तम्बाकू का ज़हरीला सफर

तम्बाकू का ज़हरीला सफर
तम्बाकू का ज़हरीला सफर

एक हुरोन इण्डियन कबीले में तम्बाकू की उत्पत्ति को लेकर एक रोचक दंतकथा है। इस दंतकथा के मुताबिक, "बहुत समय पहले, धरती बंजर थी और लोग भूख से मर रहे थे। उस समय पवित्र आत्मा ने मानव जाति की रक्षा के लिए एक स्त्री को धरती पर भेजा। धरती पर टहलते हुए जब उसका दायां हाथ मिट्टी को छूता तो वहां आलू पैदा होने लगते थे और जब उसका बायां हाथ मिट्टी को छूता तो मक्का लहलहाने लगती थी। आखिरकार जब दुनिया में भरपूर अनाज होने लगा तो वह स्त्री थोड़ी देर सुस्ताने के लिए रुकी। बाद में ठीक उसी जगह तम्बाकू पैदा होने लगी जहां वह सुस्ताई थी।"

तम्बाकू की उत्पत्ति

नई दुनिया से पुरानी दुनिया में तंबाकू के आगमन को लेकर कई किस्से हैं। एक किस्सा यह है कि तम्बाकू की खोज क्रिस्टोफर कोलंबस के दल ने अमरीका पहुंचने पर की थी। उन्होंने देखा था कि वहां के स्थानीय लोग तम्बाकू की सूखी पत्तियों को हाथ से लपेटकर धूम्रपान करते हैं। कोलंबस यह पौधा और उसके बीज स्पेन लाया और वहां पंद्रहवीं सदी के अंत में इसकी खेती शुरू करवाई। दूसरा किस्सा यह है कि पुर्तगाल में फ्रांस के राजदूत ज्यां निकॉट ने ही फ्रांस के दरबार में सबसे पहले तम्बाकू पेश की थी। यह सोलहवीं सदी की बात है। मगर तम्बाकू की सूखी पत्तियों का धूम्रपान करने का ज़िक्र मय सभ्यता में 1500 वर्ष पूर्व मिलता है।

तम्बाकू प्रजाति की उत्पत्ति 8,000 वर्ष पूर्व बताई जाती है जब अमरीकी इण्डियन्स ने इसकी दो प्रजातियों (निकोठियाना रस्टिका और निकोटियाना टेबेकुम) को पूरे अमरीका में फैलाया था। तम्बाकू सोलेनेसी कुल का सदस्य है। निकोटियाना जींस में करीब 60 प्रजातियां हैं। हल्की सुगंध और तेज़ी से जलने वाली निकोटियाना रस्टिका प्रजाति की तम्बाकू मूल रूप में वर्जीनिया में उगाई जाती थी मगर आज तुर्की, भारत और रूस में इसकी खेती होती है। आधुनिक व्यापारिक तम्बाकू निकोटियाना टेबेकुम की किस्म है।

इतिहास

तम्बाकू की खोज सबसे पहले नई दुनिया में क्रिस्टोफर कोलबंस ने पंद्रहवीं सदी में की थी और इसके बाद डेढ़ सौ साल के अंदर ही यह पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। इसका इतना तेजी से फैलाव निकोटियाना टेबेकुम की लत लगने की वजह से संभव हुआ। शुरू-शुरू में तम्बाकू को एक चिलम या पाइप में रखकर पिया जाता था। इसके बाद सिगार और सिगरेट आए।

भारत में तम्बाकू

भारत में तम्बाकू लाने का काम पुर्तगालियों ने सत्रहवीं सदी के आरंभ में किया था। यह सही है कि भारत में पहले से भी तम्बाकू की कुछ किस्में पाई जाती थीं मगर जल्दी ही उनका स्थान इस नई विदेशी प्रजाति ने ले लिया। इसका व्यापार तेज़ी से बढ़ा और सत्रहवीं सदी में तम्बाकू गोवा से निकलने वाली सबसे महत्वपूर्ण वस्तु हो गई। इस दौरान दक्षिण एशिया में कई देशों में धूम्रपान की प्रथा चल निकली। पुर्तगाली उपनिवेश के लगभग हर घर में धूम्रपान करने या तम्बाकू चबाने की आदत अपनाई गई। आगे चलकर ब्रिटिश लोगों ने आधुनिक सिगरेटें चलाई। उन्होंने भारत में तम्बाकू की खेती को खूब प्रोत्साहन दिया।

जब 1605 में भारत में तम्बाकू का आगमन हुआ तब सम्राट अकबर के दरबार के शाही हकीम ने इसके दुष्प्रभावों को लेकर चिंता जाहिर की थी। सद्र-ए-जहां हकीम अबुल फतह ने तम्बाकू के चलन का विरोध किया था मगर शहंशाह अकबर ने इसकी अनुमति दे दी थी। अबुल फतह ने ही तम्बाकू के दुष्प्रभावों से निपटने का तरीका पेश किया। उन्होंने सुझाव दिया था कि तम्बाकू के धुएं को पहले पानी में से गुज़ारा जाए और फिर कश खींचा जाए। उनके इसी सुझाव के कारण हुक्का प्रचलित हुआ और धीरे-धीरे पूरे देश में लोकप्रिय हो गया। जब 1905 में बिहार के अलावा अन्य जगहों पर भी हुक्के बनने लगे तो इनका चलन और बढ़ा। द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही बीड़ी पीने का भी चलन चला आ रहा है।

नियंत्रण के प्रयास

आज इस बात के अकाट्य प्रमाण हैं कि तम्बाकू के सेवन से मुंह और फेफड़ों का कैंसर, ब्रोंकाइटिस, हृदय रोग, एम्फीसेमा, तथा कई अन्य जानलेवा बीमारियां होती हैं। इतिहास में तीन राजाओं भारत के सम्राट जहांगीर, इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम और फारस के शाह अब्बास ने तम्बाकू के हानिकारक प्रभावों को गंभीरता से लिया था और इसके सेवन पर रोक लगाने के प्रयास किए थे। सत्रहवीं सदी में तुर्की, फारस और भारत में तम्बाकू की लत के 'अपराधी' के लिए मृत्यु दण्ड मुकर्रर किया गया था। भारत में कुछ धर्मों में भी तम्बाकू के सेवन पर पाबंदी है। सिख समुदाय के लिए तम्बाकू का निषेध करते हुए गुरु गोविंद सिंह ने कहा था, 'शराब बुरी चीज़ है, भांग एक पीढ़ी को बर्बाद करती है मगर तम्बाकू सारी पीढ़ियों को तबाह कर देती है।"

तम्बाकू की खेती

पंद्रहवीं सदी के अंत तक अमरीकी महाद्वीप के बाहर किसी को भी तम्बाकू की कृषि योग्य किस्मों की खबर नहीं थी। आज सवा सौ से ज़्यादा देशों में 40 लाख हैक्टर ज़मीन पर इसकी खेती होती है। पिछले वर्षों में तम्बाकू का उत्पादन तेज़ी से बढ़ा है और इसके लिए बढ़ती मात्रा में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है जो पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसके अलावा तम्बाकू की पत्तियों को पकाने के लिए जंगलों का विनाश होता है।  पूरी दुनिया में तम्बाकू की खेती में 20 लाख लोग लगे है। इनमे से दो तिहाई तो चीन भारत और इंडोनेशिया में ही है   

भारत में तम्बाकू की खेती

तम्बाकू की खेती के बाद इसका उपयोग विभिन्न रूपों में किया जाता है। प्रत्येक उपयोग के लिए तम्बाकू की एक खास किस्म होती है। भारत में भी तरह-तरह की तम्बाकू पैदा की जाती है। प्राचीन काल से भारत एक खेतिहर देश रहा है। शुरू शुरू में भारत में तम्बाकू की खेती गुजरात के खेड़ा और मेहसाणा जिलों में होती थी। आगे चलकर अन्य इलाकों में भी इसका प्रसार हो गया। हालांकि भारत में तम्बाकू की खेती मात्र 400 सालों से हो रही है मगर आज तम्बाकू के उत्पादन में चीन के बाद भारत दुनिया में दूसरे नम्बर पर है। भारत तम्बाकू का नौवां सबसे बड़ा निर्यातक है। इसके अलावा तम्बाकू की खपत के मामले में भी हम तीसरे नम्बर पर हैं - मात्र चीन और यू.एस. ही हमसे ऊपर हैं। तम्बाकू के कारण होने वाली मौतों में हम चीन के बाद दूसरे नम्बर पर आते हैं।

भारत में तम्बाकू की दोनों प्रजातियों की खेती होती है मगर ज़्यादा निकोटियाना टेबेकुम ही है। चूंकि निकोटियाना रस्टिका के लिए अपेक्षाकृत ठण्डी जलवायु की ज़रूरत होती है, इसलिए इसकी खेती उत्तर व उत्तर-पूर्वी इलाकों पंजाब, उत्तरप्रदेश, प. बंगाल, बिहार और आसाम तक सीमित है। इसकी तम्बाकू का इस्तेमाल खाने व हुक्का पीने और नसवार बनाने में ही होता है। दूसरी ओर सिगरेट, सिगार, चुरूट, बिडी, हुक्का और नसवार में इस्तेमाल के लिए निकोटियाना टेबेकुम की अलग-अलग किस्में विकसित की गई हैं। तम्बाकू के रकबे और उत्पादन दोनों ही लिहाज़ से खेड़ा ज़िला देश में नंबर एक है।

भारत में 1508 से ही विभिन्न किस्म की तम्बाकुओं की खेती होने लगी थी मगर काली मिट्टी में वर्जीनिया तम्बाकू की व्यावसायिक खेती 1920 में शुरू हुई। वर्जीनिया तम्बाकू का उपयोग खास तौर से सिगरेट बनाने में होता है। गैर वर्जीनिया तम्बाकू के उत्पादन के मामले में गुजरात सबसे ऊपर है जबकि उसके बाद क्रमशः आंध्रप्रदेश, बिहार, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तप्रदेश और प. बंगाल आते हैं। भारत में गैर-वर्जीनिया तम्बाकू का उपयोग बिड़ी, खाने, हुक्का, सिगार, चुरुट और नसवार में होता है। भारत में तम्बाकू की खेती में लगभग 5,38,000 लोग लगे हैं।

भारत में तम्बाकू की खपत

भारत में तम्बाकू का सेवन कई तरह से किया जाता है। चूने या सुपारी के साथ तम्बाकू खाना और नसवार सूंघना तम्बाकू के धुआं रहित उपयोग हैं। सिगरेट, बीड़ी, चिलम, हुक्का वगैरह धूम्रपान के तरीके हैं। भारत में तम्बाकू सेवन का सबसे प्रचलित तरीका बीड़ी  है।बीड़ी पीने की आदत पूरे दक्षिण पूर्व एशिया (बांग्लादेश, मलेशिया, नेपाल, पाकिस्तान, सिंगापुर और श्रीलंका) में पाई जाती है। बिड़ी दरअसल देशी सिगरेट ही है। थोड़ी सी तम्बाकू को तेन्दू पत्ते में लपेटकर बीड़ी बनाई जाती है। दुनिया भर में बीड़ी  उत्पादन में भारत का हिस्सा 85 प्रतिशत है। बीड़ी बनाने का काम प्रायः एक घरेलू उद्योग है जिसमें ग्रामीण महिलाएं व बच्चे (4-14 वर्ष) काम करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश में करीब 11 लाख बच्चे बीड़ी उत्पादन में लगे हैं। देश का कुल बीड़ी उत्पादन 55,000 करोड़ बिड़ियां है। बीड़ी  के जलते हिस्से को मुंह में रखकर पीने का रिवाज़ ग्रामीण क्षेत्रों, खासकर दक्षिण पूर्वी भारत में ज़्यादा है। गुटका या पान मसाला तैयारशुदा तम्बाकू उत्पाद हैं।

इनमें तम्बाकू के अलावा सुपारी, चूना, कत्था वगैरह मिलाए जाते हैं। खाने वाली तम्बाकू और नसवार में 28 कैंसरकारी पदार्थ होते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों को अंदेशा है कि जल्दी ही भारत में मुंह के कैंसर की महामारी फैलनेवाली है। इसका कारण यह है कि आजकल बच्चे बढ़ती संख्या में गुटका खाने लगे हैं। ग्यारह-बारह साल के बच्चों में दो साल तम्बाकू खाने के बाद कैंसर से पहले की गठान बनने की शुरुआत हो सकती है।

भारत में कुल तम्बाकू उत्पादन (लगभग 7 लाख टन) में से करीब 1.20 लाख टन का तो निर्यात हो जाता है। शेष तम्बाकू का देश में ही सेवन किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनुमान लगाया है कि भारत में तम्बाकू का सेवन करने वाले 25 करोड़ लोगों में से 14 प्रतिशत सिगरेट पीते हैं, 50 प्रतिशत बीड़ी पीते हैं और 36 प्रतिशत अन्य रूपों में तम्बाकू का सेवन करते हैं।

भारत में पहला सिगरेट कारखाना (इम्पीरियल टोबेको कम्पनी, अब आईटीसी) 1906 में बिहार के मुंगेर शहर में लगाया गया था। आई.टी.सी. की अनुसंधान शाखा इण्डियन लीफ टोबेको डेवलपमेंट डिवीजन का इतिहास देश में सिगरेट के इतिहास का गवाह है। 1928 तक इस डिवीजन ने वर्जीनिया तम्बाकू का रकबा काफी बढ़ा दिया था। 1996 में देश में 102 अरब सिगरेटों का उत्पादन हुआ था मगर 1997 से इसमें कमी आने लगी है। अनुमान है कि निर्यात और घरेलू मांग में बढ़ोतरी के चलते वर्ष 2003 में उत्पादन फिर बढ़ने लगेगा।

स्रोत -स्रोत फीचर्स ,नवम्बर 2003 

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Post By: Shivendra
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