हमारा जल प्रबन्धन, दृष्टिकोण

Anupam Mishra
Anupam Mishra

जल प्रबन्धन को लेकर नदियों को जोड़ना और मोक्षदायिनी गंगा की सफाई मोदी सरकार अपने साथ चुनाव प्रचार से ही लेती आई है। इसे लेकर चाहे केन्द्र सरकार और कुछ राजनैतिक दलों में उत्साह हो, लेकिन कई मानते हैं कि यह न तो व्यवहारिक और न ही सम्भव- दोनों नदियों को जोड़ना और गंगा की सफाई! इन दोनों ही मुद्दों पर प्रख्यात जल विशेषज्ञ अनुपम मिश्र से नीतिश द्वारा बातचीत पर आधारित लेख।

.वर्तमान में भारत को किस प्रकार के जल प्रबन्धन की जरूरत आप महसूस कर रहे हैं?
हम सभी लोग जानते हैं कि हमारे देश में एक तरह की जलवायु नहीं है। हर साल मौसम बदलता रहता है, जिससे बारिश कहीं ज्यादा तो कहीं कम होती है। हमारे यहाँ मोटे तौर पर जैसलमेर में न्यूनतम वार्षिक औसत 15 सेमी से लेकर मेघालय, जिसका नाम ही मेघों पर है, वहाँ पानी मीटरों में गिरता है। सेंटीमीटर में नहीं! इसमें छत्तीसगढ़ भी आता है, जहाँ 200 से 400 सेमी तक बरसात होती है। ऐसी जगहों पर जल-प्रबन्धन न कोई एक दिन में बन सकने वाली व्यवस्था नहीं है।

सैकड़ों-हजारों सालों से इन सब इलाकों के किसानों ने, वहाँ के लोगों ने, गाँवों ने, शहरों ने, जिनको हम कम पढ़ा-लिखा, अनपढ़ न जाने क्या-क्या कहते हैं, इन सब लोगों ने अंग्रेजों के आने से भी बहुत पहले अपने पानी का इन्तजाम कुछ-न-कुछ सोच लिया था। ‘प्रबन्धन’ तो नया शब्द है। ये लोग बिना किसी आधुनिक सरकार के कि जवाहरलाल जी आएँगे, कि इन्दिरा जी आएँगी या राजीव जी आएँगे अथवा महात्मा गाँधी वाटर मिशन बनेगा, या फिर मोदी जी आएँगे-अच्छे दिन आएँगे, कोई इसका इन्तजार किए बिना सैकड़ों-हजारों साल पहले अपना जल प्रबन्धन कर रखा था।

उनके लिए यह कोई नई बात नहीं थी। जिसकी वे प्रतीक्षा करेंगे, तब तक वे क्या करते जिन्दा कैसे रहते, या तो बाढ़ में बह जाते या अकाल में मर जाते। ऐसा नहीं है कि हमारे यहाँ अकाल न पड़े हों, लेकिन आप इतिहास में झाँकें तो पाएँगे कि दो हमारे यहाँ जो सबसे बुरे आकाल पड़े वो ईस्ट इण्डिया कम्पनी की राजस्व की नीति के कारण पड़े हैं। जमीन के स्वामित्व के कारण और उपलब्ध जल-प्रबन्धन को बिगाड़ने के कारण पड़े हैं।

इस समय समाज को अपने जल का समग्र ज्ञान नहीं है तो इसके लिए आप किसी सीधे तौर पर जिम्मेदार मानते हैं?
एक मोटा-मोटा आँकड़ा इतिहास में से निकलता है कि पाँच लाख गाँवों का देश इसमें कुछ हजार छोटे-बड़े शहर यहाँ थे, इसमें से उज्जैन, काशी ऐसे शाश्वत शहर कहलाते हैं कि इनके चार-पाँच हजार साल का इतिहास है। इन बूढ़े शहरों के आगे दिल्ली, मुम्बई जैसे शहर बचे हैं, किसी का पाँच सौ साल का इतिहास है तो किसी का हजार-सात सौ साल का। देश भर में 25 से 40 लाख तालाब थे। इन तालाबों को बिना किसी इंजीनियर बने जब हमारे पास इंजीनियरिंग कॉलेज ही नहीं थे तब बनाए गए थे।

इन तालाबों की गिनती वर्ष 1800 के आसपास हुई थी, तो ये वहीं के अनपढ़ बताए गए समाज ने बनाए थे और ये मौसम देख कर बनते थे। इनमें से शायद ही कोई ऐसा अपवाद होगा जो अति वृष्टि में कोई तालाब टूट गया हो। आज जो शब्द चलता है लोकप्रिय और नकली- वह शब्द है जनभागीदारी। असली जनभागीदारी तो वह कहलाती थी, जिसकी तीन स्तर थे, पहले आज की जनभागीदारी समझ ले कि योजना सरकार बनाती है और जनभागीदारी के लिए कहती की आप इसमें शामिल हो जाओ। लेकिन असली जनभागीदारी वह थी कि योजना भी गाँव बनाए कि यहाँ-वहाँ तालाब बनने हैं फिर उसका क्रियान्वयन भी वहीं समाज करता था और रख-रखाव भी वही करता था।

इसलिए राजस्थान से लेकर रायपुर और छत्तीसगढ़ के रतनपुर रियासत के तालाबों का बाल भी बाँका नहीं हो सका। उपेक्षा की आँधी नहीं चलती थी, प्रेम से ममत्व की हवा चलती थी, जिसमें ये सब तालाब टिकाए रखते थे। उस समय का समाज अपने ज्ञान से ज्ञानी था और इस समाज को अपने पानी का समग्र ज्ञान था। अंग्रेजों ने आने के बाद कुछ जानबुझकर, कुछ अनजाने में इस ढाँचे को तोड़ा और इसको चलाने वालों को बेईज्जत भी किया।

धीरे-धीरे एक पढ़ा-लिखा अंग्रेजी जानने वाला वर्ग तैयार हो गया, जिससे हमको डर लगने लगा कि ये जल विशेषज्ञ हैं और हम नहीं। एक समय में छत्तीसगढ़ में जिसको हम आदिवासी समाज कहते हैं, वह तालाबों का इतना बड़ा विशेषज्ञ था, उसने तरह-तरह के तालाब बनाए थे। कालान्तर में उससे ध्यान हटा दिया गया और उसके स्वामित्व का हरण कर दिया गया। उसके हाथ से उसके साधनों को ले लिया गया। उसके बाद वह गरीब और लचर बनकर किसी कोने में फेंका गया। इसलिए आज हम असहाय होकर सरकार की ओर देखते हैं कि ‘साहब! हमारे गाँव में जल-संकट है, आप टैंकर भेज दीजिए।’

क्या अब टैंकर देश में एक संगठित राजनीति भी खड़ी हो गई है?
हाँ! टैंकर में डीजल भी फूँकना पड़ता है, डीजल बाहर से मँगवाना पड़ता है और फिर सौ टैंकर गए कि पाँच सौ टैंकर, इसका हिसाब कौन रखेगा? और आधा टैंकर भर कर ले गया कि पूरा टैंक भर कर, यह भी नहीं मालूम। जैसलमेर में सबसे कम पानी गिरता है, जो अपने देश का सबसे बड़ा जिला है। इस जिले में औसतन 16 सेमी पानी गिरता है तो कहीं 4 सेमी पानी गिरता है। यानी कि रायपुर या छत्तीसगढ़ के किसी इलाके में एक घण्टे में जितना पानी गिर जाता होगा, उतना वहाँ एक साल में गिरता है। उन इलाकों में लोगों ने इतना सुन्दर काम कर रखा है कि उसका वर्णन हमारी कुछ किताबों में भी किया गया है।

ट्यूबवेल हैण्डपम्प जैसे साधनों से पानी निकालने से जल-स्रोतों पर क्या असर हो रहा है?
ये पानी बाँटने के साधन हैं और भयानक हैं। अगर इनका उचित उपयोग नहीं होगा, दुरुपयोग होगा तो ये हमारे जल साधनों को सूखा देंगे। हम इसको इस तरह समझें कि भीतर का पानी बैंक में रखा एक तरह का फिक्स्ड डिपॉजिट है, ऊपर का पानी करण्ट अकाउंट है, कभी भी जाओ और निकाल लो। भीतर का कम ही निकालना चाहिए। लेकिन आज सारी नीतियाँ ऐसी हैं कि हम धड़ाधड़ सारी धरती को छेदते जा रहे हैं। हम कुछ डालेंगे नहीं, केवल निकालते जाएँगे तो हर शहर का जलस्तर नीचे गिरता जा रहा है। आज राजनीति कितनी नीचे गिरी है या जलनीति कितनी नीचे गिरी है, इसमें होड़ लगी है। इन दोनों को थामने में हमको कुछ मेहनत करनी होगी।

दो तरह की सोच रखने वाले लोगों में भी द्वन्द्व की स्थिति बनी हुई है। वैज्ञानिक सोच और धार्मिक आस्था आमने-सामने है! इसे आप कैसे देखते हैं?
दोनों के बीच द्वन्द्व तो नकली है। पानी-पानी है। इसमे धर्म और दूसरी सोच से केवल इसकी रक्षा होनी चाहिए। इसको दूसरे तरीके से देखने की आवश्यकता नहीं है। प्रकृति हर साल पानी गिराती है, जिसका संरक्षण करना चाहिए और अपना भूजल स्तर बढ़ाना चाहिए। तालाबों में पानी भी रोक कर रखना चाहिए। मैंने तो धर्म और विज्ञान के नाम पर कोई द्वन्द्व नहीं देखा है।

आप धर्म के नाम पर फूल, माला, अस्थियाँ नहीं डालने की बात करते हैं और मल-मलबा डालें। दादी माँ के फूल या पंखुड़ी नहीं डालें। आप बताएँ, किसको पहले रोकना जरूरी है। फिर यदि धर्म भी व्यापार बन गया है और एक-एक ट्रक पूजा का कचरा निकलता है, तो यह कचरा पूजा का नहीं है। ये कचरा है हमारे दिमाग का, एक फूल डालना अलग बात है और टनों कचरा नदी में मिलाना अलग है। अनुपात तो देखना ही पड़ेगा न, मात्रा तो देखनी ही पड़ेगी।

पुराने शहर जैसे बनारस हों गया हो, यहाँ शहर का गन्दा पानी गंगा में नहीं जाएगा तो कहाँ जाएगा?
किस जगह दूसरी व्यवस्था है? न रायपुर में है न दूसरी जगह। कुछ खुले दिखते हैं तो बुरे दिखते हैं। कुछ जगह करोड़ों रुपए खर्च करके धरती के नीचे से बहा देते हैं, छिपा कर। पर जाता वह भी है यमुना, गंगा और शिवगंगा में। किसी भी इलाके में नदी सबसे नीचे बहती है और गन्दगी नदी में ही जाकर मिलती है।

अभी तक इन्होंने कोई भी ऐसी वैज्ञानिक प्रगति नहीं कर दिखाई है कि उस पानी को साफ करके उसमें मिलाएँगे। साफ करने में बिजली खर्च होती है, करोड़ों रुपए लगते हैं। दिल्ली की नगरपालिका भी शत-प्रतिशत साफ करके पानी यमुना में नहीं मिलाती। इसलिए हम छोटे राज्य की राजधानी से रायपुर से, धमतरी से, बेमेतरा से या दुर्ग से ये उम्मीद ही नहीं कर सकते कि वह अपना पानी साफ कर नदी में मिलाए।

गुजरात, हिमाचल या बहुत सारे राज्यों में पानी को लेकर कुछ काम हुए हैं, इनसे क्या सीखने को मिला है?
किसी ने अभी तक अच्छा काम नहीं किया है, एक राज्य के नाते। समाज के टुकड़ों ने काम किया है। सरकारों ने तो जल के अन्धाधुन्ध दोहन का ही काम किया है या नकली नारे लगाए हैं कि हम नदी जोड़ देंगे या हम यहाँ का पानी वहाँ फेंक देंगे। इन सबसे कोई हल नहीं निकलने वाला।

गंगा को लेकर जो योजना इस सरकार ने बनाई है, और गंगा जहाँ से निकलती और जहाँ तक अपने देश में बहती है, वहाँ गैर-बीजेपी या गैर एनडीए सरकारें हैं तो कैसे क्रियान्वयन होगा?
मैं तो कहता हूँ कि सब जगह भी उनकी सरकार आ जाए, तो भी अमल नहीं हो पाएगा। ये राजनैतिक विवाद तो छोड़ ही दीजिए, दृष्टि में ही दोष है। इस भावना से कि गंगा हमारी माँ है, पवित्र है। हम इसको साफ करेंगे। कुछ करोड़ बहा देंगे तो इससे साफ नहीं होगी, भाई! एक हम गन्दे नाले की आरती उतारते चले जा रहे हैं। पहले तो हमें यह मानना चाहिए कि हम अक्षम साबित हुए हैं। इसको साफ करने में क्या बाधाएँ हैं? पैसा नहीं है बाधा। पैसा बहाने से गंगा को साफ नहीं कर सकते।

गंगा को पानी बहाने से साफ किया जा सकता है। इसमें पानी ही नहीं छोड़ा हमने। बिजली बनाने में, बाँध बनाने में, सिंचाई में गंगा का पानी ले गए, उद्योगों में ले गए बड़े-बड़े एटॉमिक प्लांट जैसे नरोरा में ले गए और गंगा में बूँद भर पानी नहीं छोड़ते। बरसात में बाँध जब मुसीबत बनती है तो फटापट खोल देते हैं और कई लोगों को बिना चेतावनी के डूबो भी देते हैं। और जब गर्मी के दिन आते हैं तो उसका एक-एक बूँद डायवर्ट कर देते हैं। ऐसे में गंगा साफ नहीं होगी।

हाल ही में तमिलनाडु के मुल्ला पेरियार बाँध की ऊँचाई बढ़ाने का फैसला आया है, जिससे वहाँ की सरकार और लोगों में खुशी का माहौल है। इसको आप कैसे देखते हैं?
इसमें लोगों की गलती नहीं है। उनको नकली खुशी हमने पकड़ाई है। गुजरात वाला जो नर्मदा पर बाँध की ऊँचाई बढ़ाने का फैसला हुआ है, जो डूबते हैं, डूबने दो, जो आन्दोलन करते हैं, करते रहेंगे। मेरा तो कहना है कि गुजरात में भी बीजेपी की सरकार है और मध्य प्रदेश में भी। सरकार आधा मध्य प्रदेश डूबो दे फिर वहीं की जनता उसको करके दिखाएगी। हम झूठे नारों में लग गए हैं कि बाँध की ऊँचाई बढ़ाने से लोगों को लाभ मिलता है, पानी मिलता है तो तमिलनाडु कर्नाटक से कावेरी को लेकर काहे इतना लड़ रहा है। हमारी ये सब जीत, लड़ाइयाँ नकली हैं।

नदियों को जोड़ने की योजना कैसी होगी?
जरूर जोड़िए! उसका बजट उठाकर देख लीजिए। हमारे पास उसका जीरो फीसदी भी है क्या? हमारा दिमाग खराब हो गया है।
 

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