सफलता की कहानियां और केस स्टडी

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सूखे को कैसे पछाड़ा बागलकोट ने
Posted on 02 Jul, 2015 11:19 AM ड्राउट प्रूफिंग (सूखा रोधन) हमारे शब्दकोष में हाल में आई नई अवधारणा है। लेकिन यह कौशल बागलकोट जिले के लिये नया नहीं है। स्थानीय किसानों ने जल संरक्षण के लिये ऐसे तमाम तरीके खोजे थे जो कि विशेषज्ञों की जानकारी में भी नहीं थे। यहाँ उनके अपनाए गए तरीकों पर पैनी नजर डाली जा रही है।

जिस सूखे के कारण पूरे राज्य के अन्य जिलों में प्रतिकूल स्थितियाँ बनीं उनसे निपटने के लिये इन गाँवों ने कौन सी प्रणाली अपनाई? दुर्भाग्य से इस बारे में बहुत ही कम जानकारियाँ उपलब्ध हैं। फिर भी अनुभव बताता है कि बागलकोट के गुमनाम से दिखने वाले इन गाँवों में पारम्परिक विवेक मौजूद है जिसके कारण कम वर्षा का भी उन्होंने अधिकतम उपयोग किया और सूखे के असर को नियन्त्रित कर लिया।

कर्नाटक में बागलकोट जिला राज्य में सबसे कम वर्षा यानी 543 मिलीमीटर औसत के रूप में पहचाना जाता है। सरकारी अनुमान के अनुसार 2002-04 के बीच इस जिले में सूखे की स्थितियों और पानी की कमी के कारण 1500 करोड़ रुपए की फसल का नुकसान हुआ।

हालांकि जिले के कुछ गाँव ऐसे हैं जिन्होंने कम वर्षा और सूखे की स्थितियों के विरुद्ध अपने को बचा लिया। हुनागुंडा और बेनाकट्टी तालुका में स्थित इन गाँवों के नाम हैं-बड़वाडागी, चित्तरागी, , रामवाडागी, कराडी, कोडीहाला, इस्लामपुर, नंदवाडागी, केसरभावी।

लेकिन जिस सूखे के कारण पूरे राज्य के अन्य जिलों में प्रतिकूल स्थितियाँ बनीं उनसे निपटने के लिये इन गाँवों ने कौन सी प्रणाली अपनाई?
छोटी परियोजनाओं के फायदे
Posted on 08 Feb, 2015 12:48 PM

पानी को कुछ पक्का और कुछ कच्चा निर्माण कर रोका गया। इस पानी को रोकने का असर यह हुआ कि कहीं कम तो कहीं अधिक पर लगभग पाँच से दस गाँवों में पानी ‘रिचार्ज’ होने लगा और भूजल स्तर ऊपर उठने लगा। जिन कुँओं का पहले बहुत कम उपयोग हो पाता था उनसे सिंचाई के लिए पानी मिलने लगा। खेती से मिट्टी का कटान कम हो गया। रबी में गेहूँ, सरसों, जौ और सब्जियों की खेती होने लगी। चारागाह में हरियाली बढ़ गई और यहाँ के पशुओं को पीने के लिए पानी मिलने लगा।

अरबों रुपयों की लागत से बनी बड़े बाँधों की अनेक महँगी परियोजनाएँ अपेक्षित लाभ देने में विफल रही हैं। दूसरी ओर अपेक्षाकृत बहुत कम बजट की अनेक छोटी परियोजनाओं ने वर्षा के जल को रोककर अनेक गाँवों को नई उम्मीद दी है। इन छोटी परियोजनाओं में जहाँ गाँववासियों की नजदीकी भागीदारी से कार्य किया गया है और पारदर्शिता के तौर-तरीकों से भ्रष्टाचार को दूर रखा गया है, वहाँ अपेक्षाकृत बहुत कम बजट में ही कई गाँवों को हरा-भरा किया जा सका है।

ऐसी ही एक कम बजट में बड़ा लाभ देने वाली परियोजना है जयपुर जिले की कोरसिना परियोजना। कोरसिना पंचायत और आसपास के कुछ गाँव पेयजल के संकट से इतने त्रस्त हो गए थे कि कुछ वर्षों में इन गाँवों के अस्तित्व का संकट उत्पन्न होने वाला था।
मखाना की खेती कर रही महिलाएँ
Posted on 05 Jan, 2015 11:46 AM

मखाना उत्पादन पूरी तरह से मछुआरा समुदाय की महिलाओं के हाथों में है। पुरुष इस पूरी प्रक्रिया में

fox nut
पहाड़ पर हरियाली की वापसी
Posted on 02 Dec, 2014 12:55 PM

लोग जैसे अपने खेतों की देखभाल करते हैं उसी तरह जंगल की देखभाल करने लगे। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। दो-तीन सालों में ही सूखे जंगलों में फिर से हरियाली लौटने लगी। बांज, बुरास, काफल के पुराने ठूंठों पर फिर नई शाखाएं फूटने लगीं। अंयार, बंमोर, किनगोड हिंसर, सेकना, धवला, सिंसाआरू, खाकसी आदि पेड़-पौधे दिखाई देने लगे। और आज ये पेड़ लहलहा रहे हैं।

जो काम सरकार और वन विभाग नहीं कर पाया वह लोगों ने कर दिखाया। उन्होंने पहाड़ पर उजड़ और सूख चुके जंगल को फिर हरा-भरा कर लिया और वहां के सूख चुके जलस्रोतों को फिर सदानीरा बना लिया। यह गांव अब पारिस्थितिकी वापसी का अनुपम उदाहरण बन गया है।

और यह है उत्तराखंड की हेंवलघाटी का जड़धार गांव। सीढ़ीदार पहाड़ पर बसे लोगों का जीवन कठिन है। अगर पहाड़ी गांव के आसपास पानी न हो तो जीवन ही असंभव है। और शायद इसी अहसास ने उन्हें अपने पहाड़ पर उजड़े जंगल को फिर से पुनर्जीवित करने को प्रेरित किया। यह ग्रामीणों की व्यक्तिगत पहल और सामूहिक प्रयास का नतीजा है। अब यह प्रेरणा का प्रतीक बन गया है।

uttaraakhand ke jadadhaar gaanv ke jangal
छाई खेतों में हरियाली - आई गांवों में खुशहाली
Posted on 14 Nov, 2014 04:07 PM

ड्रिप इरीगेशन पद्धति अत्यंत लाभकारी है। इस तरीके से प्रेशर द्वारा पौधों की जड़ों के पास पानी पहुंचा कर डिपर द्वारा उसे बूंद-बूंद करके टपकाया जाता है। इसके लिए खेत में रबर के पाइप बिछाए जाते हैं। ये पाइप एक बार बिछाने के बाद कम-से-कम 10 साल तक काम करते रहते हैं। महाराष्ट्र, केरल व अन्य कई राज्यों के किसानों ने इसे अपनाया है।

मेरठ के किसान सिंचाई की बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली को बढ़ावा देकर न केवल पानी की बचत कर रहे हैं, प्रकृति का भी भला कर रहे हैं। पानी के गहराते संकट को देखकर जल पुरुष राजेन्द्र सिंह के क्षेत्र के किसान पानी बचाने की दिशा में सक्रिय हो गए हैं। मानपुर ग्राम के प्रधान श्री कृष्णपाल सिंह ने खुद आगे बढ़कर अपने क्षेत्र की समस्या को जांचा, परखा, देखा और खुद उसका समाधान खोजा। उन्होंने दूसरों की भांति व्यवस्था को नहीं कोसा। वरन् जल संरक्षण की महत्ता को समझा और इस दिशा में पहल करके अपने खेत में ड्रिप इरीगेशन प्लांट लगवाया।
Drip irrigation
जल संरक्षण की अलख जगाती एक ग्रामीण महिला
Posted on 09 Nov, 2014 11:27 AM रेगिस्तान जहां जल को तरसती मरूक्षेत्र की जमीन पर पानी अमृत तुल्य मा
Vimla
अपना हाथ जगन्नाथ
Posted on 06 Nov, 2014 12:45 PM कई बार बेहतर प्रारंभ पर हमारा बस नहीं होता है, लेकिन अपने प्रयासों
Kolar pond
ग्लोबल वार्मिंग को रोकेगा रेवासागर
Posted on 22 Oct, 2014 03:41 PM देवास जिले में पिछले तीन सालों से लगातार औसत से कम वर्षा होने के कारण रबी का रकबा लगातार घट रहा था। किसानों के पास सिंचाई के साधनों के नाम पर सिर्फ नलकूप थे। वो भी अत्यधिक भू-जल दोहन के कारण एक-एक कर किसान का साथ छोड़ते जा रहे थे। सिंचाई के लिए पानी की तलाश में 500 से 1000 फीट गहरे नलकूप करवाने के कारण किसान कर्ज में धंसता जा रहा था। ऐसे निराशाजनक परिदृश्य में तत्कालीन कलेक्टर श्री उमाकांत उमराव ने जल संवर्धन के क्षेत्र में एक नई अवधारणा विकसित कर उसे अभियान का रूप देने के लिए एक कारगर रणनीति तैयार की।नवंबर-दिसंबर के हल्के सर्द मौसम में यदि आप हवाई यात्रा के दौरान देवास जिले के टोंकखुर्द विकासखंड के ऊपर से गुजरे तो आपको हरे-हरे खेतों में ढेर सारी नीली-नीली बुंदकियां दिखाई पड़ेगी आप हैरत में पड़ जाएंगे। आपके मन में एक जिज्ञासा पैदा होगी कि आखिर खेतों में यह नीले रंग की फसल कौन-सी है...तो हम आपको बता दें कि इस क्षेत्र के किसानों ने अपनी खेती के तरीकों में क्या कोई बदलाव किया है? यहां के किसान अपने खेतों में पानी की खेती कर रहे हैं और ये जो नीली बुंदकियां हैं वो वास्तव में हर खेत में पानी से लबालब भरे तालाब हैं।
Talab
तालाब संस्कृति ने देवास को ‘विदर्भ’ बनने से बचाया
Posted on 08 Oct, 2014 11:35 AM मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के देवास को कभी ‘डार्क जोन (जहां भूजल खत्म हो चुका हो)’ घोषित कर दिया गया था और आलम यह था कि वहां पीने का पानी रेलगाड़ियों से लाया जाने लगा था। यह सिलसिला लगभग डेढ़ दशक तक चला लेकिन 2005 के बाद से यहां तालाब की परंपरा को जिंदा करने का अभियान शुरू किया गया।

2005 में यहां आयुक्त के तौर पर उमाकांत उमराव की तैनाती हुई और उन्होंने देखा कि देवास शहर के लोगों की प्यास बुझाने के लिए रेलगाड़ियों से पानी के टैंकर लाए जा रहे हैं। गांवों में भी ट्यूबवेल के जरिए खेतों को सींचने के लिए 350-400 फीट खुदाई की जा रही है और तब भी पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है।
<i>Rewa Sagar by Waterkeeper India</i>
सूखे पहाड़ों और बंजर जमीन पर फिर लहलहाई हरियाली
Posted on 06 Oct, 2014 01:41 PM मटका पद्धति द्वारा रोपित पौधों को वर्षा के पश्चात् सूखे के समय भी प्रत्येक 15 दिन पर मटके को भरा जाता रहा, जिससे पौधों को जीवन रक्षक नमी मिलती रही और पौधे सूखने से बच गए और साथ ही सघन वानस्पतिक आवरण विकसित करने कि दृष्टि से ‘कंटूर ट्रेंच’ की नई मिट्टी पर ‘स्टाइलो हमाटा’ चारे के बीज को छिटक दिया गया और जैसे ही वर्षा हुई बीजों से अंकुर फूटे और देखते-ही-देखते बंजर पड़ी जमीन और सूखी पहाड़ियों पर हरी चादर-सी बिछ गई। इससे मिट्टी का कटाव रुका, पानी संरक्षित हुआ साथ ही पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा सहजता से उपलब्ध हुआ। लगभग दो दशक पूर्व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली की मदद से मा. नानाजी देशमुख संस्थापक दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना मध्य प्रदेश के सतना जिले के कृषिगत विकास के योजनानुसार मझगवां में की गई। वनवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थापित इस कृषि विज्ञान केन्द्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती जीवन की मूलभूत आवश्यक्ताओं से जुड़ी हुई थी। पूरे वर्ष पीने का पानी नहीं, दो वक्त की रोटी नहीं, जीविकोपार्जन के लिए वनों पर निर्भरता बढ़ती रही, पेड़ कटते रहे, जंगल घटते रहे परिणामस्वरूप प्राकृतिक रूप से बिछी हरी चादर अस्त-व्यस्त होती चली गई।
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