क्या राष्ट्रीय नदी गंगा मैली ही रहेगी


आज गंगा की सफाई का सवाल उलझ कर रह गया है। सरकार इस बारे में अक्सर दावे करती रहती है लेकिन विडम्बना है कि उन दावों के क्रियान्वयन पर अमल नहीं होता। इसका साफ मतलब यह है कि सरकारी मशीनरी पर सरकार का नियंत्रण ही नहीं है। मौजूदा हालात तो इसकी ही गवाही देते हैं। यहाँ यह जान लें कि साल 2014 में जब देश की सत्ता पर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राजग सरकार काबिज हुयी थी, उस समय नमामि गंगे परियोजना को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्त्वाकांक्षी योजना की संज्ञा दी गई थी और इस परियोजना की सफलता के लिये केन्द्र सरकार के सात मंत्रालयों को जिम्मेवारी दी गई थी। तब से केन्द्र सरकार के मंत्रियों में गंगा की सफाई को लेकर बयान देने की होड़ लगी थी। उसमें जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारतीजी ने कीर्तिमान स्थापित किया था। उन्होंने तब दावा किया था कि गंगा की सफाई का परिणाम अक्टूबर 2016 से दिखने लगेगा और साल 2018 तक गंगा पूरी तरह साफ हो जायेगी। लेकिन 2017 समाप्ति की ओर है और आज गंगा की जो दशा है, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि गंगा की शुद्धि 2018 की बात तो दीगर है, 2024 तक किसी भी कीमत पर संभव नहीं है।

गौरतलब है कि शुरू-शुरू में गंगा की सफाई को लेकर विशेषज्ञों की एक टीम गठित की गई थी। आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक विनोद तारे को इसकी जिम्मेवारी सौंपी गई। समितियाँ गठित हुईं। जल वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और इस क्षेत्र में बरसों से काम कर रहे कार्यकर्ताओं का दिल्ली के विज्ञान भवन में सम्मेलन भी किया गया। इसके लिये 20 हजार करोड़ का भारी भरकम बजट भी आवंटित किया गया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत मार्च 2017 तक 1514.98 करोड़ रुपये खर्च किये गये। इस दौरान मिशन को 3.633 करोड़ जारी किये गए। जाहिर है कि योजना के लिये निर्धारित बजट का अधिकांश हिस्सा खर्च ही नहीं किया गया और वह ऐसे ही पड़ा रहा। एसटीपी चालू किये जाने और शवदाह गृहों में सुधार किये जाने का मसला भी केवल औपचारिकता तक सीमित रहा। नतीजतन गंगोत्री से लेकर पश्चिम बंगाल तक गंगा के 2510 किलोमीटर के बहाव पथ में स्थित शहरों में सीवेज शोधन संयंत्रों का सवाल अनसुलझा ही रहा और गंगा में औद्योगिक संयंत्रों, प्रतिष्ठानों, उद्योगों, बिजली संयंत्रों, टेनरियों का रसायन युक्त कचरा और अपशिष्ट का गिरना जारी रहा। इस पर एनजीटी ने मिशन को कई बार कड़ी फटकार लगाई और इन प्रतिष्ठानों पर कड़ी कार्यवाही के आदेश भी दिये।

प्रधानमंत्री तक ने मिशन की धीमी चाल पर अपनी नाराजगी प्रकट की। तब जाकर उमा भारतीजी ने कहा कि गंगा सफाई का मसला सरकार के बूते हल होने वाला नहीं। सरकार का जिम्मा तो निर्माण कार्य तक है। यह आमलोगों की भागीदारी के बिना असंभव है। उसके बाद ही गंगा संरक्षण व नदी जल संसाधन मंत्रालय का दायित्व नितिन गडकरीजी को सौंपा गया। फिर कहा गया कि गंगा के बहाव क्षेत्र में पड़ने वाले राज्यों से गंगा संरक्षण को गति प्रदान किये जाने हेतु तथा इसमें आ रही अड़चनों को दूर करने के लिये एक कानून लाया जायेगा। मिशन पर खर्च राशि का ऑडिट केन्द्रीय एजेंसी द्वारा किया जायेगा। उसकी रखवाली मानक के अनुरूप की जायेगी। गंगा की रखवाली हेतु गंगा पुलिस तैनात की जायेगी। गंगा प्रदूषित करने पर जुर्माना और दण्ड की व्यवस्था होगी। नये कानून के तहत नया प्राधिकरण बनेगा जो गंगा की देखभाल करेगा। गंगा की रक्षा का पूरा अधिकार केन्द्र सरकार का होगा।

इस कानून के बाद राज्य सरकारें मनमानी नहीं कर पायेंगीं। आज स्थिति यह है कि अभी तक तो सरकार कई महीनों से मिशन के कामकाज में तेजी लाने हेतु समितियों के गठन में ही लगी है। ये समितियाँ गंगा में रेत खनन, डी-सिल्टिंग, गंगा की अविरलता बनाये रखने के लिये, राज्यों की सहमति से वहाँ के गैर-चिन्हित नालों पर जल शोधन प्रौद्योगिकी के परीक्षण हेतु छोटे-छोटे प्रोजेक्ट चलाने, गंगा स्वच्छता पर नमामि गंगे कार्यक्रम के क्रियान्वयन हेतु दो स्तरीय तंत्र गठित करने, गंगा में गाद की समस्या के निराकरण का ही काम देखेंगी। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि अभी तक गंगा सफाई अभियान की जो भी परियोजनायें चल रही हैं, वे सारी की सारी देरी से चल रही हैं लेकिन सरकार दावे-दर-दावे करने में मशगूल है।

देखना यह है अब जबकि नमामि गंगे मिशन की घोषणा के तीन साल बाद गंगा की सफाई हेतु अभी तक समितियों का गठन ही किया जा रहा है, एसटीपी लगने की बात तो अभी सपना है। जो एसटीपी लगे हुए हैं, वे सुधार की बाट जोह रहे हैं। पश्चिम बंगाल तक गंगा की सफाई की बात करना बेमानी होगा जबकि गंगा के मायके में ही उसकी हालत खराब है। बदहाली का आलम यह है कि उत्तराखण्ड में राज्य सरकार जो देवभूमि का डंका पीटते नहीं थकती, की लापरवाही ने गंगा को और मैली करने में अहम भूमिका अदा की है। निंदनीय यह कि एनजीटी के आदेश के बावजूद हरिद्वार में 40 एमएलडी गैर शोधित सीवेज रोजाना गंगा में बहाया जा रहा है। यह खुलासा एनजीटी द्वारा गठित संयुक्त समिति ने जाँच के बाद किया है।

समिति ने रिपोर्ट में कहा है कि जो सीवेज बिना शोधन के गंगा में बहाया जा रहा है वह जगजीतपुर एसटीपी की क्षमता से बहुत ज्यादा है। इस अतिरिक्ति प्रवाह का फिलहाल कोई उपचार नहीं है। उसके अनुसार हरिद्वार, सितारगंज और पंतनगर में स्थित सीईटीपी में अभी तक ऑनलाइन प्रदूषण निगरानी संयंत्र भी नहीं लगाये गये हैं। पंतनगर सीईटीपी को इलेक्ट्रिक मैग्नेटिक फ्लोमीटर और कवर्ड एरिया भी मुहैया नहीं है। यह प्रशासन की अक्षमता नहीं तो और क्या है कि एनजीटी ने दो साल पहले गोमुख से हरिद्वार तक गंगा को साफ करने और कुछ माह पहले गंगा किनारे 500 मीटर तक किसी भी प्रकार का कूड़ा नहीं डालने का आदेश दिया। लेकिन एनजीटी के आदेश को धता बताते हुए खुलेआम गंगा में सीवेज जा रहा है और प्रशासन मौन है।

एनएमसीजी को गोमुख से लेकर बंगाल की खाड़ी तक गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिये केन्द्र ने साल 2018 तक अपशिष्ट शोधन संयंत्र यानी एसटीपी लगाने का लक्ष्य दिया था। उसे शहरों से निकलने वाले 118 बड़े नालों में ट्रीटमेंट प्लांट और एसटीपी स्थापित करना था। इस काम में ढिलाई इतनी बरती गई कि एनजीटी को एनएमसीजी को कई बार फटकार लगानी पड़ी। एनजीटी ने एनएमसीजी को समय और संसाधनों की बर्बादी का जिम्मेदार भी ठहराया। उसने जल संसाधन मंत्रालय के अधिकारियों को भी कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि दुख है कि आपको पता ही नहीं है कि आपको क्या करना है। जबकि गंगा की सफाई की जिम्मेदारी आपकी है। यह बहुत निंदनीय है कि आप इसमें नाकाम रहे हैं। आप तो शहरों के नालों से आगे बढ़ ही नहीं रहे हैं। आपका ध्यान तो केवल शहरों के नालों पर ही है। असलियत में सरकारी प्राधिकार भ्रमित है। यही वजह है कि सब कुछ उल्टा हो रहा है। नतीजतन बीते वर्षों में गंगा सहित अन्य नदियाँ और प्रदूषित होती चली गई हैं। जबकि प्रधानमंत्री जी ने साफ तौर पर यह जिम्मेदारी आपको सौंपी है।

विडम्बना देखिए कि 2014-15 में सरकार ने गंगा सफाई अभियान के लिये 326 करोड़ रुपये जारी किये लेकिन इसमें से एनएमसीजी द्वारा केवल 170.99 करोड़ की राशि ही खर्च की जा सकी। 2015-16 में भी सरकार ने 1.632 करोड़ जारी किए लेकिन 602.60 करोड़ ही इस परियोजना में खर्च किया जा सका। यही हाल 2016-17 में हुआ। इस दौरान 1.675 करोड़ सरकार ने दिये लेकिन खर्च केवल 741.39 करोड़ ही हुए। इस दौरान गंगा में डॉल्फिन कार्यक्रम के लिये नमामि गंगे परियोजना में शामिल लखनऊ के एक एनजीओ को 95.45 लाख रुपये दिये गये। लेकिन परिणाम नदारद। अब सवाल यह उठता है कि जब उत्तराखण्ड में गंगा की यह बदहाली है, जब यहाँ ही गंगा साफ नहीं है, उस हालत में तो पश्चिम बंगाल तक गंगा कब साफ हो पायेगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। जाहिर है कि अभी फिलहाल राष्ट्रीय नदी गंगा की सफाई की उम्मीद बेमानी है। 2024 तक गंगा साफ हो पायेगी, इसमें भी संदेह है।
 

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