विकास की सच्चाई से भाग नहीं सकते


विकास की सड़क बनाने के लिये कुछ लोगों का आशियाना तो उजड़ता ही है, लेकिन यह रास्ता उन रास्तों से होकर गुजरे जहाँ कम घर टूटे, कम आबादी उजड़े। इसके लिये बेहतर नीति, नई सोच और मानवाधिकार का सम्मान, तीनों की मिश्रित प्रक्रिया अनिवार्य है। तभी हमारे लोग झारखंड में ही रहेंगे, विकास का मजा हम सब एक साथ उठा पाएँगे। हमारे यहाँ से हर साल सैकड़ों छात्र पढ़ाई पूरी कर अपनी नई जिन्दगी शुरू करते हैं। एक ही सवाल उठता है कि उनके लिये यहाँ रोजगार क्यों नहीं? हमारे यहाँ से निकले इंजीनियर, तकनीशियन देश-दुनिया के उद्योगों, परियोजनाओं में काम करते हैं, लेकिन उन्हें अपने राज्य में काम क्यों नहीं मिलता, जबकि हमारी छवि तो एक बड़े औद्योगिक राज्य के रूप में है।

एक इंडस्ट्रियल स्टेट होने के बावजूद हम अपने स्किल्ड इंजीनियरों को क्यों रोक नहीं पा रहे हैं? इसका जवाब है कि यहाँ हर स्तर पर रोजगार की कमी है और अगर नौकरी मिल भी जाए तो उन्हें वेतन-सुविधाओं के मामले में निराशा हाथ लगती है। सभी सोच रहे होंगे कि इन बातों का सम्बन्ध जमीन से कैसे है। सीधी सी बात है कि अगर जमीन पर उद्योग नहीं लगेंगे तो रोजगार का सृजन कहाँ से होगा और यहाँ के लोगों का जीवन स्तर कैसे उठेगा? यह बात भी ठीक है कि लोगों को बसाने के उपाय किए बगैर ही जमीन लेने की परम्परा देखने को मिली है। झारखंड में तो औद्योगिक क्रान्ति ने एक सदी पहले ही दस्तक दे दी थी, जब कालीमाटी में टाटा कारखाना लगा। इसके बाद बिरला ने औद्योगिक विकास को नया आयाम दिया। बाद के वर्षों में एचईसी, बोकारो, स्टील, सेल जैसी कई कम्पनियों ने देश ही नहीं विदेशों में भी झारखंड का नाम स्थापित किया। इन सारी विकास प्रक्रियाओं के बीच जमीन का सवाल बना रहा। हर बार जमीन अधिग्रहण के समय बवाल हुआ, गोलियाँ चलीं, संघर्ष हुआ, जिनमें कई घायल हुए, कई लोगों ने जान तक गँवा दी।

दरअसल, सरकार ने कभी भी इन संघर्षों की ठीक से व्याख्या नहीं की। उद्योग तो लगने हैं विकास के लिये, लेकिन इसमें गोली-बारी की नौबत क्यों आ जाती है? इसका सीधा सा जवाब है कि जिन लोगों की जमीनें ली जाती हैं, उन्हें उनके मुताबिक न्याय नहीं मिल पाता। झारखंड में आजादी से पहले के समय में हिंसक विरोध नहीं हुआ, लेकिन बाद में लोग उद्योगों, खनन के लिये जमीन देने पर अड़े। कोयल-कारो परियोजना के बारे में अनुमान था कि यह पूरे एशिया का सबसे बड़ा और महत्त्वाकांक्षी हाइडल प्रोजेक्ट होगा। लेकिन यह करीब चार दशकों से लटका पड़ा है। इसके ठीक विपरीत मैं स्वर्णरेखा मल्टीपरपज प्रोजेक्ट का जिक्र करना चाहूँगा, जो बीते चार दशक में भी पूरा नहीं हो पाया है। इन दो स्थितियों के दो निष्कर्ष निकलते हैं – जमीन देने से भी कोई फायदा नहीं होता है, सारी परियोजनाएँ फेल ही होती हैं। दूसरा यह कि अच्छा हुआ कि कोयल-कारो प्रोजेक्ट के लिये लोगों ने जमीन नहीं दी, इसका कोई नतीजा नहीं निकलता। ये दोनों स्थितियाँ जनता की मानसिकता को दर्शाती हैं, जिसका निर्माण सरकार के डिफंक्ट सिस्टम के कारण हुआ है। लोगों के पास भी दलील है कि पहले की योजनाएँ पूरी नहीं कर पाते और लोगों को उजाड़ने की अगली योजना बना ली जाती है।

अगर हम देखें तो सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश उपक्रमों में ही ऐसी स्थिति है। आप एचईसी का उदाहरण लें, डीवीसी का उदाहरण लें या किसी अन्य बड़ी सिंचाई परियोजना का। हर जगह आप एक सी नाकामी पाएँगे। दूसरी बड़ी वजह री-सेटलमेंट में की गई कोताही और धोखाधड़ी है। इसी वजह से लोग जमीन देने में हिचकते हैं और विरोध करने हथियार के साथ निकल आते हैं। लेकिन इसका समाधान क्या है? अगर लोग जमीन नहीं देंगे तो उद्योग कहाँ लगेंगे और रोजगार का सृजन कैसे होगा? बीच का रास्ता क्या हो सकता है, जिससे जमीन गँवाने वालों के साथ भी न्याय हो और राज्य में औद्योगिक विकास की गाड़ी भी दौड़ती रहे। सबसे पहले दशकों से लटकी परियोजनाओं को ईमानदारी के साथ युद्ध स्तर पर पूरा किया जाए। पूर्व के विस्थापितों का पुनर्वास हो और उन्हें न्याय मिले। इसके बाद ही लोगों के अन्दर विश्वास जगेगा और राज्य के औद्योगिक विकास में हर कोई सहयोग करेगा।

यह तभी सम्भव है जब एक सर्वसम्मत और न्यायपूर्ण पुनर्वास नीति बने। विस्थापित होने वालों को मुआवजा मिले, नौकरी मिले, आवास मिले और उसके परिवार के सदस्यों के लिये भी पर्याप्त सुविधाएँ दी जाएँ। ग्रामीणों ने यह मान लिया है कि उद्योगों के लिये, खनन कार्य के लिये या किसी अन्य परियोजना के नाम पर हमेशा उन्हें ही क्यों उजाड़ा जाता है, जबकि इसके बदले उन्हें फैक्ट्री में चौथे दर्जे की नौकरी दे दी जाती है। इन पर फिर से विचार करना होगा। साथ ही विस्थापितों में डर है कि उनकी अगली पीढ़ी का क्या होगा। इस मामले को संजीदा तरीके से सुलझाने की जरूरत है।

खनिज सम्पदा वैसे भी एक समय के बाद नष्ट हो जाती है। यह प्राकृतिक चक्र है। यह भी देखना होगा कि औद्योगिक विकास के नाम पर हम अतिवादी रवैया न अपनाएँ। जिन इलाकों की जमीन खेती में इस्तेमाल न हो रही है, वहाँ प्रोजेक्ट को इम्प्लीमेंट किया जाए। झारखंड में वेस्टलैंड की बहुतायत है, उनका बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। इन सबके लिये सबको मिल बैठकर नीति बनानी होगी। औद्योगिक विकास आज की सच्चाई है, हम इससे भाग नहीं सकते। राज्य से गरीबी-बेरोजगारी को मिटाना भी है और वैश्विक स्तर पर हो रहे विकास से तालमेल भी बिठाने हैं। विकास की सड़क बनाने के लिये कुछ लोगों का आशियाना तो उजड़ता ही है, लेकिन यह रास्ता उन रास्तों से होकर गुजरे जहाँ कम घर टूटे, कम आबादी उजड़े। इसके लिये बेहतर नीति, नई सोच और मानवाधिकार का सम्मान, तीनों की मिश्रित प्रक्रिया अनिवार्य है। तभी हमारे लोग झारखंड में ही रहेंगे, विकास का मजा हम सब एक साथ उठा पाएँगे।

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