दैवीय आपदाओं से खतरे में पिंडर घाटी का अस्तित्व


1988 के दौर से पिंडर घाटी पर खतरा मंडराने लगा। 1989-90 के दौर में थराली प्रखण्ड के लोल्टी गदेरे में बाढ़ आने से 15 लोग अकाल मौत के शिकार हो गये थे। तब त्रिकोट, कोठा, राजकंडी, तलवाड़ी तथा बैनोली गाँवों पर आपदा का कहर मंडरोने लगा था। इसेक चलते 92 मवेशी भी आपदा में दफन हो गये थे और ग्रामीणों की 1202 हेक्टेयर भूमि आपदा की भेंट चढ़ गई थी। गोपेश्वर। दैवीय आपदा के हिसाब से समूची पिंडर घाटी का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है। इस कारण नारायणबगड़ तथा थराली बाजारों पर लगातार मंडरा रहे खतरों से लोग भविष्य को लेकर मुश्किलों में घिरते जा रहे हैं। इससे इस घाटी के लोगों को अपने सुरक्षित भविष्य की चिन्ता भी सताने लगी है।

गौरतलब है कि पहले प्राकृतिक सौन्दर्य तथा आपदा की दृष्टि से पिंडर घाटी के नारायणबगड़, थराली तथा देवाल विकास खण्ड बेहद सुरक्षित माने जाते रहे हैं। यही वजह है कि तब चमोली जिले की पिंडर घाटी विकास की दृष्टि से अन्य विकास खण्डो के मुकाबले काफी आगे निकलने लगी थी।

90 के दशक में इस घाटी पर आपदा का ग्रहण लगने लगा और तब से यह घाटी प्राकृतिक आपदाओं के लगातार थपेड़े झेल रही है यही वजह है कि पिंडर घाटी पूरी तरह डेंजर जोन में आ गई है। इसके नारायणबगड़ तथा थराली कस्बे सुरक्षित भविष्य के लिये और भी डेंजर हो चले हैं। हाल ही में नारायणबगड़ में आई आपदा से लोग भविष्य को लेकर चिन्ता में डूबने लगे हैं।

दरअसल 1988 के दौर से पिंडर घाटी पर खतरा मंडराने लगा। 1989-90 के दौर में थराली प्रखण्ड के लोल्टी गदेरे में बाढ़ आने से 15 लोग अकाल मौत के शिकार हो गये थे। तब त्रिकोट, कोठा, राजकंडी, तलवाड़ी तथा बैनोली गाँवों पर आपदा का कहर मंडरोने लगा था। इसेक चलते 92 मवेशी भी आपदा में दफन हो गये थे और ग्रामीणों की 1202 हेक्टेयर भूमि आपदा की भेंट चढ़ गई थी।

यही नहीं चेपड़ों से लेकर नंदकेशरी तक सटे गाँवों तक भी इस आपदा ने पैर पसारकर लोगों को मुश्किलों में ला खड़ा कर दिया था। यह सिलसिला आगे ही बढ़ता गया और फिर लोल्टी गदेरे ने कहर बरपाना शुरू किया। इसके बाद 1990 में किमनी, भेंटा, चौंडा समेत अन्य गाँव में भी आपदा ने पाँव पसारे और कई लोग अकाल मौत के शिकार हुए।

इस आपदा से थराली बाजार का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया और वहीं से थराली से नारायणबगड़ तक का सड़क मार्ग जगह-जगह भूस्खलन की जद में आने के कारण स्लाइड जोन में आ खड़ा हो गया। आपदा की यह मार पिंडर घाटी पर बुरी तरह पड़ने लगी। 1992 में खांखर खेत में बादल फटने से गडनी बाजार तबाह हो गया था और तब 14 लोग अकाल मौत के शिकार हुए थे। इससे तमाम गाँव भी आपदा की जद में आने के कारण असुरक्षित हो चले थे। फिर 1993 नारायणबगड़ विकास खण्ड के ही मूसा उडियार में बादल फटने के कारण 5 परिवार बेघर हो गये थे और 78 नाली से अधिक भूमि आपदा की भेंट चढ़ गई थी।

1993 मे ही थराली विकास खण्ड के सोलपट्टी क्षेत्र में बादल फटने से 3 महिलाएँ अकाल मौत की शिकार हो गई थीं। हालांकि सोलपट्टी में यह खतरा कम नहीं हुआ और 2017 में भी डुंग्री गाँव का एक युवक बरसाती नाले में बह गया था 2017 में ही नारायणबगड़ के चिरखून गाँव में बज्रपात से 8 लोग बाल-बाल बच गये थे किन्तु ईड़ा गाँव की 8 साल की बेटी सिमली गदेरे में बह गई थी।

वर्ष 2013 की दैवीय आपदा ने तो समूची पिंडर घाटी का ही भूगोल बदल कर रख दिया था इस आपदा ने देवाल, थराली तथा नारायणबगड़ विकास खण्ड के तमाम गाँवों को तहस-नहस कर रख दिया था। पिंडर नदी के रौद्र रूप में आ जाने के कारण देवाल विकास खण्ड के तमाम गाँव खतरे में आ गये थे और वर्षों पहले लगे पैदल पुल भी आपदा की भेंट चढ़ गये थे।

थराली कस्बे का स्वरूप ही इस आपदा ने पूरी तरह बिगाड़ दिया था। थराली कस्बे का काफी इलाका बाढ़ की भेंट चढ़ गया था और देवाल जाने वाली सड़क बड़े हिस्से तक पिंडर मे समा जाने के कारण गायब होकर रह गई थी। यही नहीं तमाम भवन भी आपदा की भेंट चढ़ गये थे। इससे कई गाँव खतरे में आ गये और लोग आज भी मौत के टीलों पर जीवन गुजारने को विवश हैं। तब थराली से नारायणबगड़ तक की सड़क भी जगह-जगह जवाब दे गई थी।

2013 में ही इस भीषण आपदा का सबसे बड़ा कहर नारायणबगड़ कस्बे पर टूट पड़ा। इसका सदियों का पुराना बाजार पिंडर नदी की भेंट चढ़ गया। देखते-ही-देखते सदियों पुराना पुल भी आपदा की भेंट चढ़ा और दूसरी छोर पर स्थित बाजार भी अपने भविष्य को लेकर साँसे गिनता रहा। वैसे पिछले कई वर्षों से केवर गाँव के नीचे तथा जीत सिंह मार्केट व मुख्य बाजार के बीच नारायणबगड़ थराली सड़क मार्ग पर स्थित स्लाइड जोन उभर जाने के कारण नारायणबगड़ कस्बे के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे थे।

बीते कई वर्षों से जरा सी बरसात में यह स्लाइड जोन पूरे पिंडर घाटी के लिये मुसीबतों का सबब बन गया है। हाल ही में हुये बज्रपात से नारायणबगड़ का अस्तित्व एक बार फिर खतरे में आ गया है मंगलवार को हुई घटना ने एक बार फिर लोगों को भविष्य के लिये मुश्किलों मे लाकर खड़ा कर दिया है।

जिस तरह भारी बारिश के बीच केवर गदेरे ने रौद्र रूप धारण किया उससे इण्टर कॉलेज गेट से लेकर स्लाइड जोन तक के मौजूदा बाजार में दुकानों और आवासों के भीतर मलवा घुसने से लोगों की साँसे अटकी रही। अब जरा सी भी आसमानी गर्जना और बारिश के चलते लोगों की साँसें थम सी जा रही हैं।

एक जमाने में नैसर्गिक सौन्दर्य तथा सुरक्षित बसागत के लिये मानी जाने वाली पिंडर घाटी आज अपने अस्तित्व के लिये छटपटा रही है। अभी जबकि मानसून का सीजन आने में काफी देर है। इसके बावजूद ग्रीष्मकाल के ही इस दौर में जिस तरह प्रकृति ने तांडव मचाना शुरू कर दिया है उसने लोगों को झकझोर कर रख दिया है। अब यदि पिंडर घाटी की संवेदनशीलता को देखते हुए कोई ठोस उपाय नही किये गये तो फिर भविष्य के खतरे कम नहीं हैं।

वैसे भी चमोली जिला आपदा की दृष्टि से जोने-5 में स्थित है इसके तमाम इलाके आज भी आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। वैसे 2017 की दैवीय आपदा ने अलकनंदा, हेमगंगा नंदाकिनी,बालखिला,निगोल तथा पिंडर नदी के तटवर्ती इलाकों पर कहर बरपा था जोशीमठ के ही लामबगड़ से लेकर गोविंद घाट तक का इलाका इस आपदा में तहस-नहस हो गया था और हेमकुण्ड साहिब तथा फूलों की घाटी इलाके के भ्यूंडार, पुलना एवं उर्गम घाटी के कई गाँवों पर यह खतरा इस कदर मंडराया था कि लोग संभले नहीं संभल पाये थे। कहा जा सकता है कि आपदा की दृष्टि से पिंडर घाटी के तमाम इलाके असुरक्षित व अशांत हो चले हैं। इसलिये इसकी संवेदनशीलता को देखते हुये सुरक्षित उपायों की भी दरकार है।

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Post By: RuralWater
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