आठवीं योजना में ऊर्जा स्रोत


लेखक ने ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाने और इसके अधिक से अधिक संरक्षण पद जोर दिया है। लेखक का कहना है कि इन दो कार्यों से सम्बंधित सभी परियोजनाओं को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिये ऊर्जा के अपारम्परिक स्रोतों के विकास के प्रयास तेज किए जाने चाहिए।

ऊर्जा के इन गैर-पारम्परिक स्रोतों के उपयोग की टेक्नोलॉजी का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए ताकि आबादी के बड़े हिस्से, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की ऊर्जा की आवश्यकता पूरी की जा सके। इस टेक्नोलॉजी का प्रसार सिर्फ सरकार के प्रयासों से ही सम्भव नहीं है, इसके लिये इनका फायदा उठाने वाले ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को भी इन कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के कार्य में भागीदार बनना होगा।

देश के आर्थिक विकास तथा लोगों के जीवन स्तर में सुधार के लिये भोजन के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु शायद ऊर्जा ही है। किसी देश की खुशहाली का पता लगाने के लिये आजकल जिस पैमाने का इस्तेमाल किया जा रहा है वह है प्रति व्यक्ति ऊर्जा की औसत खपत। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी भी देश की प्रगति का अनुमान उस देश में ऊर्जा के उत्पादन और खपत से लगाया जा सकता है। पर्याप्त ऊर्जा के बिना किसी भी प्रकार का औद्योगिक विकास सम्भव नहीं है। बड़े पैमाने पर खेती करने, पानी की सप्लाई, कपड़े के उत्पादन और भवनों के निर्माण के लिये पर्याप्त मात्रा में बिजली उपलब्ध होना बेहद जरूरी है। इसीलिये योजना निर्माण की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि विद्युत उत्पादन और इसके प्रभावी उपयोग में तेजी से बढ़ोत्तरी सुनिश्चित की जाए। ऊर्जा के स्रोतों का विकास प्रधान कार्य है। ऊर्जा का उपयोग करने वाले विभिन्न क्षेत्रों की मांग को पूरा करने के लिये बड़े पैमाने पर पूँजी निवेश की जरूरत होती है। यही कारण है कि सातवीं और आठवीं योजना में ऊर्जा के क्षेत्र के लिये निर्धारित धनराशि कुल योजना खर्च का 30 प्रतिशत यानी लगभग एक तिहाई है। इतने बड़े पैमाने पर पूँजी लगाने के बावजूद हमारी अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में बिजली की कमी महसूस की जा रही है।

बिजली के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली कुल ऊर्जा का लगभग 60 प्रतिशत कोयले और ताप बिजली घरों से, 25 प्रतिशत पन-बिजली घरों से, 2 प्रतिशत परमाणु बिजलीघरों से, 4 प्रतिशत डीजल और गैस पर आधारित बिजलीघरों से तथा लगभग एक प्रतिशत से कम अपारम्परिक स्रोतों, जैसे-सौर, पवन, बायोगैस और लघु पन-बिजलीघरों से प्राप्त होता है। ऊर्जा का दूसरा बड़ा स्रोत है पेट्रोलियम और पेट्रोलियम पदार्थ। हमारी समूची परिवहन प्रणाली (रेल, सड़क और वायु), कृषि क्षेत्र, (नलकूप, पम्पिंग प्रणालियाँ, ट्रैक्टर, फसल तैयार होने के बाद काम में आने वाली मशीनें आदि) तथा घरेलू क्षेत्र (खाना पकाने के लिये मिट्टी का तेल) की जरूरत पेट्रोलियम पदार्थों से ही पूरी होती है। ऊर्जा के इन व्यावसायिक स्रोतों, के अलावा देश में ऊर्जा की कुल जरूरत का करीब 50 प्रतिशत जलावन, खेती-बाड़ी से बचे बेकार पदार्थों और पशुओं के गोबर से पूरी होती है। लगभग समूचे ग्रामीण क्षेत्र तथा शहरी इलाकों के भी काफी बड़े भाग में ऊर्जा की कुल खपत का लगभग आधा हिस्सा इन्हीं पदार्थों से प्राप्त होता है। इससे यह बात साफ हो जाती है कि भारत के अधिकतर गाँवों में खाना पकाने, सर्दियों में ऊर्जा के स्रोत के रूप में लकड़ी तथा खेती-बाड़ी से प्राप्त होने वाले पदार्थों का उपयोग किया जाता है।

पर्यावरण पर प्रभाव


ऊर्जा के परम्परागत स्रोतों में एक भी ऐसा नहीं है जिसका पर्यावरण पर कुछ-न-कुछ असर न पड़ता हो। हालाँकि ताप बिजलीघरों में सभी सावधानियाँ बरती जाती हैं और समय-समय पर इनमें सुधार किए गए हैं लेकिन इनसे निकलने वाले धुएँ से होने वाले प्रदूषण की समस्या अब भी बरकरार है। इसी तरह पन-बिजलीघर बनाने से बाँध की वजह से बड़ी संख्या में हटाए जाने वाले लोगों को बसाने की समस्या पैदा हो जाती है। उन्हें परियोजना स्थल से दूसरे स्थान पर ले जाना पड़ता है। नतीजा यह होता है कि लोगों को भारी मुसीबतें उठानी पड़ती है। अक्सर राजनेता स्थिति का नाजायज फायदा उठाते हैं जिससे परियोजनाओं को लागू करने में बहुत देरी होती है और लागत में भारी बढ़ोत्तरी हो जाती है। इसी तरह परमाणु बिजलीघरों से सम्बंधित समस्याएँ भी किसी से छिपी नहीं हैं। यह बात सच है कि परमाणु बिजलीघरों की सुरक्षा के लिये अनेक सावधानियाँ बरती जाती हैं। फिर भी विश्व के विभिन्न भागों में कई ऐसी बड़ी दुर्घटनाएँ हुई हैं जिससे आम आदमी के मन में विकिरण के खतरे के बारे में बड़ा डर समा गया है।

इसी तरह पेट्रोलियम पदार्थों के जलने से उत्पन्न वायु प्रदूषण की समस्या पर काफी बहस हो चुकी है। यही नहीं गैर-व्यावसायिक क्षेत्र में लकड़ी, खेती-बाड़ी से मिलने वाले पदार्थों और मिट्टी तेल के जलने से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है। प्रदूषण के खतरे से मुक्त ऊर्जा के क्षेत्र अपारम्परिक क्षेत्र में हैं। सौर-ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा समुद्र की लहरों और ज्वार से प्राप्त होने वाली ऊर्जा प्रदूषण के खतरे से पूरी तरह मुक्त होती है। ये स्रोत फिर से इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इनमें से अनेक अभी परीक्षण दौर में हैं और इन्हें बढ़ावा देने तथा लोकप्रिय बनाने के लिये अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में काफी कुछ किया जाना जरूरी है।

आठवीं योजना में ऊर्जा


देश में योजना-निर्माण की प्रक्रिया अपनाए जाने के बाद शुरू से ही विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा के उत्पादन में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। सारणी-1 से यह बात साफ हो जाती है।

इस सारणी से यह स्पष्ट हो जाती है कि प्रत्येक दस वर्ष की अवधि में हर प्रकार की ऊर्जा के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। लेकिन पिछले 10-12 वर्षों में इसमें बहुत तेजी से भी वृद्धि हुई है और इस दौरान ऊर्जा का उत्पादन लगभग दुगुना हो गया है।

प्राकृतिक गैस के उत्पादन में भी महत्त्वपूर्ण वृद्धि हुई है।

सातवीं और आठवीं योजना में ऊर्जा उत्पादन में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ इस क्षेत्र में पूँजीनिवेश में हुई वृद्धि को सारणी-2 में दर्शाया गया है।

इस सारणी को देखने से पता चलता है कि लगभग सभी क्षेत्रों में पूँजीनिवेश दुगुना हो जाने की सम्भावना है। लेकिन अगर हम आठवीं योजना के लक्ष्य काफी हद तक पूरा कर लें तब भी ऊर्जा की मांग और आपूर्ति में भारी अंतर बना रहेगा। आठवीं योजना में ऊर्जा उत्पादन सारणी-3 में प्रदर्शित किया गया है। इसे देखने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आठवीं योजना के अंतिम वर्ष में, यानी 1996-97 में अधिकतर क्षेत्रों में ऊर्जा के उत्पादन में वृद्धि 20 से 30 प्रतिशत के बीच रहेगी। प्राकृतिक गैस के उत्पादन में काफी बढ़ोत्तरी होने की सम्भावना है। लेकिन अगर ऊर्जा की खपत में वृद्धि की दर से तुलना की जाए तो इसका उत्पादन आवश्यकता से काफी कम रहेगा। कहने का मतलब यह है कि ऊर्जा की किल्लत बनी रहेगी।

खपत


ऊर्जा की खपत जिन चार प्रमुख क्षेत्रों में होती है, वे हैं- उद्योग, परिवहन, घरेलू उपयोग और कृषि। इनमें से सबसे अधिक ऊर्जा उद्योगों में काम आती है। इसके बाद परिवहन, घरेलू उपयोग और चौथा कृषि के क्षेत्र का स्थान है। वर्ष 1990-91 और 1996-97 में प्रत्येक क्षेत्र में ऊर्जा की खपत सारणी-4 में दर्शाई गई है। योजना के आखिरी वर्ष में उद्योग और कृषि के क्षेत्र में ऊर्जा की खपत में गिरावट आने का अनुमान लगाया गया है, जबकि परिवहन और घरेलू उपयोग के क्षेत्र में ऊर्जा की खपत में बढ़ोत्तरी हो सकती है।

सारणी-1

व्यावसायिक रूप से ऊर्जा उत्पादन

ऊर्जा स्रोत इकाई

उत्पादन

 

1950-51

1960-61

1970-71

1980-81

1991-92

कोयला लाख टन में

330

556.7

729.5

1140.1

2292.6

लिग्नाइट लाख टन में

-

0.5

33.9

48.0

158.1

कच्चा तेल लाख टन में

2.6

4.5

68.2

105.1

303.4

प्राकृतिक गैस लाख घनमीटर

-

-

11,450

23,580

7,82,800

पन-बिजली अरब

 

 

 

 

 

किलोवाट घंटा

2.52

7.84

25.25

46.54

72.60

परमाणु बिजली अरब

 

 

 

 

 

किलोवाट घंटा

-

-

2.42

3.00

5.59

 


सारणी-2

ऊर्जा के क्षेत्र में योजनागत खर्च

(करोड़ रुपयों में)

सातवीं योजना

सातवीं योजना

आठवीं योजना

बिजली

37,845.27

795.89

तेल और प्राकृतिक गैस

16,025.22

2400

कोयला और लिग्नाइट

7,105.79

10,507

कुल

60,976.28

1,140.96

 

1990-91 से आठवीं योजना के अंतिम वर्ष (1996-97) तक ऊर्जा की खपत में विभिन्न क्षेत्रों का हिस्सा सारणी-5 में प्रदर्शित किया गया है। सभी क्षेत्रों में इस दौरान बिजली, पेट्रोलियम और गैस की खपत बढ़ाने का अनुमान लगाया गया है। परिवहन तथा घरेलू उपयोग के क्षेत्र में तेल तथा प्राकृतिक गैस की खपत में भारी वृद्धि होगी, जबकि कृषि के क्षेत्र में इनकी खपत घटेगी। लेकिन इस दौरान कृषि के क्षेत्र में बिजली की खपत बढ़ेगी।

ऊर्जा की खपत और उत्पादन के बारे में ऊपर दिए गए आँकड़ों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पहली योजना से लेकर सातवीं योजना तक ऊर्जा के उत्पादन और खपत में भारी वृद्धि हुई है। व्यावसायिक ऊर्जा की खपत में बढ़ोत्तरी के बावजूद प्रति व्यक्ति ऊर्जा के उपयोग की दृष्टि से भारत दुनिया में काफी पीछे है। वर्ष 1990-91 में भारत में ऊर्जा के लिये तेल की खपत प्रति व्यक्ति औसतन 123.5 के जी ओ ई थी। लेकिन अगर गैर-व्यावसायिक ऊर्जा की खपत को भी इनमें शामिल कर लिया जाए तो यह बढ़कर 265.4 के जी ओ ई हो जाता है। इस समय भारत में प्रति व्यक्ति बिजली की औसत खपत 250 किलोवाट घंटा है। सारणी-6 में भारत में प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत की तुलना विश्व के कुछ विकसित देशों से की गई है। दुनिया में ऊर्जा की सबसे अधिक खपत कनाडा में है। इसके बाद अमेरिका तथा अन्य देशों का स्थान है। इन देशों के मुकाबले भारत की स्थिति सचमुच बेहद खराब है।

सारणी -3

बिजली, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और कोयले का उत्पादन

 

इकाई

1991-92

1996-97

उत्पादन क्षमता

मेगावाट

69,082

99,620

तप-बिजली क्षमता

प्रतिशत

69.64

68.52

जल विद्युत क्षमता

 ‘‘

27.78

28.59

उत्पादन

अरब किलोवाट घंटा

311.21

448.00

खपत

 ‘‘

226.34

335.84

ट्रांसमिशन और वितरण के दौरान नुकसान

प्रतिशत

23.00

21.00

खनिज तेल

उत्पादन

लाख मैट्रिक टन

303.4

500.0

शुद्ध आयात

‘‘

240.0

133.2

तेल शोधन क्षमता

‘‘

518.5

650.0

खनिज तेल

‘‘

514.2

633.3

पेट्रोलियम पदार्थ

तेल शोधन संयंत्रों से उत्पादन

‘‘

491.5

615.7

शुद्ध आयात

‘‘

67.4

196.2

खपत

‘‘

566.6

811.9

प्राकृतिक गैस

सकल उत्पादन

लाख घन मीटर

1,82,800

3,01,800

जलने से होने वाला नुकसान

‘‘

53,140

24,150

खपत

‘‘

1,29,660

2,77,650

कोयला

उत्पादन

लाख मैट्रिक टन

2,292.6

3,080.0

शुद्ध आयात

‘‘

59.8

20.0

खपत

‘‘

2,288.3

3,100.0

लिग्नाइट           

उत्पादन

लाख मैट्रिक टन

158.1

223

 


सारणी-4

ऊर्जा की व्यावसायिक खपत में चार प्रमुख क्षेत्रों की हिस्सेदारी (प्रतिशत)

क्षेत्र

1990-91

1996-97 (अनुमानित)

उद्योग

51.0

46.3

परिवहन

23.3

25.4

घरेलू उपयोग

13.8

15.8

कृषि

9.6

8.8

अन्य

2.3

3.7

कुल

100.00

100.00

 

आठवीं योजना में ऊर्जा उत्पादन का संक्षिप्त ब्यौरा इस प्रकार है :

बिजली क्षेत्र


आठवीं योजना के प्रारम्भ में बिजली क्षेत्र की संस्थापित उत्पादन क्षमता 96,000 मेगावाट थी। आठवीं योजना में 50,538 मेगावाट अतिरिक्त विद्युत उत्पादन क्षमता पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है। अगर यह लक्ष्य पूरा हो जाता है तो इस योजना के अंत तक कुल संस्थापित क्षमता बढ़कर 100000 मेगावाट हो जाएगी लेकिन इतने बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने में कई अड़चने आएँगी जिन्हें सुलझाना होगा। मौजूदा बिजलीघरों की आर्थिक स्थिति काफी खराब है और इनमें से कई भारी घाटे में चल रहे हैं। संचालनात्मक कमियों के अलावा अधिकतर राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में बिजली की दरें युक्तिसंगत नहीं है।

पेट्रोलियम क्षेत्र


देश में संशोधित पेट्रोलियम पदार्थों की मांग में पिछले कुछ वर्षों से बढ़ोत्तरी हो रही है। दरअसल पेट्रोलियम पदार्थों की खपत में वृद्धि की दर सातवीं योजना में निर्धारित लक्ष्य से कहीं अधिक थी। आठवीं योजना के अंतिम वर्ष में (1996-97) पेट्रोलियम पदार्थों की मांग 812 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है। इस दौरान देश में कच्चे तेल के उत्पादन में जो वृद्धि होगी उसकी तुलना में इसकी मांग में वृद्धि बहुत अधिक होगी इसलिये कच्चे तेल तथा पेट्रोलियम पदार्थों दोनों का आयात बढ़ाना आवश्यक हो जाएगा। वर्ष 1991-92 में 294 लाख टन पेट्रोलियम पदार्थों का आयात करना पड़ा था। वर्ष 1996-97 में 312 लाख टन पेट्रोलियम पदार्थ आयात करने पड़ेंगे। देश में विदेशी मुद्रा की भारी आवश्यकता को देखते हुए यह बड़ी कठिन स्थिति होगी और विदेशी तेल बाजारों की अनिश्चितता को देखते हुए इससे हमारी अर्थव्यवस्था और संकट में पड़ जाएगी।

कोयला क्षेत्र


कोयला हमारे देश में ऊर्जा का बुनियादी स्रोत है और लम्बे समय तक यही स्थिति बनी रहेगी। वर्ष 1991-92 में करीब 2,290 लाख टन कोयले का उत्पादन हुआ। आठवीं योजना में इसका उत्पादन 3,080 लाख टन हो जाने का अनुमान है। कोयले का सबसे अधिक उपयोग करने वालों में बिजली और इस्पात उद्योग प्रमुख हैं। इसके अलावा सीमेंट, उर्वरक और लघु उद्योग भी कोयले का उपयोग करने वाले प्रमुख उद्योगों में शामिल हैं।

ऊर्जा के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास


ऊर्जा के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास की गतिविधियों को प्राथमिकता दी जा सके, इस बात को मद्देनजर रखते हुए अब हम इस क्षेत्र की कुछ समस्याओं पर विचार करेंगे।

बिजली


देश में योजना प्रक्रिया शुरू होते वक्त (1950 में) बिजली उत्पादन की संस्थापित क्षमता 1,710 मेगावाट थी जो 1989-90 (यानी सातवीं योजना के आखिरी वर्ष में) बढ़कर 64,000 मेगावाट हो गई। इस अवधि में बिजली का कुल उत्पादन 5.1 अरब किलोवाट घंटा से बढ़कर लगभग 245 अरब किलोवाट घंटा हो गया। विद्युत वितरण प्रणाली में इतना बड़ा विस्तार टेक्नोलॉजी में सुधार के लिये उठाए गए महत्त्वपूर्ण कदमों के बिना सम्भव नहीं था। बिजलीघरों की क्षमता में भी सुधार हुआ है और अब 500 मेगावाट तक की क्षमता के संयंत्र बनाए जाने लगे हैं। अब 400 किलो वोल्ट तक की वोल्टेज वाली ए.सी. और डी.सी. बिजली बनाई जाने लगी है। बिजली उत्पादन में काम आने वाले प्राकृतिक संसाधन देश में सभी स्थानों पर समान रूप से नहीं पाए जाते, इसलिये एक राज्य से दूसरे राज्य तक लम्बी दूरी की उच्च वोल्टेज वाली ए.सी. और डी.सी. ट्रांसमिशन लाइनें बिछाना आवश्यक हो गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि हमारे पास क्षेत्रीय बिजली ग्रिड के रूप में एक ऐसी जटिल विद्युत प्रणाली उपलब्ध है जिसके लिये अत्यंत परिष्कृत संचार और नियंत्रण व्यवस्था बनाना आवश्यक हो जाता है।

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए बिजली के क्षेत्र में जिन-जिन विषयों पर अनुसंधान और विकास का कार्य बहुत आवश्यक है वे इस प्रकार हैं:-

1. उपभोक्ताओं के लिये बिजली को सस्ता बनाना बहुत आवश्यक है।
2. बिजलीघरों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिये इनसे प्राप्त होने वाली राख और फालतू गर्मी का इस्तेमाल जरूरी है।
3. संसाधनों को बचाने और लागत घटाने के लिये बिजली के उत्पादन, ट्रांसमिशन, वितरण और उपयोग में होने वाली बिजली की बर्बादी कम करना जरूरी है।
4. विद्युत प्रणाली पर्यावरण मंत्रालय के मानकों के अनुसार बनाई जानी चाहिए।
5. विद्युत प्रणाली के संचालन की कुल लागत को घटाने के लिये मांग को उपयुक्त स्तर पर बनाए रखना जरूरी है।

कोयला


जहाँ तक कोयले के उत्पादन का सवाल है, गैर-कोकिंग कोल किस्म के कोयले का मुख्य उपभोक्ता बिजली उद्योग है जबकि कोकिंग कोल की मांग इस्पात उद्योग में सबसे अधिक होती है। हमारे कोयले के अधिकतर भण्डार पूर्वी और मध्यवर्ती भारत में स्थित हैं। आने वाले वर्षों में देश के अन्य भागों में कोयले की बढ़ती हुई मांग को देखते हुए बड़ी मात्रा में कोयला वहाँ भेजना पड़ेगा। भारत में मिलने वाले कोयले में राख की मात्रा बहुत अधिक होती है और इसमें ताप भी कम होता है। कोयले की ढुलाई से हमारी परिवहन प्रणाली पर पहले ही भारी दबाव पड़ रहा है और भविष्य में यह समस्या और गम्भीर हो जाएगी।

इसलिये कोयले के परिवहन के वैकल्पिक तरीकों (जैसे कोयले और पानी के मिश्रण को पाइपलाइनों से भेजना) का पता लगाना बहुत जरूरी है ताकि परिवहन प्रणाली पर दबाव कम किया जा सके। कोयले की गुणवत्ता में सुधार और उसके अंतिम उपयोग के समय कार्यकुशलता बढ़ाने के लिये स्वदेशी टेक्नोलॉजी विकसित करना भी आवश्यक है।

पेट्रोलियम


इस समय पेट्रोलियम पदार्थों की सालाना मांग 580 लाख मैट्रिक टन है। देश में कुल 30 से 32 लाख मैट्रिक टन तक कच्चा तेल उपलब्ध हो पाता है। घरेलू उत्पादन अधिक-से-अधिक करने के सभी प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिये देश में तेल और गैस क्षेत्रों की खोज तथा इनके विकास पर जोर दिया जा रहा है। आने वाले वर्षों में पेट्रोलियम पदार्थों की घरेलू मांग और उपलब्धता में अंतर के और बढ़ जाने की आशंका है। इससे देश की अर्थव्यवस्था पर गम्भीर असर पड़ सकता है। पेट्रोलियम क्षेत्र में जिस बात पर जोर दिया जा रहा है उनमें एक ओर तेल की खोज और तेल क्षेत्रों का विकास शामिल है तो दूसरी ओर तेल का संरक्षण तथा वैकल्पिक साधनों के उपयोग को बढ़ावा देकर इसकी मांग कम करना भी शामिल है। तटवर्ती तथा समुद्री तेल और गैस के विकास में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है। यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है कि इस क्षेत्र में अनुसंधान और विकास सम्बंधी प्रयासों का उद्देश्य स्वदेशी टेक्नोलॉजी विकसित करना है।

गैर-पारम्परिक स्रोत


सभी विकासशील देशों के लिये भविष्य में ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोत सबसे महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से भारत में ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोतों के उपयोग में भारी वृद्धि हुई है। बायोगैस संयंत्रों की संख्या में भी तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। इसी प्रकार सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा का भी व्यापक उपयोग करने के लिये लगभग हर राज्य ने अपने-अपने कार्यक्रम बना लिये हैं। गुजरात और महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों ने अन्य राज्यों के मुकाबले कहीं अच्छा काम किया है। कुल मिलाकर पूरे देश में समूचा कार्यक्रम जोर पकड़ रहा है।

भारत में ग्रामीण विकास के संदर्भ में गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों का बड़ा महत्त्व है। कुछ क्षेत्रों में खाना पकाने और रोशनी के लिये लकड़ी और कृषि से बचे बेकार पदार्थों के स्थान पर बायोगैस का प्रचलन बढ़ रहा है तथा पानी निकालने और अन्य कार्यों में पवन ऊर्जा इस्तेमाल में लाई जा रही है।

देश में खनिज तेल की आम कमी, लम्बी दूरी तक (विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में) परम्परागत ईंधन को लाने-ले-जाने में आने वाली भारी परिवहन लागत और टिकाऊ विकास की आवश्यकता को देखते हुए गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोत महत्त्वपूर्ण हैं। अनुसंधान और विकास से सम्बंधित कई प्रकार के कार्यक्रम और प्रदर्शन हाथ में लिये गए हैं। इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम हैं- बायोगैस संयंत्र, सुधरे चूल्हे तथा सौर ताप, सौर-फोटोवोल्टैक, पवन-ऊर्जा, बायोमास तथा माइक्रो जल विद्युत परियोजनाएँ। इसके अलावा वैकल्पिक ईंधन, बैटरी चालित वाहन, हाइड्रोजन, भू-तापीय तथा रासायनिक स्रोतों पर आधारित ऊर्जा-प्रणालियों पर अनुसंधान और विकास कार्य जारी है।

अभी पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों और इनसे संबद्ध टेक्नोलॉजी को बड़े पैमाने पर

सारणी -5

विभिन्न क्षेत्रों में व्यावसायिक ऊर्जा की खपत

प्रतिशत

क्षेत्र

वर्ष

कोयला

तेल/गैस

बिजली

उद्योग

1990-91

69.96

13.1

17.3

 

1996-97

69.2

11.6

19.2

परिवहन

1990-91

9.6

88.9

1.5

 

1996-97

4.0

94.7

1.3

घरेलू उपयोग

1990-91

3.9

77.1

19.0

 

1996-97

7.3

68.9

23.8

कृषि

1990-91

-

57.1

42.9

 

1996-97

-

50.2

49.8

अन्य

1990-91

-

29.2

70.8

 

1996-97

-

48.2

51.8

 

अगस्त, 1992 तक प्रमुख कार्यक्रमों की उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं:-

1. बायोगैस संयंत्र

16.16 लाख

2. सुधरे चूल्हे

127 लाख

3. सौर ऊर्जा से पानी गर्म करने की घरेलू प्रणाली

10,292

4. औद्योगिक इकाइयों में सौर ऊर्जा से पानी गर्म करने की प्रणालियाँ

4,907

5. सौर कुकर

2.27 लाख

6. फोटोवोल्टैक स्ट्रीट लाइट

28,887

7. फोटोवोल्टैक घरेलू विद्युत इकाइयाँ

11,430

8. पवन ऊर्जा से चलने वाले पम्प

2,922

9. पवन फार्म

42.97 मेगावाट

10. मिनी माइक्रो हाइडल

86.44 मेगावाट

11. बायोमास गैसीफायर/स्टायरलिंग इंजन

1040

 

विभिन्न अपारम्परिक ऊर्जा प्रणालियों की औसत लागत इस प्रकार हैंः-

1. बायोगैस (4 एम3 क्षमता)

10,000 रुपये

2. सुधरे चूल्हे

100 रुपये

3. सौर ऊर्जा पर आधारित पानी गर्म करने की प्रणाली

10,000 रुपये प्रति वर्गमीटर संग्राहक क्षेत्र

4. सोलर फोटोवोल्टैक

225 रुपया प्रति पीक वाट

5. पवन बिजली  

2.5-3.0 करोड़ रुपया प्रति मेगावाट

6. माइक्रो-हाइडल

40,00-80,000 रुपया प्रति किलोवाट

 

सारणी -6

विभिन्न देशों में प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत

देश

व्यावसायिक ऊर्जा की खपत (के.जी.ओ.ई)

बिजली की खपत (किलोवाट घंटा)

अमरीका

5,355

9,348

कनाडा

5,897

14,363

फ्रांस

2,444

4,515

जापान

2,075

4,908

द. कोरिया

1,648

2,206

भारत

123

253

स्रोत - अन्तरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी 1985 के आँकड़े  1990 के आँकड़े हैं।

 

अभी पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों और इनसे संबद्ध टेक्नोलॉजी को बड़े पैमाने पर सब्सिडी देना आवश्यक है। लेकिन सब्सिडी कम करने के लिये टेक्नोलॉजी में सुधार करना होगा तथा व्यावसायीकरण को अपनाना होगा। बड़े पैमाने पर गैर-पारम्परिक स्रोतों को अपनाकर ही लागत घटाई जा सकती है।

ऊर्जा के इन गैर-पारम्परिक स्रोतों के उपयोग की टेक्नोलॉजी का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए ताकि आबादी के बड़े हिस्से, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की ऊर्जा की आवश्यकता पूरी की जा सके। इस टेक्नोलॉजी का प्रसार सिर्फ सरकार के प्रयासों से ही सम्भव नहीं है, इसके लिये इनका फायदा उठाने वाले ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को भी इन कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के कार्य में भागीदार बनना होगा।

जैसे कि पहले भी कहा जा चुका है कि अधिकतर राज्यों ने गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों के विकास और उन्हें बढ़ावा देने के लिये अपनी ऊर्जा विकास एजेंसियाँ बनाई है। लेकिन टेक्नोलॉजी के विकास तथा तकनीकी सहायता देने के अपने निर्धारित कार्य की बजाए अधिकतर एजेंसियाँ गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों के उपयोग में काम आने वाले उपकरणों के निर्माताओं और खरीददारों के बीच मध्यस्थ बनकर रह गई है। उनका वैज्ञानिक और तकनीकी पहलुओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

निष्कर्ष


बिजली के क्षेत्र में विकास कार्यक्रमों की लागत को पूरा करने के लिये बड़े पैमाने पर वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए मौजूदा संसाधनों का अधिकतम उपयोग अत्यंत आवश्यक है। इसलिये न सिर्फ पुराने ताप बिजलीघरों और पन-बिजली इकाइयों का आधुनिकीकरण और सुधार जरूरी है बल्कि बिजली की ट्रांसमिशन तथा वितरण प्रणालियों पर भी पूरा ध्यान देने की आवश्यकता है। बिजली के ट्रांसमिशन और वितरण में कमियों की वजह से करीब एक चौथाई बिजली बर्बाद हो जाती है। इसे रोकने के लिये आवश्यक उपाय किए जाने चाहिए। बिजली क्षेत्र के विकास का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि पन-बिजली और ताप-बिजली का अनुपात 40ः60 बनाए रखा जाए ताकि दोनों तरह की विद्युत प्रणालियों की उत्पादन क्षमता का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। साठ के दशक के शुरू से ही कुल विद्युत उत्पाद क्षमता में पन-बिजली का हिस्सा घटता जा रहा है।

इसी तरह तेल की मांग भी इस तरह से नियंत्रित की जानी चाहिए कि कच्चे तेल और पेट्रोलियम पदार्थों का कम से कम आयात करना पड़े इसके लिए पेट्रोलियम पदार्थों की किफायत को बढ़ावा देना होगा गैस उत्पादन के क्षेत्र में भी गैस से जलकर नष्ट होने को और कम करना होगा। कोयले के क्षेत्र में इसकी सप्लाई और ढुलाई की प्रणाली में सुधार करना होगा। कोयले की गुणवत्ता में सुधार करके इस्पात उत्पादन में देश में उपलब्ध कोकिंग कोल किस्म के कोयले का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए। ऊर्जा क्षेत्र सम्भवतः देश की अर्थव्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। ऊर्जा के उत्पादन और संरक्षण की सभी परियोजनाओं में होने वाले विलम्ब को कम-से-कम किया जाना चाहिए। इसके साथ-साथ देश में, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा के गैर पारम्परिक स्रोतों के उपयोग से सम्बंधित कार्यक्रम लागू किये जाने चाहिए।

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