टाइम बम बनतीं हिमालयी झीलें

यह ग्लोबल वार्मिंग का असर है या क्षेत्रीय जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कि अब ऊंचाई पर बर्फबारी नहीं, बारिश होने लगी है। हिमालयी क्षेत्रों की ग्लेशियर निर्मित झीलें राहत नहीं बल्कि आफत बन चुकी हैं।

उत्तराखंड राज्य में एक बड़ी समस्या झीलों में होना वाला ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट भी है। कुछ समय पहले तक यहां के ऊंचाई वाले स्थानों पर अधिक बारिश नहीं होती थी लेकिन अब यहां अक्सर बरसात होती है जिससे फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ गया है। इस तरह की बाढ़ में अब तक कितने ही घर, खेत और पशु तबाह हो चुके हैं। यहां तक कि गांवों का नामोनिशान तक मिट गया है। हिमालयी सदानीरा नदियां कभी भी तबाही बन सकती हैं। हिमालयी क्षेत्रों से सफेद बर्फ की चादर की जगह अब काले बादल खतरे के रूप में मंडराने लगे हैं। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र की तमाम ग्लेशियर निर्मित झीलों की पारिस्थितिकी बदलने से राज्य के ऊपरी इलाकों में तबाही का खतरा बढ़ रहा है। ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (जीएलओएफ) की घटनाओं में अचानक बढ़ोतरी हो गई है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से मौसम में आए बदलाव ने भी क्षेत्र के पारिस्थितिकी को बड़े हद तक प्रभावित किया है। वैज्ञानिक यह स्पष्ट कर चुके हैं कि सिर्फ आर्कटिक या अंटार्कटिक ही नहीं, हिमालय के ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं। कभी पूरा उत्तराखंड राज्य हरे-भरे पहाड़ों से आच्छादित था लेकिन धीरे-धीरे स्थितियां बदल रही हैं। तमाम सदानीरा नदियां एवं प्राकृतिक जलस्रोतों में बदलाव आ रहे हैं उत्तराखंड की ग्लेशियर युक्त पर्वत श्रृंखलाएं व इससे जुड़ी घाटियां वाटर बैंक के रूप में जानी जाती हैं। इस क्षेत्र के 917 ग्लेशियर 3,550 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। आज भी इस राज्य में 2,267 जलस्रोतों से 16 हजार गांवों में पेयजल की आपूर्ति होती है एवं बारिश से जलभराव करने वाले स्रोतों से इन गांवों की खेती निर्भर है। विडंबना है कि जल संरक्षण या प्रबंधन के प्रभावी उपाय न होने से बारिश का अधिकांश जल बह जाती है।

उत्तराखंड में औसतन 1,240 मिलीमीटर यानी 66,320 मिलियन किलोमीटर पानी वर्षा से प्राप्त होता है जिसका अधिकांश नदियों के माधअयम से बह जाता है। प्रदेश के पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि 0.68 प्रतिशत जल भी संरक्षित किया जा सके तो राज्य के पेयजल की पूर्ति हो सकती है। वहीं यदि 2.36 प्रतिशत जल संरक्षित हो जाए तो सिंचाई जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। साथ ही, अगर 0.70 प्रतिशत और जल का संरक्षण किया जाए तो यहां की औद्योगिक आवश्यकता पूरी हो सकती है। राज्य सरकार ने एक एक्शन प्लान का दावा वर्षों पहले किया था जिसके तहत यहां वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली विकसित करने की बात कही गई थी लेकिन इसके परिणाम अब तक अपेक्षित हैं।

जबकि वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियरों के नीचे अवस्थित झीलों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है जिससे व्यापक तबाही की आशंका पैदा हो गई है। राज्य की 42 झीलों के टोपोशीट के कंपाइलेशन अध्ययन एवं मौजूदा आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पाया गया कि इन झीलों का स्थिति नाजुक बनी हुई है। गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूगर्भशास्त्र विभाग के उपाचार्य डॉ. एम.पी.एस. बिष्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन तापमान में वृद्धि एवं वनावरण (जंगल) की कमी से ज्यादातर झीलों का अस्तित्व संकट में है। वैसे तो राज्य की सभी झीलों के पानी का स्तर लगातार गिर रहा है लेकिन नैनीताल झील, जो पृथ्वी के गर्भ में छिपे जलस्रोत से ही जलापूर्तित रही है, का भी जलस्तर काफी हद तक गिरने लगा है। दरअसल, झीलों का जलस्तर वर्षा के प्रवाह और बर्फबारी पर निर्भर रहता है लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फबारी कम होने लगी है। इसका नतीजा यह है कि ग्लेशियर में बर्फ का स्तर घट रहा है और फिर झीलों के जलस्तर में गिरावट आ रही है। साथ ही, बर्फबारी कम समय होने से बर्फ सख्त क्रिस्टल में तब्दील नहीं हो पाती। लिहाजा, गर्मियां आते ही यह पिघलने लगती है। वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि ऊंचाई पर अब बर्फबारी से अधिक वर्षा होने लगी है। इससे भी ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगे हैं।

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्टग्लेशियल लेक आउटबर्स्टउत्तराखंड राज्य में एक बड़ी समस्या झीलों में होना वाला ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट भी है। कुछ समय पहले तक यहां के ऊंचाई वाले स्थानों पर अधिक बारिश नहीं होती थी लेकिन अब यहां अक्सर बरसात होती है जिससे फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) का खतरा बढ़ गया है। इस तरह की बाढ़ में अब तक कितने ही घर, खेत और पशु तबाह हो चुके हैं। यहां तक कि गांवों का नामोनिशान तक मिट गया है। 2003 में चमोली जिले के स्याकुरी गांव इसी तरह की एक घटना में जमींदोज हो चुका है। यानी हिमालयी सदानीरा नदियां कभी भी तबाही बन सकती हैं। 1970 में अलकनंदा नदी में बनी झील से नदी किनारे की बस्तियां जलमग्न हो गई थीं। ये ग्लोबल वार्मिंग का ही असर कहा जाएगा कि हिमालयी क्षेत्रों से सफेद बर्फ की चादर (ग्लेशियर) की जगह अब काले बादल खतरे के रूप मं मंडराने लगे हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्वैच्छिक संगठन इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंट्रीमेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी ईसीईएमडी द्वारा कराए गए ग्लेशियर सर्वे भी इसी तरह के संकेत मिले थे। नेपाल और भूटान में ग्लेशियर क्षेत्र के सर्वेक्षण के बाद ऐसे नतीजे इस संस्था को मिले थे। इस सर्वेक्षण के अनुसार, नेपाल की लगभग बीस और भूटान की 24 झीलों को टूटने से बचाना असंभव होगा। इससे लाखों लोगों की जिंदगी और अरबों की संपत्ति दांव पर लगी है। वर्ष 2009 में भूटान की पोंच नदी के कैंपमेंट में एक हिमनदीय झील ने तबाही का यह मंजर दिखाया भी था। हिमाचल में नाशा पा झाकरी जलविद्युत परियोजना भी इसी तरह तबाह हो गई। हिमाचल के कई जिलों में बाढ़ ने भी इस कारण तबाही मचाई थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि पहले बुग्यालों में भारी बर्फबारी होती थी। यहां कि वनस्पतियां कई दिनों तक बर्फ के नीचे अत्यधिक न्यूनतम तापमान में रहती थीं लेकिन अब सीधे वर्षा होती है। बर्फबारी यहां केवल जाड़ों में ही होती दिख रही है। इससे यहां उपजाऊ एवं बहुमूल्य समझी जाने वाली ऊपरी सतह बारिश के पानी से बह जाती है। नतीजतन बुग्यालों के बंजर होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। बुग्याल ऐसे क्षेत्र माने जाते हैं जहां वनस्पतियां अपना जीवनचक्र बहुत ही कम समय में पूरा कर सकती थीं लेकिन अब यह क्षेत्र भी खतरे में है।

जिन ऊंचाईयों पर बर्फबारी होती थी वहां बारिश से मचती है तबाहीजिन ऊंचाईयों पर बर्फबारी होती थी वहां बारिश से मचती है तबाहीइंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार काफी तेज हो गई है। पैनल का कहना है कि अगर यह दर यूं ही बरकरार रही तो साल 2035 तक ग्लेशियर का नामोनिशान काफी हद तक भी मिट जाएगा। फिलहाल, उत्तराखंड के केदारनाथ के पास स्थित चाटीवाड़ी ग्लेशियर प्रतिवर्ष 18 सेंटीमीटर पीछे खिसक रहा है। इसी तरह गंगोत्री, गौमुख तथा अन्य ग्लेशियर भी तेजी से खिसक रहे हैं। वाड़िया इंस्टीट्यूट, देहरादून के अंतर्गत हाल में गठित हिमालयन ग्लेशियोलॉजी सेंटर के वैज्ञानिक डॉ. डी.पी. डोभाल का अध्ययन भी इन खतरों को पुष्ट कर रहा है। डोभाल के मुताबिक, भारत के करीब 37,579 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में कुल 5,243 ग्लेशियर हैं। इनमें गंगोत्री ग्लेशियर सालाना 20 से 23 मीटर प्रतिवर्ष की दर से खिसक रहा है जबकि डुक्रियन ग्लेशियर 15 से 20 मीटर प्रति वर्ष की दर से घट रहा है।

इसके अलावा भारत में पहली बार कार्बन सूट (राख) के हिमालयी ग्लेशियरों पर पड़ने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन करने का फैसला लिया गया है। इस अध्ययन का मकसद यह पता लगाने की कोशिश करना है कि हिमालयी ग्लेशियरों पर वैश्विक के अलावा क्षेत्रीय कारकों का कितना प्रभाव पड़ता है। इसरो के अलावा उत्तराखंड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर एंड स्पेस और तिरुवनंतपुरम स्थित फिजिक्स लेबोरेटरी के वैज्ञानिक इस अध्ययन में शामिल होंगे।

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