मानसून का पूर्वानुमान - एक पहेली

मानसून
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यदि निजी मौसम एजेंसी ‘स्काईमेट‘ का वर्षा सम्बन्धी पूर्वानुमान सही निकलता है तो यह देश के किसान और अर्थव्यवस्था के लिये यह अच्छी खबर है। एजेंसी की मानें तो इस साल सूखे के बिल्कुल आसार नहीं हैं। मानसून शत-प्रतिशत सामान्य रहेगा। जून से सितम्बर तक दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में सक्रिय रहने वाले मानसून पर आई यह पहली भविष्यवाणी है।

‘स्काईमेट ने दावा किया है कि अगर मानसून सामान्य रहा तो जून से सितम्बर अवधि में देश में 88.7 सेंटीमीटर से अधिक बारिश होगी। एजेंसी ने 1 जून को केरल के समुद्री तट पर मानसून आने की उम्मीद भी जताई है। मध्य भारत के लिये जारी पूर्वानुमान में कहा है कि इन्दौर, जबलपुर, रायपुर, मुंबई, पुणे, नासिक और इनके आस-पास के इलाकों में भारी बारिश हो सकती है।

वर्षा के बारे में पूर्वानुमान जारी करते हुए एजेंसी ने दावा किया है कि इस सम्बन्ध में यह उसकी पहली पहल है। पर हकीकत यह है कि ‘स्काईमेट‘ पाँच साल से मानसून की भविष्यवाणी कर रहा है लेकिन वे असफल साबित हुईं। परम्परागत रूप से अब तक भारतीय मौसम विभाग ही मानसून के बारे में पूर्वानुमान जारी करता रहा है।

हर साल अप्रैल-मई में मानसून के अच्छे या खराब रहने की अटकलों का दौर शुरू हो जाता है। यदि औसत मानसून आये तो देश में हरियाली और समृद्धि की सम्भावना बढ़ती है और औसत से कम आये तो अकाल की क्रूर परछाइयाँ देखने में आती हैं। मौसम मापक यंत्रों की गणना के अनुसार यदि 90 प्रतिशत से कम बारिश होती है तो उसे कमजोर मानसून कहा जाता है।

90-96 फीसदी बारिश औसत मानी जाती है। 96-104 फीसदी बारिश को सामान्य मानसून कहा जाता है। यदि बारिश 104-110 फीसदी होती है तो इसे सामान्य से अच्छा मानसून कहा जाता है। 110 प्रतिशत से ज्यादा बारिश होती है तो इसे अधिकतम मानसून कहा जाता है।

भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणियाँ अक्सर गलत साबित होती हैं। पिछले साल विभाग ने अच्छी बारिश का पूर्वानुमान था, लेकिन देश सूखे की चपेट में रहा। इसी तरह 2016 में मौसम विभाग ने 106 प्रतिशत बारिश की भविष्यवाणी की थी, लेकिन महाराष्ट्र का मराठवाड़ क्षेत्र और तमिलनाडु सूखे रह गए थे। इसी तरह यदि पिछले नौ साल के आँकड़ों को देखें तो एक भी भविष्यवाणी सटीक नहीं बैठती।

देश में बिगड़ती कृषि के लिये भी कहीं-न-कहीं मानसून के पूर्वानुमान का गलत होना जिम्मेवार है। कृषि की मानसून पर निर्भरता लोगों का जीविकोपार्जन के सबसे पुराने तरीके से लोगों का मोह भंग कर रहा है। देश में कृषि पर लोगों की निर्भरता के हिसाब से यह हमारी अर्थव्यवस्था की लिये भी अच्छा नहीं है। धान, मक्का, ज्वार, कपास और सोयाबीन जैसी खरीफ की फसलें इसी मानसून पर निर्भर रहती हैं। देश में कुल खाद्य उत्पादन का लगभग 40 फीसदी इसी बरसात पर निर्भर है।

आखिर हमारे मौसम वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान आसन्न संकटों की क्यों सटीक जानकारी देने में खरे नहीं उतरते? क्या हमारे पास तकनीकी ज्ञान अथवा साधन कम हैं, अथवा हम उनके संकेत समझने में अक्षम हैं? मौसम वैज्ञानिकों की बात मानें तो जब, उत्तर-पश्चिमी भारत में मई-जून तपता है और भीषण गर्मी पड़ती है तब कम दाब का क्षेत्र बनता है।

इस कम दाब वाले क्षेत्र की ओर दक्षिणी गोलार्ध से भूमध्य रेखा के निकट से हवाएँ दौड़ती हैं। दूसरी तरफ धरती की परिक्रमा सूरज के इर्द-गिर्द अपनी धुरी पर जारी रहती है। निरन्तर चक्कर लगाने की इस प्रक्रिया से हवाओं में मंथन होता है और उन्हें नई दिशा मिलती है। इस तरह दक्षिणी-गोलार्ध से आ रही दक्षिणी-पूर्वी हवाएँ भूमध्य रेखा को पार करते ही पलटकर कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर गतिमान हो जाती हैं।

ये हवाएँ भारत में प्रवेश करने के बाद हिमालय से टकराकर दो हिस्सों में विभाजित होती हैं। इनमें से एक हिस्सा अरब सागर की ओर से केरल के तट में प्रवेश करता है और दूसरा बंगाल की खाड़ी की ओर से प्रवेश कर उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और पंजाब तक बरसती है। अरब सागर से दक्षिण भारत में प्रवेश करने वाली हवाएँ आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बरसती हैं।

इन मानसूनी हवाओं पर भूमध्य और कश्यप सागर के ऊपर बहने वाली हवाओं के मिजाज का प्रभाव भी पड़ता है। प्रशान्त महासागर के ऊपर प्रवाहमान हवाएँ भी हमारे मानसून पर असर डालती हैं। वायुमण्डल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित होती है तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है।

महासागरों की सतह पर प्रवाहित वायुमण्डल की हरेक हलचल पर मौसम विज्ञानियों को इनके भिन्न-भिन्न ऊँचाइयों पर निर्मित तापमान और हवा के दबाव, गति और दिशा पर निगाह रखनी होती है। इसके लिये कम्प्यूटरों, गुब्बारों, वायुयानों, समुद्री जहाजों और रडारों से लेकर उपग्रहों तक की सहायता ली जाती है। इनसे जो आँकड़ें इकट्ठे होते हैं उनका विश्लेषण कर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है। हमारे देश में 1875 में मौसम विभाग की बुनियाद रखी गई थी।

आजादी के बाद से मौसम विभाग में आधुनिक संसाधनों का निरन्तर विस्तार होता चला आ रहा है। विभाग के पास 550 भू-वेधशालाएँ, 63 गुब्बारा केन्द्र, 32 रेडियो पवन वेधशालाएँ, 11 तूफान संवेदी, 8 तूफान सचेतक रडार और 8 उपग्रह चित्र प्रेषण एवं ग्राही केन्द्र हैं। इसके अलावा वर्षा दर्ज करने वाले 5 हजार पानी के भाप बनकर हवा होने पर निगाह रखने वाले केन्द्र, 214 पेड़-पौधों की पत्तियों से होने वाले वाष्पीकरण को मापने वाले, 38 विकिरणमापी एवं 48 भूकम्पमापी वेधशालाएँ हैं। लक्षद्वीप, केरल व बंगलुरु में 14 मौसम केन्द्रों के डेटा पर सतत निगरानी रखते हुए मौसम की भविष्यवाणियाँ की जाती हैं। अन्तरिक्ष में छोड़े गए उपग्रहों से भी सीधे मौसम की जानकारियाँ सुपर कम्प्यूटरों में दर्ज होती रहती हैं।

बरसने वाले बादल बनने के लिये गरम हवाओं में नमी का समन्वय जरूरी होता है। हवाएँ जैसे-जैसे ऊँची उठती हैं, तापमान गिरता जाता है। अनुमान के मुताबिक प्रति एक हजार मीटर की ऊँचाई पर पारा 6 डिग्री नीचे आ जाता है। यह अनुपात वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत ट्रोपोपॉज तक चलता है। इस परत की ऊँचाई यदि भूमध्य रेखा पर नापें तो करीब 15 हजार मीटर बैठती है। यहाँ इसका तापमान लगभग शून्य से 85 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे पाया गया है।

यही परत ध्रुव प्रदेशों के ऊपर कुल 6 हजार मीटर की ऊँचाई पर भी बन जाती है और तापमान शून्य से 50 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे होता है। इसी परत के नीचे मौसम का गोला या ट्रोपोस्फियर होता है, जिसमें बड़ी मात्रा में भाप होती है। यह भाप ऊपर उठने पर ट्रोपोपॉज के सम्पर्क में आती है। ठंडी होने पर भाप द्रवित होकर पानी की नन्हीं-नन्हीं बूँदें बनाती है। पृथ्वी से 5-10 किलोमीटर ऊपर तक जो बादल बनते हैं, उनमें बर्फ के बेहद बारीक कण भी होते हैं। पानी की बूँदें और बर्फ के कण मिलकर बड़ी बूँदों में तब्दील होते हैं और बर्षा का रूप ले लेतें हैं।

दुनिया के किसी अन्य देश में मौसम इतना विविध, दिलचस्प, हलचल भरा और प्रभावकारी नहीं है, जितना कि भारत में है। इसका मुख्य कारण है भारतीय प्रायद्वीप की विलक्षण भौगोलिक स्थिति। हमारे यहाँ एक ओर अरब सागर है और दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी है और इन सबके ऊपर हिमालय के शिखर हैं।

इस कारण देश का जलवायु विविधतापूर्ण होने के साथ प्राणियों के लिये बेहद हितकारी है। इसीलिये पूरे दुनिया के मौसम वैज्ञानिक भारतीय मौसम को परखने में अपनी बुद्धि लगाते रहते हैं। इतने अनूठे मौसम का प्रभाव देश की धरती पर क्या पड़ेगा, इसकी भविष्यवाणी करने में हमारे वैज्ञानिक क्यों अक्षम हैं? लोगों का ऐसा मानना है कि आयातित सुपर कम्प्यूटरों की भाषा ‘एल्गोरिदम’ वैज्ञानिक ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं। कम्प्यूटर भले ही आयातित हों, लेकिन इनमें मानसून के डाटा स्मरण में डालने के लिये जो भाषा हो, वह देशी हो।

हमें सफल भविष्यवाणी के लिये कम्प्यूटर की देशी भाषा विकसित करनी होगी। लिहाजा,जब हम वर्षा के आधार स्रोत की भाषा पढ़ने व संकेत परखने में सक्षम हो जाएँगे तो मौसम की भविष्यवाणी भी सटीक बैठेगी? स्काईमेट के पास भी न तो भारतीय भौगोलिक स्थिति के अनुसार सॉफ्टवेयर हैं और न ही अपनी भाषा है। ऐसे में उसकी भी आयातित कम्प्युटरों पर निर्भर रहने की मजबूरी है।

 

 

 

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