ऊर्जा पर वैकल्पिक सोच

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वैकल्पिक ऊर्जा की सोच से ज्यादा उसकी दरकार नई है। देश में 2012 तक की स्थिति यह है कि महज 5.6 फीसद ऊर्जा आपूर्ति वैकल्पिक तरीके से हो रही है। जबकि सरकार इसके लिए प्रोत्साहन भी दे रही है। अगर बिजली पर निर्भरता कम करनी है तो इस ओर तेजी से कदम बढ़ाने ही होंगे, इसी मुद्दे पर है यह फोकस।

 

पिछले छह दशक में भारत ने जो ऊर्जा ढाँचा निर्मित किया है, अगर ऊर्जा की अपनी बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करना हो तो लगभग उतना ही ढाँचा अगले छह साल में निर्मित करना पड़ेगा यानी साठ साल का काम छह साल में पूरा करना होगा। जाहिर है, ऐसा करना इतना आसान नहीं होगा जितनी आसानी से इसका आकलन किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर लगातार बढ़ता चला जाएगा। जिसे पाटने के लिए अगर हम ऊर्जा के वैकल्पिक रास्तों पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि भारत में वैकल्पिक ऊर्जा माध्यमों से देश की कमोबेश 5.6 प्रतिशत आपूर्ति सुनिश्चित हो रही है।

हाल के दिनों में भारत में ऊर्जा की मांग में ही ख़ासी वृद्धि दर्ज की गई है। आने वाले सालों में भी उर्जा की मांग और आपूर्ति की यह वृद्धि जारी रहेगी। ऊर्जा की मांग और आपूर्ति का बढ़ा हुआ दायरा सामाजिक और आर्थिक विकास के संतुलन को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी है। लेकिन आर्थिक और सामाजिक ढांचे का संतुलन बनाए रखने के लिए हम यहां जिस ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चर्चा कर रहे हैं, उसमें सबसे बड़ी बाधा है ऊर्जा की उपलब्धता। जिस मात्रा में बिजली की मांग बढ़ रही है उस मात्रा में उसकी आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। आज बिजली उत्पादन के लिए हम प्रमुख रूप से जिन माध्यमों पर निर्भर हैं, वे ऊर्जा के चिरस्थायी विकल्प नहीं हो सकते हैं। ऊर्जा उत्पादन की आज की प्रणाली बेहद प्रतिकूल है। फिर मांग और आपूर्ति के बीच 10 प्रतिशत का अंतर बिजली आपूर्ति की समस्या को और जटिल बना देता है। इन दो विपरीत बातों के बीच सरकार के लिए सबको बिजली उपलब्ध कराना संभव नहीं है। सरकार खुद मानती है कि देश में तीस करोड़ लोग ऐसे हैं जो बिजली की उपलब्धता के दृष्टिकोण से अछूत हैं।

एक संप्रभु देश होने के नाते किसी भी सरकार की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह विकास दर को उच्च स्तर पर बनाए रखे। ऐसा करना सिर्फ आंकड़ेबाजी का खेल भर नहीं होता बल्कि उसी विकास दर से देश की माली हालत का भी अंदाज़ लगता है और नागरिक जीवन को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। लेकिन आज के इस उत्तर आधुनिक दौर में विकास के रास्ते उस दौर की तरह नहीं हो सकते, जहां औद्योगिक चिमनियां मुंह फाड़कर धुआं उगलती थीं और नागरिक जीवन को सरल बनाने की कीमत पर्यावरण से वसूल करती थीं। आज हमारी चिंता दोतरफा हो गई है। दुनिया के किसी भी देश को जहां एक ओर अपनी विकास दर बनाकर रखनी होती है वहीं दूसरी ओर पर्यावरण की समुचित चिंता करना उसका प्रथम कर्तव्य बनता है। ऐसी स्थिति में भारत जैसे उभरते देश के लिए दोहरी चुनौती सामने खड़ी है।

भारत जब विकास के रास्ते पर आगे बढ़ेगा तो उसकी ऊर्जा आपूर्ति का तरीका अब वह कभी नहीं होगा, जिसे दुनिया औद्योगिक देश प्रयोग करने के बाद उसका दुष्परिणाम भुगत रहे हैं। भारत को अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को लेकर दोबारा समग्रता और पूर्णता में सोचने की जरूरत है। हमें तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों ही तरीकों से ऊर्जा ज़रूरतों के बारे में विचार करने की जरूरत है।

पिछले छह दशक में भारत ने जो ऊर्जा ढाँचा निर्मित किया है, अगर ऊर्जा की अपनी बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करना हो तो लगभग उतना ही ढाँचा अगले छह साल में निर्मित करना पड़ेगा यानी साठ साल का काम छह साल में पूरा करना होगा। जाहिर है, ऐसा करना इतना आसान नहीं होगा जितनी आसानी से इसका आकलन किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर लगातार बढ़ता चला जाएगा। जिसे पाटने के लिए अगर हम ऊर्जा के वैकल्पिक रास्तों पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि भारत में वैकल्पिक ऊर्जा माध्यमों से देश की कमोबेश 5.6 प्रतिशत आपूर्ति सुनिश्चित हो रही है। यह आंकड़ा भी 2012 का है। वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत को सुलभ कराने के लिए अभी भारत में सरकारी स्तर पर सहायता दी जाती है फिर भी उसको ऊर्जा, आपूर्ति के मुख्य विकल्प के तौर पर कभी नहीं देखा जाता।
 

 

 

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