सूर्यः मौसम का निर्माता

सूर्य पृथ्वी के मौसम रूपी इंजन को चलाने वाला ऊर्जा स्रोत है। सूर्य की ऊर्जा व ऊष्मा के बगैर कोयला, जीवाश्म ईंधन, पौधे, हवा और बारिश ही नहीं अपितु जीवन का भी अस्तित्व संभव नहीं है। सूर्य ही हवा के गर्म या ठंडी, तूफानी या शांत, बादलों भरी या स्वच्छ और आर्द्र या शुष्क होने का निर्धारण करता है। सूर्य की ऊष्मा के कारण ही हवाओं, बादलों, चक्रवातों और अन्य मौसम संबंधी परिघटनाओं का जन्म होता है।

सूर्य के केंद्र में तापनाभिकीय संलयन क्रिया द्वारा हाइड्रोजन परमाणु के नाभिक उच्च तापमान पर हीलियम परमाणु में बदल जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान वृहद मात्रा में उत्पन्न होने वाली ऊर्जा दूर तक फैलती है।सूर्य के केंद्र में तापनाभिकीय संलयन क्रिया द्वारा हाइड्रोजन परमाणु के नाभिक उच्च तापमान पर हीलियम परमाणु में बदल जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान वृहद मात्रा में उत्पन्न होने वाली ऊर्जा दूर तक फैलती है।

हम जानते हैं कि सूर्य एक तारा है। मध्याकार वाला यह तारा यानी सूर्य ही पृथ्वी की समस्त ऊर्जा का स्रोत है। सूर्य के क्रोड या केंद्र में मुख्यतः सबसे हल्का तत्व हाइड्रोजन उपस्थित होता है। हाइड्रोजन परमाणु सूर्य के केंद्र में अत्यंत उच्च ताप पर तापनाभिकीय संलयन अभिक्रिया द्वारा हीलियम के परमाणु का निर्माण करता है। इस प्रक्रिया के दौरान सूर्य से विशाल मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है, जिसका कुछ अंश हम पृथ्वी पर प्रकाश और ऊष्मा के रूप में प्राप्त करते हैं। पृथ्वी पर लगभग सभी गतिविधियाँ सूर्य से लगातार प्राप्त होने वाले प्रकाश और ऊष्मा पर ही निर्भर होती हैं। सूर्य के प्रकाश के बिना किसी भी वनस्पति का उगना असंभव है और वनस्पति की अनुपस्थिति में कोई भी जीव यहां तक की मानव भी जीवित नहीं रह सकता है। पृथ्वी पर उपलब्ध अन्य ऊर्जा स्रोत भी अप्रत्यक्ष रूप से सूर्य पर ही निर्भर हैं। लाखों वर्षों के दौरान जीवों और वनस्पतियों से बनने वाले कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के निर्माण में भी सूर्य की प्रमुख भूमिका है। यदि एक वर्ष की अवधि तक सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक न पहुंचे तब भी अनेक प्रजातियाँ उसी प्रकार समाप्त हो सकती हैं जिस प्रकार लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व एक विशाल क्षुद्रग्रह के पृथ्वी से टकराने पर उत्पन्न धूल और राख का मोटा सा आवरण बन जाने के कारण सूर्य का प्रकाश भूमि तक नहीं पहुंच पाया था और जिसके फलस्वरूप डायनासोर समेत अनेक प्रजातियां लुप्त हो गई थीं।

पृथ्वी पर ऊष्मा का असमान वितरण


पृथ्वी की सतह पर सूर्य प्रकाश की तीव्रता अक्षांशों पर निर्भर करती है।पृथ्वी की सतह पर सूर्य प्रकाश की तीव्रता अक्षांशों पर निर्भर करती है।

पृथ्वी का गोले सा आकार एवं इसके अपनी कक्षा के समतल में एक निश्चित कोण से झुके होने और अपने अक्ष पर घूमने के कारण पृथ्वी के सभी हिस्सों में वर्ष भर समान मात्रा में सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंचता है। भूमध्य रेखा पर सूर्य किरणों के सीधे पड़ने के कारण इस क्षेत्र के आसपास तापमान सदैव अधिक होता है। जब हम उत्तर से दक्षिण की ओर उच्च अक्षांशों की तरफ जाते हैं तब वहां तापमान कम होने के कारण मौसम अधिक सुहाना होता है। ध्रुवीय घेरे के पार तापमान का शून्य डिग्री सेल्सियस से कम होना वहां के मौसम को अत्यंत ठंडा रखता है।

किसी स्थान के मौसम के निर्धारण में उस स्थान से भूमध्य रेखा की दूरी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रायः भूमध्य रेखा के समीप के क्षेत्रों का औसत तापमान अधिक और भूमध्य रेखा के दूरस्थ क्षेत्रों का औसत तापमान कम होता है। जब हम ध्रुवों के समीप जाते हैं तो तापमान तीव्रता से घटता है जो ठंड के दिनों में शून्य से दस डिग्री सेल्सियस नीचे तक पहुंच जाता है। अकसर पर्वतों के ऊपर हवा के बहने की दिशा और बादलों के निर्माण से मौसम में अचानक बदलाव देखा जा सकता है।

सूर्य की ऊष्मा से हवा फैलकर हल्की होने लगती है। तब कहीं पर संवहन के कारण हवा के ऊपर उठने से निम्न दाब के क्षेत्र का निर्माण होता है तो कहीं ठंडी हवा सिकुड़ कर उच्च दाब के क्षेत्र का निर्माण करती है। दाब में संतुलन स्थापित करने के लिए उच्च दाब वाले क्षेत्र से हवा निम्न दाब वाले क्षेत्र की ओर बहती है इसके परिणामस्वरूप हवा गतिशील हो जाती है। इस गति को हम पवन के रूप में जानते हैं। दो क्षेत्रों के मध्य ताप और दाब में जितना अधिक अंतर होगा उनके मध्य चलने वाली हवाओं की गति उतनी ही तीव्र होगी।

सूर्य के अलावा पृथ्वी की सतह पर ऊष्मा के असमान वितरण के लिए अन्य कारक भी उत्तरदायी हैं। इन अन्य कारकों में ऋतु चक्र, अक्षांश, बादलों की उपस्थिति, धरती और सागरों से ऊष्मा का पुनः वितरण और हवाएं या पवनें शामिल हैं। पृथ्वी के गर्म हिस्सों में संवहन की घटनाएं अधिक होती हैं, इन हिस्सों में हम प्रतिकूल मौसम और अकसर तूफान आने की घटनाओं को देख सकते हैं।

पृथ्वी सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित कर वायु प्रवाह को जन्म देती है। वायु प्रवाह महासागरीय जल के वाष्पन को, बादलों के बनने को, बारिश को एवं जल-चक्र को प्रभावित करता है। सूर्य की किरणें समुद्रों के पानी को जलवाष्प में बदल कर उसे ऊपर उठाती हैं। जब जलवाष्प फैलकर ठंडी होती हैं तब इसमें समाई नमी छोटी-छोटी बुंदकियों में बदल कर बादलों का निर्माण करती है। सामान्यतः वायु का ऊपर की ओर खिंचाव बादलों को ऊंचाई पर स्थिर रखता है। लेकिन बादलों में पर्याप्त नमी और बारिश के लिए अनुकूल परिस्थितियों के उपस्थित होने पर ये सूक्ष्म बुंदकियां आपस में मिलकर बड़ी बूंदे बनाकर गुरुत्व के प्रभाव से धरती पर बारिश के रूप में बरसती हैं।

सौर धब्बे (सूर्य कलंक) और मौसम


सौर कलंक पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।सौर कलंक पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

बीते वर्षों में मौसमी तथ्यों के विकास से यह पता लगा है कि सूर्य की क्रियाओं से होने वाले व्यवधान या सौर धब्बों की उपस्थिति के कारण सूर्य से आने वाली ऊर्जा में हल्का और सूक्ष्म परिवर्तन भी पृथ्वी के मौसम को प्रभावित कर सकता है। इस प्रकार के सह-संबंधों का अवलोकन पहली बार चीनी खगोलविदों ने एक हजार वर्ष पहले किया था। हाल के समय में सूर्य कलंक की प्रति ग्यारह वर्षों के एक चक्र या सौर चक्र के बारे में पता लगाया जा चुका है। यह सौर चक्र पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में ध्रुवीय ज्योति और रेडियो ब्लैक आउट जैसे व्यवधानों से संबंधित होता है। सौर चक्र के दौरान सौर धब्बों की संख्या और प्रदीप्ति गतिविधियां के उच्चतम से अधिकतम गतिविधि अवधि को दर्शाया जाता है।

सौर धब्बे सूर्य के चुंबकत्व गुण से संबंधित होते हैं। वास्तव में सौर धब्बे हमेशा जोड़ों में उपस्थित रहते हैं। यदि हम बहुत विशाल घोड़े की नाल सूर्य की सतह के नीचे गाड़ दे तब यह सूर्य कलंकों के युग्म की तरह चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करेगा। हजारों वर्षों के आंकड़े यह बताते हैं कि करीब एक हजार वर्ष पहले सौर चुंबकत्व बहुत अधिक हो गया था तब से प्रत्येक 300 सालों में या और अधिक समय में यह कम होता है। सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र के कम होने पर पृथ्वी ठंडी होने लगती है। पिछले 20 वर्षों में नासा के उपग्रहों ने सौर चुंबकत्व एवं सूर्य द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा और पृथ्वी के तापमान में होने वाले परिवर्तन के सहसंबंधों का पता लगाया है। आंकड़े दर्शाते हैं कि जब सौर चुंबकत्व क्षेत्र के कम होने पर बादल अधिक क्षेत्र में छाए रहते हैं तब शायद पृथ्वी से कुछ किलोमीटर ऊपर कॉमिस्क विकिरण नाभिकीय बीज की भांति व्यवहार दर्शाती हैं।

फिर भी सौर चक्र के कारण सूर्य से आने वाली ऊर्जा में बहुत कम विचलन होता है, जिसकी मात्रा लगभग 0 से 1 प्रतिशत से भी कम होती है। कुछ वैज्ञानिक इस विचलन का पृथ्वी के क्षोभमंडल, जहां सभी मौसमी घटनाएं घटित होती हैं, पर किसी प्रकार के प्रभाव की बात पर संदेह व्यक्त करते हैं। लेकिन यह संभव है कि सौर चक्र समताप मंडल को प्रभावित करता है जिसका पृथ्वी के मौसम पर प्रभाव पड़ता है। इस सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता कि सौर चक्र के दौरान सूर्य से आने वाले समस्त विकिरणों की तुलना में पराबैंगनी विकिरणों में 10 गुना अधिक विचलन होता है जिससे समतापमंडल, जहां ओजोन पर्त पराबैंगनी विकिरणों को अवशोषित करती है, का तापमान सौर चक्र के अनुसार बदलता रहता है।

मौन्डर न्यून


ऐतिहासिक आंकड़ों से सूर्य कलंकों और मौसम के संबंधों को जाना जा सकता है। इटली के खगोलविज्ञानी गैलीलियो गैलिली द्वारा सौर धब्बों की खोज के बाद के 70 वर्षों में यानी 1645 से 1715 तक की अवधि के दौरान सूर्य पर सौर धब्बे नजर नहीं आए थे। ब्रिटिश खगोलविज्ञानी एडवर्ड वाल्टर मौन्डर, जिन्होंने पिछले अभिलेखों (रिकार्डस्) में पहली बार इसे देखा था इसके नाम पर इस समय को मौन्डर न्यून कहा जाता है। अभिलेखों से यह पता चलता है कि यह परिघटना पिछले कुछ समय के दौरान होने वाली उत्तरी ध्रवीय ज्योति जैसी सौर गतिविधियों से भी संबंधित थी। इस अवधि को यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका में आए छोटे हिम युग से भी जोड़ा गया। इस अवधि के दौरान खगोलविज्ञानियों ने 30 वर्षों के दौरान अवलोकित 40,000 से 50,000 सौर धब्बों की तुलना में केवल 50 सौर धब्बों को ही देखा था।

सन् 1645 से 1715 यानी 70 वर्षों की यह विशिष्ट अवधि, जिस दौरान सूर्य कलंक प्रकट नहीं हुए थे, को मौन्डर न्यून कहते हैं।सन् 1645 से 1715 यानी 70 वर्षों की यह विशिष्ट अवधि, जिस दौरान सूर्य कलंक प्रकट नहीं हुए थे, को मौन्डर न्यून कहते हैं।

निम्न सौर गतिविधियों की अवधि में यानी सौर धब्बों की संख्या कम होने पर (सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरणों के घटने पर) पृथ्वी के क्षोभमंडल में ओजोन के निर्माण पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है जो महासागरों के तापन को परिवर्तित कर सकता है। इसके परिणामस्वरूप ठंड के दिनों में तापमान एक डिग्री सेल्सियस से दो डिग्री सेल्सियस तक कम हो कर नदियों के जमाव में सक्षम होने के साथ कृषि व अर्थव्यवस्था आदि क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है। इस संबंध के आधार पर वैज्ञानिकों द्वारा भविष्य में सौर गतिविधियों में होने वाले परिवर्तन और उनका पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में पूर्वानुमान लगाने के लिए एक मॉडल प्रस्तुत किया है।

जीवाश्म ईंधनों के दहन से उत्पन्न ग्रीन हाउस गैसों की तुलना में सूर्य हमारे मौसम को कैसे प्रभावित करता है? मौसमी आंकड़ो से यह प्रमाणित हुआ है कि 19वीं सदी की तुलना में 20वीं सदी गर्म रही है। पिछली सदी में मौसम में तीन मुख्य बदलाव देखे गए-बढ़ती गर्मी जो 1940 के दौरान अपने शिखर पर थी, सन् 1970 तक औसत तापमान का कम होना और फिर गर्मी का बढ़ता जाना। अब वैश्विक स्तर पर इस बात पर सहमति हो गई है कि हाल के दशक में विश्व के अनेक स्थानों पर मौसम की अनिश्चितता और विश्व के औसत तापमान में वृद्धि यानी ग्लोबल वार्मिंग के लिए मानवीय गतिविधियों के कारण वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ती मात्रा जिम्मेदार है। यद्यपि मौसम के निर्धारण में सूर्य महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है लेकिन मानव भी मौसम को काफी हद तक प्रभावित करता है। इसलिए भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने के लिए अभी से उचित कदम उठाने की आवश्यकता है।

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