तटीय इलाकों से टकराने के बाद कमजोर पड़ा ‘वरदा’


बंगाल की खाड़ी से उठा वरदा इस सीजन का तीसरा चक्रवाती तूफान है। वरदा का मतलब अरबी या उर्दू में लाल गुलाब होता है। तबाही मचाने के लिये कुख्यात इन तूफानों के नामों के पीछे भी रहस्य है। तूफानों के नाम एक समझौते के तहत रखे जाते हैं। वरदा पाकिस्तान द्वारा दिया गया नाम है। क्योंकि इस बार नाम रखने का क्रम पाकिस्तान का था। पिछली बार ओमान की बारी थी, जिसने बंगाल की खाड़ी में उठे चक्रवाती तूफान का ‘हुदहुद’ रखा था, इससे पहले फालीन चक्रवात का नाम थाईलैंड की ओर सुझाया गया था। इस बात की प्रबल आशंका थी कि बंगाल की खाड़ी से उठने वाला चक्रवाती तूफान वरदा तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश के एक बड़े हिस्से को तबाह कर सकता है, लेकिन शुक्र है कि सतर्कता की वजह से यह तूफान उस तरह का विनाशकारी साबित नहीं हुआ, जिस तरह का भय व्याप्त था।

मौसम विज्ञानियों ने चेतावनी दे रखा था कि 120-130 किमी की रफ्तार से आगे बढ़ रहा वरदा तूफान तमिलनाडु के समुद्र तटीय इलाकों में भारी तबाही मचा सकता है, लेकिन तटीय इलाकों से टकराने के बाद ही वरदा की तीव्रता कमजोर पड़ गई और सतर्कता की वजह से सर्वनाश का मंजर परोस नहीं सका, हालांकि तूफान के प्रभाव से तमिलनाडु के तटीय इलाकों में हजारों पेड़ और बिजली के खम्भे उखड़ गए और जनजीवन पूरी तरह बाधित हुआ। हवाई-सड़क और रेल यातायात पूरी तरह ठप हो गया।

इस तूफान से भारी बारिश के कारण निचले हिस्सों में बाढ़ की सम्भावना बढ़ गई है और हजारों करोड़ फसल को नुकसान पहुँचा सकता है। अच्छी बात यह है कि तूफान की भविष्यवाणी होते ही राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन एजेंसी, केन्द्र, तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश की सरकार सतर्क हो गई और उसी का नतीजा है कि जान-माल का ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। तमिलनाडु और आन्ध्रप्रदेश दोनों सरकारों ने तूफान से पहले ही लाखों लोगों को समुद्र तटीय इलाकों से बाहर निकाल सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश के विभिन्न तटीय इलाकों में 15 से ज्यादा एनडीआरएफ की टीमें और सेना के जवान तैनात हैं।

तूफान के कहर से बचाव के लिये लोगों को रहने और इलाज की सुविधा मिल सके इसके लिये पहले ही अस्थायी शिविर एवं अस्पताल का बन्दोबस्त कर लिया गया था। रेलवे ने भी फौरी कदम उठाते हुए इन इलाकों से गुजरने वाली सभी दर्जनों ट्रेनों को रद्द कर दिया था। गौर करें तो राज्यों ने सराहनीय भूमिका निभाई है। केन्द्र सरकार भी प्रभावित इलाकों के लोगों को कैम्प में रहने व खाने-पीने का समुचित बन्दोबस्त हो सके इसके लिये तमिलनाडु और आन्ध्रप्रदेश सरकार की मदद कर रही है। अगर, समय रहते बचाव का समुचित उपाय नहीं किया गया होता तो यह तूफान दोनों राज्यों के समुद्र तटीय इलाकों को मरघट में बदल सकता था।

बंगाल की खाड़ी से उठा वरदा इस सीजन का तीसरा चक्रवाती तूफान है। वरदा का मतलब अरबी या उर्दू में लाल गुलाब होता है। तबाही मचाने के लिये कुख्यात इन तूफानों के नामों के पीछे भी रहस्य है। तूफानों के नाम एक समझौते के तहत रखे जाते हैं। वरदा पाकिस्तान द्वारा दिया गया नाम है। क्योंकि इस बार नाम रखने का क्रम पाकिस्तान का था।

पिछली बार ओमान की बारी थी, जिसने बंगाल की खाड़ी में उठे चक्रवाती तूफान का ‘हुदहुद’ रखा था, इससे पहले फालीन चक्रवात का नाम थाईलैंड की ओर सुझाया गया था। यहाँ ध्यान देना होगा कि अभी कुछ साल पहले तक मौसम विज्ञान की भविष्यवाणियाँ सटीक नहीं होती थीं और आपदाओं से निपटना कठिन होता था, लेकिन पिछले कुछ एक साल से स्पेस टेक्नोलॉजी में तेजी से सुधार हुआ है और तूफानों के आने की सटीक भविष्यवाणियाँ की जाने लगी हैं।

याद होगा कि चौदह साल पहले नवम्बर 1999 में उड़ीसा में सुपर साइक्लोन आया था, जिसकी सटीक भविष्यवाणी न होने से भारी जानमाल का नुकसान हुआ था। इस तूफान में 15000 से अधिक लोग मारे गए थे और हजारों गाँव मरघट में बदल गए।

सैकड़ों हेक्टेयर फसल बर्बाद हो गई थी। तूफान गुजर जाने के बाद हजारों लोग बीमारियों की वजह से काल के ग्रास बने। उस समय सुपर साइक्लोन का केन्द्र जगतसिंहपुर के बन्दरगाह शहर पारादीप में था, हालांकि तब भी सूचना प्रणाली द्वारा तूफान की जानकारी दी गई थी, लेकिन चूँकि समय और स्थान की सटीक भविष्यवाणी नहीं हुई थी, लिहाजा व्यापक स्तर पर जानमाल का नुकसान हुआ।

इसी तरह 1990 में आन्ध्र प्रदेश में मछलीपट्टम में तूफान की वजह से 1000 से अधिक लोगों की मौत हुई और 40 लाख से ज्यादा मवेशी मारे गए। नवम्बर 1996 में आन्ध्र प्रदेश में ही तूफान से हजारों लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता हो गए। इसी तरह जून 1998 में गुजरात के पोरबन्दर-जामनगर में तूफान से लगभग 1200 लोग मारे गए और कई हजार लोग लापता हुए।

गत वर्ष पहले तमिलनाडु में थाणे चक्रवात की वजह से 42 लोग मारे गए। सटीक भविष्यवाणी के अभाव में 24 दिसम्बर 2004 को हिन्द महासागर में विनाशकारी भूकम्प के कारण दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के तटवर्ती इलाकों में उठे समुद्री तूफान सुनामी में डेढ़ लाख से अधिक लोग मारे गए। इस महाविनाशकारी भूकम्प के झटकों से बेकाबू हुए समुद्र ने भारत में भयंकर लीला मचाई।

अण्डमान व निकोबार और मुख्य भूमि का सम्पूर्ण पूर्वी तट एकाएक बरपे इस कहर के मुख्य आखेट स्थल बन गए। यहाँ रहने वाले हजारों लोगों को सुनामी लील गई। भारतीय वायुसेना का द्वीपीय अड्डा तबाह हो गया। मुख्य भूमि पर सुनामी का तांडव तमिलनाडु के तट पर सर्वाधिक भयावह रहा जहाँ कम-से-कम तीन हजार से अधिक लोग मारे गए। समुद्री मछुआरों का शहर कहा जाने वाला नागपट्टिनम पूरी तरह तबाह हो गया। पुदुचेरी, आन्ध्रप्रदेश और केरल में भी सैकड़ों लोग मारे गए। लाखों एकड़ फसल जलमग्न हो गई।

गौर करें तो इंडोनेशिया और श्रीलंका भारत से भी अधिक दुर्भाग्यशाली रहे। इंडोनेशिया में 94 हजार लोग और श्रीलंका में 30 हजार लोग परलोक सिधार गए। आमतौर पर भारत में चक्रवाती तूफान आने का समय अप्रैल से दिसम्बर के बीच होता है। इस समय तूफान शबाब पर होते हैं। सामान्य चक्रवात वायुमण्डलीय प्रक्रिया है परन्तु जब यह पवनें प्रचंड गति से चलती हैं तो विकराल आपदा का रूप धारण कर लेती हैं। त्रासदी यह है कि आज तक इन चक्रवाती तूफानों की उत्पत्ति के विषय में कोई सर्वमान्य सिद्धान्त नहीं बन पाया है। इनकी गति बेहद रहस्यमयी होती है।

अमूमन माना जाता है कि गर्म इलाकों के समुद्र में सूर्य की भयंकर गर्मी से हवा गर्म होकर बहुत ही कम वायुदाब का क्षेत्र बना देती है। इसके बाद हवा गर्म होकर तेजी से ऊपर आती है और ऊपर की नमी से सन्तृप्त होकर संघनन से बादलों का निर्माण करती है। इस जगह को भरने के लिये नम हवाएँ तेजी से नीचे जाकर ऊपर उठती हैं और ये हवाएँ बहुत तेजी के साथ इस क्षेत्र के चारों तरफ घूमकर बादलों और बिजली कड़कने के साथ मूसलाधार बारिश करती हैं। अच्छी बात है कि चक्रवाती तूफानों की पूर्व सूचना अब भारत में भी विकसित हो गई है।

इस बार भी मौसम विज्ञानियों ने चक्रवाती तूफान की पूर्व सूचना नाविकों, मछुवारों, किसानों तथा जनसामान्य को दे रखी थी, जिससे हजारों लोगों की जान बच गई। इस तूफान में अभी तक सिर्फ आधा दर्जन लोगों के मारे जाने की खबर है, लेकिन इस तूफान में बड़े पैमाने पर घर और फसलें नष्ट हुई हैं। इस तबाही से नुकसान होने की क्षतिपूर्ति सरकार को मुआवजा देकर करनी होगी।

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