएन राय यहाँ आए उन्होंने पर्यावरण को प्रदूषित होने से होने वाले बदलाव का परीक्षण किया तो वह बेहद दुखी हुए यहाँ तक कि वो पेड़ों के नीचे बैठ कर रोने लगे उन्होंने देखा कि पेड़ों के पत्तों पर फ्लोराइड का प्रभाव किस तरह से उन्हें नष्ट कर रहा है। पत्तों पर कोयले के कण थे और उन कोयले के कणों में फ्लोराइड की मात्रा थी जिसका पत्तों पर प्रभाव साफ देखा जा सकता था। रिहन्द बाँध में कोयले की राख आज भी देखी जा सकती है।
उन्होंने बताया कि मौसम के बदलते रुख से वर्षा कम हुई जिससे पीने के पानी की कमी होने लगी भूजल स्तर नीचे चला गया, पीने का पानी मुहैया कराने को सरकार ने जो चापाकल (हैंडपंप) लगाये वो बहुत गहरे, यानि 300 मीटर पर लगाये, गहरी बोरिंग के चापाकल में आने वाला पानी फ्लोराइड युक्त पानी है। विभाग ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि जो पानी वह चापाकल से पीने को मुहैया करवा रहे हैं वह फ्लोराइड युक्त पानी है और वो भी मानक से कई गुना अधिक जो आज भी जस के तस जारी है।
वनवासी सेवा आश्रम के सर्वे के अनुसार सोनभद्र
चौपन ब्लॉक के गाँव परवाकुंडवारी पिपरबां, झीरगाडंडी, ब्लॉक दुद्धी में गाँव मनबसा, कठौती, मलौली, कटौली, झारोकलां, दुद्धी, म्योरपुर ब्लॉक में गाँव कुस्माहा, गोविन्दपुर, खैराही, रासप्रहरी, बरवांटोला, पिपरहवा, सेवकाडांड, खामाहरैया, हरवरिया, झारा, नवाटोला, राजमिलां, दुधर, चेतवा, नेम्ना, ब्लॉक बभनी के गाँव बकुलिया, बारबई, घुघरी, खैराडीह। प्रदेश मुख्यालय लखनऊ में अभी तक फ्लोरोसिस की देखरेख कर रहे स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी डॉ एके पाण्डेय के अनुसार सोनभद्र में संदिग्ध मरीजों की संख्या 201613 है।
क्या कहना है फ्लोरोसिस से प्रभावित ग्रामवासियों का
गोविंदपुर गाँव के एक परवर की महिला मुखिया चम्पादेवी ने बताया कि वह लगभग 25 वर्षों से बीमार है दोनों पैर टेढ़े हो चुके हैं, दो लाठी के सहारे किसी तरह घिसट कर चल पाते हैं। घर में दो बहुएँ कबूतरी देवी तथा सुकुमारी देवी हैं उनकी भी कमर झुक गयी है पैर कमजोर हो गये हैं जब वो ब्याह कर आयीं थी पूरी तरह से स्वस्थ थीं। दो लड़के हैं वो भी इस पैरों से कमजोर हैं। होरीलाल पुत्र बुद्दन ने बताया कि पीने के पानी में फ्लोराइड है ये सब जानते हैं और इससे बीमार भी होते हैं फिर भी यही पानी पीने को मजबूर हैं चापाकल में जो पानी को शुद्ध करने का फ़िल्टर लगाया गया है वो काम ही नहीं करता है। पंचायत सदस्य रवीन्द्र ने बताया कि कुश्म्हा तथा गोविंदपुर में 35 चापाकल के साथ मिनी किट फ़िल्टर लगे हैं लेकिन कोई भी किट काम नहीं कर रही है कुश्म्हा गाँव में एक आरओ लगाया गया है जिसकी क्षमता 2000 लीटर है आरओ तभी चल पाता है जब विद्युत सप्लाई होती है। गाँव में विद्युत सप्लाई बहुत कम है। ऐसे में 2 से 3 किमी दूर से जब लोग पानी लेने जाते हैं और जब पानी नहीं मिलता है तो फिर लोग निराश होकर यही फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हो जाते हैं। गाँव नेरुईयादामर में किस्मतिया देवी पत्नी सीताराम ठाकुर ने बताया कि उनके दोनों पैरों की हड्डियाँ टेढ़ी हो गयी हैं ये लगभग 10 वर्षों से दिक्कत आयी है। चिरंजी के परिवार में वो उसकी पत्नी सुनयना दोनों ही चल-फिर नहीं सकते हैं। गाबेरडाहा चिरु बस्ती में शिवकुमार पिता स्व.दिमागी, प्रमिला पति शिवकुमार, गुलजार पिता शिवकुमार तीनों ने ही चार-पाई पकड़ ली है।
फ्लोराइड युक्त पानी से बचाव के प्रयास
फ्लोराइड युक्त पानी के दुष्प्रभाव से बचाने के लिये वनवासी सेवा आश्रम ने सबसे पहले पहल की लेकिन संस्था के लिये इतने संसाधन नहीं थे कि वह शुद्ध पानी नागरिकों को उपलब्ध करवा पाते उनके कार्यकर्ताओं ने चापाकल लगा रहे विभाग उप्र जल निगम का दरवाजा खटखटाया तमाम प्रयासों के बाद चापाकल के साथ एक मिनी फिल्टर लगाने में सहमति बनी जिससे फ्लोराइड को पानी से फ़िल्टर किया जा सके लेकिन मिनी फ़िल्टर भी ज्यादा दिनों तक साथ नहीं दे सके क्यों कि इसमें प्रयोग होने वाला मिडिया 4000 लीटर पानी को ही फ़िल्टर कर सकता था। फ़िल्टर का मिडिया कब काम करने लायक नहीं है इसकी देखरेख नहीं की जा सकी। जिससे चापाकल में लगे फ़िल्टर केवल शोपीस बनकर रह गए। अभी कुछ दिनों पूर्व क्षेत्र में लगी फैक्ट्री मैनेजमेंट ने सीएसआर (कार्पोरेट शोसल रेस्पोंस्बिलिटी) के तहत कुछ गाँवों में 2000 लीटर क्षमता वाले आरओ लगाये। यह आरओ कम क्षमता होने, विद्युत समय पर न आने तथा नागरिकों की पहुँच से कम से कम 3 से 4 किमी की दूरी पर होने के कारण कारगर साबित नहीं हो पा रहे हैं।
क्या है चापाकल (हैंडपंप) के साथ लगने वाले मिनी किट फ़िल्टर
चापाकल के साथ एक ऐसा लोहे का ड्रम लगाया जाता है जिसमें 50 किग्राम एक्टिवेटिड अल्युमिना भरा जाता है। चापाकल से निकलने वाला पानी इस मिडिया से होकर गुजारा जाता है जिससे फ्लोराइड के साथ ही आर्सेनिक को भी फ़िल्टर किया जा सके। उप्र जल निगम ने मिनी किट फ़िल्टर लगाने का काम स्थानीय कम्पनी एम एस इंटरप्राइजेज को सौंपा। एम एस इंटरप्राइजेज के प्रतिनिधि अंजनी शर्मा ने बताया कि चापाकल से निकलने वाले पानी को जब इस मिडिया से होकर गुजारते हैं तो मिडिया फ्लोराइड को ऊपरी सतह पर फ़िल्टर कर रोक लेता है और शुद्ध पानी नीचे से निकलकर उपभोक्ता को मिल जाता है। यह मिडिया 4000 लीटर पानी को फ़िल्टर करने में ही कारगर है इसके बाद मिडिया को बदला जाना चाहिए। जब कम्पनी के प्रतिनिधि से जानकारी मांगी कि मिडिया बदलने लायक हो गया है इसकी मॉनीटरिंग कौन करता है उन्होंने बताया कि कम्पनी के सुपरवाइजर तथा उप्र जलनिगम के क्षेत्रकर्मी इसकी मॉनीटरिंग करते हैं। जब प्रतिनिधि से ये जानकारी चाही कि आपके द्वारा लगे मिनी किट फ़िल्टर के एक भी ड्रम में मिडिया नहीं मिला तो वह कोई जवाब नहीं दे सका।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिलवाया मुआवजा
फ्लोराइड के प्रभाव से फ्लोरोसिस का दंश झेल रहे लोगों को नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त भारतीय बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी की पहल पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर जिला प्रशासन ने अक्तूबर 2012 में 198 तथा नवंबर 2013 में 176 फ्लोरोसिस पीड़ितों को 20-20 हज़ार रुपए मुआवजे की राशि उपलब्ध करवाई थी।
एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) तथा जिला प्रशासन के निर्देश भी रहे बेअसर
वनवासी सेवा आश्रम के कार्यकर्ता जगत नारायण विश्वकर्मा ने बताया कि इन लाइलाज बीमारियों का मूल कारण इस क्षेत्र में स्थापित एक दर्ज़न से अधिक पावर प्लांट हैं जिनका अपशिष्ट सीधे रिहंद बाँध में छोड़ा जाता है। पावर प्लांट से छोड़े जाने वाले अपशिष्ट में फ्लोराइड की मात्रा बहुतायत है जिला प्रशासन ने भी अपशिष्ट प्रबंधन छोड़े जाने पर अपनी नाराजगी जतायी लेकिन कोई असर न छोड़ सकी। जगत जी ने बताया जब जिला प्रशासन भी कारगर साबित नहीं हुआ तो उन्होंने एनजीटी का दरवाजा खटखटाया। उनकी अपील को संज्ञान में लेते हुए एनजीटी ने औद्योगिक इकाइयों को निर्देश दिए कि क्षेत्र के नागरिकों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध करवायें साथ ही इकाइयों से निकलने वाले फ्लोराइड युक्त अपशिष्ट को रिहंद बाँध में न डालें। लेकिन सख्त निर्देशों के बाद भी हालात जस के तस रहे। उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी स्वामीनाथ राम जिनका अभी हाल ही में कुछ माह पूर्व स्थानांतरण गोरखपुर-बस्ती-फैजाबाद क्षेत्र में किया गया, ने बताया कि ये तो सही है कि पावर प्लांट से निकलने वाली कोयले की राख में फ्लोराइड है कोयले की राख पावर प्लांट में न डाली जाए इसके लिये एनजीटी ने सख्त आदेश दिए थे एनजीटी ने इसकी निगरानी को एक टीम भी गठित की जिसमें केन्द्रीय जल आयोग के अधिकारी को भी रखा गया था। उन्होंने बताया कि पावर प्लांट में AWRS (एस सर्कुलेटर सिस्टम) लगवाये गए जिससे निकलने वाली राख को ट्रीट कर ही निस्तारण किया जा सके साथ ही राख को पानी में किसी भी कीमत पर न डालने दिया जाय। पानी को प्रदूषण करने वाले मामले पर उच्चतम न्यायालय भी सख्त है उसने आदेश दिए हैं कि औद्योगिक इकाइयाँ जीरो डिसचार्ज पर ही काम कर सकेंगी। औद्योगिक इकाइयों को निर्देश दिए गए हैं कि 31 दिसंबर 2016 तक वह इस आदेश का पालन करें।
केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा चिन्हित किये गए प्रदेश के जिले तथा दी गयी धनराशि
केंद्र ने फ्लोराइड युक्त पानी पीने से प्रभावित 6 जिलों को चिन्हित किया जिसमें वर्ष 2009-10 में उन्नाव तथा रायबरेली, वर्ष 2010-11 में प्रतापगढ़, फिरोजाबाद, तथा वर्ष 2011-12 में मथुरा को चिन्हित किया है। चिन्हित किये गए जनपदों को केंद्र ने अभी तक सीधे जनपदों के स्वास्थ्य विभाग को धनराशि उपलब्ध करवायी है। उन्नाव जनपद के स्वास्थ्य विभाग को 25 लाख रुपए दी गयी जिसमें 19.79 लाख रुपए खर्च किये, रायबरेली जनपद को 25 लाख की धनराशि मिली जिसमें 23.81 लाख खर्च किये, प्रतापगढ़ को 41.10 लाख दिए जबकि यहाँ सिर्फ 8.87 ही खर्च किये जा सके, फिरोजाबाद को 41.10 लाख दिए इस जिले में सिर्फ 6.57 लाख ही खर्च किये जबकि मथुरा जनपद को 41.10 लाख दिए गए यहाँ पर राशि को खर्च ही नहीं किया गया। जबकि सोनभद्र जनपद को केंद्र के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अभी तक फ्लोरोसिस कि रोकथाम कार्यक्रम में चयनित ही नहीं किया है।
क्या है एनपीपीसीएफ (नेशनल प्रिवेंशन एण्ड कन्ट्रोल ऑफ फ्लोरोसिस) प्रोग्राम – केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय से जब जानकारी हुई कि अधिक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से होने वाली बीमारी फ्लोरोसिस देश के कई राज्यों में अपना प्रभाव दिखा रही है तब वर्ष 2008-09 में मंत्रालय ने एनपीपीसीएफ योजना को मूर्तरूप देने के लिये देश के विभिन्न राज्यों के 100 जनपदों को चिन्हित किया और चिन्हित जनपदों को एक कार्ययोजना सौंपी जिसके तहत ऐसे मरीजों को खोजना था जो फ्लोरोसिस से प्रभावित थे।
1 अप्रैल 2014 को पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने एक सर्वे रिपोर्ट स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंपी कि मानक से अधिक फ्लोराइड युक्त पीने के पानी को पीने से देश के विभिन्न 20 राज्यों के 200 जनपदों में 11.7 लाख नागरिकों में फ्लोरोसिस बीमारी होने की सम्भावना है। सर्वे रिपोर्ट को संज्ञान में लेते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने एनपीपीसीएफ प्रोग्राम को मूर्तरूप देने के लिये उप्र के चयनित पाँच जनपदों को सीधे धनराशि भेजी जिससे फ्लोराइड युक्त पानी को पीने से होने वाली फ्लोरोसिस बीमारी के मरीजों को चिन्हित किया जा सके।
जिम्मेदार अधिकारियों का कथन
केंन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जन सूचना अधिकार-2005 के अंतर्गत सूचना दी है कि 2015-16 से जनपदों को फ्लोरोसिस कार्यक्रम के तहत सीधे कोई धनराशि नहीं दी जाएगी। फ्लोरोसिस कार्यक्रम को एनएचएम देखेगा जिससे कार्यक्रम कि मॉनीटरिंग कि जा सके। उप्र एनएचएम एनसीडी डीजी एबी सिंह ने बताया कि चयनित पाँच जनपदों रायबरेली, फ़िरोज़ाबाद, मथुरा, प्रतापगढ़ तथा उन्नाव के लिये 60.30 लाख रुपए धनराशि केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग से प्राप्त हुई है। सोनभद्र तथा आगरा जनपद को अभी चयनित नहीं किया गया है। जनपदों के चयन की प्रक्रिया के बारे में एनसीडी प्रभारी कोई जानकारी नहीं दे सके।
डॉ प्रदीप सक्सेना राष्ट्रीय सलाहकार एनएचएम ने फ्लोरोसिस कार्यक्रम के लिये चयन प्रक्रिया के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि जिस जनपद में दस गाँव फ्लोराइड युक्त पानी के पीने से होने वाले फ्लोरोसिस बीमारी से प्रभावित हैं उन जनपदों को फ्लोरोसिस कार्यक्रम के तहत चयन किया जाता है। प्रदेश के एनएचएम के अधिकारिओं द्वारा इसकी मॉनिटरिंग कि जाती है।
दुखद यह है कि उप्र में जिन जनपदों में यह संख्या 100 गाँव से भी अधिक है उन जनपदों का चयन भी नहीं किया गया। उप्र का कन्नौज एक ऐसा जनपद है जिसके 133 गाँव के पीने के पानी में फ्लोराइड है। आगरा मुख्यालय से 15 से 20 किमी क्षेत्र में बसे गाँव के पानी में मानक से कई गुना ज्यादा फ्लोराइड युक्त पानी ग्रामवासी पीने को मजबूर हैं वर्ष 2010 में यह शोध भी किया जा चुका है। डॉ भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा के प्रोफ़े.बीएस शर्मा, ज्योती अग्रवाल तथा अनिल कुमार गुप्ता ने आगरा जनपद के भूमिगत जल में फ्लोराइड की स्थिति पर शोध किया है। शोध पर आने वाले नतीजे बेहद गंभीर हैं। बावजूद इसके आगरा प्रशासन ने कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने शासन को सूचना देकर इतिश्री कर ली। आगरा से 20 किमी दूर पचगांय एक ऐसा गाँव है जहाँ की 60 प्रतिशत आबादी फ्लोरोसिस से प्रभावित है।
प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य विभाग के सर्वे के अनुसार
उन्नाव जिले में गाँव की संख्या 1699, फ्लोराइड प्रभावित 260 गाँव तथा प्रभावित जनसंख्या 124500, रायबरेली जिले में गाँव की संख्या 760 फ्लोराइड से प्रभावित गाँव 115 तथा जनसंख्या प्रभावित 57000, फिरोजाबाद जनपद में गाँवों की संख्या 803, फ्लोराइड से प्रभावित गाँव 22 प्रभावित जनसंख्या 31500, मथुरा जनपद में गाँवों की संख्या 735, फ्लोराइड से प्रभावित गाँव 253 तथा जनसंख्या प्रभावित 31500, प्रतापगढ़ जनपद में फ्लोराइड से प्रभावित जनसंख्या 31354 तथा सोनभद्र में फ्लोराइड से प्रभावित जनसंख्या 201613 है।
सोनभद्र का औद्योगिक इतिहास
सोनभद्र जनपद के सिंगरौली एवं रेनुकूट क्षेत्र के आस-पास आज़ादी के बाद वर्ष 1956 से उद्योगों की आधारशिला रखना शुरू हुई। सबसे पहले चुर्क सीमेंट कारखाना 1956 में लगाया गया जिसमें 800 टन सीमेंट का प्रतिदिन उत्पादन होता है, वर्ष 1961 में रिहंद बाँध का निर्माण करवाया गया जिससे विद्युत संयंत्रों की स्थापना की जा सके, वर्ष 1962 में हिंडाल्को अल्युमिनियम कारखाना रेणुकूट में स्थापित किया गया, वर्ष 1965 में कनोरिया केमिकल्स की स्थापना की जो वर्तमान में अब आदित्य बिरला ग्रुप संचालित कर रहा है, वर्ष 1967 में रेनुसागर पावर प्लांट (हिंडाल्को), 1968 में ओबरा पावर प्लांट, 1971 में डाला सीमेंट फैक्ट्री, 1971 में ओबरा पावर प्लांट, 1980 में चुनार सीमेंट फैक्ट्री, 1980 में ही अनपरा थर्मल पावर, 1984 में सिंगरौली थर्मल पावर, 1987 में विन्ध्यांचल थर्मल पावर, 1988 में हाई-टेक कार्बन रेणुकूट, 1989 में रिहंद थर्मल पावर प्लांट एनटीपीसी बीजपुर, 1998 में कनोरिया केमिकल्स पावर प्लांट रेणुकूट में स्थापित हैं।
सोनभद्र में फ्लोराइड का प्रभाव
सोनभद्र उत्तर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्रफल वाला जिला है सोनभद्र की आबादी वर्ष 2011 में हुए सर्वे के अनुसार 18 लाख 62 हज़ार 559 है जनपद का क्षेत्रफल 6788 किमी है। सोनभद्र क्षेत्र के 2 लाख से भी ज्यादा परिवार पीने के पानी में फ्लोराइड के कारण फ्लोरोसिस जैसी लाइलाज बीमारी से ग्रसित हैं। जो जनसंख्या का 10 प्रतिशत से भी अधिक है।
वनवासी सेवा आश्रम गोविंदपुर के सर्वे अनुसार
दाँतों का फ्लोरोसिस- वनवासी सेवा आश्रम ने 236 गाँव के 41 स्कूलों के बच्चों के दाँतों का परीक्षण करवाया, 136 गाँव के स्कूलों के बच्चों में शुरूआती दाँतों का फ्लोरोसिस, 82 गाँव के बच्चों में मध्यम तथा 18 गाँव के स्कूली बच्चों में गंभीर दाँतों का फ्लोरोसिस पाया गया। 54 ब्लॉक के गाँव परवाकुंडवारी, पिपरवा, झीरगाडंडी तथा नई-बस्ती दुद्धी ब्लॉक के गाँव मनबसा कठौती, मलौली, कटौली, झरोकला, दुद्धी, म्योरपुर ब्लॉक के गाँव कुस्माहा, गोविंदपुर, खैराही, रासप्रहरी, बरवांटोला, पिपरहर, सेवकाडाड, खामाहरैया, हरवरिया, झारा, नवाटोला, राजमिलन, नेम्ना, दुधर, चेतवा, बभनी ब्लॉक के बकुलिया, बारबई, घुघरी, खैराडीह
हड्डियों में फ्लोरोसिस
गाँव कुटोंधी में 14, मनबसा में 11, करमाडाड में 8 मरीज मिले जिनको हड्डियों का फ्लोरोसिस बहुत शुरूआती दौर में था, गाँव कुटोंधी में 9, कुस्माहा में 5, करमाडाड में 1 में माध्यम तथा गाँव परवाकुंडवारी नई-बस्ती में 30, कुस्माहा में 7 तथा मनबसा में 2 को गंभीर हड्डियों का फ्लोरोसिस है।
वर्ष बार राज्यों के चयनित जनपद
Year wise selected districts under National Programme for Prevention and Control of Fluorosis: Year
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State |
Districts |
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2008-09 |
Andhra Pradesh |
1. Nellore |
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Gujarat |
2. Jamnagar |
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Rajasthan |
3. Nagaur |
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Madhya Pradesh |
4. Ujjain |
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Orissa |
5. Nayagarh |
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Tamil Nadu |
6. Dharmapuri |
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2009-10 |
Assam |
7. Neygaon |
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Bihar |
8. Nawada |
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Chhattisgarh |
9. Durg |
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Andhra Pradesh |
10. Nalgonda |
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Jharkhand |
11. Palamau |
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Karnataka |
12. Mysore, 13. Bellary |
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Kerala |
14. Pallakad |
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Maharashtra |
15. Chanderpur 16. Nanded |
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Punjab |
17. Sangrur |
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Uttar Pradesh |
18. Unnao, 19 RaeBarelli |
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West Bengal |
20. Bankura |
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2010-11 |
Andhra Pradesh |
21. Karimnagar, 22. Prakasam |
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Assam |
23. K.Long, 24. Kamrup |
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Uttar Pradesh |
25. Pratagarh, 26. Firozabad |
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Karnataka |
27. Chikkaballapur, 28. Kopel, 29. Davangere, 30. Tumkur |
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Madhya Pradesh |
31. Dhar, 32. Seoni, 33. Chindwara, 34. Mandla |
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Punjab |
35. Firozpur |
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Haryana |
36. Mahendragarh, 37. Mewat |
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Bihar |
38. Banka, 39. Aurangabad, 40. Bhagalpur, 41. Gaya, 42. Jammui, 43. Nalanda, 44. Shekhpura |
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Jharkhand |
45. Garhwa, 46. Chatra |
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Orissa |
47. Angual, 48. Naupada |
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Gujarat |
49.Sabarkantha |
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Rajasthan |
50. Ajmer, 51. Rajsamand, 52. Bhilwara, 53. Tonk, 54. Jodhpur |
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Maharashtra |
55. Latur, 56. Washim, 57. Yavatmal |
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W. Bengal |
58. Birbhum, 59. Purlia, 60. D.Dinajpur |
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2011-12 |
Andhra Pradesh |
61. Guntur, 62. Mehboob Ngr. |
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Bihar |
63. Kaimur, 64. Munger |
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Jharkhand |
65. Hazaribagh |
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Kerala |
66. Alppuzha |
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Maharashtra |
67. Beed |
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Uttar Pd. |
68. Mathura |
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W. Bengal |
69 Maldha |
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Karnataka |
70. Bangalkot , 71. Bangalore(U), 72. Bijapur, 73. Raichur, 74. Chitra Durga, 75. Gadag, 76. Gulbarga, 77. Hassan, 78. Kolar, 79. Mandia 80. Ramnagaram 81.Shimoga |
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Rajasthan |
82. Bikaner, 83. Churu, 84. Dausa, 85. Dungarpur, 86. Jaipur, 87. Jaisalmer, 88. Jalore, 89. Pali, 90. Sikar, 91. Udaipur |
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Madhya Pradesh |
92. Betul, 93. Jhabua, 94. Raigarh, 95. Sehore, 96. Alirajpur, 97. Dindori, 98. Khargoan, 99. Raisen 100. Shajapur |
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2013-14 |
Rajasthan |
101. Banswara, 102. Sawai Madhopur |
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Chhattisgarh |
103. Kanker |
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Gujarat |
104. Vadodra |
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J&K |
105. Doda |
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2014-15 |
Rajasthan |
106. Karauli, 107. Chittaurahgarh, 108. Ganganagar 109. Jhalawar, 110. Jhunjhunu |
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Gujarat |
111. Banas kantha |
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