सालों पुराने जल विवाद का निपटारा


कावेरी जल विवाद पर आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दिल्ली और हरियाणा के बीच यमुना जल बँटवारे, पंजाब और हरियाणा के बीच सतलज जल बँटवारे, मध्य प्रदेश और गुजरात के बीच नर्मदा जल के बँटवारे और बिहार, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के बीच चल रहे सोन के जल विवाद के भी निपटने की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

इसे सुखद आश्चर्य माना जा रहा है कि कावेरी के जल के बँटवारे से सम्बन्धित सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और कर्नाटक तथा तमिलनाडु में कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया नहीं हुई। 137 साल पहले कावेरी पर बने बाँध से किसे कितना पानी मिले यह विवाद इतनी शांति से कभी नहीं निपटा था। दोनों राज्य सरकारों ने खुद से सुरक्षा के इन्तजाम किये थे और सुप्रीम कोर्ट ने भी सुरक्षा के निर्देश दिये थे। हालाँकि कोर्ट के फैसले की असल परीक्षा इसे जमीनी स्तर पर लागू कराने के तरीके से होगी। इस मामले में कोर्ट ने केंद्र को ‘कावेरी मैनेजमेंट बोर्ड’ का गठन करने का निर्देश भी दिया है। यह बोर्ड बतौर नियामक कोर्ट के फैसले को लागू करायेगा। इसके लिये सरकार को छह हफ्ते का समय भी दिया गया है।

जब बाँध बना था, तब पानी खासकर सिंचाई की बहुत जरूरत थी। लिहाजा तब के मैसूर रियासत से समझौता करके तमिलनाडु यानी तब के मद्रास प्रेसिडेंसी ने साधन लगाये थे। तब जल विवाद ऐसा न था। जब विवाद होने लगा तो दोनों सरकारों ने समझौता किया था। उसको लेकर भी कुछ आपत्तियाँ थीं, पर 1924 में हुआ समझौता पचास साल तक चला। असल समस्या शुरू हुई 1974 में समझौता खत्म होने के बाद। तबसे अदालती लड़ाई से लेकर सड़क पर हिंसा तक का सहारा लिया गया और एक पंचाट बनाकर निपटारे की असफल कोशिश भी की गई। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले पंचाट के फैसले को किसी ने नहीं माना और बात सर्वोच्च अदालत तक पहुँची जिसे अभी भी विवाद के बाकी पक्षों पर फैसला करना है। लेकिन हाल ही में आये फैसले के बाद यह उम्मीद बढ़ी है कि मामला शांति से निपट जायेगा। बात सिर्फ तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुदुच्चेरी के बीच पानी के बँटवारे भर की नहीं है। अदालत ने इस बार के फैसले में केरल और पुदुच्चेरी को मिलने वाले पानी की मात्रा में कमी या वृद्धि नहीं की। उसने तमिलनाडु का पानी घटाया और कर्नाटक को 177 अरब क्यूसेक पानी बढ़ा दिया। इससे कर्नाटक में खुशी है क्योंकि वहाँ की खेती को ही नहीं बल्कि बंगलुरु जैसे शहर को पेयजल की भी तकलीफ होने लगी थी।

कर्नाटक अपने कोडुगु जिले से निकलने वाली कावेरी पर हक जताता रहा है, पर जिस बाँध से पानी रोककर नहरों के जरिये इस्तेमाल होता है, उस पर ज्यादातर खर्च तमिलनाडु का हुआ है इसीलिये तमिलनाडु के लिये भी यह उतना ही संवेदनशील मसला है। साढ़े सात सौ किलोमीटर के लम्बे रास्ते में कावेरी कर्नाटक और तमिलनाडु ही नहीं केरल और पुदुच्चेरी के कुछ हिस्सों से भी गुजरती है इसीलिये उनको भी क्रमशः तीस और सात अरब क्यूसेक पानी मिलता है। इस बार के शांतिपूर्ण फैसले के बाद दिल्ली और हरियाणा के बीच यमुना जल बँटवारे, पंजाब और हरियाणा के बीच सतलज जल बँटवारे, मध्य प्रदेश और गुजरात के बीच नर्मदा जल के बँटवारे और बिहार, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के बीच चल रहे सोन के जल विवाद के भी निपटने की उम्मीदें बढ़ गई हैं, हालाँकि नदियों के पानी को लेकर इतने सारे विवाद और जो कुछ भी बताते हों, पानी के बढ़ते महत्त्व को जरूर बताते हैं। ऐसे में हमें सिर्फ विवाद के निपटने से खुश होने की जगह जल संरक्षण और बेहतर इस्तेमाल की चिंता भी करनी चाहिए। अदालत का ताजा फैसला तो पंद्रह साल के लिये ही है लेकिन जिस तरह की शांति इस बार रही वह इस ओर एक उम्मीद तो बँधाती ही है।

कई लोगों का मानना है कि इस बार तमिलनाडु की राजनीति जितनी अस्त-व्यस्त है, उसने भी इसमें एक भूमिका निभाई क्योंकि हर बार का विरोध और हिंसा राजनैतिक दल ही उकसाते थे। अन्नाद्रमुक नेता जयललिता ने इस सवाल पर कई बार अनशन किया, पर अब शासन में रहने के बावजूद अन्नाद्रमुक अपने अंदरूनी विवादों में इस तरह उलझी है कि उसे इस तरह के मुद्दे उठाने की फुर्सत नहीं है। देश में भी पीएनबी घोटाला समेत दूसरे इतने बड़े मसले इस फैसले के आस-पास ही दिखे कि इस प्रकरण पर कायदे से चर्चा भी नहीं हुई। इन ऋणात्मक कारणों को भी गिन लें, तब भी इस बार जो हुआ उसे शुभ ही मानना चाहिए वरना कावेरी पंचाट ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के 2016 के फैसले को भी किसी पक्ष ने नहीं माना था, जबकि उनमें कोई बड़ा बदलाव करने की कोशिश नहीं हुई थी। साफ लगता है कि हमारी आज की राजनीति जितना बनाती नहीं है, उससे ज्यादा चीजों को बिगाड़ती है:

वहीं प्राकृतिक संसाधनों पर किसका हक हो यह एक बड़ा सवाल है और उस पर ढंग से विचार करके ही हम इस तरह के विवादों का स्थायी हल खोज पायेंगे। बताना न होगा कि दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे विवादों के बीच यह सवाल भी बड़ा बनता जा रहा है क्योंकि पानी, हवा, मिट्टी, जंगल, खनिज से जुड़े मसले हर कहीं से उठ रहे हैं और यह भी तथ्य है कि जल, जंगल, जमीन, खनिज, वन सम्पदा से लेकर हर संसाधन शहरी और पैसे वालों के इस्तेमाल में ही आ रहे हैं जबकि इनके स्वाभाविक अधिकारी इनसे वंचित हो रहे हैं। आजाद भारत में ही करीब 5 करोड़ आदिवासी और ग्रामीण विभिन्न ‘विकास’ योजनाओं के नाम पर अपनी जमीन से हटाये गये हैं। उनके पुनर्वास का सवाल तो प्रमुख है ही, इन विकास योजनाओं का कोई लाभ भी उन्हें नहीं मिला है। अब तो नदियों को बेचने और बड़ी-बड़ी कम्पनियों के हवाले करने का अभियान भी शुरू हो चुका है। इसमें गरीब किसान, आदिवासी और मूलवासी लोग कहाँ जायेंगे? लाभ पाने वालों में भी जिसके पास जितनी दौलत है, वह उतना उपभोग करता है, बर्बादी करता है।

पानी के बारे में एक फॉर्मूला बहुत अच्छा माना जाता है कि पानी की बूँद जिसकी जमीन पर गिरे या जिसकी जमीन के अन्दर हों, उसका हक पहला होना चाहिए। पानी के इस्तेमाल में इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि अगर व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा है तो उसका लाभ भी बराबर बँटे। पानी के इस्तेमाल में होने वाले निवेश का सवाल छोटा है और राज्य की जगह समुदाय के अधिकार को ऊपर करना फैसला मनवाने का आधार बन सकता है। तीसरी बात जरूरत की प्राथमिकता की है। पीने के पानी को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए, खेती, पशुओं के इस्तेमाल का नम्बर बाद में आता है। पर लॉन की सिंचाई और कुत्ते जैसे पशुओं को नहलाने का नम्बर सबसे आखिर में होना चाहिए। अगर शीतल पेय से लेकर किसी भी व्यावसायिक इस्तेमाल की जरूरत हो तो स्थानीय समुदाय की इजाजत और लाभ में उसकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

लेखक परिचय
अरविंद मोहन, पॉलिटिकल एक्सपर्ट हैं

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