मेरठ में बनेगा उत्तर प्रदेश की नदी नीति का प्रारूप

दो दिनों तक विशेषज्ञ करेंगे गहन मंथन


तारीख : 16-17 सितंबर 2012
स्थान : राधा गोविंद पब्लिक स्कूल मेरठ (उ.प्र.)


राज्य की राजधानी से बहती गोमती हो, बनारस व कानपुर से बहती गंगा हो, मथुरा व आगरा से बहती यमुना हो, सहारनपुर से बहती हिण्डन व धमोला हो, मेरठ से बहती काली हो, बागपत से बहती कृष्णी हो, मुरादाबाद से बहती अरिल हो या फिर राज्य के अन्य शहरों की नदियां हों, सब की सब कचरा ढोने का साधन बनकर रह गई हैं। मेरठ में पुनः एक ओर ऐतिहासिक कार्य की नींव पड़ गई। उत्तर प्रदेश की नदी नीति का प्रारूप तैयार करने के लिए मेरठ की ऐतिहासिक धरती को चुना गया। नीर फाउंडेशन द्वारा जल बिरादरी के सहयोग से मेरठ में नदी नीति के प्रारूप को तैयार करने का निर्णय लिया गया है। इसका आयोजन 16-17 सितम्बर, 2012 को राधा गोविन्द पब्लिक स्कूल में किया जायेगा। इसमें देशभर के नीति निर्माताओं व नदियों के प्रति चिंतित कार्यकर्ता अपनी भूमिका निभाएंगे।

गौरतलब है कि पिछले दो दशकों में उत्तर प्रदेश की नदियों की हालत बद से बदतर हो चली है। नदियां नाले का रूप धारण कर चुकी हैं। बड़ी, मझली व छोटी तीनों प्रकार की नदियों की हालत समान है। नदियां जहां भयंकर प्रदूषण की चपेट में हैं वहीं उनके बेसिन पर अवैध कब्जा भी किया जा रहा है। जहां बरसाती नदियां भूजल नीचे खिसकने के कारण मृतप्राय हो चुकी हैं वहीं पहाड़ी नदियों में भी पानी की कमी हो रही है। पहाड़ी नदियों के सामने उनको बांधने की चुनौती भी पेश आ रही है। नदियों का निर्मल व अविरल प्रवाह पूरी तरह से तहस-नहस हो चुका है। नदियों में बहता हुआ जहर धीरे-धीरे भूजल में जाकर मिल रहा है जिस कारण से भूजल भी प्रदूषित हो चुका है। इसकी परिणाम नदी किनारे बसे गांवों व बस्तियों में देखा जा सकता है। मानव जीवन कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की चपेट में आ चुका है। धार्मिक अनुष्ठान भी प्रदूषित व जहरीले पानी में पूर्ण किए जा रहे हैं, जिससे हमारी आस्थाओं पर भी गहरी चोट पहुंच रही है। जिन नदियों के किनारे सभ्यताएं पनपीं व विकसित हुईं आज वे अपनी चरम सीमा पर पहुंचकर उजड़ने के कगार पर हैं।

राज्य की राजधानी से बहती गोमती हो, बनारस व कानपुर से बहती गंगा हो, मथुरा व आगरा से बहती यमुना हो, सहारनपुर से बहती हिण्डन व धमोला हो, मेरठ से बहती काली हो, बागपत से बहती कृष्णी हो, मुरादाबाद से बहती अरिल हो या फिर राज्य के अन्य शहरों की नदियां हों, सब की सब कचरा ढोने का साधन बनकर रह गई हैं। नदियों की इस दयनीय दशा को सुधारने के कुछ गैर-सरकारी प्रयासों के अलावा सरकारी प्रयास नगन्य ही हैं। नदियों की हालत कैसे सुधरे? कैसे इनके क्षेत्र को कब्जा मुक्त रखा जा सके? कैसे ये निर्मल व अविरल बह सकें? इन सब सवालों के जवाब देने के लिए राज्य के पास ऐसा कोई कानून नहीं है जोकि मात्र नदियों की देख-रेख कर सके व उनको बचाने में सहायक हो।

इसी चिंता को ध्यान में रखकर नीर फाउंडेशन ने जल बिरादरी के सहयोग से निर्णय लिया कि उत्तर प्रदेश में भी एक नदी नीति होनी चाहिए। वह नदी नीति कैसी हो उसको तय भी वे लोग करें जो नदियों के प्रति चिंतित हैं।

इन दो दिनों में जो नदी नीति का प्रारूप गहन चर्चा के बाद निकलकर आएगा उसको राज्य सरकार को सौंपा जाएगा तथा सरकार से आग्रह किया जाएगा कि इस प्रारूप को आधार बनाकर जल्द से जल्द एक नदी नीति अस्तित्व में आ पाएगी तो नदियों पर अत्याचार करने वालों पर लगाम लग सकेगी और हमारी नदियों बच सकेंगी।

इस प्रारूप को तैयार करने में जलपुरूष राजेन्द्र सिंह, उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री राजेन्द्र सिंह राणा, आई आई टी कानपुर के विनोद तारे, बीकेयू के राकेश टिकैत, भूगर्भ जल विभाग के सुकेश साहनी, सांसद राजेन्द्र अग्रवाल, पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमपाल शास्त्री, यमुना जिये अभियान के मनोज मिश्रा, आई आई टी रूड़की के वी सी गोयल, नीति निर्माता भरत झुनझुनवाला, पीपुल्स सांइस इंस्टीट्यूट, देहरादून के अनिल गौतम, पांवधोई नदी के योद्धा पी के शर्मा व एस के उपाध्याय, नीति विशेषज्ञ एम एस वाणी व राधा होल्ला भार, इण्डो चाइना प्रोजेक्ट की आयशा खोसला, प्राफेसर अंशुमाली शर्मा, हमारी धरती के सुबोध नन्दन शर्मा, उत्तर प्रदेश जल बिरादरी के अध्यक्ष एन एन मेहरोत्रा, लोकभारती, लखनऊ के ब्रिजेन्द्र पाल सिंह, इण्डिया वाटर पोर्टल के सिराज केसर व अमिता भादुड़ी, सेंटर फॉर साइंस एण्ड एन्वायरन्मेंट के नित्या जैकब, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण विभाग के पूर्व चेयरमेन पारीतोष त्यागी, किरोड़ीमल कॉलेज के प्रोफेसर कौशल शर्मा, यूएनडीपी के पी एस सोढ़ी, डब्ल्यू डब्ल्यू एफ के नितिन कौशल, अमरपुर काशी के मुकुट सिंह, सेवानिर्वत आई ए एस कमल टावरी, जर्मन विशेषज्ञ इरमेल, इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एन्वायरन्मेंट की चारू गुप्ता व प्रदीप कुमार व लेखक अरूण तिवारी के अतिरिक्त धार्मिक गुरू, पत्रकार व कुछ प्रमुख पर्यावरणीय पत्रिकाओं के सम्पादक भी भाग लेंगे।

संपर्क
रमन त्यागी
निदेशक- (नीर फाउंडेशन)
मो. 9411676951
Email : theneerfoundation@gmail.com


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