सुरंगों में हिमालय का भविष्य 

सुरंगों में हिमालय का भविष्य 
सुरंगों में हिमालय का भविष्य 

ऑल वेदर रोड की एक सुरंग धंसी

ऑल वेदर रोड के तहत धरासू-यमुनोत्री हाईवे पर सिल्क्यारा से डंडालगांव के बीच साढ़े चार किमी लंबी सुरंग का निर्माणाधीन है। यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर सिलक्यारा से डंडालगांव तक निर्माणाधीन सुरंग के अंदर भूस्खलन हुआ है। इस सुरंग का एक हिस्सा 150 मीटर खंड ढह गया है। यह चारधाम परियोजना के लिए एक महत्वपूर्ण झटका है। इसके बन जाने के बाद उत्तरकाशी और यमुनोत्री धाम के बीच की दूरी 26 किमी कम हो जाती। लगभग 40 श्रमिकों के फंसे होने की सूचना है, उत्तरकाशी के जिला आपदा प्रबंधन ने इस बात की पुष्टि की है। एक पाइप से आक्सीजन और खाने-पीने का सामान भेजा जा रहा है। और फंसे हुए मजदूरों से संपर्क किया जा रहा है,  कंपनी मलबा हटाने का प्रयास कर रही है। श्रमिकों को बचाने के लिए पांच एंबुलेंस भी मौके पर मौजूद हैं।

हिमालय के साथ आखिर हो क्या रहा है

यह त्रासदी हिमालय के लिए किसी भी ऐसी रणनीति की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है जो सर्वव्यापी हो, जिसमें भूविज्ञान, टिकाऊ इंजीनियरिंग और कुशल विनियमन का ज्ञान शामिल हो। इससे न केवल लोगों, श्रमिकों का जीवन सुरक्षित रहेगा, बल्कि निर्माण भी लंबा साथ देंगे। साथ ही, हिमालय क्षेत्र के विशिष्ट और इसके लिए आवश्यक पारिस्थितिकी तंत्र और जल स्रोतों को संरक्षित किया जा सकेगा। 

इन पहाड़ों पर जल विद्युत और रेल परियोजनाओं की बाढ़ आई हुई है। पर्यावरणविद और भूवैज्ञानिक हिदायतें देते रहे हैं कि गंगा-यमुना  और उसकी हजारों सहायक नदियों की अविरल धारा अबाध रहनी चाहिए। नहीं तो, हिमालय की नदियां अस्तित्व के संकट से जूझेंगी। बिजली परियोजनाओं में जो संयंत्र (रन-ऑफ-द-रिवर) लग रहे हैं, उनके लिए हिमालय को खोखला किया जा रहा है। सड़कों आदि के लिए आधुनिक औद्योगिक विकास का ही परिणाम है कि आज हिमालय दरकने लगा है। जिन पर हजारों सालों से बसे लोग अपनी ज्ञान-परंपरा के बूते जीवन-यापन करते चले आ रहे हैं। 

फंसे हुए श्रमिकों के जीवन के लिए तत्काल खतरा पैदा करने के अलावा, भयानक भूस्खलन यह सवाल उठाता है कि हिमालयी पारिस्थितिकी कितनी नाजुक है। यह क्षेत्र, आश्चर्यजनक दृश्यों और विविध पारिस्थितिकी प्रणालियों के लिए प्रसिद्ध है, विशेष रूप से मानव गतिविधि के परिणामस्वरूप पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के लिए अतिसंवेदनशील है।

ऑल वेदर रोड विवाद-दर-विवाद

चारधाम परियोजना की सड़क चौड़ाई को लेकर विवाद खूब रहा है। 6 मीटर को छोड़कर 12 मीटर चौड़ी जैसी पहल से संबंधित निर्माण कार्यों के लिए अक्सर पहाड़ी परिदृश्य में बड़े व्यवधान की आवश्यकता होती है। वनों की कटाई, सुरंग निर्माण और उत्खनन इसके नाजुक संतुलन को बिगाड़ सकते हैं, जिससे भूवैज्ञानिक अस्थिरता, जैव विविधता हानि और मिट्टी के कटाव का खतरा बढ़ सकता है। डाउन2अर्थ को दिए गए एक बयान में गंगा आह्वान संस्था से जुड़ी एक्टिविस्ट मलिका भनोट कहती हैं कि पर्यावरणीय दृष्टि से यह बहुत संवेदनशील क्षेत्र है। इस फ़ैसले के बाद अब इतनी चौड़ी सड़कें बनेंगीं तो इस क्षेत्र की संवेदनशीलता कई गुना बढ़ जाएगी और पर्यावरण पर होने वाला असर भी उसी गति से बढ़ेगा। वह आशंका जताती हैं कि आने वाले समय में इस क्षेत्र में आने वाली आपदाओं का विकराल रूप देखने को मिलेगा।

निर्माण-संबंधी गतिविधियों से हो क्या रहा है

भीमकाय निर्माण-संबंधी गतिविधियों में निवास स्थान को खंडित करने और नष्ट करने, स्थानिक प्रजातियों को खतरे में डालने की क्षमता है। व्यवधान से मिट्टी में अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है, जिससे भूस्खलन हो सकता है। असंख्य महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता के स्रोत के रूप में हिमालय, नदियाँ भारतीय उपमहाद्वीप को व्यापक भूवैज्ञानिक मूल्यांकन-संवेदनशील जल आपूर्ति करने की क्षमता प्रदान करने में बाधा उत्पन्न कर सकता है। पीने के पानी, कृषि और अन्य आवश्यकताओं के लिए इन नदियों पर निर्भर रहने वाले लोग पानी के प्राकृतिक प्रवाह में गड़बड़ी से पीड़ित होते हैं, चाहे निर्माण दुर्घटनाओं के कारण या भूस्खलन के कारण।

हिमालय के संबंध में हम आपदाओं के इशारों को नजरअंदाज कर रहे हैं या जाने-अनजाने खतरे को बुला रहे हैं। यह बात सबको पता है कि हिमालयी क्षेत्र बहुत ही समस्याग्रस्त है, लेकिन इसका ख्याल नहीं रखा जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि हिमालय में आपदाएं अब बहुत बड़ी चुनौती बन गई हैं। 2013 की केदारनाथ आपदा से लेकर इस साल हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में हुई आपदाएं इसके साक्षी हैं। फिलहाल का यह संकट हो या जोशीमठ। 

12 नवंबर की आपदा का सबक क्या है

12 नवंबर की आपदा के बाद, बचाव अभियान जारी रहने के साथ ही व्यापक पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में सोच जाना जरूरी है। हिमालय क्षेत्र में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन केन्द्रीय मुद्दा होना चाहिए। संवेदनशीलता के बारे में हमारी जागरूकता के बावजूद, बुनियादी ढांचे के विकास में जल्दबाजी की जा रही है, जो तेजी से शहरीकरण के साथ मिलकर, अक्सर नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर अत्यधिक दबाव डालता है, साथ ही भूगर्भिक रूप से अस्थिर स्थानों में भी बड़े भीमकाय निर्माणों को बढ़ावा देता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया बुधवार, 15 नवंबर, 2023 के अपने लेख में अंजल प्रकाश कहते हैं कि आर्थिक कारक अल्पकालिक मुनाफे को दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्थिरता से आगे रखते हैं। इसके परिणाम पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं। प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता वाले अपर्याप्त संसाधन व्यापक भूवैज्ञानिक मूल्यांकन करने और टिकाऊ इंजीनियरिंग पद्धतियों को निष्पादित करने की क्षमता में बाधा डाल सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण यह कमजोरी और भी बढ़ गई है। मौसम के बदलते मिजाज के कारण भूवैज्ञानिक संरचनाएं और ज्यादा अस्थिर हो जाती हैं। 

हिमालय के निर्माण को याद करने की जरूरत है

पृथ्वी के अंदर के गतिविधियों के चलते लगभग 5 करोड़ साल पहले तिब्बत प्लेट और गोंडवाना एक-दूसरे के पास आने लगे। इससे सागर के तल में इकट्ठा हुए मलवे में तेज बल पड़ा और वे मलवे झुकने-मोड़ने लगे। ये मलवे धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ते गए और एक ऊँचा और टेढ़ा-मेढ़ा पर्वत बन गए। इसी तरह दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वत हिमालय बना। भू-विज्ञानी कहते हैं कि हिमालय अभी भी ऊँचा होता जा रहा है। हिमालय को बनने के बाद चार भागों में विभाजित किया गया है- शिवालिक या बाहरी हिमालय (सबसे कम ऊँचाई वाला), निम्न/ लघु हिमालय, उच्च हिमालय और टेथियन हिमालय।

सबसे नया और बिल्कुल अलग कारण से बने हिमालय में किसी भी निर्माण से पहले गहन भूवैज्ञानिक जांच और जोखिम मूल्यांकन आवश्यक हैं। इसके लिए मिट्टी की स्थिरता, भूवैज्ञानिक संरचना और फॉल्ट लाइन या भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों जैसे संभावित खतरों के बारे में पूरी जागरूकता की आवश्यकता है। योग्य भूवैज्ञानिकों और इंजीनियरों को संभावित खतरों की पहचान करने, शमन योजनाएं बनाने और समीक्षा के लिए डेटा को सार्वजनिक डोमेन में रखने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना काफी हद तक टिकाऊ इंजीनियरिंग सिद्धांतों को लागू करने पर निर्भर करता है। 

अंत में 

हिमालय क्षेत्र भूवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत कमजोर और पारिस्थितिकी के प्रति बहुत ही संवेदनशील है। इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष अनेक प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं प्रायः आती ही रहती हैं। पिछले कुछ दशकों से हिमालय लगभग हर मानसून सीजन में बाढ़ एवं भूस्खलन सहित अनेक आपदाओं का मुख्य केन्द्र बिन्दु रहता है। इनके साथ ही मानवजनित आपदाएं रोकने के लिए जरूरी है कि सख्त नियामक निरीक्षण और अनुपालन हों। स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण नियमित ऑडिट, निरीक्षण और अनुपालन जांच के माध्यम से संभावित समस्याओं का शीघ्र और पूर्वानुमानित कर सकते हैं। 

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Post By: Shivendra
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