पर्यावरण कानून : विश्व भर में एक समान हों

पर्यावरण कानून : विश्व भर में एक समान हों
पर्यावरण कानून : विश्व भर में एक समान हों

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 14 व 21 का दायरा बढ़ाकर स्वच्छ वातावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को भी शामिल किया गया है. जो कि पूरी तरह से ‘इकोसाइड’ को लेकर चल रहे प्रयासों को अपना समर्थन अप्रत्यक्ष रूप से दे रहा है। अतः अब भारत को भी इकोसाइड को लेकर कुछ प्रयास करना चाहिए। तभी हम प्रकृति के अधिकारों की रक्षा के साथ पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रख सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद-21 को लेकर कहा कि यह पृथ्वी पर जीवन के अधिकार की रक्षा करता है, क्योंकि इसका सीधा संबंध वायु, जल, मृदा प्रदूषण से है। इसी तरह अनुच्छेद-14 में समानता का अधिकार शामिल है।

हालांकि सरकारों द्वारा समय-समय पर पर्यावरण पारिस्थितिकी को संरक्षित करने के लिए एक दर्जन से ज्यादा नियम, नीति व कानून बनाए गए हैं। लेकिन अभी भी समुच्चय रूप से एक ऐसे कानून की जरूरत है, जो प्रकृति के नियमों के अनुसार धरती पर जीवन की रक्षा कर सके। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में दखल देना पड़ा, क्योंकि हवा पानी और भोजन की आवश्यकता प्रत्येक जीवधारी को है। पृथ्वी को विभाजित देश की सीमाओं ने किया है, नहीं तो पृथ्वी में सबके लिए सभी वस्तुओं का बराबर-बराबर अनुपात निश्चित है। वैसे तो विश्व में पर्यावरणीय कानून देश-काल, जलवायु और परिस्थिति के अनुसार होने चाहिए। लेकिन पृथ्वी पर अगर कहीं भी किसी स्थान पर प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन किया जाता है तो इसका प्रभाव पूरे ब्रह्मांड का पड़ता है अतः प्राकृतिक नियमों के साथ सामंजस्य बनाए रखने के लिए एक समान पर्यावरणीय नियमों का पालन आवश्यक होगा।

विश्व में तमाम तरह के प्रयास जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए अपने-अपने स्तर पर किए जा रहे हैं। जैसा कि वैज्ञानिकों द्वारा हाल ही में क्लाउड ब्राइटनिंग तकनीकी का प्रयोग किया था। क्लाउड ब्राइटनिंग सोलर एनर्जी को वापस अंतरिक्ष में भेजने के कई तरीकों में से एक है। इस तरह की तकनीक को सोलर रेडिएशन मॉडिफिकेशन, सोलर जियो इंजीनियरिंग और क्लाइमेट इंटरवेंशन भी कहा जाता है। इसके अलावा भारत सरकार भारत सरकार के प्रयास से ही अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस का भी गठन किया गया है, जिसके माध्यम से जलवायु परिवर्तन की समस्याओं को रोकने में सौर ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया गया। यही वजह है कि जी-20 सम्मेलन में भारत की तरफ से थीम भी ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ थी, जो कि इस बात को स्पष्ट करती है कि पृथ्वी के संरक्षण के लिए एक कानून लागू किया जाए।

इसके अलावा पीएम मोदी ने 'ग्रीन क्रेडिट' कहे जाने वाले अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण की ओर बढ़ने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने जी-20 देशों से सकारात्मक पर्यावरणीय प्रयासों को बढ़ावा देने और रचनात्मक पहल को प्रोत्साहित करने के लिए 'ग्रीन क्रेडिट पहल' पर काम शुरू करने का आग्रह किया। भारत ने अपने पर्यावरणीय कार्यों के लिए व्यक्तियों, निजी क्षेत्रों, लघु उद्योगों, सहकारी समितियों, वानिकी उद्यमों और किसान उत्पादन संगठनों द्वारा किए गए स्वैच्छिक पर्यावरणीय कायों को प्रोत्साहित करने के वास्ते 'ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम' तैयार किया है। इसके अलावा देश के केंद्रीय बैंक की एक रिपोर्ट में बुधवार को कहा गया कि भारत अपने विभिन्न उद्योगों को जलवायु परिवर्तन मानदंडों के अनुरूप ढालने के लिए 2030 तक अनुमानित 85.6 ट्रिलियन रुपये (1.05 ट्रिलियन डॉलर) खर्च करेगा और यही खर्च अगर सामूहिक रूप से सभी देशों द्वारा किया जाए तो शायद हम पर्यावरण के नुकसान की भरपाई जल्दी कर पाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के खिलाफ एक बहुप्रचारित, लेकिन कम स्पष्ट अधिकार को संविधान में एक विशिष्ट मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है।  

यह स्पष्ट होना अभी बाकी है कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के खिलाफ लोगों का अधिकार है। ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि यह अधिकार और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन से होने वाली तबाही साल-दर-साल बढ़ती जा रही है, इसे एक अलग अधिकार के रूप में व्यक्त करना आवश्यक हो जाता है। इसे अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीवन का अधिकार) द्वारा मान्यता प्राप्त है। अदालत ने जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य के अधिकार, स्वदेशी अधिकार, लैंगिक समानता और विकास के अधिकार सहित विभिन्न मानवाधिकारों के बीच अंतसंबंध पर भी प्रकाश डाला। फैसले में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से सुरक्षित स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार एक 'मौलिक मानव अधिकार' है। 'स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार का उल्लंघन कई अधिकार क्षेत्रों में हो सकता है जिसमें जीवन का अधिकार, व्यक्तिगत अखंडता, स्वास्थ्य, पानी और आवास के साथ-साथ सूचना, अभिव्यक्ति, संघ और भागीदारी जैसे प्रक्रियात्मक अधिकार शामिल है। अदालत ने जलवायु परिवर्तन की समस्याओं को रोकने में सौर ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।

पूरा ब्रह्मांड सहअस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित है। इसीलिए यह जीवंत है। अवलोकनों से पता चलता है कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है एवं विकास जीव जंतुओं की एक अंतर्निहित विशेषता है। इसी तरह 1927 में विकसित विग बैंग सिद्धांत भी जीवन निर्माण के लिए यह वैज्ञानिक व्याख्या करता है। इसके अलावा कॉसमॉस का अर्थ "ब्रह्मांड होता है, लेकिन इस शब्द का प्रयोग आम तौर पर एक व्यवस्थित या सामंजस्यपूर्ण ब्रह्मांड से है। संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण कानून भी इसी बात की वकालत करता है कि पर्यावरणीय स्थिरता जीवन के लिए एक आधार है और बढ़ते पर्यावरणीय दबावों की तुलना में इसके उद्देश्यों की पूर्ण प्राप्ति और भी जरूरी हो गई है। पर्यावरण कानून का उल्लंघन सतत विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के सभी आयामों की उपलब्धि को कमजोर करता है। अनुमान है कि पृथ्वी पर अब तक रहने वाली सभी प्रजातियों में से 99 प्रतिशत से अधिक, यानी पांच अरब से अधिक प्रजातियां, विलुप्त हो गई हैं। हर दिन 150 प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। प्रति घंटे लगभग तीन प्रजातियां लुप्त हो रही हैं, जिसके परिणाम स्वरूप एक ही दिन में 72 प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं। प्रकृति संकट में है और स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। चूंकि प्रजातियां के लुप्त होने की दर 10 मिलियन वर्षों में नहीं देखी है। 1 मिलियन से अधिक प्रजातियां वर्तमान में कगार पर हैं। यूके स्थित यूटिलिटी विडर की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 30 वर्षों में 6,68,400 हेक्टेयर वन क्षेत्र खोने के बाद भारत वनों की कटाई की दर में दूसरे स्थान पर है। वायु प्रदूषण, कचरे का खराब प्रबंधन, पानी की बढ़ती कमी, भूजल स्तर में गिरावट, जल प्रदूषण, जंगलों का संरक्षण और गुणवत्ता, जैव विविधता की हानि और भूमि/मिट्टी का क्षरण कुछ प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दे हैं, जिनका भारत आज सामना कर रहा है।

यही सब कारण है कि दस देशों ने शांतिकाल के दौरान अपनी सीमाओं के भीतर पारिस्थितिकी हत्या को एक अपराध के रूप में संहिताबद्ध किया है, जिन देशों ने पर्यावरण हत्या को अपराध घोषित किया है उनमें वियतनाम, यूक्रेन और रूस शामिल हैं। भारत ने कुछ निर्णयों में प्रकृति के ‘कानूनी व्यक्तित्व’ को मान्यता दी है। कुछ भारतीय निर्णयों में 'पारिस्थितिकी हत्या' शब्द का उपयोग किया गया है. लेकिन यह कानून में पूरी तरह से लागू नहीं हुआ है। भारत के विधायी ढांचे में विभिन्न पर्यावरण कानून शामिल है, जिन्हें समेकन और व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण कानून भी इसी बात की वकालत करता है कि पर्यावरणीय स्थिरता जीवन के लिए एक आधार है और बढ़ते पर्यावरणीय दबाओं की तुलना में इसके उद्देश्यों की पूर्ण प्राप्ति और भी जरूरी हो गई है। अतः विश्व में एक पर्यावरणीय कानून, सतत विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के सभी आयामों की उपलब्धि को मजबूती प्रदान करेगा।

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