बच्चन का आना ठीक नहीं रहा साहब....

गीर एशियाई शेरों का एक मात्र ठिकाना है। 1412 वर्ग किलोमीटर का ये गीर भांति-भांति के पेड़ पौधों और जानवरों से भी भरा पड़ा है। फिर भी गीर फॉरेस्ट नेशनल पार्क के समर्पित गाइड और जंगल के आशिक भावेश भाई की बात सुन कर हम भी अचरज में पड़ गए। या यूं कहिए कि इन्होंने गुजरात में टूरिज़्म को बढ़ाने के लिए बनाए गए और सुपर स्टार अमिताभ बच्चन द्वारा किए गए विज्ञापनों को परखने का नज़रिया ही बदल डाला। अब बच्चन ने इनका क्या बिगाड़ा है यह तो हम भी नहीं जानते, लेकिन भावेश भाई का लहजा ऑरिजनल, अलग और इतना अनोखा था कि बात सुनते ही हमारी आंखों के सामने ‘कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में’ की गुज़ारिश करता बच्चन का चेहरा तैरने लगा। गीर की सैर करते हुए बिग बी के पर्यटन अभियान और जंगल की आबादी पर उसके असर का वृत्तांत सुना रहे हैं नीरज गुप्ता।

सौराष्ट्र के जूनागढ़ से अमरेली जिले तक फैला गीर नेशनल पार्क पूरी दुनिया में एशियाई शेर का अकेला कुदरती ठिकाना है। करीब 1412 वर्ग किलोमीटर का ये ‘सूखा जंगल भांति-भांति के पेड़-पौधों और जानवरों से भरा पड़ा है। सूखा इसलिए कि मानसून में पानी से सराबोर होने के बाद भी ये चंद दिनों में ही पूरी तरह सूख जाता है और इस जंगल की ये पतझड़िया फितरत ही इसे एशियाई शेरों के मनमाफिक बनाती है। एशियाई बब्बर शेर घने जंगल में छुपकर रहने के बजाय खुले में रहना पसंद करते हैं। बच्चन का आना ठीक नहीं रहा साहब.... शिकायती लहज़े में ये व्यथा थी भावेश भाई की। भावेश भाई यानी गीर फॉरेस्ट नेशनल पार्क के समर्पित साइड और जंगल के आशिक। गुजरात चुनावों की कवरेज के दौरान मैंने 3 दिसंबर, 2012 की रात सासन गीर नेशनल पार्क में गुजारी और अगली सुबह 6 बजे की पहली सफारी के लिए गाइड के तौर पर भावेश भाई मेरे साथ थे। मुस्कराते हुए मैंने पूछा-क्या हुआ भावेश भाई, बच्चन ने आपका क्या बिगाड़ दिया। भावेश भाई जैसे फट पड़े-बच्चन के बाद बहुत टूरिस्ट आने लगा है साहब। एजुकेशन नहीं है उसके पास। डिस्कवरी चैनल देखकर आता है....2 घंटे की सफारी में शेर, शेरनी, बच्चे सब देखना चाहता है...शेर की रनिंग, शेर की रोरिंग...। अरे साहब ये नेचुरल सफारी है...शेर दिखा तो दिखा, नहीं दिखा तो नहीं दिखा। बताए कोई उनको कि डिस्कवरी के एक घंटे के प्रोग्राम में कितना टाइम लगता है... कितना पैसा बहाते हैं वे। इसीलिए बोलता हूं साहब बच्चन का आना ठीक नहीं रहा।

भावेश भाई की बातें सुनकर मैं हैरान था। मेरी आंखों के सामने ‘कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में’ की गुज़ारिश करता अमिताभ बच्चन का चेहरा तैरने लगा। गुजरात में टूरिज़्म बढ़ाने के लिए बनाए गए ‘सुपर स्टार’ विज्ञापनों को परखने का ये एक ऑरिजनल, अलग और अनोखा नज़रिया था।

सौराष्ट्र के जूनागढ़ से अमरेली जिले तक फैला गीर नेशनल पार्क पूरी दुनिया में एशियाई शेर का अकेला कुदरती ठिकाना है। करीब 1412 वर्ग किलोमीटर का ये ‘सूखा जंगल भांति-भांति के पेड़-पौधों और जानवरों से भरा पड़ा है। सूखा इसलिए कि मानसून में पानी से सराबोर होने के बाद भी ये चंद दिनों में ही पूरी तरह सूख जाता है और इस जंगल की ये पतझड़िया फितरत ही इसे एशियाई शेरों के मनमाफिक बनाती है। एशियाई बब्बर शेर घने जंगल में छुपकर रहने के बजाय खुले में रहना पसंद करते हैं। शेर तो खैर यहां का खास आकर्षण है लेकिन तेंदुआ, लकड़बग्घा, सियार, जंगली बिल्ली, जंगली सुअर, चीतल, सांभर, चिंकारा, नील गाय, नेवले, लंगूर, मगरमच्छ और कछुए भी इस जंगल की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं। किस्मत अच्छी हो तो पेंगोलिन, पाइथन और ब्लैकबक यानी काला हिरण भी देखने को मिल जाते हैं।’

सुबह के सवा छह बजे थे लेकिन अंगड़ाइयां लेती सांगवान, शीशम, जामुन और आम की टहनियों को निहारने के बजाय मैं भावेश भाई की बातों में दिलचस्पी ले रहा था-इंटनेट देखकर आते हैं... साउथ अफ्रीका और मसाई मारा (जंगली जानवरों के लिए मशहूर केन्या का एक इलाक़ा) की बात करते हैं। अफ्रीका में पैंतीस हजार शेर हैं साहब और गीर में चार सौ ग्यारह... अब बताइए...। हम बोलते हैं साहब, इधर आना भी है तो शांति से आओ। देखो, अंग्रेज आता है (सामने से गोरे टूरिस्टों से लदी एक ओपन जीप निकल रही थी) पंछी भी देखता है... जानवर भी देखता है... नहीं दिखता तो इंतजार करता है। लेकिन अपने वालों को सिर्फ शेर मांगता है। अगर दिख जाए तो बोलते हैं कि उसको इधर देखने को बोलो, फोटो खींचना है। अगर सो रहा हो तो बोलते हैं कि इंजेक्शन लगाया है क्या... ये हिलता क्यूं नहीं... पालतू है क्या। मन करता है कि पूछूं-तुमको शेर के बारे में मालूम क्या है।

हमारी गाड़ी एक कच्चे रास्ते पर मुड़ी लेकिन भावेश भाई की बातों का रास्ता नहीं मुड़ा। खिड़की से हाथ बाहर निकालकर बोले-वो देख रहे हैं साहब...उधर एक दिन एक लेपर्ड हिरण को टारगेट करके बैठा था। लेपर्ड टाइम नहीं देता लेकिन उस दिन 20 मिनट तक बैठा रहा टारगेट करके। अपने नौ साल के करियर में वैसा सीन मैंने सिर्फ तीन बार देखा है। उस वक्त गाड़ी बंद करके चुप रहना मांगता है। लेकिन मेरे साथ दूरिस्ट शोर मचा रहा है... बच्चे हल्ला कर रहे हैं... ताली बजा रहे हैं। लेपर्ड भाग गया साहब वरना हिरण को टारगेट करता सीन वे टूरिस्ट पूरी जिंदगी नहीं देख पाएगा। क्या करेगा...एजुकेशन नहीं है।

मेरे पास सिर्फ दो घंटे का वक्त था और मैं मन बनाकर निकला था कि शेर न भी दिखा तो मुंह अंधेरे कम से कम जंगल की सैर तो हो ही जाएगी। लिहाजा गाड़ी की खुली खिड़कियों से आर-पार हो रही सुबह की ताज़ा हवा के बीच मुझे भावेश की बातें मजेदार लग रही थीं। जंगल में भावेश भाई की जान बसती है। चंद चुप्पी के बाद अचानक झल्लाकर बोले-दीवाली पर 16 बसें और 60 कारें आई थीं टूरिस्टों की। वाइल्ड लाइफ को कितना डिसटरबेंस होगा। साहब...बच्चन का आना ठीक नही रहा।

यहां पोचिंग होती है क्या भावेश भाई-बातचीत का रुख बदलते हुए मैंने पूछा। नहीं साहब...वैसे एक बार कोशिश हुई थी। लेकिन गाँववालों ने होने नहीं दिया। दरअसल टाइगर की पोचिंग पर प्रेशर बढ़ा तो वे लोग शेर के शिकार के लिए इधर आए थे। लेकिन पकड़े गए। कोई संसार सिंह करके है साहब... उसके आदमी थे। संसार सिंह नहीं, संसार चंद-मैंने कहा-बहुत बड़ा पोचर है वो। 6 साल की जेल हुई थी उसको। काफी साल पहले मैं जाता था दिल्ली कोर्ट में उसकी पेशी के वक्त।

अरे साहब आप जानते हैं...जेल नहीं, फाँसी करवाते उसको-भावेश भाई लगभग चिल्ला ही पड़े-जानवर को कैसे मार सकता है कोई।

भावेश भाई शेर से जुड़ी जानकारियों के इनसाइक्लोपीडिया हैं। 12-13 साल जीता है साहब...जू में उम्र एक-आध साल बढ़ जाती है। वहां खाना टाइम से मिलता है न। जंगल में बूढ़ा होने के बाद शिकार की दिक्कत भी हो जाती है। वैसे जवानी में शेर 3-4 दिन में एक ही बार शिकार करता है।

भावेश भाई सब कुछ शेर की नजर से देखते हैं बल्कि बात करते वक्त कई बार तो लगा जैसे खुद शेर ही भावेश भाई की शक्ल में अपना मुकदमा लड़ने आ गया हो। ठुमक-ठुमक कर चलता एक जंगली सुअर हमारी गाड़ी के आगे से गुजरा तो भावेश भाई बोले-देखों साहब, वाइल्ड बोर...चर्बी वाला भोजन है ये। हिरणों का झुंड देखकर मैंने कहा कि कितना मासूम जानवर है तो भावेश भाई ने टोका-बच्चे बहुत देता है साहब....साल में 2-3 बार। शेर इनको खाएगा नहीं तो इनकी संख्या बहुत बढ़ जाएगी।

भावेश भाई का इतिहास शायद थोड़ा कमजोर था या वह इतिहास में जाने के मूड में नहीं थे। मैंने पूछा कि यहां शेर कब से हैं तो बोले-जूनागढ़ के नवाब साहब लाए थे। आप जानते हैं न, परवीन बॉबी भी जूनागढ़ की थी। मैंने कहा जानता हूं लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके जूनागढ़ की परवीन बॉबी कितनी बुरी मौत मरी थी। मौत के तीन दिन बाद उनकी बॉडी उनके घर से निकाली गई। अफसोस जताते हुए भावेश भाई ने कहा-सही कह रहे हैं साहब, कभी-कभी शेर के साथ भी ऐसा होता है। मौत के तीन-तीन दिन बाद बॉडी मिलती है। मैंने मुस्कराते हुए सोचा-वाकई, भावेश भाई की पूरी दुनिया शेर के इर्द-गिर्द ही टहलती है।

शेरों की गिनती कैसे होती है भावेश भाई-मैंने एक अनाड़ी बच्चे का-सा सवाल किया। लेकिन एक तजुर्बेकार टीचर की तरह भावेश भाई बोले-5साल में एक बार करते हैं साहब ताकि एक जेनरेशन का कब (शेर का बच्चा) बड़ा हो जावे। गाँववालों की मदद से एक-एक शेर को ट्रेक करते हैं। उसके सभी एंगल से फोटो लेते हैं। कान का साइज, पंजे का साइज, आंखों का रंग वगैरह से पहचान करते हैं। 3-4 दिन तक एक-एक शेर पर नजर रखते हैं ताकि एक शेर की गिनती दो बार न हो जावे। फिर रजिस्टर में उसकी एंट्री करते हैं। अगली गिनती 2015 में होगी। सेंसस (शेरों की गिनती) के वक्त हम लोग मुफ़्त सर्विस देते हैं। जंगल इतना कुछ देता है हमको तो हमारा भी तो कोई फर्ज बनता है न साहब।

पगडंडी पर दौड़ती गाड़ी के दाईं तरफ सूरज की लाल सुर्ख किरणों ने अंधेरे को खदेड़ना शुरू कर दिया था। माहौल में चिड़ियों की चहचहाट, कोयल की कू-कू, तोतों की टेंटे और पत्तों की सरसराहट बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह बज रहे थे। अचानक गाड़ी रुकवाकर भावेश भाई ने एक और आदमी को गाड़ी में बिठाया। खाकी वर्दी और हाथ में लाठी के साथ ये साहब थे- सुनील भाई। सुनील भाई गीर में ट्रेकर हैं यानी शेर की लोकेशन और गतिविधियों पर नजर रखते हैं। हाथ में वॉकी-टॉकी लिए सुनील भाई जंगल में फैले दूसरे ट्रेकरों के संपर्क में थे। अपने साथियों से बातचीत के बाद उन्होंने गाड़ी को दाईं तरफ मोड़ने को कहा। आगे तीन गाड़ियां और खड़ी थीं सुनील भाई फौरन हमारी गाड़ी से उतरे और हवा में कुछ सूंघने सूनने लगे। 2-3 मिनट की रहस्यमयी सी हरकतों के बाद उन्होंने गाड़ियों को धीरे-धीरे चलने को कहा एक अंजानी उम्मीद से मेरे दिल की धड़कनें भी कुछ बढ़ गई थीं अपने होठों पर उंगली रखकर दबे कदमों से चल रहे सुनील भाई ने अचानक बाईं तरफ इशारा किया। करीब 25-30 मीटर की दूरी पर पत्थर के ढेर के पीछे बैठा था जंगल का राजा-बब्बर शेर। जोश में अपना कैमरा उठाकर मैंने तस्वीरों की झड़ी लगा दी। हालांकि मेरी खिड़की से बामुश्किल शेर का सिर्फ मुंह नजर आ रहा था। लेकिन तस्वीरों, चिड़ियाघरों या सर्कस में देखे उस शानदार प्राणी को जंगल में रूबरू देखने की उत्तेजना का अंदाजा सिर्फ निजी तज़ुर्बे से ही लगाया जा सकता है। भावेश भाई अगर न रोकते तो शायद मैं गाड़ी से उतर ही जाता। गाड़ियाँ जरा आगे सरकीं तो मुझे बेहतर नज़ारा मिला। हालांकि राजा साहब ने 2-3 उबासी और हलकी-फुलकी चिंघाड़ के अलावा हम लोगों को कोई तव्वजो नहीं दी। किस्मत से वहां मौजूद टूरिस्ट भी एजुकेशन वाला था। किसी ने कोई शोर नहीं मचाया।

भावेश भाई ने कहा-किस्मत वाला है साहब आप। ऐसे अकेले मेल (नर) जल्दी दिखने को नहीं मिलता और वह तो रोरिंग भी किया आपके लिए. अब ये दोपहर तक यहीं मिलेगा साहब। हां... वो शोर-शराबे वाला टूरिस्ट आकर इसको डिस्टर्ब न करे तो। खैर साहब...शाहंशाह शेर हमें तखलिया कह ही चुके थे लिहाजा उन्हे अकेला छोड़कर हम आगे निकल लिए। अपेक्षाएं न रखने का सबसे अच्छा पहलू यही है। एक फासले से मिली बब्बर शेर की वह हलकी झलक भी मुझे तसल्ली और खुशी दे गई।

करीब साढ़े आठ बज रहे थे। चाय की चुस्कियों के साथ विदा लेने के वक्त आ चुका था और जैसा कि अक्सर होता है.. माहौल थोड़ा इमोशनल हो गया। भावेश भाई बोले-साहब काम के अलावा कभी वक्त निकालकर आइए...फ़ुरसत से। शेर के साथ बिठाकर नाश्ता करवाएंगे आपको। मैंने ठहाका मारकर कहा - अरे भावेश भाई गारंटी मत दीजिए. ये तो नेचुरल सफारी है... शेर दिखा तो दिखा नहीं दिखा तो नहीं दिखा।

कई दिन बीत गए लेकिन आज भी टीवी पर गुजरात का प्रचार करते अमिताभ बच्चन को देखता हूं तो भावेश भाई का शिकायत भरा मासूम चेहरा याद आ जाता है। जैसे कह रहा हो-बच्चन का आना ठीक नहीं रहा साहब।

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