जब साथ छोड़ देती है परछाई

एक आम कहावत है कि परछाई कभी साथ नहीं छोड़ती, पर खगोल वैज्ञानिकों के मुताबिक साल के दो दिन ऐसे होते हैं, जब परछाई भी साथ छोड़ देती है।

नई दिल्‍ली, 15 मई (इंडिया साइंस वायर):  बचपन से हमें पढ़ाया जाता है कि सूर्य पूरब में उगता है, परछाई हमेशा साथ साथ चलती है, हर दिन मध्‍याह्न के वक्‍त सूर्य सिर के ऊपर होता है और दिन-रात की अवधि हमेशा बराबर होती है। लेकिन, खगोल वैज्ञानिक इन चारों धारणाओं को गलत ठहराते हैं। सच तो यह कि वर्ष में सिर्फ दो दिन ही सूर्य वास्‍तविक पूरब दिशा में उगता है। इसी तरह साल में महज दो दिन ऐसे होते हैं, जब सूर्य मध्‍याह्न के समय ठीक हमारे सिर के ऊपर चमकता है। इस‍लिए उन दो दिनों में मध्‍याह्न के समय हमारी परछाई हमारा साथ छोड़ देती है। परछाई न बनने के इस घटनाक्रम को खगोल विज्ञानी जीरो शैडो-डे या ‘शून्‍य छाया दिवस’ कहते हैं।

यह तो हम जानते ही हैं कि हमारी पृथ्‍वी सूर्य की परिक्रमा करती है और अपनी धुरी पर भी घूमती है। पृथ्‍वी अपने अक्षांश पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है, जिस कारण सूर्य का प्रकाश धरती पर हमेशा एक जैसा नहीं पड़ता और इसी वजह से दिन और रात की अवधि भी बराबर नहीं होती। पृथ्‍वी के सूर्य का चक्‍कर लगाते रहने के कारण सूर्य के उत्‍तरायण और दक्षिणायन की प्रकिया घटित होती है और ऋतुओं में परिवर्तन होता है।  

जब सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में 23.5 डिग्री अक्षांश पर स्थित मकर रेखा से उत्‍तर की ओर बढ़ता है, तो इसे उत्‍तरायण कहते हैं। उत्‍तर की ओर बढ़ते हुए 21 जून को सूर्य उत्‍तरी गोलार्ध में 23.5 डिग्री अक्षांश पर स्थित कर्क रेखा के ऊपर पहुंच जाता है। इस दौरान भूमध्‍य रेखा से कर्क रेखा के बीच कुछ खास स्‍थानों पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, जिस कारण वहां लंबवत खड़ी किसी चीज की परछाई नहीं बनती है। उत्‍तरायण के दौरान उत्‍तरी गोलार्ध में गरमी बढ़ने लगती है, रातें छोटी तथा दिन लंबे होते हैं और 21 जून को यहां सबसे छोटी रात एवं दिन सबसे बड़ा होता है।

सूर्य जब दक्षिण की ओर बढ़ने लगता है तो उसे दक्षिणायण कहते हैं और 22 दिसंबर के आसपास सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में स्थित मकर रेखा के ऊपर चमकता है। इस दौरान वहां पर गरमी का मौसम होता है तथा दिन लंबे और रातें छोटी होती हैं। इस दौरान भूमध्‍य रेखा से दक्षिण में 23.5 डिग्री अक्षांश पर स्थित मकर रेखा पर मौजूद कई स्‍थानों पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, तो वहां भी मध्‍याह्न के समय कुछ पलों के लिए शून्‍य छाया दिवस होता है। ध्‍यान रहे कि शून्‍य छाया दिवस की घटना कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच में ही घटित होती है। कर्क रेखा के उत्‍तर और मकर रेखा के दक्षिण में शून्‍य छाया दिवस नहीं होता है।

सूर्य के उत्‍तरायण और दक्षिणायण की प्रक्रिया से स्‍पष्‍ट है कि सूर्योदय का केंद्र भी बदलता बदलता रहता है। इस तरह साल में महज दो दिन (21 मार्च एवं 21 सितंबर के आसपास) सूर्य वास्‍तविक पूरब दिशा में निकलता है। इन दो दिवसों को विषुव दिवस या इक्विनॉक्‍स कहते हैं। बाकी के दिनों में सूर्योदय का केंद्र उत्‍तर-पूर्व या फिर दक्षिण पूर्व होता है। 21 जून और 22 दिसंबर को सूर्य जब उत्‍तर-पूर्व या फिर दक्षिण-पूर्व में अपने शीर्ष बिंदु पर होता है, तो उसे अयनांत या सॉलिस्टिस कहते हैं।

21 मार्च के बाद के दिनों में निरंतर गौर करें तो हम पाएंगे कि सूर्योदय का बिंदु धीरे-धीरे उत्‍तर की ओर खिसक रहा है और इस तरह 21 जून को ग्रीष्‍म अयनांत या कर्क संक्रांति के दिन सूर्योदय का केंद्र वास्‍तविक पूर्व दिशा से उत्‍तर की ओर अधिकतम बिंदु पर पहुंच जाता है। अगले दिन से सूर्य दक्षिण की ओर खिसकने लगता है, जिसे भारत में हम दक्षिणायण कहते हैं। दक्षिण की ओर अपनी इस यात्रा में 21 सितंबर को सूर्योदय का केंद्र एक बार फिर वास्‍तविक पूर्व दिशा में पहुंच जाता है। जबकि दक्षिण-पूर्व में अपने अधिकतम बिंदु पर यह 21 दिसंबर को पहुंचता है। इसके अगले दिन से पुन: उत्‍तरायण शुरू हो जाता है और यह क्रम इसी तरह चलता रहता है।

सूर्य भूमध्‍य रेखा से कर्क रेखा की ओर उत्‍तरायण में होता है तो उत्‍तरी गोलार्ध में सूर्य का प्रकाश अधिक और दक्षिणी गोलार्ध में कम पड़ता है। इस दौरान दक्षिणी गोलार्ध में कड़ाके की ठंड पड़ती और तभी अंटार्कटिका जाने के अभियान कुछ समय के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

उत्‍तर से दक्षिण की ओर सूर्य वापस आता है, तो ठीक दोपहर के बारह बजे उसी अक्षांश फिर से शून्‍य परछाई बनती है। यानी कर्क रेखा से मकर रेखा के बीच सूर्य के दक्षिणायण होते समय इस खगोलीय घटना को दोबारा देखा जा सकता है। इस तरह कन्‍याकुमारी से कर्क रेखा तक मध्‍य भारत के तमाम स्‍थानों में अप्रैल से जून तक और वापसी में जून से अगस्‍त तक किसी खास दिन मध्‍याह्न में इस खगोलीय घटना को वर्ष में दो बार देखा जा सकता है।

भारत के कई शहर इन दिनों ‘शून्‍य छाया दिवस’ का गवाह बन रहे हैं। खगोल विज्ञानी, विद्यार्थी और जिज्ञासु लोग इस दिन तरह-तरह के प्रयोग करते हैं। वे मध्‍याह्न के समय अपनी परछाई को देखते हैं, गिलास को उलटा रखकर देखते हैं या फिर किसी खंबे की परछाई को देखते हैं।  

इस वर्ष भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित निकोबार द्वीप समूह के सबसे बड़े द्वीप ग्रेट निकोबार में स्थित कैम्‍पबेल-बे में छह अप्रैल को जीरो शैडो-डे की शुरुआत हुई थी। एस्‍ट्रोनॉमिकल सोसायटी ऑफ इंडिया ने इससे संबंधित एक मैप जारी किया है और बताया है कि किन तारीखों पर कौन-से शहरों में जीरो शैडो-डे या ‘शून्‍य छाया दिवस’ देखा जा सकेगा। भारत में अंडमान-निकोबार, केरल, तमिलनाडु, पुद्दुचेरी, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, महाराष्ट्र, ओडिशा, गुजरात, छत्‍तीसगढ़, मध्‍यप्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड समेत कई राज्‍यों में ‘शून्‍य छाया दिवस’ देखा जा सकता है। (इंडिया साइंस वायर)

 

लेखक का ट्विटर हैंडल - @usm_1984

 

कुछ प्रमुख शहरों में शून्‍य छाया दिवस :-

मई 25/ जुलाई 18

राजनांदगांव, अमरावती

मई 26/ जुलाई 17

रायपुर, नागपुर, भिलाई, दुर्ग, भंडारा, डोंगरगढ़

मई 27/ जुलाई 16

बुरहानपुर, तुमसर, गोंदिया, चांदीपुर

मई 28/जुलाई 15

संबलपुर, बालासोर, तिल्‍दा

मई 30/जुलाई 13

खरगोन, खंडवा, बेतूल, बालाघाट, रायगढ़, झारसुगुडा,

मई 31/जुलाई 12

चांपा, कवर्धा, बड़वानी, नंदीग्राम

जून 1/ जुलाई 11

छिंदवाड़ा, सिवनी, बिलासपुर, हल्दिया

जून 3/जुलाई 9

हरदा, कोरबा, राउरकेला, खड़गपुर, मेदिनीपुर

जून 5/ जुलाई 7

इटारसी, मंडला, कोलकाता

जून 6/ जुलाई 6

होशंगाबाद, इंदौर  

जून 7/ जुलाई 4

नरसिंहपुर

जून 9/जुलाई 3

अहमदाबाद, देवास, कल्‍याणी

जून 11/ जुलाई 1

अंबिकापुर

जुलाई 12/जून 30

गांधी नगर, उज्‍जैन, सिहोर, जबलपुर, बांकुरा

जुलाई 13/ जून 29

भोपाल, भुज

जुलाई 20

धमतरी, वर्धा, बालांगीर, अकोला

जून 15/जून 27

पुरुलिया, रांची, रतलाम

जून 17/जून 25

मेसरा

स्रोत: एस्‍ट्रोनॉमिकल सोसायटी ऑफ इंडिया

 

Get ready for magic of vanishing shadows

 

By Dr T V Venkateswaran

 

New Delhi, May 24 (India Science Wire): “Our shadow will follow us everywhere”, says an old Tamil proverb. On two days in a year, however, this does not hold true. On ‘Zero Shadow Days’ no shadow of vertical objects is cast as the sun is at the zenith at noon on two particular days. Stick a vertical pole on the ground or stand erect, no shadow will be seen for a fleeting moment on zero shadow days.

 

We all believe that the sun rises in the east; the sun is on top of our head at noon; and we have twelve hours each of day and night. All the three statements appear simple truths but are just fallacies in scientific terms.  

 

Shadows have helped humans to understand the passage of time since time immemorial. It is by studying the behaviour of shadows that humans began to understand bigger cycles of time. A day can be easily recognised and measured as the time interval between two successive sunrises and a month one cycle of lunation of the moon - from one full moon or poornima to another.

 

 

A year has been defined as the time taken for the earth to make one round around the sun. But how do we mark the beginning and end and actually compute its period?  For ancient civilisations, shadow cast by the sun came in handy.

 

Consider an imaginary point at the equator. If you stick a vertical pole and observe its shadow, it will be as long as 200 times the height of the pole at the time of sun rises.  Now if you watch the direction of the shadow at sunrise, first it would be away from the sun, and it would not be pointing towards due west on most days of the year. By measuring the angle of the shadow at the sunrise time, one can compute the sunrise point. It would be evident that the position of the sunrise point is north-east or south-east.  This means the sun does not always rise from the east.

 

Any keen observer could notice that the sunrise point at the horizon achieves maximum north on June 21. After this day, the sunrise point would slowly and steadily shift towards the south – in a phenomenon known as dakshinayan.  While the sunrise point is in dakshinayan, the sunrise point would be true east on September 21. The next day, the sunrise point would be towards southeast, and the sunrise point would reach the southernmost point on December 21. After December 22, the sunrise point would appear to move north – marking the uttarayan. During the uttarayan period, again on March 21, the sun will rise at true east.  Thus one cycle of north-south movement of sunrise point gives the year.

 

Now consider the case of the shadow cast by the vertical pole when the sun crosses the meridian.  As the sunrise point is usually not east, it is clear that the sun will not come overhead every day. Precisely on March 21 and September 21, the day of equinoxes, that sun will rise exactly in the east and set exactly in the west and hence will be on top of the vertical pole at the local noon. However, between March 22 and September 20, the sunrise point is northeast, and hence the sun would appear to be slightly north of the pole even at the local noon. This implies the shadow at noon will be towards the south. Similarly, it is easy to make out that the shadow of the pole at midday would be pointing to the north between September 21 and March 20. Thus at the equator,  only on two days in a year - March 21 and September 21 - the day of equinoxes a vertical pole will not cast any shadow, giving us zero shadow days.

 

While the sun is on top of the equator on March 21, it will be north of equator from next day. This means it would be over some latitude north of the equator on that day and will cast now shadow at local midday in that latitude. Likewise, the position of the sun would be aligned with some latitude, and on June 6, it would be over 22.7 degree N latitude. Indore is situated in this latitude. At the local midday, the sun will cast no shadow in Indore.  

 

The position of the sun will go further north, until it reaches the maximum on July 21, when it would go over the Tropic of Cancer. Subsequently, the position would move south and once again go over Indore on July 6, before again being on top of the equator on September 21, the day of the equinox.  The Sun would be over the Tropic of Capricorn on December 22. Incidentally July 21 when the Sun’s path in the sky is maximum north is called summer solstice and December 22, when it is maximum south is called winter solstice.

 

Why the sun’s path does not go beyond 23.5 degrees? That is to do with the earth’s tilt. This has implications for people in the northern hemisphere, living north of Tropic of Cancer. For then, there will be no day on which the sun will come right overhead. Sun will always be south of them.

 

One can mimic zero shadow day at home too. Stand right below an overhead lamp, you will feel intense light and perhaps warmth. Keep the same overhead light to your south, the intensity of the illumination will be reduced and it won’t be that warm. When the sun is right on top of your latitude, or nearby, it is obvious it would be summer. When it is taking the southernmost path, and even during the midday it is south of you, it would be winter. That is why in the northern hemisphere we have summer during July and winter during December. It is not as most assume that in elliptical orbit the earth is near to the sun at one time and far away at another time. In fact, the earth’s orbit is nearly circular that there is perhaps not more than 3% variation in the sun’s rays. It is the tilt of the Earth and the apparent motion of the sun that causes seasons.

 

Zero Shadow Day is an opportunity for us all to understand the phenomenon and feel it. Just keep a vertical pole in an open ground, you will see no shadow on these two days. The Public Outreach and Education Committee of Astronomical Society of India and Vigyan Prasar are jointly organising many programmes on these two days. Visit http://astron-soc.in/outreach/activities/zero-shadow-day/ for further details. See the table below to find out when you can see in your place. Visit the interactive map for details https://alokm.com/zsd.html

 

May 26/ July 17

Raipur, Nagpur, Bhilai

May 28/July 15

Sambalpur, Gondiha

June 1/ July 11

Chhindwara, Bilaspur

June 3/July 9

Korba, Rourekela

June 5/ July 7

Itarsi, Mandla, Kolkata, Anand, Mhow

June 6/ July 6

Hoshangabad, Indore

June 7/ July 4

Narasinghpur

June 9/July 3

Ahmedabad, Dewas, Kalyani

June 11/ July 1

Ambikapur

July 12/June 30

Gandhinagar, Ujjain, Sehore, Jabalpur, Bankura

July 13/ June 29

Bhopal, Bhuj

June 15/June 27

Purilia, Ranchi, Ratlam

June 17/June 25

Mesra

 

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Post By: RuralWater
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