नवनीत कुमार गुप्ता

नवनीत कुमार गुप्ता
पहियों पर चलती जैवविविधता
Posted on 14 Aug, 2012 10:33 AM

हमारे देश में जो फसलें उगाई जाती हैं उनमें से 66 प्रजातियां व उनके जंगली संबंधियों की लगभग 320 प्रजातियों का जन्म स्थान भारत ही है। आपको यह जानकर एक सुखद आश्चर्य अवश्य होगा कि आज से लगभग 50 साल पहले तक भारत में चावल की लगभग 50,000 से 60,000 किस्में उगाई जाती थीं।

हमारी जीवनदायी धरती जीवन के रंग-बिरंगे रूपों से सजी है। भांति-भांति के पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं की उपस्थिति धरती को जीवनमय बनाए हुए है। विभिन्न जीवों का घर हमारी पृथ्वी अपनी अनोखी जैवविविधता के कारण विशिष्ट है। जैव विविधता के कारण धरती मनोहर और सुंदर बनी हुई है। हमारा देश भी जैवविविधता के मामले में संपन्न है। देश की इसी जैवविविधता से आम जनता को अवगत कराने के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय एवं विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा 5 जून से एक जैवविविधता स्पेशल ट्रेन चलायी गयी है।
पर्यावरण के बिना जीवन असंभव
Posted on 02 Jul, 2012 04:43 PM
वर्तमान युग औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण का युग है। जहाँ आज हर काम को सुगम और सरल बनाने के लिए मशीनों का उपयोग होने लगा हैं, वहीं पर्यावरण को नुकसान भी पहुंचा रहे हैं। पर्यावरण, ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य उपहार है, जो संपूर्ण मानव समाज का एकमात्र महत्वपूर्ण और अभिन्न अंग है। प्रकृति द्वारा प्रदत्त अमूल्य भौतिक तत्वों- पृथ्वी, जल, आकाश, वायु एवं अग्नि से मिलकर पर्यावरण का निर्माण हुआ हैं। यदि म
अनोखे पारिस्थितिकी तंत्र महासागर
Posted on 08 Jun, 2012 09:50 AM

हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विश्व की लगभग 21 प्रतिशत आबादी महासागरों से लगे 30 किलोमीटर तटीय क्षेत्र में निवास करती है इसलिए अन्य जीवों के साथ-साथ मानव समाज के लिए भी प्रदूषण मुक्त महासागर कल्याणकारी साबित होंगे। इसके अलावा पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने वाले पारितंत्रों में समुद्र की उपयोगिता को देखते हुए यह आवश्यक है कि हम समुद्री पारितंत्र के संतुलन को बनाए रखें।

महासागर पृथ्वी पर जीवन का प्रतीक है। पृथ्वी पर जीवन का आरंभ महासागरों से माना जाता है। महासागरीय जल में ही पहली बार जीवन का अंकुर फूटा था। आज महासागर असीम जैवविविधता का भंडार है। हमारी पृथ्वी का लगभग 70 प्रतिशत भाग महासागरों से घिरा है। महासागरों में पृथ्वी पर उपलब्ध समस्त जल का लगभग 97 प्रतिशत जल समाया है। महासागरों की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि पृथ्वी के सभी महासागरों को एक विशाल महासागर मान लिया जाए तो उसकी तुलना में पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक छोटे द्वीप से प्रतीत होंगे। मुख्यतया पृथ्वी पर पाँच महासागर हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं- प्रशांत महासागर, हिन्द महासागर, अटलांटिक महासागर, उत्तरी ध्रुव महासागर और दक्षिणी ध्रुव महासागर। महासागरों का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से महत्व मानव के लिए इन्हें अतिमहत्वपूर्ण बनाता है। इसलिए महासागरों के प्रति जागरूकता के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रतिवर्ष 08 जून को विश्व महासागर दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष की थीम युवा बदलाव की अगली लहर।

पृथ्वी रहेगी तो जीवन बचेगा
Posted on 18 Apr, 2012 12:24 PM

पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल पर विशेष


ग्लोबल वार्मिंग आज पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई है। सबसे अजीब बात यह है कि जो विकसित देश इस समस्या के लिए अधिक जिम्मेदार हैं वहीं विकासशील व अन्य देशों पर इस बात के लिए दबाव बना रहे हैं कि वो ऐसा विकास न करें जिससे धरती का तापमान बढ़े। हालांकि वो खुद अपनी बात पर अमल नहीं करते लेकिन दूसरों देशों को शिक्षा देते हैं। बहरहाल बात चाहे जो हो विभिन्न देशों के आपसी विवाद में नुकसान केवल हमारी पृथ्वी का ही है।

पृथ्वी पर कल-कल बहती नदियां, माटी की सोंधी महक, विशाल महासागर, ऊंचे-ऊंचे पर्वत, तपते रेगिस्तान सभी जीवन के असंख्य रूपों को अपने में समाए हुए हैं। वास्तव में अन्य ग्रहों की अपेक्षा पृथ्वी पर उपस्थित जीवन इसकी अनोखी संरचना, सूर्य से दूरी एवं अन्य भौतिक कारणों के कारण संभव हो पाया है। इसलिए हमें पृथ्वी पर मौजूद जीवन के विभिन्न रूपों का सम्मान और सुरक्षा करनी चाहिए। परंतु पिछले कुछ दहाईयों के दौरान मानवीय गतिविधियों एवं औद्योगिक क्रांति के कारण पृथ्वी का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा है। दिशाहीन विकास के चलते इंसानों ने प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया है। परिणामस्वरूप आज हवा, पानी और मिट्टी अत्यधिक प्रदूषित हो चुके हैं। इस प्रदूषण के कारण कहीं लाइलाज गंभीर बीमारियां फैल रही हैं तो कहीं फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है।
प्रकृति की अनोखी प्रयोगशाला
Posted on 28 Feb, 2012 11:29 AM
हमारे आस-पास मौजूद हर वस्तु पर्यावरण का हिस्सा है और इस पर्यावरण को बनाने में प्रकृति की अहम भूमिका रही है। विज्ञान प्रसार द्वारा प्रकाशित पुस्तक प्रकृति की प्रयोगशाला नामक प्रकृति की इसी अहम भूमिका को समझाने का प्रयास करती है। इस पुस्तक के अनुसार प्रकृति मानव को सीखने हेतु परिवेश प्रदान करती है। प्रकृति मानव की सभी सृजनात्मक अनुभूतियों के लिए मंच प्रदान करती है। गहन विचारों को छोड़ दें तो बच्चों
दलदली जमीन का संरक्षण कीजिए
Posted on 02 Feb, 2012 10:21 AM
नमभूमियां अर्थात दलदल भूमि प्रकृति का एक ऐसा अनोखा और अनुपम स्वरूप है जो हमारे पर्यावरण संरक्षण में विशेष योगदान देते हैं। असल में नमभूमि अपनी अनोखी पारिस्थितिकी संरचना के कारण महत्वूपर्ण है। नमभूमियों के अंतर्गत झीलें, तालाब, दलदली क्षेत्र, हौज, कुण्ड, पोखर एवं तटीय क्षेत्रों पर स्थित मुहाने, लगून, खाड़ी, ज्वारीय क्षेत्र, प्रवाल क्षेत्र, मैंग्रोव वन आदि शामिल हैं। गुजरात को नलसरोहर, उड़ीसा की चिल्का झील और भितरकनिका मैंग्रोवन क्षेत्र, राजस्थान का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान तथा दिल्ली का ओखला पक्षी अभयारण्य नमभूमि क्षेत्र के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। अभी तक विश्व भर के 1,994 नमभूमियों के रूप में चिन्हित किया गया है जो करीब उन्नीस करोड़ अठारह लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल पर फैली हुई है। इन क्षेत्रों में से 35 प्रतिशत क्षेत्र पर्यटन संभावित क्षेत्र हैं। इसलिए इन क्षेत्रों में इको-पर्यटन को बढ़ावा देने और वहां धारणीय विकास (सस्टेनेबल डेवलेपमेंट) के लिए इस बार के विश्व नमभूमि दिवस का थीम ‘नमभूमि और पर्यटन’ रखा गया है। नमभूमियां भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 4.63 प्रतिशत क्षेत्रफल पर फैली हुई है यानी कुल 15,26,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर। इनसे अलावा 2.25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल से कम आकार वाली करीब 5,55,557 छोटी-छोटी नमभूमियां चिन्हित की गई हैं।
ग्लोबल वार्मिंग का समाधानः गांधीगीरी
Posted on 30 Jan, 2012 11:59 AM
‘‘ग्लोबल वार्मिंग का समाधानः गांधीगीरी’’ पुस्तक में जलवायु परिवर्तन को समझाने के साथ ही गांधीगीरी के द्वारा इससे निपटने के तरीकों पर विचार व्यक्त किया गया है। पुस्तक में भूमिका और प्रस्तावना के अतिरिक्त 14 अध्याय है। भूमिका में लेखक कहते हैं कि ‘‘मानवीय गतिविधियों के कारण वैश्विक तापन यानी ग्लोबल वार्मिंग के कारण उत्पन्न हो रहे विभिन्न खतरों से इस ग्रह के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं
जलवायु परिवर्तनः एक गंभीर समस्या
Posted on 27 Jan, 2012 11:29 AM
सूर्य से तीसरा ग्रह पृथ्वी, हमारे सौर मंडल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ जीवन अपने पूर्ण रूप में फल-फूल रहा है। वनस्पति, सूक्ष्मजीव, जीव-जन्तु यानी जीवन के विभिन्न रूप एक नाजुक संतुलन पर टिके हैं। एक ऐसा संतुलन जिसमें सभी जीव-जन्तु मिलकर अपने अस्तित्व को बचाए रखते हैं या फिर यूँ कहे कि एक दूसरे के अस्तित्व का सहारा हैं। लेकिन आज जब दुनिया विकास की अंधी दौड़ लगा रही है ऐसे में अनेक नाजुक संतुलन गड़बड
खतरे में हैं नमभूमियां और प्रवासी पक्षी
Posted on 24 Jan, 2012 11:01 AM

(19-22 जनवरी, 2012 के दौरान गुजरात में आयोजित द्वितीय ग्लोबल बर्ड वॉचर्स कांफ्रेंस पर आधारित लेख)

धरती का रक्षा कवच ओज़ोन आवरण
Posted on 15 Sep, 2011 10:12 AM

इस समस्या का निदान सिर्फ एक दिन इसके लिए आरक्षित कर देने और समारोह मनाने से नहीं हो सकता है बल

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