मनमर्जी की मंजूरी

एक विशेषज्ञ समिति ने पिरना का दौरा किया तो उसे वेदांत या सेसा गोवा के दावों की असलियत पता चली। समिति ने पाया कि प्रस्तावित खनन स्थल के उत्तर में चपोरा नदी बहती है और यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों वाला है। यह तथ्य कंपनी की रिपोर्ट में कहीं नहीं था। यहां खनन चालू हो जाता तो चपोरा में गाद भरती जाती और इसका नतीजा बाढ़ के रूप में सामने आता। विशेषज्ञ समिति की जांच के आधार पर पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण ने कंपनी को जानकारी छिपाने का दोषी ठहराया, तब जाकर मंत्रालय की नींद टूटी।

खनन और दूसरी परियोजनाओं को सरकार की ओर से हरी झंडी देने से पहले इस बात का आकलन किया जाता है कि पर्यावरण पर उनका क्या असर होगा लेकिन बहुत सारे मामलों में दी गई पर्यावरण संबंधी मंजूरी एक औपचारिकता भर होती है। इसीलिए ऐसे फैसलों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। यों विवाद का विषय बन जाने पर मंजूरी वापस लेने का कदम भी पर्यावरण मंत्रालय ने उठाया है, मगर ऐसे मामले अपवाद की तरह हैं। गौरतलब है कि गोवा में वेदांत समूह की सहायक कंपनी सेसा गोवा को लौह अयस्क के खनन के लिए दी पर्यावरण मंजूरी पर्यावरण मंत्रालय ने रद्द कर दी है, इस आधार पर कि कंपनी ने मंत्रालय को अपनी परियोजना के बारे में सौंपी गई रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए थे। मंत्रालय का निर्णय उचित है। पर सवाल है कि उसे इस नतीजे पर पहुंचने में इतना लंबा वक्त क्यों लगा? गौरतलब है कि कंपनी को अगस्त 2009 में उत्तरी गोवा के पिरना इलाके में सालाना बीस लाख टन लौह अयस्क निकालने के लिए पर्यावरण मंजूरी मिली थी।

यह शुरू से जाहिर था कि कंपनी ने स्थानीय लोगों की सहमति हासिल नहीं की। इस खनन परियोजना के खिलाफ पिरना के लोगों और पर्यावरण-कार्यकर्ताओं का आंदोलन बराबर चलता रहा। वेदांत ने अपनी परियोजना की बाबत पर्यावरणीय आकलन रिपोर्ट में कहा था कि पिरना के दस किलोमीटर के इलाके में न तो कोई अभ्यारण्य है न नेशनल पार्क और न ही कोई ऐतिहासिक धरोहर। उसकी इस रिपोर्ट को बिना कोई आपत्ति किए मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया था। तब पर्यावरण मंत्री ए राजा थे, जो 2-जी घोटाले के आरोप में तिहाड़ जेल की हवा खा रहे हैं। आरोप है कि उन्होंने और भी बहुत-से मामलों में पर्यावरण मंत्री रहते हुए इसी तरह की उदारता दिखाई थी।

एक विशेषज्ञ समिति ने पिरना का दौरा किया तो उसे वेदांत या सेसा गोवा के दावों की असलियत पता चली। समिति ने पाया कि प्रस्तावित खनन स्थल के उत्तर में चपोरा नदी बहती है और यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों वाला है। यह तथ्य कंपनी की रिपोर्ट में कहीं नहीं था। यहां खनन चालू हो जाता तो चपोरा में गाद भरती जाती और इसका नतीजा बाढ़ के रूप में सामने आता। विशेषज्ञ समिति की जांच के आधार पर पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण ने कंपनी को जानकारी छिपाने का दोषी ठहराया, तब जाकर मंत्रालय की नींद टूटी लेकिन तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और गलत सूचनाएं देने का यह अकेला मामला नहीं है। कर्नाटक के चित्रदुर्ग और तुकमुर जिलों में भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वेदांत समूह को अपनी खनन गतिविधियां बंद करनी पड़ी हैं।

दरअसल, जब तक आवेदक कंपनी को ही अपनी परियोजना के पर्यावरणीय असर के बारे में रिपोर्ट देने को कहा जाता रहेगा, गलत आकलन का सिलसिला बंद नहीं हो सकता। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय को इसी बात के लिए फटकार लगाई थी कि उसने एक आवेदक कंपनी को ही पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने की छूट क्यों दे दी। गुजरात के भावनगर में निरमा कंपनी के प्रस्तावित बिजली और सीमेंट संयंत्रों का वहां की पारिस्थितिकी पर क्या असर होगा, इसकी रिपोर्ट खुद कंपनी ने मंत्रालय की रजामंदी से तैयार की थी, जबकि यह काम मंत्रालय को या स्वतंत्र विशेषज्ञों की किसी समिति को करना चाहिए था। ऐसे मामलों का सबक यही है कि पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाई जाए।

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