लीमा, भारत और अमेरिका-चीन करार

गरीब भारतीयों और तीसरी दुनिया वालों के लिए विनाशकारी है बड़ी ताकतों का समझौता

आउटलुक टीम द्वारा नागराज अडवे के साक्षात्कार पर आधारित लेख।

. अमेरिका-चीन द्वारा हाल में जलवायु परिवर्तन पर की गई घोषणा के मायने क्या हैं?
12 नवम्बर, 2014 को अमेरिका और चीन द्वारा जलवायु परिवर्तन पर की गयी संयुक्त घोषणा के मूल में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के प्रभावों को कम करना है। इसमें कहा गया है कि अमेरिका 2025 तक अपने सालाना उत्सर्जन को 2005 के स्तर से 26-28 फीसदी कम करेगा। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2005 में अमेरिका का कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 599.9 करोड़ टन था।

अपनी तरफ से चीन ने वादा किया है कि वह अपने कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को 2030 तक या सम्भव हुआ तो उससे पहले अधिकतम स्तर पर ले जाएगा। हालाँकि इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि अधिकतम स्तर क्या होगा। चीन ने यह इरादा भी जाहिर किया है कि 2030 तक वह अपने प्राथमिक ऊर्जा उपभोग में गैर-जीवावशेष ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाकर 20 फीसदी तक ले जाएगा। चिन्ता की बात यह है कि इसमें नाभिकीय ऊर्जा और बड़ी पनबिजली परियोजनाएँ शामिल हैं।

यह घोषणा हमारी पृथ्वी के लिए विनाशकारी क्यों है?
आँकड़ों की पड़ताल करें तो बात स्पष्ट हो जाती है। अमेरिका का कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 2005 के स्तर से 28 फीसदी कम यानी सालाना 4.3 अरब टन कम किए जाने का लक्ष्य है। चीन का उत्सर्जन किस स्तर पर जाकर चरम् पर पहुँचेगा यह स्पष्ट नहीं, लेकिन इस बारे में हाल के आँकड़े चिन्ताजनक हैं- पिछले दस सालों में चीन का कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन सालाना आधे अरब टन से ज्यादा के औसत से लगातार बढ़ रहा है- 2001 में 3353 मिलियन टन (एमटी) से बढ़कर 2006 में 5963 एमटी और 2011 में 8715 एमटी तक। कमजोर विश्व अर्थव्यवस्था को देखते हुए और कोयले का इस्तेमाल कम करने की चीन की इच्छा को देखते हुए बढ़ोतरी के इस स्तर में गिरावट भी आती है तो एक धीमी रफ्तार (मानिए, सालाना 350 एमटी) का भी मतलब होगा कि चीन 2030 तक सालाना 15 अरब टन का उत्सर्जन करेगा।

इसमें अमेरिका का उत्सर्जन जोड़ दीजिए और हम पाएँगे कि दुनिया की ये दो महाशक्तियाँ ही मिलकर 19-20 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कर लेंगी। ये दो देश मिलकर ही उतना उत्सर्जन कर लेंगे जो कार्बन डाइऑक्साइड को हजम करने की पृथ्वी की क्षमता (इस समय सालाना 17-18 अरब टन के लगभग) से कहीं ज्यादा है! नतीजतन कार्बन बजट, यानी वो मात्रात्मक सीमा जो यह सुनिश्चित करती है कि हम 2 डिग्री सेल्शियस की तापमान वृद्धि के दायरे में रहें, बड़ी तेजी से खत्म हो जाएगा। वस्तुतः इसका मतलब 2 डिग्री से ज्यादा की तापमान वृद्धि का खतरनाक स्तर तय है जो हर जगह रहने वाले गरीबों के साथ-साथ लाखों अन्य जीव-जन्तुओं के लिए भी विनाशकारी साबित होगा।

इससे लीमा में चल रहे मौजूदा विचार-विमर्श और पेरिस में 2015 के जलवायु सम्मेलन पर क्या प्रभाव पड़ेंगे?

अन्तरराष्ट्रीय विचार-विमर्श की प्रक्रिया में फिर से खेमेबन्दी होगी और कुछ देशों पर वादे करने के लिए दबाव बढ़ेंगे। हालाँकि 2 डिग्री सेल्शियस के सामूहिक लक्ष्य को सामने रखकर ऊपर से नीचे आने वाले एक ढाँचे को तैयार करने के बजाय ज्यादा जोर ‘इण्टेण्डेड नेशनली डिटरमाइण्ड कण्ट्रीब्यूशंस’ (आईएनडीसी) के तहत् अलग-अलग देशों के स्तर पर स्वेच्छा से सीमाएँ तय करने पर है। फिर अमेरिका-चीन घोषणा इतनी कमजोर है कि इसके परिणामस्वरूप बाकी तमाम देशों की प्रतिबद्धताएँ काफी कम रहेंगी, जिसका कुल मिलाकर असर यह रहेगा कि पृथ्वी के गरम होने का स्तर खतरनाक हद को पार कर जाएगा।

इस करार का भारत में छोटे किसानों, अन्य समुदायों और व्यापक स्तर पर लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
अमेरिका-चीन करार गरीब भारतीयों के लिए बेहद विनाशकारी है। पिछले 18 महीनों में हमने चार ऐसी आपदाएँ देखी हैं जो सम्भवतः जलवायु परिवर्तन से प्रभावित थीं- उत्तराखण्ड में प्रलय, पूर्वी तट पर तूफान, महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश में फसलों व जानवरों की तबाही करने वाली ओलावृष्टि और कश्मीर में बाढ़। हर मामले में विनाश झेलने वालों में गरीब महिलाएँ, प्रवासी श्रमिक, छोटे किसान आदि प्रमुख थे।

अगर महज 0.9 डिग्री सेल्शियस की औसत तापमान वृद्धि पर ही इस तरह की आपदाएँ आ रही हैं तो अनुमान लगाया जा सकता है कि तापमान और बढ़ा तो कृषि, बागवानी और देश के करोड़ों लोगों के जीवनयापन पर क्या असर पड़ेगा। किसी कमजोर करार का मतलब होगा ज्यादा गरम पृथ्वी, लू के थपेड़ों से ज्यादा मौतें, छोटे किसानों को प्रभावित करने वाली अत्यधिक व अनियमित वर्षा, लम्बा सूखा और गरम समुद्र के चलते ज्यादा तेज तूफान।

आईपीसीसी की ताजा रिपोर्ट यह संकेत देती है कि 2080 तक उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में तापमान 4-5 डिग्री सेल्शियस तक ज्यादा हो जाएगा जिससे गेहूँ व धान जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार नष्ट हो जाएगी। फिर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इंसानों में गरमी से जूझने की एक शारीरिक सीमा होती है। भारत में करोड़ों लोग- खेतिहर मजदूर, छोटे किसान, शहरों में सुरक्षा गार्ड आदि रोजाना खुले में काम करते हैं- भीषण गरमी में भी। लेकिन तब तक देश का काफी हिस्सा मानव अस्तित्व के लिए सम्भवतः अनुपयुक्त रह जाएगा।

(लेखक इण्डिया क्लाइमेट जस्टिस के सदस्य हैं और जलवायु परिवर्तन पर लम्बे समय से शोधरत हैं)

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Post By: Shivendra
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