सुरेश भाई

सुरेश भाई
हिमालय में सुनामी : आपदा पर उत्तराखंड हिमालय की आवाज़ सुनो...
Posted on 05 Dec, 2013 04:42 PM
विकास के जिस मॉडल पर आज तक बेतहाशा सड़के खुदती रही विद्युत परियोजनाएं भारी विस्फोटों के साथ सुरंगे खोद कर संवदेनशील पर्वत माला को झकझोरती रही और नदियों के अविरल प्रवाह को जहाँ-तहाँ रोककर गांव के लोगों के लिए कृत्रिम जलाभाव पैदा किया गया और कभी इन्हीं जलाशयों को अचानक खोलकर लोगों की जमीनें एवं आबादियां बहा दी गई। अब भविष्य में ऐसा विकास का मॉडल उत्तराखंड में नहीं चलेगा। इस आवाज़ को इस रिपोर्ट के माध्यम से यहां के लोगों ने बुलंद किया है। उत्तराखंड में 16-17 जून को आई आपदा की जानकारी इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया के द्वारा प्रचारित की जाती रही है। इसके अलावा कई लेखकों व प्रख्यात पर्यावरणविदों ने भी आपदा के कारणों व भविष्य के प्रभावों पर सबका ध्यान आकर्षित किया। इसी को ध्यान में रखते हुए 23-26 सितम्बर 2013 को उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग, अगस्तमुनी, ऊखीमठ, गोपेश्वर, कर्णप्रयाग, श्रीनगर, ऋषिकेश और हरिद्वार के प्रभावित गांव व क्षेत्र का अध्ययन एक टीम द्वारा किया गया है। इस टीम में प्राकृतिक संसाधनों पर विशेषज्ञों का एक दल जिसमें उड़ीसा स्थित अग्रगामी से श्रीमती विद्यादास, गुजरात में कार्यरत दिशा संस्था की सुश्री पाउलोमी मिस्त्री, और कर्नाटक संस्था इन्वायरमेंट प्रोटेक्शन ग्रुप के श्री लियो सलडान और दिल्ली से ब्रतिन्दी जेना शामिल थी।
आपदाग्रस्त क्षेत्रों में पलायन
Posted on 29 Aug, 2013 11:53 AM

आपदा के बाद पुनः निर्माण से पहाड़ बचाए जाएं।


जहाँ उत्तराखंड की सरकार आपदा के बाद पुनःनिर्माण की योजना बना रही है वहीं आपदाग्रस्त क्षेत्रों में इन दिनों पलायन की भी चर्चा जोरों पर है। सरकार को सावधानी से इससे निपटने के सुझाव दे रहे हैं सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश भाई की एक रिपोर्ट-

चर्चा गहरी हो गई है कि यहाँ से कहीं दूसरी जगह ही पलायन हो। इससे सावधान रहने के लिए वर्तमान में राज्य को कठिन प्रतिज्ञा करनी चाहिए। राज्य सरकार ने यह निर्णय लेकर कि नदियों के किनारे कोई निर्माण नहीं होगा, इसका स्पष्टीकरण नहीं हो सका है। क्या इसका अर्थ इस नाम पर लिया जाय कि नदियों के किनारों की दूर तक की आबादी को खाली करवाना है, या नदियों के किनारों को सुदृढ़ ही नहीं करना है। यदि ऐसा है तो जो नदियों के किनारों की आबादी है वह भविष्य में अधिक खतरे की जद में आने वाली है। ऐसी स्थिति पैदा करने से पलायन बढ़ेगा। गंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनंदा जैसी पवित्र नदियों के संगम व इनके तटों पर निवास करने वाले लोग कभी बड़े भाग्यशाली माने जाते थे। इसमें ऐसी भी कहावत है कि इन नदियों के तटों पर जो एक रात्रि भी विश्राम करे, वह पुण्य का भागीदार माना जाता है। लेकिन अब स्थिति भिन्न होती नजर आ रही है। नदियों के पास रहने वाले समाज को अनुभव हो रहा है कि उनके आने वाले दिन संकट में गुजरेंगे। हर बरसात में औसत दो गांव और दो ऐसी आबादी वाले क्षेत्र तबाह होते नजर आ रहे हैं, जहाँ पर लोग तीर्थ स्थलों तक पहुँचने से पहले चाय, पानी पीकर विश्राम लेते थे। बरसात में पहाड़ी राज्यों में खासकर उत्तराखंड़, हिमाचल, जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्व के राज्यों में भी लोगों को अपने पाँव के नीचे की ज़मीन असुरक्षित नजर आ रही है। आखिर ऐसा पिछले वर्षों में क्या हो गया कि लोग अकस्मात पहाड़ी क्षेत्रों में अब अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं।
उत्तराखंड में मानव जनित विकास की ’बाढ़’
Posted on 27 Jul, 2013 09:25 AM
मौजूदा स्थिति में विकास के नाम पर 558 परियोजनाओं से 40,000 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इन बिजली परियोजनाओं के निर्माण के लिए नदियों के किनारों से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों को चौड़ा ही इसलिए किया जा रहा है ताकि बड़ी-बड़ी भीमकाय मशीनें सुरंग बांधों के निर्माण के लिए पहाड़ों की गोद में पहुंचाई जा सकें। यहाँ तो हर रोज सड़कों का चौड़ीकरण विस्फोटों और जेसीबी मशीनों द्वारा हो रहा है। जिसके कारण नदियों के आर-पार बसे अधिकांश गांव राजमार्गों की ओर धंसते नजर आ रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन, भूकंप की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। उत्तराखंड हिमालय से निकलने वाली पवित्र नदियां, भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनंदा, भिलंगना, सरयू, पिंडर, रामगंगा आदि के उद्गम से आगे लगभग 150 किमी तक सन् 1978 से लगातार जलप्रलय की घटनाओं की अनदेखी होती रही है। 16-17 जून 2013 को केदारनाथ में हजारों तीर्थ यात्रियों के मरने से पूरा देश उत्तराखंड की ओर नजर रखे हुए है। इस बीच ऐसा लगा कि मानो इससे पहले यहाँ कोई त्रासदी नहीं हुई होगी, जबकि गंगोत्री से उत्तरकाशी तक पिछले 35 वर्षों में बाढ़, भूकंप से लगभग एक हजार से अधिक लोग मारे गए। 1998 में ऊखीमठ और मालपा, 1999 में चमोली आदि कई स्थानों पर नजर डालें तो 600 लोग भूस्खलन की चपेट में आकर मरे हैं। 2010-12 से तो आपदाओं ने उत्तराखंड को अपना घर जैसा बना दिया है। इन सब घटनाओं को यों ही नजरअंदाज करके आपदा के नाम पर प्रभावित समाज की अनदेखी की जा रही है।
छीजता पहाड़ का पानी
Posted on 06 May, 2013 03:10 PM
उत्तराखंड हिमालय, गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों और उनकी सैकड़ों सदानीरा जलधाराओं के कारण पूरे विश्व में जलभंडार के रूप में प्रसिद्ध है। मगर तथाकथित विकास और समृद्धि के झूठे दंभ से ग्रस्त राज्य सरकारें गंगा और उसकी धाराओं के प्राकृतिक सनातन प्रवाह को बांधों से बाधित कर रही हैं। इनसे इन नदियों का अस्तित्व खतरे में है। इसके चलते राज्य की वर्षापोषित और हिमपोषित तमाम नदियों पर संकट छा गया है। जहां वर्षापोषित कोसी, रामगंगा, जलकुर आदि नदियों का पानी निरंतर सूख रहा है वहीं भागीरथी, यमुना, अलकनंदा, भिलंगना, सरयू, महाकाली, मंदाकिनी आदि हिमपोषित नदियों पर सुरंग बांधों का खतरा है। उत्तराखंड समेत सभी हिमालयी राज्यों में सुरंग आधारित जल विद्युत परियोजनाओं के कारण नदियों का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ गया है। ढालदार पहाड़ियों पर बसे गाँवों के नीचे बांधों की सुरंग बनाई जा रही है। जहां-जहां ऐसे बांध बन रहे हैं, लोग सवाल उठा रहे हैं। इन बांधों के निर्माण के लिए निजी कंपनियों के अलावा एनटीपीसी और एनएचपीसी जैसी कमाऊ कंपनियों को बुलाया जा रहा है। राज्य सरकार ऊर्जा प्रदेश का सपना भी इन्हीं के सहारे देख रही है। ऊर्जा प्रदेश बनाने के लिए पारंपरिक जल संस्कृति और संरक्षण जैसी बातों को बिल्कुल भुला दिया गया है। निजी क्षेत्र के हितों को ध्यान में रख कर नीति बनाई जा रही है। निजी क्षेत्र के प्रति सरकारी लगाव के पीछे दुनिया की वैश्विक ताक़तों का दबाव है। इसे विकास का मुख्य आधार मान कर स्थानीय लोगों की आजीविका की मांग कुचली जा रही है। बांध बनाने वाली व्यवस्था ने इस दिशा में संवादहीनता पैदा कर दी है। वह लोगों की उपेक्षा कर रही है। उत्तराखंड में जहां-जहां सुरंगी बांध बन रहे हैं, वहां लोगों की दुविधा यह भी है कि टिहरी जैसा विशालकाय बांध तो नहीं बन रहा है, जिसके कारण उन्हें विस्थापन की मार झेलनी पड़ सकती है। इसलिए कुछ लोग पुनर्वास की मांग करते भी दिखाई दे रहे हैं।
नदियों के पास रहने वाले समाज की अनदेखी
Posted on 19 Apr, 2013 12:06 PM
नदियों पर बांधों की श्रृंखलाएं बनाने की परियोजनाओं को महत्व दिए जाने से नदियों से लोगों का रिश्ता टूटकर निजी कंपनियों और पूंजीपति वर्ग के हाथों में नदियां चली जाएंगी। पानी और जंगल का जिस तरह रिश्ता है, उसे बरकरार रखना भी जलनीति का मुख्य बिन्दु होना चाहिए। गाड़-गदेरों व नदियों से पानी को मोड़कर सिंचाई नहरों मे आने वाले पानी का इस्तेमाल बहु उपयोगी होना चाहिये। प्रत्येक सिंचाई नहर से एक घराट चलाकर अथवा टरबाईन चलाकर बिजली बनाने का प्रयोग हमारे प्रदेश में मौजूद हैं। जिसका अनुकरण सरकार को जलनीति बनाते समय करना चाहिए। वर्षा जल संग्रहण के पारंपरिक तरीकों से सरकार को सीखना होगा। उत्तराखंड राज्य समेत सभी हिमालयी राज्यों में सुरंग आधारित जल विद्युत परियोजनाओं के कारण नदियों का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ गया है। ढालदार पहाड़ी पर बसे हुए गाँवों के नीचे धरती को खोदकर बांधों की सुरंग बनाई जा रही है। जहां-जहां पर इस तरह के बांध बन रहे हैं वहां पर लोगों द्वारा सवाल उठाये जा रहे हैं कि, मुर्दाघाटों की पवित्रता पानी के बिना कैसे बचेगी़? इन बांधों का निर्माण करने के लिए निजी कंपनियों के अलावा एनटीपीसी और एनएचपीसी जैसी कमाऊ कंपनियों को बुलाया जा रहा है। राज्य सरकार ऊर्जा प्रदेश का सपना भी इन्हीं के सहारे पर देख रही है। ऊर्जा प्रदेश बनाने के लिए पारंपरिक जल संस्कृति और पारंपरिक संरक्षण जैसी बातों को बिलकुल भुला दिया गया है। इसके बदले रातों रात राज्य की तमाम नदियों पर निजी क्षेत्रों के हितों में ध्यान में रखकर नीति बनाई जा रही है। निजी क्षेत्र के प्रति सरकारी लगाव के पीछे भी, दुनिया के वैश्विक ताक़तों का दबाव है। दूसरी ओर इसे विकास का मुख्य आधार मानकर स्थानीय लोगों की आजीविका की मांग को कुचला जा रहा है। बांध बनाने वाली व्यवस्था ने इस दिशा में संवादहीनता पैदा कर दी है।
हिमालय नीति जन संवाद
Posted on 08 Oct, 2012 02:46 PM
जन संवाद के प्रथम दिवस के अवसर पर देश और दुनिया के परिदृश्य में हिमालय की भूमिका के विषय पर विचारकों ने प्रतिभागियों के मन और बुद्धि को झकझोरने वाले विचार व्यक्त कर बहुत गंभीरतापूर्वक आज की परिस्थिति को समझकर दिशा तय करने में सावधानी बरतने की ओर इशारा किया है। उन्होंने आज की वैश्विक साम्राज्यवादी ताकतों के बल पर नीति-नियन्ताओं की कमजोरी को भी उजागर किया है। 27-28 सितम्बर 2012 को उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून में हिमालय नीति जन संवाद का आयोजन किया गया है। इस अवसर पर हिमालय लोक नीति विषय पर चर्चा केन्द्रित रही है। इसमें लगभग 75 लोगों ने भाग लिया है। जन संवाद में अधिकांश वही लोग उपस्थित रहे जिन्होंने सन 2010 से हिमालय लोकनीति के मसौदे को तैयार किया था। गौरतलब है कि हिमालय राज्यों में विशेषकर उत्तराखंड ने चिपको, रक्षासूत्र, नदी बचाओ, हिमालय बचाओ के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण जो देश और दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है उसी के अनुरुप उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, हिमांचल के सामाजिक कार्यकर्ताओं, महिलाओं, किसानों, पंचायत प्रतिनिधियों ने मिलकर नवम्बर 2010 में एक हिमालय नीति की कल्पना की थी।
जनभागीदारी से हो कूड़े-कचरे का प्रबंधन
प्लास्टिक व पॉलीथिन पर नियंत्रण के लिए पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने एक आदेश दिया था जिसमें पूरी तरह पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई है। इस आदेश को सरकार ने कड़ाई से पालन करने के लिए प्रयास तो किए हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि इसमें थोड़ी भी कमी नहीं आई है। प्रदूषण नियंत्रण के विषय में अदालतों ने अनेक फरमान जारी किए हैं जिनका प्रभाव एक महीने से अधिक नहीं टिक पाता। इसका कारण है
Posted on 08 Nov, 2023 03:25 PM

हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर, बुग्याल, जंगल में जगह-जगह  कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। यात्रा सीजन पूरा होने के बाद चारधाम और बुग्यालों के बीच में आने वाले पर्यटकों द्वारा पैदा किए गए ठोस कचरे को एकत्रित करने के प्रयास भी किए जाते हैं, लेकिन अक्सर देखा गया कि जहां से इसको बोरों में भरकर उठाया जाता है, उसके आगे नदियों के किनारे ही डंप कर दिया जाता है। इसके बाद सफाई का संदेश भी प्रकाशित हो जाता है। प्र

जनभागीदारी से हो कूड़े-कचरे का प्रबंधन
हिमालय बना आपदा का घर
हिमाचल में व्यास, रावी, सतलुज नदी के तटों की आबादी पर अधिक मार पड़ी है भारी जल सैलाब के खतरे को देखकर नदियों की अविरल धारा को रोकने वाले बांधों के गेट खोलने पड़े जिसके कारण लुधियाना, पटियाला जैसे अनेक इलाके लंबे समय तक पानी में डूबे रहे यमुना पर हथिनी कुंड के पास गेट खोलने से यमुनानगर, करनाल से लेकर दिल्ली तक पानी में डूब गए। Posted on 28 Oct, 2023 01:09 PM

हिमालय आपदा का घर बन गया है। पहाड़ तेजी से दरक रहे हैं। हाहाकार मचा हुआ है। हिमाचल और उत्तराखंड में 24 जून से 21 अगस्त, 2023 के दौरान भारी बारिश में भूस्खलन से सैकड़ों लोग मारे गए हैं। हिमाचल में 800 से अधिक स्थानों पर सड़कें बंद रहीं, जिनमें 113 स्थान ऐसे हैं, जहां जानलेवा लैंडस्लाइड्स के कारण 330 से ज्यादा लोगों की जान चली गई और 38 लोग लापता हैं। उत्तराखंड में 360 से अधिक डेंजर जोन बन गए हैं,

हिमालय बना आपदा का घर
उर्गम घाटी में हर साल लगता है पर्यावरण एवं प्रकृति-पर्यटन मेला
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर चमोली स्थित उर्गम घाटी में विगत 24 वर्षों से चिपको नेत्री गौरा देवी के नाम पर पर्यावरण एवं प्रकृति-पर्यटन मेले का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष यह मेला 25 वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। गौरतलब है कि विश्वप्रसिद्ध चिपको आन्दोलन की शुरुआत करने वाली गौरा देवी का जन्म 1925 में और निधन 4 जुलाई 1991 को हो गया था.
Posted on 21 Oct, 2023 12:02 PM

चिपको आंदोलन की चर्चित महिला नेत्री गौरा देवी ने सन 1974 में अपने गांव के जंगल का व्यवसायिक दोहन रुकवाया था। उस समय वह पहली महिला थीं, जिन्होंने अपने रैणी गांव की दर्जन भर से अधिक महिलाओं का नेतृत्व करके सरकार द्वारा काटे जा रहे बहुमूल्य प्रजाति के पेड़ों को बचाया था। वनों के संरक्षण के लिए उनका यह अहम योगदान दुनिया भर के लोग आज भी आदर्श उदाहरण के रूप में याद करते हैं।नके जन्म व कर्मक्षेत्र चमो

पर्यटन मेला,Pc- सर्वोदय जगत
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