पिथौरागढ़ के नौले-धारे


गाड़ गधेरे, नौले, धारे के बारे में सबने सुना होगा, धीरे-धीरे सब खत्म या कम होते जा रहे हैं लेकिन पहले ऐसा नहीं था, पहले इन नौलों गाड़ों गधेरों में कई बच्चों ने अपने पहले प्यार, पहली तैराकी और पहली ट्रेकिंग की ट्रेनिंग ली थी।

पहाड़ों के पानी की अनदेखीउस समय पिथौरागढ़ के जो कुछ प्रमुख गाड़ गधेरे नौले मुझे याद आते हैं उनमे चिमस्या नौला, पद्या धारा, जोग्या धारा, चटकेश्वर की गाड़, ठुल गाड़, ठुल के आस-पास की दो तीन और गाड़ गधेरे जिनके नाम याद नहीं आ रहे। महादेव धारा टकाना नौला, नयी बाजार का धारा एन्चोली का धारा और नौला दोनों, भदेलबाड़ा का धारा ( या नौला याद नहीं आ रहा)। ऐसे ही वो कुजौली में भी था एक, धोबीघाट, धोबीघाट वाली गाड़ आगे जाकर जहाँ मिलती है वह गधेरा, रँधोला, सिनेमालाइन के बगल से गुजरने वाली गाड़। जाखनी में भी था एक नौला, कुमोड़ वाला हो गया। नौले-धारे इतने सारे थे कि स्कूल जाते-जाते दो तीन मिल जाते थे। अब कुछ तो मकानों की वजह से दिखते नहीं बाकी कुछ को मकानों ने दबा दिया।

यहाँ दिल्ली में जब कुछ लोग अपना बचपन याद करके बताते हैं कि उन्होंने स्कूल बंक करके फ़िल्म देखी या फलाना जगह घूमने गए तो हमारे मुँह से निकलता है कि हम तो स्कूल बंक करके तैरने जाते थे। यहाँ माँ-बाप हजारों की फीस खर्च करके अपने बच्चों को स्वीमिंग क्लास में डालते हैं और बाकायदा छोड़ कर आते हैं क्लास तक, एक हम थे जो घर में ये बताने पर कि मैं गाड़ में स्वीमिंग सीख कर आया हूँ तो पिटाई होती थी।

अब माँ बाप भी क्या करें हमारे कुछ स्वर्गीय भाईयों ने चौमास में उफान पर आयी गाड़ में तैरने की हिम्मत दिखा दी और उस रिस्क के कारण उनकी जान चली गयी तो हमारे माँ-बाप के जेहन में भी यह बात बैठ गयी कि गाड़ गधेरे में तैरने का रिस्क होता है और कौन माँ-बाप अपने बच्चों को जान का रिस्क लेने देंगे।

खैर माँ-बाप की सुनने की उम्र वो थोड़ी होती है माँ-बाप कहते रहे और हम चतकेश्वर में डुबकी लगाते रहे। कभी नैनी सैनी के बगल की डिग्गी में तैर आये तो कभी विषाड़ की धारे से बनी डिग्गी में गोता लगाना सीख आये। कभी कम पानी होने पर गाड़ के नीचे खड़ंजे से पिछवाड़ा सुजा बैठे तो कभी चटकेश्वर की गाड़ की भँवर से खुद को बचाना सीख लिया। कुछ अनचाहे बुरे घटनाक्रमों को छोड़कर इन गाड़ गधेरों में हमने अच्छा ही सीखा।

इसी तरह नौले और धारे भी थे। दो जरकीन पानी के लिये टकाना से एन्चोली तक जाने का उपक्रम भी किया ठैरा तब। आज टंकी में पानी ना चढ़े तो घर के बच्चों में चीख पुकार मच जाती है और एक उस समय रंधोला से टकाना पानी चढ़ाया हमने। सुनने में अजीब लगेगा मगर जिन लोगों ने उस समय के पानी के हालात देखें हैं वह ये सब जानते हैं। तब सिर्फ घाट की पानी की लाइन से पूरी पिथौरागढ़ को पानी सप्लाई होती थी। ठुलगाड के पानी प्रोजेक्ट के बारे में कहा जाता था कि फौजियों के सीवर के पानी को फ़िल्टर करवाने का प्रोजेक्ट है। (सरकार फौजियों को टट्टी का पानी फ़िल्टर करके देगी अब)

खैर बाद में इस ठुलगाड के कारण शहर को बहुत पानी मिला। केमू स्टेशन के ऊपर के पार्क की टंकी भी बहुत बाद में बनी कोई उस पार्क का नाम याद दिला दे तो उसकी कहानी भी बताऊँगा एक।

तो उन दिनों एक जोग्या धारा होता था दयानन्द स्कूल के नीचे, उसमें बहुत पानी आता था, आस-पास की काफी लड़कियाँ पानी भरने आती थी। एक बार स्टेडियम से लौटते समय मेरे एक मित्र को एक लड़की पसन्द आ गयी। वह कभी अपने घर के लिये पानी भरने नहीं निकलता था लेकिन उस लड़की से बात करने के चक्कर में 10 10 लीटर के दो जार लेकर जोग्या धारा आने लग गया था। अब रोडवेज के पास रहने वाला लड़का पानी भरने जोग्या धारा आये तो अजीब तो लगेगा ही। वह भी स्टेडियम छोड़-छाड़ के पानी भरने की लाइन में लगने लगा। एक महीने बाद वह लड़की से बस इतना कह पाया था कि 'आप भर लो पानी आपके बाद भर लूँगा'। और उसके लिये ये बहुत बड़ा अचीवमेंट था कि लड़की ने पलट के यह कहा कि 'आप भरो आप बहुत देर से लाइन में लगे हो'।

बस इन लाइनों को पकड़े हुए वह कहा करता था कि देखा कितनी केयर करती है मेरी मेरे कहने के बाद भी उसने खुद ना भर के मुझे पानी भरने को कहा। इस बीच पानी घरों में रेगुलर आना शुरू हो गया तो लड़की ने धारे आना भी बंद कर दिया। बेचारे दोस्त की जान सूख गयी। फिर एक दिन दयानन्द जाकर (वह दयानन्द में पढ़ती थी) उसने रिनॉल्डस की लाल पेन से लिखा लव लेटर उस लड़की को दिया। जिसमें ना जाने क्या-क्या लिख मारा था आधा अंग्रेजी आधा हिंदी (इम्प्रेशन ज़माने के लिये) उसकी चार लाईनें प्रस्तुत हैं।

'तुम्हें धारे में जब से वाटर सप्लाई करते हुए देखा है तबसे खुद से कंट्रोल हट गया है। मालूम है तुम भी मुझे नोटिस करती हो तो नोटिस का जवाब क्यों नहीं देती। अगर प्रोपोज यस में है तो लेटर में यस लिख देना एन्ड धारे के पास छोड़ देना।'

असल में मित्र जो हैं हमसे उम्र में 5 साल बड़े थे, बस साथ में खेलते थे तो मित्र हो गए। और मित्रता में हमें लेटर भी पढ़ा दिया। पूरे लेटर का मजमून बस इतना था कि 'तुम ही हो बस तुम ही हो जिंदगी बस तुम ही हो'।

हालाँकि यह उनके इश्क का पहला इम्तिहान था मगर चिट्ठी का जवाब आज तक नहीं आया, 2016 में आज से तीन दिन पहले लड़की ने अपने दो बच्चों के साथ सेल्फ़ी अपलोड की थी फेसबुक पर जिसके जवाब में मियां आशिक ने नीचे लिखा 'ऑसम पिक मैम'।

खैर इश्क में यह सब चलता रहता है। पर धारे और नौले भी उन दिनों खूब इश्क करवाते थे। हमारे टकाना वाले नौले का एक इश्क अपने मुकाम तक जा पहुँचा और अगले दिन मोहल्ले की औरतें कह रही थी कि हमें पहले से शक था। मोहल्ले में उस शादी के इतने चर्चे हुए कि उस लड़की के पिता परेशान होकर अपनी दूकान बेचकर गाँव लौट गए।

हालाँकि बाद में उनकी बीमारी में उनके दामाद ने ही उनका खर्च उठाया और शादी के 10 साल बाद उन्हें अपनी बेटी का फैसला सही लगा।

नौले, धारे, गाड़ के अलावा एक गधेरा भी होता था जहाँ अक्सर चुराया हुआ मुर्गा पकाकर खाते थे मैंने बस एक बार इस तरह के ट्रैकिंग एडवेंचर में भाग लिया है। तब हम रनधोला पहुँच गए थे। हमारे कुछ अनुभवी सीनियर लोगों ने भूख लगने पर एक मुर्गे की व्यवस्था की जिसे काटने धोने पकाने तक के कामों में हमने भरपूर साथ दिया। बाद में बिना नमक का तन्दूरी मुर्गा खाते हुए एहसास हुआ कि जब तक हमारे पूर्वज जंगलों में थे तो वास्तव में बड़ी कठिन लाइफ जी रहे थे।

#पिथौरागढ़_कथा

Path Alias

/articles/paithaauraagadha-kae-naaulae-dhaarae

Post By: Hindi
×