शहजादापुर गाँव के किसान मछलीपालन से ला रहे बदलाव

fish farming
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मत्स्य पालन रोजगार के अवसर तो पैदा करता ही है, खाद्य पूर्ति में वृद्धि के साथ-साथ आय में वृद्धि करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। आज बिहार मत्स्य उत्पादक राज्य के रूप में उभर रहा है। एक समय था, जब मछलियों को तालाब, नदी या सागर के भरोसे रखा जाता था, परन्तु बदलते वैज्ञानिक परिवेश में इसके लिये कृत्रिम जलाशय बनाए जा रहे हैं, जहाँ वे सारी सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं, जो प्राकृतिक रूप में नदी, तालाब और सागर में होती हैं। गाँवों के वे युवा, जो कम शिक्षित हैं, वे भी मछली पालन कर अच्छी आजीविका अर्जित कर सकते हैं। मछली और पानी के अन्य जीव कई लोगों के खाने का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं, इस वजह से मछली पालन एक दिलचस्प करियर के रूप में उभरता जा रहा है।

प्रोटीन से भरपूर मछलियाँ पौष्टिक होने के साथ-साथ स्वादिष्ट भोजन का एक भाग भी हैं। ज्यादातर इन्हें तटीय इलाकों से हासिल किया जाता है और पूरे देश में जरूरत के अनुसार इनकी आपूर्ति की जाती है। इनकी आवश्यकता को देखते हुए मछली पालन करियर के रूप में उभरता जा रहा है और इस क्षेत्र से जुड़ने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।

कभी मत्स्य पालन मछुआरों तक ही सीमित था, किन्तु आज यह सफल और प्रतिष्ठित लघु उद्योग के रूप में स्थापित हो रहा है। नई-नई टेक्नोलॉजी ने इस क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है।

मत्स्य पालन रोजगार के अवसर तो पैदा करता ही है, खाद्य पूर्ति में वृद्धि के साथ-साथ आय में वृद्धि करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। आज बिहार मत्स्य उत्पादक राज्य के रूप में उभर रहा है। एक समय था, जब मछलियों को तालाब, नदी या सागर के भरोसे रखा जाता था, परन्तु बदलते वैज्ञानिक परिवेश में इसके लिये कृत्रिम जलाशय बनाए जा रहे हैं, जहाँ वे सारी सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं, जो प्राकृतिक रूप में नदी, तालाब और सागर में होती हैं। मछली पालन के क्षेत्र में मछलियों के प्रजनन और मछलियों से बने विभिन्न उत्पादों को तैयार किया जाता है।

बिहार के कुछ गाँवों में कृत्रिम तरीके से मछलियों का तालाब बनाकर मछली का उत्पादन करने में किसान व डिग्रीधारी युवा लगें हैं। ऐसा ही कुछ बिहार राज्य के गाँव में देखा जा सकता है। बिहार के समस्तीपुर जिले के सरायरंजन के शहजादापुर गाँव के लोगों की तकदीर मछलीपालन से बदल रहे हैं। यहाँ के लोगों की लाइफस्टाइल भी बदल गई है। यहाँ पानी में डूबे खेत में कोई फसल तक नहीं होती थी। आज यह जमीन धन बरसाने लगी है।

अस्सी एकड़ जमीन में बने तालाब से सालाना डेढ़ से दो करोड़ रुपए तक की कमाई होती है। मछलीपालन के लिये किसानों ने सहकारी समिति बनाई है। इसमें गाँव के 37 से 50 किसान जुड़ गए हैं। 2009 से यहाँ मछलीपालन की शुरुआत हुई थी। प्रॉफिट देखकर आस-पास के गाँव के लोग भी मछलीपालन करने लगे हैं। विद्यापति डुमदहा चौर और क्योंटा दलिसंहसराय के किसान भी यहाँ के किसानों से मछलीपालन का गुर सीख कर मछलीपालन करने लगे हैं।

साथ ही यहाँ समेकित (इंटीग्रेटेड) खेती पर भी किसानों का जोर है। मछली के साथ दूध, अंडा, मांस, फल व सब्जी का भी उत्पादन हो रहा है। तालाब से ही मछली बिक जाती है। इन तालाबों से सालाना 200 टन मछली समस्तीपुर जिले में खपत हो जाती है। यहाँ रोहू, कतला व नैनी मछली होती है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जिस तरह यहाँ के किसानों ने यह व्यवस्था की है, वह काबिले तारीफ है। समस्तीपुर जिला बहुत जल्द मछली पालन के क्षेत्र में आन्ध्र प्रदेश की श्रेणी में आ खड़ा होगा। उन्होंने कहा कि यदि ऐसी तकनीक अन्य किसान भी अपनाएँ तो बिहार मछली पालन के क्षेत्र मे भी सबसे आगे होगा। मुख्यमंत्री की खुशी का एक कारण यह भी था कि आन्ध्र प्रदेश की तरह यहाँ के कृत्रिम तालाबों में मछलियों की भरमार थी।

मुख्यमंत्री ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि इससे रोजगार के क्षेत्र में इजाफा होगा और जिले के साथ ही बिहार की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। मुख्यमंत्री ने मछली पालन व्यवसाय से जुड़े लोगों को भरोसा दिलाया कि सरकार इस मछली पालन को बढ़ावा देने के लिये हरसम्भव प्रयास करेगी।

इस क्षेत्र में असीम सम्भावनाएँ हैं। इसलिये इस उद्योग को आगे बढ़ाने में बिहारवासियों का आगे आना होगा। नेशनल फिशरीज डेवलपमेंट बोर्ड के अधिकारी भी यहाँ मछलीपालन देखने पहुँच चुके हैं। उनका कहना था कि फिशरी डायरेक्टरेट की ओर से यहाँ के किसानों को फैसिलिटीज की गई है। पानी नहीं सूखे इसके लिये सोलर पम्प सेट लगाए गए हैं। तालाब की मेढ पर सब्जी व केले व अमरूद की खेती भी होती है। गौपालन के साथ ही मुर्गीपालन भी हो रही है।

तालाब में बतख पालन भी हो रहा है। फिशरी साइंटिस्ट की सलाह गाँव वालों की मेहनत और लगन ने यहाँ की लाइफस्टाइल भी बदल दी। कल तक गाँव के स्कूलों में पढ़ाई करने वाले बच्चे अब शहरों के बड़े स्कूलों में पढने लगे हैं। किसान अपने बच्चों को इंजीनियरिंग व एमबीए आदि की पढाई कराने में काबिल हो गए हैं। एमबीए और इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद भी यहाँ के कई बच्चों ने बड़े पैकेज पर नौकरी की जगह मछलीपालन करना बेहतर समझा। गाँव के विकास कुमार भी ऐसे ही युवक हैं, जो एमबीए की डिग्री लेने के बाद मछलीपालन का काम कर रहे हैं।

उनका कहना है कि मछली पालन मे खासतौर इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि मछली पालन एक ऐसा व्यवसाय है जिसे गरीब-से-गरीब किसान अपना रहे हैं एवं अच्छी आय प्राप्त कर रहें है। तथा समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाया है।

विभिन्न माध्यमों से मत्स्य पालन व्यवसाय में लगकर अपना आर्थिक स्तर सुधार रहा है तथा सामाजिक स्तर में भी काफी सुधार भी हुआ है। आज मत्स्य व्यापार में लगी महिलाएँ पुरु षों के साथ बराबर का साथ देकर स्वयं मछली बेचने बाजार जाती हैं जिससे उनकी इस व्यवसाय से संलग्न रहने की स्पष्ट रुचि झलकती दिखाई देती है।

कई किसान समूहों का गठन कर मिलकर आर्थिक स्तर सुधारने का कार्य कर रही हैं वहीं दूसरी ओर समाज को एकसूत्र में बाँधकर आगे बढ़ाने का सराहनीय कार्य कर रही हैं। आज के परिवेश में समाज में उत्कृष्ट स्थान बनाने के लिये बच्चों की शिक्षा पर उचित ध्यान देकर उनके भविष्य को सँवारने एवं समाज में उचित स्थान दिलाने के लिये यह एक सराहनीय कदम है।

शिक्षा को समाज का मुख्य अंग माना गया है क्योंकि शिक्षित समाज ही एक उन्नत समाज की रचना कर सकता है तथा समाज के साथ-साथ अपने घर, ग्राम, देश के विकास में अपना पूर्ण योगदान दे रहा है। शहजादापुर के सोनमार्च चौर फिशरी डेवलपमेंट कमेटी के मेम्बर सुनील कुमार ने बताया कि तत्कालीन जिला फिशरी के अधिकारी मछलीपालन की सही तकनीक बनाने के साथ खूब मोटीवेट किया। तब सभी किसान तालाब बनाने के लिये तैयार नहीं हो रहे थे। बाद में कारवाँ बढ़ा और आज यह इलाका मछलीपालन का मॉडल बन चुका है।

एनएफडीबी ने मछलीपालन ट्रेनिंग सेंटर, फिश फीड मिल और अन्य के लिये एक करोड़ का प्रोजेक्ट बनाया है। पर, डिपार्टमेंटल लेटलतीफी में अभी यह फँसा है। फिशरी वैज्ञानिकों का कहना है कि गाँव के लोग फिशरी के बिजनेस को लेकर मोटिवेटेड हैं। मछलीपालन के लिये आन्ध्र प्रदेश भेज कर इन्हें ट्रेंनिंग दी गई। डिपार्टमेंट के स्तर पर जो फैसिलिटी दिलाई जा सकती थीं, दिलाने का प्रयास किया गया। गाँव वालों ने जब भी बुलाया, मछलीपालन में आ रही दिक्कतों का समाधान किया।

मत्स्यपालकों के बीच अब मत्स्य विभाग 50 प्रतिशत अनुदान पर अंगुलिका बीज वितरण करने की योजना बना रही है। इसको लेकर विभागीय प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह बीज चयनित मत्स्यपालकों के बीच दिया जाएगा, ताकि लोग मत्स्यपालन कर खुद रोजगार से जुड़े और कइयों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में रोजगार दे सके। इसको लेकर मत्स्य विभाग ने तैयारी शुरू कर दी है। जिले में मत्स्यपालन में और कई किसान जुड़े हुए हैं, जो सरकारी व निजी जल कर पर मत्स्य पालन करते हैं। इस बार भी जिले में बम्पर मत्स्यपालन की सम्भावना है।

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Post By: RuralWater
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