नैनीताल पर मँडराता खतरा

नैनीताल में भूस्खलन ने बढ़ाई चिन्ता
नैनीताल में भूस्खलन ने बढ़ाई चिन्ता

उत्तराखण्ड के नैनीताल का जिक्र आते ही दिलोदिमाग में वहाँ की हसीन वादियाँ कौंध आती हैं, प्राकृतिक छटा से भरपूर यह शहर देश-विदेश के सैलानियों को आकर्षित करता है, लेकिन नैनीताल की बुनियाद में स्थित बलियानाला के पास भूस्खलन ने शहरवासियों की नींद उड़ा दी है।

शहर में मालरोड के एक हिस्से के धँसने के बाद उभरी चिन्ताओं से अब तक कोई छुटकारा नहीं मिला कि इस नई मुसीबत ने चिन्ताओं को और बढ़ा दिया है, दरअसल, बलियानाला इस शहर की बुनियाद की तरह है, ऐसे में इस इलाके में बढ़ता भूस्खलन पूरे शहर के लिये बड़ी चुनौती है, वहीं प्रशासन अब तक सिर्फ भूस्खलन की जद से आये परिवारों के विस्थापन के चिन्हीकरण तक ही सीमित हैं।

बलियानाला ब्रिटिशराज से ही संवेदनशील रहा है भूवैज्ञानिकों के अनुसार, भूकम्पीय जोन चार में स्थित बलियानाला से नैनी लेक फाल्ट भी गुजरता है। पूर्व में बलियानाला में 17 अगस्त, 1880 को हुई भारी भूस्खलन की चपेट में आने से 27 भारतीय और एक ब्रिटिश नागरिक की मौत हुई थी।

यहाँ साल 1934-35, 1972, 2004 और 10 सितम्बर, 2014 तथा 12 सितम्बर, 2017 को भी भूस्खलन हुआ था। बलियावाला में दरारों की वजह से हरिनगर और रईस होटल क्षेत्र के कई मकान झुके हुए हैं यहाँ कृष्णापुर को जाने वाला रास्ता भी भूस्खलन की चपेट में आया। तब से इलाके के लोग चौपहिया वाहन से ज्योलीकोट होते हुए नैनीताल आते हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, 2001 में विशेषज्ञों के सुझावों पर अमल करते हुए बलियानाला ट्रीटमेंट की कार्ययोजना बनी थी। इसके लिये 15 करोड़ 52 लाख रु. के निर्माण कार्य किये गए थे मगर उसका एक पत्थर भी आज नहीं बचा है अतिसंवेदनशील बलियानाला पर नैनीताल का अस्तित्व टिका हुआ है।

हल्द्वानी रोड भवाली रोड के अलावा रईस होटल क्षेत्र तल्लीताल, कृष्णापुर आदि की हजारों की आबादी बलियानाला के आस-पास रहती है, जिस पर संकट आ गया है इस साल नैनीताल के रईस होटल की पूरी जमीन बलियानाले में समा गई है।

नैनीताल के जिलाधिकारी विनोद कुमार सुमन और पुलिस की टीम ने इस भूस्खलन के बाद क्षेत्र का मुआयना करके यहाँ के घरों को खाली करा दिया है, जिलाधिकारी ने लोगों से कहा कि वे अपने रहने के लिये अन्य जगह पर किराए के मकान की व्यवस्था कर लें, प्रशासन की ओर से उसका भुगतान किया जाएगा।

बलियानाला में पहाड़ी दरक गई तो मलबे में दो पेयजल योजनाएँ भी ध्वस्त हो गई 80 के दशक में बलियानाला के मध्य में प्राकृतिक जलस्रोतों से जल निगम की ओर से दो पेयजल योजनाएँ बनाई गई थीं। ब्रिटिशराज में यहाँ पानी की टंकी बनाई गई थी, जो दो साल पहले भूस्खलन में ध्वस्त हो गई 7 सितम्बर को हुए भूस्खलन में बलियानाला के मध्य से जाने वाली दोनों पेयजल योजनाएँ ध्वस्त हो गई हैं, जिससे बल्दियाखाल, नैना गाँव, देवीधुरा, जोश्यूड़ा, चढ़ता, आडूखान, कूंण समेत आस-पास के तोक तथा गेठिया में पेयजल सप्लाई ठप हो गई है।

बलियानाला के मध्य में स्थित प्राकृतिक जलस्रोत से इन गाँवों को पेयजल सप्लाई करने के लिये जोड़े गए पाइप ध्वस्त हो गए हैं, लगातार भूस्खलन की वजह से जल संस्थान वैकल्पिक इन्तजाम भी नहीं कर पा रहा है।

जल संस्थान के अनुसार दो साल पहले स्टील के चैम्बर बनाकर उससे पाइपों को जोड़ा गया था, विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्राकृतिक स्रोत से प्रति मिनट 700-800 लीटर पानी निकलता है जब तक इस पानी का उपयोग नहीं किया जाएगा, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान मुमकिन नहीं है।

प्रसिद्ध भू-विज्ञानी, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के भूविज्ञान के प्रो. राजीव उपाध्याय के मुताबिक, ‘बलियानाला के मुहाने की चट्टान चूना पत्थर यानी एक प्रकार की डोलोमाइट से बनी है, जिसके नीचे स्लेट हैं नैनी लेक फॉल्ट में स्थित इस नाले की दोनों ओर की पहाड़ियों की चट्टानों का ढलान नीचे को है, यह काफी भुरभुरी हैं बलियानाला की तलहटी पर नैनी झील से निकलने वाले पानी से कटाव होते रहने की वजह से इसके दोनों और ऊपर की पहाड़ियों से भूस्खलन हो रहा है। इसकी वजह मानवीय उतनी नहीं मानी जा सकती जितनी कि प्राकृतिक है इन चट्टानों के कमजोर और तीव्र ढलान पर होने के कारण इनमें लगातार कटाव होता रहता है बलियानाला के मध्य में जो प्राकृतिक जलस्रोत हैं, उनका सदुपयोग न होने से वे भी इस कटाव में योगदान देते हैं।’

वहीं भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (Indian soil and water conservation institute) के अध्ययन में साफ निष्कर्ष निकाला गया है कि बलियानाला का ट्रीटमेंट नैनीताल के अस्तित्व के लिये जरूरी है इस बार के भूस्खलन को नैनीताल में अगस्त में हुई भारी बारिश का परिणाम माना जा रहा है।

जीबी पन्त विश्वविद्यालय (g b pant university) के मौसम वैज्ञानिक आर.के. सिंह बताते हैं, ‘प्रदेश में इस बार अगस्त में बीते पाँच साल में सर्वाधिक बारिश दर्ज हुई है नैनीताल में भी बारिश ने पाँच साल का रिकार्ड तोड़ दिया है।’ वहीं रईस होटल क्षेत्र में इस बार का भूस्खलन हाल के वर्षों में सबसे बड़ा भूस्खलन है अब यह खतरा आबादी क्षेत्र की ओर रुख करने लगा है वीरभट्टी को जाने वाले मोटर मार्ग को भी खतरा पैदा हो गया है, जिसकी वजह से प्रशासन को इसे बन्द करना पड़ा है।

कुमाऊँ विश्वविद्यालय (kumaun university) के प्रोफेसर ललित तिवारी कहते हैं कि राजभवन के पीछे निहाल नाले की पहाड़ी में भूस्खलन ने भी चिन्ता बढ़ा दी है निहाल नाले की ऊपरी पहाड़ी से गिर रहे बोल्डर और कटाव से राजभवन पर खतरा मँडरा रहा है।

225 एकड़ में फैले राजभवन और 45 एकड़ में फैले राजभवन गोल्फ कोर्स में झंडीधार तथा मुंशी कुटीर इलाका बेहद संवेदनशील हो चला है झंडीधार से नीचे की खतरनाक पहाड़ी के नीचे रूसी बाइपास से गुजरता है इसी पहाड़ी में निहाल नाले में पहाड़ी से कटाव होने के साथ पत्थर गिरते रहते हैं।

पिछले वर्षों के दौरान राजभवन में मुंशी कुटीर के समीप की पहाड़ी का लोक निर्माण विभाग ने अत्याधुनिक तकनीक के ट्रीटमेंट किया था। उसके बाद भूस्खलन रुक गया था पर समीप की पहाड़ी में कटान इस बार फिर चिन्ता बढ़ा रहा है वहीं कुछ स्थानों पर राजभवन रोड भी धँस रही है राजभवन मार्ग की देखरेख करने वाले लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियन्ता सीएस नेगी के मुताबिक, ‘इसकी सुरक्षा के लिये प्रोजेक्ट शासन को भेजा गया है।’

नैनीताल पर पुस्तक लिखने वाले लेखक-पत्रकार प्रयाग पांडे कहते हैं, ‘ब्रिटिश शासन के दौरान भूस्खलन के बाद शहर को दीर्घ जीवन देने के लिये कई उपाय किये गए थे। आजादी के बाद से इनकी उपेक्षा ही हुई है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद तो इन उपायों को हुक्मरानों ने कूड़े के ढेर में फेंक डाला। शहर की इन चिन्ताजनक स्थितियों को लेकर सरकार अब भी असंवेदनशील है।’ जाहिर है, नैनीताल की सुक्षा के लिये केवल तात्कालिक नहीं बल्कि दूरगामी उपायों और उन पर अमल की जरूरत है।

 

 

 

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