नदी-जोड़ हठधर्मिता : केंद्रीय मंत्री की नियामकों, मीडिया और नागरिकों को धमकी


नदी-जोड़ परियोजना को लेकर केंद्रीय मंत्री 'उमा भारती' की हठधर्मिता की कहानी भी बहुत ही अजीब है। 'उमा भारती' किसी भी कीमत पर 'केन-बेतवा नदी-जोड़ परियोजना' को पूरा करना चाहती हैं।

7 जून 2016 को मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार केंद्रीय जल-संसाधन मंत्री 'उमा भारती' ने 'केन-बेतवा नदी-जोड़ परियोजना' में और देर होने पर भूख हड़ताल करने की धमकी दी है। ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’ अखबार के अनुसार उन्होंने पर्यावरणविदों द्वारा परियोजना का विरोध किये जाने को 'राष्ट्रीय अपराध' करार दिया है। यह धमकी उन सभी लोगों के लिये है जो जल-संसाधन मंत्रालय की 'केन-बेतवा नदी-जोड़ परियोजना' पर सवाल उठा रहे हैं।

असल में जो इस परियोजना के विपक्ष में खड़े हैं उनमें से कई लोग आधिकारिक सरकारी एजेंसियों से संबद्ध हैं। अगर एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री इस तरह की धमकी देती हैं तो निश्चित तौर पर यह नियामक प्रणाली में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करना और जबरन अपना विचार थोपना है। और इससे माहौल बिगड़ता है। इस तरह की धमकियों से संवैधानिक समितियों के सदस्य और अधिकारियों को कोई भी निर्णय लेने में कठिनाई होगी। साथ ही इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष तौर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया भी प्रभावित होगी।

सोचने वाली बात है कि इस योजना को अभी तक वैधानिक रूप से मंजूरी नहीं मिली है। साथ ही इससे पर्यावरण पर होने वाले विपरीत प्रभावों का समुचित आकलन नहीं किया गया है और न ही प्रामाणिक जनसुनवाई के माध्यम से लोगों से रायशुमारी की गयी है। इसके अलावा योजना का पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन अधूरा है और नदी में जल उपलब्धता के आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया गया है, ना ही इन आंकड़ों का स्वतंत्र मूल्यांकन हो पाया है।

इस तरह, इस योजना से संबधित तमाम अहम मूल्यांकन और मंजूरियाँ अधूरी हैं। लेकिन द हिन्दू अखबार के मुताबिक जल-संसाधन मंत्री 'उमा भारती' जी ने सीधे और स्पष्ट शब्दों में कहा है, ‘बाँध का निर्माण किया जायेगा और अगर इसमें और विलम्ब हुआ तो मैं विरोध प्रदर्शन करूंगी।’

'उमा भारती' ने यह माना है कि 'केन-बेतवा नदी-जोड़ परियोजना' का पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन और पर्यावरण प्रबंधन योजना पूरी तरह तैयार नहीं है। उन्होंने कहा है, ‘हमने बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) से कहा है कि वह गिद्धों को लेकर हमें मदद करें।’ उन्हें यह भी कहना चाहिए था कि ‘वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया’ अभी लैंडस्केप मैनेजमेंट प्लान तैयार कर रहा है जिसे बनाने में 2 वर्ष का समय लगता लेकिन भरोसेमंद पर्यावरण प्रभाव का मूल्यांकन नहीं होने के कारण यह और लम्बा खिंच सकता है।

इस योजना को अभी तक वैधानिक रूप से मंजूरी नहीं मिली है। साथ ही इससे पर्यावरण पर होने वाले विपरीत प्रभावों का समुचित आकलन नहीं किया गया है और न ही प्रामाणिक जनसुनवाई के माध्यम से लोगों से रायशुमारी की गयी है। इसके अलावा योजना का पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन अधूरा है और नदी में जल उपलब्धता के आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया गया है, ना ही इन आंकड़ों का स्वतंत्र मूल्यांकन हो पाया है।केन-बेतवा योजना द्वारा भंडारण बाँध बनेगा वह बुन्देलखंड से बाहर है। इस योजना से बुन्देलखंड को जो सीमित फायदा मिलने का दावा किया गया है, उतने फायदे के लिए कई बेहतर विकल्प मौजूद हैं। केन-बेतवा योजना कम खर्चीली नहीं है। ऐसा लगता है कि 'उमा भारती' बेवजह विकास बनाम बाघ और गिद्ध की लड़ाई की पृष्ठभूमि तैयार कर रही हैं। वे कहती हैं कि इंसान को पहले देखना होगा, लेकिन उचित रूप से देखा और समझा जाये तो ऐसे विरोधाभास का कोई कारण नहीं है।

'उमा भारती' का दावा है कि इस परियोजना से 70 लाख लोगों को फायदा होगा जबकि इससे महज 7 हजार लोग (हालांकि दोनों ही आंकड़े सवालों के घेरे में हैं) प्रभावित होंगे। वे आगे कहती हैं, ‘इस योजना में अड़ंगा डालने वाले वे (विशेषज्ञों की समिति के सदस्य) होते कौन हैं।’ इस बयान का अर्थ यह है कि हमें किसी नियामक की जरूरत नहीं है और 'उमा भारती' यह तय करेंगी कि कौन परियोजना के पक्ष में है और कौन विपक्ष में; या कौन पक्ष में हो सकता है और कौन इसके खिलाफ।

इसी कड़ी में एक और बात गौर करने लायक है। इस परियोजना में शामिल दो राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के बीच विस्तृत योजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिये समझौता पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए 11 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन कार्यान्वयन करार नहीं हुअा है। मंत्री महोदया पन्ना जिलाधीश द्वारा योजना आयोग को लिखे पत्र के मजमून को भी देख सकती हैं। जिसमें लिखा गया था कि यदि केन-बेतवा योजना लागू किया गया तो बुन्देलखंड के पन्ना और दमोह जिले हमेशा के लिये पिछड़े ही रह जायेंगे।

बिजनेस स्टैण्डर्ड समाचार पत्र के अनुसार 'उमा भारती' ने कहा है, ‘हम बाघों, गिद्धों, हिरण और प्रभावित लोगों को भी बचा लेंगे। कृपया हमें पर्यावरणीय मंजूरी दे दी जाये। लेकिन हम बांध की ऊंचाई कम करने पर पुनर्विचार नहीं करेंगे।’ इसका मतलब है कि हमें जल-संसाधन मंत्री के आधार पर मान लेना पड़ेगा कि बाघों, गिद्ध और सभी प्रभावितों को बचा लिया जाएगा। यदि हमारे लिए मंत्री महोदया का दावा काफी होता तो फिर ‘वन्यजीव बोर्ड’ व पर्यावरण कानूनों और पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी की जरूरत ही क्या है, उनका बयान ही काफी है!

इकोनॉमिक टाइम्स अखबार की रिपोर्ट की मानें तो 'उमा भारती' ने खुद को सबसे बड़ा पर्यावरणविद करार देते हुए कहा है कि अगर वे योजना पर काम शुरू कर रही हैं तो उनके इरादे पर संदेह कैसे किया जा सकता है। इस हिसाब से तो उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय के अधीन बनी विशेषज्ञों की कमेटी के सदस्यों का मजाक उड़ाया है। इसी अखबार की एक अन्य रिपोर्ट में मंत्री ने कहा है कि जरूरत पड़ी तो वे गिद्ध और बाघों का पुनर्वास भी करेंगी।

केन-बेतवा योजना द्वारा भंडारण बाँध बनेगा वह बुन्देलखंड से बाहर है। इस योजना से बुन्देलखंड को जो सीमित फायदा मिलने का दावा किया गया है, उतने फायदे के लिए कई बेहतर विकल्प मौजूद हैं। केन-बेतवा योजना कम खर्चीली नहीं है। ऐसा लगता है कि 'उमा भारती' बेवजह विकास बनाम बाघ और गिद्ध की लड़ाई की पृष्ठभूमि तैयार कर रही हैं। वे कहती हैं कि इंसान को पहले देखना होगा, लेकिन उचित रूप से देखा और समझा जाये तो ऐसे विरोधाभास का कोई कारण नहीं है।मतलब की बात यह है कि ‘जब हमारे पास योजना को अमलीजामा पहनाने वाले हैं जो कह रहे हैं कि गिद्धों और बाघों की चिंता नहीं करनी है, क्योंकि जल-संसाधन मंत्री खुद इसे देख रही हैं!’ अतएव हमें किसी पर्यावरण मंत्रालय की जरूरत है क्या? अखबार के मुताबिक मंत्री ने कहा है कि इस क्षेत्र में पानी ज्यादा जायेगा जिससे बाघों की संख्या बढ़ेगी। सबसे बड़ा मजाक यह है कि यानी अब हमारे सामने एक नया मिसाल कायम होगा कि डूबा हुअा और तबाह हुअा टाइगर रिजर्व बाघों के लिये अच्छा है!

राष्ट्रीय वन्यजीव समिति ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में कुछ अधिकारियों के हवाले से कहा है कि इस परियोजना से 50 प्रतिशत गिद्धों का आशियाना उजड़ जायेगा। वहीं, बीएनएचएस को जब इस पर शोध करने को कहा जा रहा है। जबकि जल-संसाधन मंत्री का कहना है कि गिद्धों का केवल 3 प्रतिशत आशियाना ही उजड़ेगा। गिद्धोंं के 97 प्रतिशत घोसले अधिकतम जलस्तर से ऊपर होंगे।

मंत्री यह नहीं बता रही हैं कि इस प्रोजेक्ट का केन घड़ियाल सेंक्चुअरी के निचले हिस्से पर क्या प्रभाव पड़ेगा या केन नदी की मछलियों पर इसका कितना असर पड़ेगा। साथ ही वे यह भी बताना जरूरी नहीं समझती हैं कि जलागम क्षेत्र में जंगलों की कटाई से नदी के प्रवाह पर क्या प्रभाव पड़ेगा। वे यह भी नहीं बोल रही हैं कि पहले से ही प्रभावित और जलवायु परिवरर्तन के चक्रव्यूह में फंसे बुन्देलखंड पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

बहरहाल जल-संसाधन मंत्री के 'राष्ट्रीय अपराध' वाले बयान का असर बेहद बुरा होने वाला है। भविष्य में जब नदी-घाटी योजनाओं के लिये बनी सरकारी विशेषज्ञ समिति केन-बेतवा नदी-जोड़ को लेकर पर्यावरणीय मंजूरी पर विचार करेगी, वन सलाह समिति वनीय मंजूरी पर बैठक करेगी, राष्ट्रीय वन्यजीव समिति वन्यजीव मंजूरी पर चर्चा करेगी तो उन्हें याद रखना होगा कि यह उमा भारती के शब्दों में 'राष्ट्रीय अपराध' कर रहे होंगे, और जब इस मनोभाव से काम करेंगे तो क्या केन-बेतवा को न्याय मिल पाएगा। साथ ही जब मीडिया केन-बेतवा नदी-जोड़ के खिलाफ लिखेगा और बुन्देलखंड के लोग और सिविल सोसाइटीज इसका विरोध करेंगे या सुप्रीम कोर्ट व अन्य न्यायिक संस्थाओं की समितियाँ इस योजना को चुनौती देंगी तो उन्हें याद रखना होगा कि यह 'राष्ट्रीय अपराध' है। साथ ही उन्हें 'उमा भारती' के विरोध का सामना भी करना पड़ सकता है।

जल-संसाधन मंत्री का 'राष्ट्रीय अपराध' वाला बयान कई मायनों में गलत और अस्वीकार्य है। हमें उम्मीद है कि वे जल्द ही सार्वजनिक रूप से अपने बयान को लेकर माफी माँगेंगी और बयान वापस भी लेंगी। वैसे अगर वे माफी मांग भी लेती हैं तो भी उनकी यह धमकी लोगों के जेहन में रहेगी। इसे दूर करने और भय का माहौल खत्म करने का एक ही तरीका है कि 'उमा भारती' अपने मंत्री पद से इस्तीफा दें। इससे नियामक संस्थाएँ किसी भय या केंद्रीय मंत्री के प्रदर्शन की धमकी के प्रभाव में न आकर स्वाधीनता से काम कर सकेंगी। अगर ऐसा नहीं होता है, तो लोगों के पर्यावरणीय प्रक्रियाओं से डिगे भरोसे को जीतने की उम्मीद बेमानी होगी।

केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना पर आधारित लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।


लेखक (हिमांशु ठक्कर) साउथ एशिया नेटवर्क आन डैम्स, रीवर्स एंड पीपल (SANDRP) के को-अॉर्डिनेटर हैं।

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